आज के सन्दर्भ में महाड़ आन्दोलन का महत्व

विद्या भूषण रावत

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अम्बेडकरी आन्दोलन के इतिहास में महाड़ एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान है जहा बाबा साहेब आंबेडकर ने लोगों को संघर्ष का रास्ता दिखाया और यह भी साबित किया के किसी भी आन्दोलन की जीत में वैचारिक स्पष्टता बहुत आवश्यक है। इस वर्ष अगस्त में जब मैं महाड़ गया था तो मैंने इन ऐतिहासिक जगहों को देखने की कोशिश की। यहाँ के उस चवदार तालाब में, जहाँ बाबा साहेब ने पानी पीकर दलितों-वंचितों को उनके पीने के पानी के मूल अधिकार को दिलाया था, वहाँ पहुंचकर बेहद प्रसन्नता भी हुई और दुःख भी हुआ। इस ऐतिहासिक स्थल को जैसे रखा जाना चाहिए था वैसा नहीं हुआ और यहाँ की नगरपालिका ने इसे मात्र एक पार्क में तब्दील कर दिया है। पार्क से जुड़ा एक आंबेडकर मेमोरियल है वो भी अधिकांशतः बंद रहता है। चवदार तालाब के मध्य बाबा साहेब की एक मूर्ति है और गेट पर इस संघर्ष का थोड़ा-सा जिक्र है। चवदार तालाब के बाद मैंने सोचा कि उस स्थल को भी देखूँ जहा मनुस्मृति का दहन हुआ था और 25-27 दिसंबर तक महिला सम्मेलन हुआ था। लेकिन वह मुझे कहीं नहीं दिखाई दिया। मुझे महसूस हुआ कि मनुस्मृति दहन दिवस पर लोगों ने सांकेतिक कार्यक्रम तो किये लेकिन महाराष्ट्र में उस स्थल को संरक्षित और सुरक्षित करने का कोई प्रयास नहीं हुआ जहाँ यह जलाई गयी थी। इससे मुझे यह अहसास हुआ कि शायद सत्ताधारी इसे स्वीकार नहीं करेंगे। यह एक बहुत क्रांतिकारी कदम था और इसके स्मारक को बनाने का मतलब होगा कि जातिवादियों को रोज-रोज अपने इतिहास से रूबरू होना पड़ता जो उनके लिए असंभव था। मैं तो दुनियाभर के अंबेडकरवादियों से कहूंगा कि वे इस ऐतिहासिक स्थल को एक बड़े स्मारक के तौर पर बनाने के प्रयास जरूर करें।

छुआछूत, जातिवाद, धर्मान्धता के विरुद्ध संघर्ष केवल दलितों की जिम्मेवारी नहीं है अपितु संवेदनशील व्यक्तियों का साथ होना जरूरी है। यह वैचारिक लड़ाई है किसी व्यक्ति या जातिविशेष के विरुद्ध नहीं। यही कारण है कि मनुस्मृति को जलाने के लिए प्रस्ताव रखने वाले गंगाधर नारायण सहस्त्रबुद्धे चितपावन ब्राह्मण थे और बाबा साहेब के बेहद करीबी मित्र भी। उनके विचारों का अनुमोदन पी एन राजभोज ने किया और फिर इन दोनों ने मनुस्मृति को दहन करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। मतलब यह कि ब्राह्मणवाद या मनुवाद के विरुद्ध लड़ाई में सभी जातियों की आवश्यकता है

महाड़ आन्दोलन यह दिखाता है कि कानूनी अधिकार मिलने की बाद भी दलितों को उसे लागू करवाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और यह कि सत्ताधारी अपनी जातियों को तब तक नाराज नहीं कर सकते जब तक इसके विरुद्ध बड़ा आन्दोलन न हो या कोई न्यायलय का रास्ता न अपनाए। दूसरी बात यह कि, किसी भी आन्दोलन की जीत के पीछे हमें अपनी वैचारिकता को सशक्त करना पड़ेगा क्योंकि यह आन्दोलन महाड़ में जरूर हुआ लेकिन इसने पूरे देश में दलितों में बहुत बड़ी चेतना का प्रवाह किया। तीसरी बात यह कि बिना महिलाओं की भागीदारी और साझीदारी के हम कोई आन्दोलन जीत नहीं सकते हैं। चौथा यह कि छुआछूत, जातिवाद, धर्मान्धता के विरुद्ध संघर्ष केवल दलितों की जिम्मेवारी नहीं है अपितु संवेदनशील व्यक्तियों का साथ होना जरूरी है। यह वैचारिक लड़ाई है किसी व्यक्ति या जातिविशेष के विरुद्ध नहीं। यही  कारण है कि मनुस्मृति को जलाने के लिए प्रस्ताव रखने वाले गंगाधर नारायण सहस्त्रबुद्धे चितपावन ब्राह्मण थे और बाबा साहेब के बेहद करीबी मित्र भी। उनके विचारों का अनुमोदन पी एन राजभोज ने किया और फिर इन दोनों ने मनुस्मृति को दहन करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। मतलब यह कि ब्राह्मणवाद या मनुवाद के विरुद्ध लड़ाई में सभी जातियों की आवश्यकता है। वैसे भी महाड़ आन्दोलन की पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। आखिर बाबा साहेब को यह सब क्यों करना पड़ा!

