क्या आप डॉ रत्नप्पा भरमप्पा कुम्हार को जानते हैं?

शिवदास

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उत्तर भारत और हिन्दी भाषियों के लिए यह नाम शायद बिलकुल नया होगा क्योंकि इससे पहले इस पर कोई सार्वजनिक चर्चा नहीं हुई। वैसे भी हिन्दी समाज में वास्तविक नायकों की जगह मिथकीय नायकों को ज्यादा आदर देने की परंपरा रही है इसलिए अधिकतर लोगों को पाता ही नहीं कि जिसे वे अपना नायक मानते हैं उसने उनके या उनके समाज के लिए क्या किया है। हिन्दी प्रदेश की यह विडम्बना है कि वहाँ पूजा होती रही लेकिन सवाल कम से कम उठाए जाते रहे हैं।

यह और बात है कि बीते कुछ वर्षों में बहुजन समाजों में अपने नायकों को जानने और उन्हें सम्मान देने की परंपरा शुरू हुई है। जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, शाहूजी महाराज, डॉ अंबेडकर, पेरियार, अय्यंकाली, गाडगे बाबा, जगदेव प्रसाद, ललई सिंह यादव, रामस्वरूप वर्मा, बीपी मंडल, संतराम बीए, महाराज सिंह भारती और चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु आदि के प्रति तेजी से आदर बढ़ा है और इनकी जयंती और पुण्यतिथियों पर आयोजन और विचार गोष्ठियाँ होने लगी हैं।

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इससे सामाजिक जागृति और भागीदारी के प्रति चेतना बढ़ी है। इसी के साथ सामाजिक अन्याय की शिनाख्त में भी तेजी आई है। सामाजिक वंचना और उत्पीड़न के सवाल तेजी से उठे हैं और इन प्रक्रियाओं ने राजनीतिक रूप से भारी उथल-पुथल पैदा कर दी है। अब सभी समाजों का कोई न कोई राजनीतिक चेहरा सामने आ रहा है। वह निगोसिएट करने की स्थिति में आने के बाद अपने सामाजिक हितों को पूरा करने के लिए विधानसभाओं और संसद की ओर जाना चाहता है।

अब कोई भी समाज किसी एक राजनीतिक पार्टी का मुखापेक्षी नहीं रह गया है। उस पर कॉंग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा कोई भी अपना पक्का दावा नहीं कर सकता। अब सभी को नई-नई रणनीतियों के साथ मैदान में उतरना अनिवार्य हो गया है। दूसरे शब्दों में यह साफ-साफ कहा जा सकता है कि कई कमजोर समुदाय मिलकर अपने से कई गुना मजबूत दिखनेवाले समाजों को धूल चटा सकते हैं। यह संभव हुआ है उस सामाजिक जागृति से जिसमें अपने नायकों को चुनने और उन्हें इज्जत देने की प्रक्रिया शुरू हुई है।

इस कड़ी में ही रत्नप्पा कुंभार को भी देखा जाना चाहिए। आज उनकी 113वीं जयंती है। वे भारतीय संविधान सभा के सदस्य, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पूर्व सांसद, महाराष्ट्र सरकार के पूर्व गृह, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री, महाराष्ट्र विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष थे। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित किया था।

अब कोई भी समाज किसी एक राजनीतिक पार्टी का मुखापेक्षी नहीं रह गया है। उस पर कॉंग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा कोई भी अपना पक्का दावा नहीं कर सकता। अब सभी को नई-नई रणनीतियों के साथ मैदान में उतरना अनिवार्य हो गया है। दूसरे शब्दों में यह साफ-साफ कहा जा सकता है कि कई कमजोर समुदाय मिलकर अपने से कई गुना मजबूत दिखनेवाले समाजों को धूल चटा सकते हैं।

 

कौन थे रत्नप्पा कुम्भार

रत्नप्पा कुम्हार का पूरा नाम डॉ. रत्नप्पा भरमप्पा कुम्भार है। वह भारतीय संविधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ भारतीय संविधान के अंतिम मसौदे पर हस्ताक्षर भी किया था। उनका जन्म 15 सितंबर 1909 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिरोल तहसील क्षेत्र के नीमशीर गांव में हुआ था।

