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यादवों ने किस कृष्ण का निर्माण किया है?

पिछड़ों के साहित्य की खोज में जेल की कोठरियों की छानबीन, अदालती पराजयों का गहन अध्ययन, फांसी के फंदों और थानों की हवालातों के विश्लेषण से पिछड़ों का साहित्य खोजने की परिकल्पना की गई है। इसके साथ ही आदि लिपिकार पथरकटों, आदि आविष्कारक चरवाहों, किसानों, देशों के अन्वेषक और खोजी मल्लाहों, नाइयों, धोबियों, बुनकरों की ऐतिहासिक जीवन यात्राओं के अलावा विभिन्न घटनाओं के प्रभावों का गहन अध्ययन भी एक मुख्य परिकल्पना है और मुझे लगता है इन्हीं सब में एक विराट पिछड़ा साहित्य मौजूद है।

नांदेड़ : राजनीति और शासन जाति की सड़ांध से प्रेमियों को नहीं बचा सकते

इस कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि सक्षम और आंचल के रिश्ते के बारे में परिवार में सभी जानते थे और उन्होंने उनके रिश्ते को स्वीकार करने का नाटक किया, लेकिन यह परिवार की एक चाल थी और आखिरी दिन उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आंचल ने अपना विरोध दिखाया और सक्षम की लाश से शादी कर ली। 'सिंदूर' लगाया और मांग की कि उसके माता-पिता और भाइयों को फांसी दी जाए।

विषमतम दौर में भारत और भारतीय संविधान (डायरी 27 जनवरी, 2022)

कल भारत में जनतंत्र दिवस दिवस मनाया गया। कायदा तो यह होना चाहिए था कि इस मौके पर भारतीय संविधान को याद किया जाता...

क्या सुरक्षित नहीं हैं अंबेडकर आंदोलन से जुड़ी ऐतिहासिक चीजें और जगहें

क्या अम्बेडकरी समाज के लोग महाड़ के इन ऐतिहासिक स्थलों को एक बेहद महत्वपूर्ण स्मारक के तौर पर नहीं रख सकते? क्या महाराष्ट्र के अम्बेडकरी समाज के लोग सरकार से इन स्थलों को अच्छे स्मारकों के तौर पर विकसित करने के बात नहीं कर सकते। ये सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि इतिहास का महत्वपूर्ण अंश आपकी यादों से गायब करने के प्रयास किये जा रहे हैं इसलिए सावधान रहने की आवश्यकता है।

गरीबी और जाति दोनों के परिचालन एवं प्रभाव की तीक्ष्णता तथा मारकता में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है

तीसरा और आखिरी भाग क्या ग़रीबी और जाति-भेद व्यक्ति को समान रूप से रोकते हैं या कोई अधिक घातक है? ग़रीबी और जाति-भेद व्यक्ति के जीवन...

जवन कर दिही अन्हार, उ अंजोर का करी…(डायरी 24 नवंबर, 2021)

आज मेरी जेहन में एक बात चल रही है। मैं यह सोच रहा हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना सांड़ कहे जानेवाले पशु...

हमें न गाँधी का राम चाहिए न आर एस एस का राम चाहिए!

जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता विद्या भूषण रावत का विकास तर्कवादी विचारकों-लेखकों के सान्निध्य में हुआ। वे जीवन और समाज की हर चीज को संशय और...

 मेरा गांव सोन नद की बांहों में विचारों में उलझी मेरी महबूबा सा…

मेरा गांव सोन नद की बांहों में विचारों में उलझी मेरी महबूबा सा..... कभी गांव को लेकर मैंने एक लंबी कविता लिखी थी। यह कविता मेरे आलोचकीय विवेक पर...

क्या आप डॉ रत्नप्पा भरमप्पा कुम्हार को जानते हैं?

उत्तर भारत और हिन्दी भाषियों के लिए यह नाम शायद बिलकुल नया होगा क्योंकि इससे पहले इस पर कोई सार्वजनिक चर्चा नहीं हुई। वैसे...

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