महाड़ तालुका महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले का हिस्सा है और बम्बई से करीब 165 किलोमीटर की दूरी पर है। ये सभी बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा थे। 4 अगस्त 1923 को बॉम्बे विधान परिषद् में सीताराम केशव बोले ने, जो नॉन ब्राह्मण पार्टी के विधायक थे और सत्य शोधक समाज से जुड़े थे, ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया कि वही सार्वजानिक स्थान जो जनता के पैसो से बने हैं और जिनका सञ्चालन सरकार द्वारा होता है —  जैसे तालाब, पानी पीने के अन्य स्थल, धर्मशालाएँ, स्कूल, डिस्पेंसरी, न्यायालय, सरकारी कार्यालय आदि सभी को दलितों और अन्य वंचित समुदायों के लिए बिना भेदभाव के खोल दिया जाना चाहिए। बोले स्वयं भंडारी समुदाय से आते है जो ताड़ी निकालने का कार्य करते हैं,  लेकिन वह बाबा साहेब से इतना प्रभावित थे कि बाद में इंडियन लेबर पार्टी के सदस्य बने और खोटी विरोधी आन्दोलन में बाबा साहेब को नेतृत्व करने के लिए बुलाया। बॉम्बे विधान परिषद् में उन्होंने बहुत से प्रगतिशील विधेयक रखे हालांकि बाद में वे हिन्दू महासभा में भी शामिल हो गए और अंत तक उसमें ही बने रहे।

जनवरी 1924 में महाड़ नगर पालिका के अध्यक्ष सुरेन्द्र टिपनिस ने बॉम्बे प्रेसिडेंसी द्वारा पारित किये गए प्रस्ताव को स्वीकार करने की घोषणा कर दी, लेकिन जैसा कि भारत में होता है, इस घोषणा के बाद भी सार्वजानिक स्थलों पर दलित- पिछड़ों को बैठना तो दूर की बात, पानी तक नहीं पीने दिया जाता था और इस सन्दर्भ में कोई राजनैतिक आन्दोलन भी नहीं हो रहा था। पता नहीं, गाँधी जी और कांग्रेस पार्टी कहाँ छुपी हुई थी। उस वक्त न वामपंथी और न ही कोई हिन्दुत्ववादी इस दौर में खड़ा हुआ और ब्राह्मणों की इस सामाजिक-सांस्कृतिक राजनैतिक सत्ता को चुनौती दी। फिर भी 1927 आते आते कई लोगों को यह अखरने लगा और सुरेन्द्र टिपनिस, सहस्रबुद्धे और ए वी चित्रे ने महाड़ में इस विषय में बैठक आयोजित करने का फैसला किया। उन सभी ने बाबा साहेब आंबेडकर से सम्पर्क किया और इस प्रकार इस सभा का आयोजन बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने किया लेकिन इसमें तथाकथित बड़ी जातियों के भी कुछ लोग शामिल हुए। इस बैठक की तिथि 19-20  मार्च 1927 रखी गयी। बाबा साहेब ने पहले से ही दलित महिलाओं में स्वाभिमान जगाने के लिए कई बैठकें की थी इसलिए इस बैठक में भी बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं ने भागीदारी की। इस सम्मलेन में अपनी बात रखने के बाद बाबा साहेब के नेतृत्व में हजारों लोगों ने चवदार तालाब की और प्रस्थान किया जहाँ बाबा साहेब ने उसमें से हाथ में पानी लेकर आचमन किया और उसे पिया। इस प्रकार पानी के अधिकार को मूल अधिकार और सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार के साथ जोड़ा।