उनके पिता का नाम भरमप्पा कुम्भार था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा कोल्हापुर स्थित राजाराम हाई स्कूल से ग्रहण की। इसके बाद उन्होंने 1933 में कोल्हापुर स्थित राजाराम कॉलेज से अंग्रेजी विषय में स्नातक की उपाधि हासिल की। फिर वे कानून की पढ़ाई करने लगे। बाद में पुणे विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि से भी नवाजा था। उन्होंने 1934 में पार्वती देवी से शादी की। उनके परिवार में तीन बेटियां हैं।

डॉ. रत्नप्पा ने 15 फरवरी 1938 को सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार माधवराव बागल और कवि दिनकर देसाई आदि के साथ मिलकर प्रजापरिषद नामक संगठन की स्थापना की। इसके बैनर तले वे लोगों को रियासतों के शासकों के खिलाफ लामबंदकरने लगे। उन्हें लोगों का समर्थन भी मिलने लगा था। इससे नाराज कोल्हापुर रियासत के शासकों ने 8 जुलाई 1939 को उन्हें और देसाई को गिरफ्तार कर लिया। कोल्हापुर की रियासत ने उन पर जुर्माना लगाया।

वहां से रिहा होने के बाद उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसकी वजह से उन्हें छह साल तक भूमिगत भी रहना पड़ा था। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनके समर्पण और कार्यों की वजह से लोगों ने उन्हें देशभक्त की उपाधि दे दी जिसकी वजह से उन्हें देशभक्त रत्नप्पा कुम्भार कहा जाने लगा।

बड़ी औद्योगिक, सामाजिक और राजनीतिक भूमिकाएँ

डॉ. रत्नप्पा ने 15 फरवरी 1938 को सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार माधवराव बागल और कवि दिनकर देसाई आदि के साथ मिलकर प्रजापरिषद नामक संगठन की स्थापना की। इसके बैनर तले वे लोगों को रियासतों के शासकों के खिलाफ लामबंदकरने लगे। उन्हें लोगों का समर्थन भी मिलने लगा था। इससे नाराज कोल्हापुर रियासत के शासकों ने 8 जुलाई 1939 को उन्हें और देसाई को गिरफ्तार कर लिया।

 

देश की आजादी के बाद डॉ. रत्नप्पा ने 24 जनवरी 1950 को बॉम्बे प्रांत से भारतीय संविधान सभा के सदस्य के रूप में शपथ ली और भारतीय संविधान के अंतिम मसौदे पर बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ हस्ताक्षर किया। 1952 में डॉ. रत्नप्पा कांग्रेस पार्टी से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए। 1955 में उन्होंने हत्कनांगल तहसील क्षेत्र में पंचगंगा सहकारी चीनी उद्योग की स्थापना की।

उन्होंने महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन और शिक्षा के क्षेत्र में में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देशभक्त रत्नप्पा कुम्हार ने 1933 में शाहाजी लॉ कॉलेज, 1955 में पंचगंगा कोऑपरेटिव सुगर फैक्टरी, 1957 में डॉ. रत्नप्पा कुम्भार कॉलेज ऑफ कॉमर्स, 1960 में दादा साहेब मग्दम हाई स्कूल, 1961 में नव महाराष्ट्रा कोऑपरेटिव प्रिंटिंग एवं पब्लिकेश सोसाइटी लिमिटेड, 1963 में कोल्हापुर जनता सेंट्रल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर स्टोर्स, 1963 में रत्नदीप हाई स्कूल, इचलकरांजी, 1968 में कोल्हापुर जिला शेतकारी वींणकारी सहकारी सूत गिरानी लिमिटेड, इचलकरांजी, 1971 में नाइट कॉलेज ऑफ आर्ट्स ऐंड कॉमर्स कोल्हापुर और 1975 में कोल्हापुर एल्यूमिना इंडस्ट्री (1975) की स्थापना की।

इचलकरंजी निवासी देशभक्त रत्नप्पा कुम्हार महाराष्ट्र विधानसभा में शिरोल विधान परिषद सीट से करीब 28 साल तक विधायक रहे। वह 1962 से 1982 तक लगातार 20 साल तक विधान परिषद में शिरोल का प्रतिनिधित्व करते रहे।

वह 1974 से 1978 तक महाराष्ट्र सरकार में गृह मंत्री और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री भी रहे। 1982 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि समाज सेवा के क्षेत्र उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 1985 में उन्हें पद्मश्री अवार्ड से नवाजा। वह 1990 में एक बार फिर से शिरोल विधानसभा से निर्वाचित हुए और अपनी मृत्यु तक विधायक रहे। उनकी मृत्यु 23 दिसंबर 1998 को हार्ट अटैक की वजह से हो गई थी।

वह 1995 में महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष भी बने थे। कोल्हापुर में उनके नाम पर देशभक्त रत्नप्पा कुम्भार कॉलेज ऑफ कॉमर्स (1957) का संचालन आज भी होता है। वह उसके संस्थापक अध्यक्ष थे। नागपुर के कामटी  में रामदास खोपे ने देशभक्त रत्नप्पा कुम्भार विद्यालय की स्थापना भी की है।

प्रजापति समाज के आइकॉन

डॉ रत्नप्पा कुम्भार का व्यक्तिव और कृतित्व बहुत प्रभावशाली रहा है। भारत की सर्वाधिक श्रमजीवी जातियों में से एक कुम्भार जाति के लिए यह गौरव की बात है कि डॉ रत्नप्पा उसके पूर्वज थे, जिन्होंने देश और समाज के लिए इतना काम किया है। वे न सिर्फ जनता की बेहतरी और आज़ादी के लिए कोल्हापुर रियासत से लड़े बल्कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में भी उनका बहुत अधिक योगदान है।

डॉ रत्नप्पा ने समाज सुधार और सामाजिक उत्थान के लिए दर्जनों संस्थाओं का गठन किया। स्कूल, कॉलेज और बैंक के अलावा अनेक सहकारी समितियों की स्थापना भी की। वे अपनी राजनीतिक भूमिका में भी बहुत प्रखरता से समाज के लिए सक्रिय रहे। पीएस-4 यानि प्रजापति शोषित समाज संघर्ष समिति के प्रमुख छेदी लाल निराला ने बताया कि संतराम बीए के बाद डॉ रत्नप्पा प्रजापति समाज के बड़े आइकॉन हैं। इनकी जयंती के माध्यम से हम व्यापक दायरे में इस संदेश को पहुंचाएंगे कि प्रजापति समाज को किसी राजनीतिक दल का पिछलग्गू नहीं, बल्कि एक राजनीतिक ताकत बनना है।

निराला यह भी कहते हैं कि ‘पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश की सामंती और फासीवादी ताकतों द्वारा प्रजापति समाज पर घातक हमले किए गए लेकिन उत्तर सरकार उन्हें सुरक्षा और न्याय दिलाने में अक्षम रही है। समाज में बिखराव होने से अन्याय के खिलाफ उठने वाली आवाजें दब जाती रही हैं लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।’

यह तो आनेवाला समय ही बताएगा कि समाज में राजनीतिक और सांस्कृतिक जागृति कितनी तेजी से बढ़ती है लेकिन इतना तो तय है कि उसकी शुरुआत हो चुकी है। अब इस समाज के हर हिस्से में जागृति फ़ेल रही है और अन्याय के खिलाफ मुट्ठियाँ तनने लगी हैं।

शिवदास जाने-माने युवा पत्रकार और वनाञ्चल एक्सप्रेस के संपादक हैं।

3 Comments
  1. Umesh Yadav says

    नयी जानकारी. शिवदास जी को हार्दिक बधाई. गाँव के लोग को धन्यवाद.

  2. Raj prajapati says

    Prajapati Samaj जय रत्नप्पा भरप्पा कुंभार

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