बाबा साहेब के इस आन्दोलन से मनुवादियों में गुस्से की लहर दौड़ गयी। शहर में तनाव बढ़ गया और ब्राह्मणवादियो ने अपने कर्मकांड से पुनः उस तालाब को शुद्ध किया। उन्होंने पानी पीने की इस घटना के साथ कई अफवाहें उड़ाई लेकिन बाबा साहेब ने अपना काम कर दिया था और वह रुकने वाले नहीं थे। उन्हें पता था कि वह कानून के अनुसार काम कर रहे थे। कई किस्म के मुकदमें ठोंककर मामले को लटकाया गया। कहा गया के निजी तालाबों पर ये नियम क्यों लागू हों? बाबा साहेब ने इस केस को मजबूती से लड़ा और बॉम्बे उच्च न्यायलय ने अंत में 1937 में, यानी दस वर्ष बाद, यह फैसला दिया के सार्वजनिक स्थानों पर पानी पीने का अधिकार सभी को है और सभी वहाँ आ-जा सकते हैं।

बाबा साहेब आंबेडकर न केवल एक कानूनी लड़ाई लड़ना चाहते थे अपितु इस आन्दोलन के जरिये दलितों, महिलाओं और छोटे किसानों में स्वाभिमान का संचार भी करना चाहते थे। वह जानते थे कि उनके जाने के बाद हालात वैसे ही होंगे और इसलिए इस सामाजिक आन्दोलन को आगे बढ़ाना ही होगा। इसलिए महाड़ में ही बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने 25  दिसंबर से लेकर 27 दिसंबर तक एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें बाबा साहेब को ही नेतृत्व करना था। मार्च की घटना के बाद, जिला प्रशासन बाबा साहेब आंबेडकर को बहाँ नहीं आने देने पर तुला था। उसने अनेकों प्रकार से उनको समझाया कि वहाँ न आएँ। बम्बई से महाड़ आने वाली बसों ने उस दिन हड़ताल कर दी। ब्राह्मणों ने कार्यक्रम की पूर्व संध्या पर चवदार तालाब मामले में न्यायलय से स्टे ले लिया था। कार्यक्रम आयोजित करने के लिए उन्हें सार्वजानिक स्थल भी उपलब्ध नहीं करवाए गए। ऐसे में एक मुस्लिम फत्ते खान ने उन्हें अपनी निजी भूमि पर कार्यक्रम करने का आमंत्रण दिया और लोगों के लिए खान-पान की व्यवस्था करवाई। 25 दिसंबर को सत्याग्रहियों ने बाबा साहेब के नेतृत्व में चवदार तालाब के आगे नारेबाजी  की और वापस कार्य्रकम स्थल पर आये। शाम को भरी सभा में बाबा साहेब के सहयोगी जी एन सहश्रबुद्धे ने मनुस्मृति को दहन करने का प्रस्ताव रखा और पी एन राजभोज ने उसका अनुमोदन किया। उसके बाद इन दोनों लोगो के नेतृत्व में 4 अन्य सत्याग्रहियों ने मनुस्मृति का दहन हिया। बताया जाता है कि सभा में दस हज़ार से अधिक लोग शामिल हुए। अपने प्रस्ताव में सहश्र्बुद्धे ने कहा “हालांकि मै ब्राह्मण हूँ लेकिन मैं मनुस्मृति के ‘सिद्धांतो’ की निंदा करता हूँ। यह कोई धर्म-व्यवस्था नहीं है अपितु असमानता, क्रूरता और अन्याय की व्यवस्था है। मैं यह प्रस्ताव रख रहा हूँ कि मनुस्मृति, जो  पीढियों से लोगों की पीड़ा का कारण है, का दहन किया जाना चाहिए।”  पी. एन राजभोज ने इसका अनुमोदन किया और फिर वह हुआ जिसकी लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

बाबा साहेब के इस आन्दोलन से मनुवादियों में गुस्से की लहर दौड़ गयी। शहर में तनाव बढ़ गया और ब्राह्मणवादियो ने अपने कर्मकांड से पुनः उस तालाब को शुद्ध किया। उन्होंने पानी पीने की इस घटना के साथ कई अफवाहें उड़ाई लेकिन बाबा साहेब ने अपना काम कर दिया था और वह रुकने वाले नहीं थे। उन्हें पता था कि वह कानून के अनुसार काम कर रहे थे। कई किस्म के मुकदमें ठोंककर मामले को लटकाया गया। कहा गया के निजी तालाबों पर ये नियम क्यों लागू हों?

इस सम्मलेन में केवल मनुस्मृति दहन का ही कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सत्याग्रहियों को शपथ भी लेनी थी जो निम्न लिखित है–
1. मै चातुर्वर्ण में विश्वास नहीं करता।

2. मै जातिभेद में विश्वास नहीं करता।

  • मै समझता हूँ कि छुआछूत हिन्दू धर्म का एक अभिशाप है और मैं इसे ईमानदारीपूर्वक ख़त्म करने का प्रयास करूँगा।
  • मैं हिन्दुओं में खान-पान सम्बंधित किसी भी निषेध को नहीं मानूंगा।
  • मैं मानता हूँ कि अछूतों को मंदिर, पानी के स्रोतों, स्कूलों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का प्रयोग करने का पूर्ण अधिकार है।

आज के दौर के लिए इस संघर्ष के मायने 

महाड़ सत्याग्रह से हम बहुत निष्कर्ष निकाल सकते हैं जो आज के सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों के लिए बहुत जरूरी है। बाबा साहेब एक विद्वान् व्यक्ति थे और वह यह जानते थे कि एक किताब जलाकर वो सवर्णवादी मानसिकता को ख़त्म नहीं कर सकते लेकिन वह संकेतों का महत्व भी समझते थे और इसके जरिये समाज को जागृत भी करना चाहते थे। उनके लिए ये संघर्ष एक ‘इवेंट’ नहीं था। कोई भी आन्दोलन केवल सांकेतिक नहीं हो सकती अपितु उसके विचारधारात्मक पहलू को मज़बूत होना होगा इसलिए सत्याग्रहियों के लिए प्रतिज्ञाएं आवश्यक थी। प्रतिज्ञाओं को भी यदि हम देखेँ तो इनमे पूरा खुलापन है और किसी जातिविशेष पर कोई भी टिप्पणी नहीं है।

लड़ाई लम्बी है इसलिए सभी जातियों के प्रगतिशील लोग चाहिए जो अपनी बिरादरियों के गलत होने पर गलत को गलत कह सकने की हिम्मत रखते हो। बाबा साहेब के साथ के प्रमुख लोगों में केवल महार या दलित ही नहीं थे अपितु ब्राह्मण, कायस्थ, मराठा, कुनबी, भंडारी आदि जातियों से भी थे। इसका मतलब यह कि बाबा साहेब जाति उन्मूलन के आन्दोलन में सभी जातियों की भूमिका चाहते थे और उन्हें लगता था कि सबके साथ होने पर ही ये बात आगे बढ़ सकती है, आखिर यदि एक चितपावन ब्राह्मण और एक दलित मनस्मृति को साथ-साथ दहन करते हैं तो यह सामाजिक न्याय और बराबरी की दिशा में बहुत बड़ा कदम है। दुखद यह है कि आज के ‘अस्मिताओं’ के युग में आपकी पहचान इस बात में है कि आप राजनीतिक तौर पर अपनी बिरादरियों को कैसे साथ जोड़ सकते हैं। इसलिए जातीय जोड़-तोड़ में माहिर लोग आगे हैं। वे विभिन्न दलों में अपनी जातीय पहचान के साथ आ रहे हैं और इस प्रकार जाति तोड़क लोग राजनीति के हाशिये पर चले गए हैं। दुखद बात यह है कि राजनीति ने ऐसे प्रगतिशील लोगों को अपनी अपनी बिरादरियो में भी अलग-थलग कर दिया है।

भारत में मात्र कानूनों के बन जाने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा अपितु वैचारिक संघर्ष और इन कानूनों का ईमानदारी से पालन करना और करवाना भी बहुत जरुरी है और उसके लिए वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध लोगों की आवश्यकता होती है जो उनका मूल्यांकन कर सके।

चवदार तालाब के पास खड़े लेखक

महाड़ आन्दोलन के यह भी सबक है कि किसी आन्दोलन की सफलता के लम्बी लड़ाई की जरूरत होती है। यह सबक आज के दौर के राजनेताओं के लिए भी है जिनके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है और जो जातीय हितों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। बाबा साहेब की लड़ाई में अतिपिछड़ों, छोटे किसानों की बड़ी भूमिका थी और 1937 के चुनावों में बॉम्बे प्रेसीडेंसी से इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के 17 उम्मीदवार चुनाव जीते थे इसमें 16 गैर दलित थे। यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 1937 के चुनावों में अधिकांश दलित वोट ही नहीं दे सकते थे क्योंकि वे भूमिहीन थे। यही कारण था के बाबा साहेब आंबेडकर ने  खोती विरोधी आन्दोलन में जाने के एस के बोले के निमंत्रण को स्वीकार किया और उसका नेतृत्व भी किया। बाद में बाबा साहेब ने खोती विरोधी बिल भी बम्बई लेजिस्लेटिव कौंसिल में रखा और इसे पारित करवाया। इस बिल के विरोध में बड़े किसान विशेषकर ब्राह्मण, मराठा और मुसलमान भी शामिल थे लेकिन कुनबी, महार, अग्रहरी और अन्य खेतिहर जातियों में एकता भी बनी। इसी खोती विरोधी बिल की तर्ज पर ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम लाया गया। यानी बाबा साहेब मजदूरों, भूमिहीनों, छोटे किसानों, महिलाओं के प्रश्न को अपनी लड़ाई में जोड़कर एक प्रगतिशील गठबंधन बना रहे थे जिसका वैचारिक धरातल  तर्क और मानववादी सिद्धांतों पर आधारित हो।

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महाड़ आन्दोलन की इन ऐतहासिक धरोहरों को विश्वस्तरीय स्मारकों में बदलने की जरुरत है ताकि हमारी भविष्य की पीढियों को पता चल सके कि उनके अधिकारों के लिए बाबा साहेब ने कैसा संघर्ष किया और किस प्रकार उनके रास्तों में पर्याप्त रोड़े लगाने के बावजूद वे अपने रास्ते पर अडिग रहे ताकि समाज को न्याय दिलवा सकें और नया रास्ता भी दिखा सके।

महाड़ आन्दोलन से महिलाओं में एक नया नेतृत्व पैदा हुआ और उसने अम्बेडकरी आन्दोलन को बेहद मज़बूत किया। बाबा साहेब जानते थे कि किसी भी आन्दोलन की सफलता में महिलाओं की भूमिका सबसे प्रमुख है इसलिए आज के दौर में भी यदि हमें अपने आंदोलनों को मज़बूत करना है तो महिलाओं, किसानों और अन्य वंचित समूहों को तो साथ लेना ही होगा।  यहाँ तक कि उनके बीच वैचारिक क्रांति का सूत्रपात करना होगा। यह भी जरुरी है के भारत में मात्र कानूनों के बन जाने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा अपितु वैचारिक संघर्ष और इन कानूनों का ईमानदारी से पालन करना और करवाना भी बहुत जरूरी है और उसके लिए वैचारिक तौर पर  प्रतिबद्ध लोगों की आवश्यकता होती है जो उनका मूल्यांकन कर सकें।

आज मनुस्मृति को दिलों से हटाने की आवश्यकता है। बाबा साहेब जानते थे कि बिना विकल्प के हम कभी भी कोई नया समाज नहीं बना सकते और अपने को ब्राह्मणवाद की आलोचना तक सीमित रखते है इसलिए उन्होंने बुद्ध के रास्ते का विकल्प हम सभी को सुझाया। इसलिए आवश्यक है मानववाद की इस लड़ाई में हमारे साथी बाबा साहेब की वैचारिकी को आगे बढ़ाएँ और मानववादी समाज की मंजिल को प्राप्त करें। इसके अलावा ये भी महत्वपूर्ण है के मनस्मृति दहन स्थल हमारे ऐतिहासिक स्थलों में कब शरीक होगा। क्या अम्बेडकरी समाज के लोग महाड़ के इन ऐतिहासिक स्थलों को एक बेहद महत्वपूर्ण स्मारक के तौर पर नहीं रख सकते? क्या महाराष्ट्र के अम्बेडकरी समाज के लोग सरकार से इन स्थलों को अच्छे स्मारकों के तौर पर विकसित करने के बात नहीं कर सकते। ये सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि इतिहास का महत्वपूर्ण अंश आपकी यादों से गायब करने के प्रयास किये जा रहे हैं इसलिए सावधान रहने की आवश्यकता है। बाबा साहेब का आन्दोलन एक वैचारिकी का आन्दोलन भी रहा है इसलिए उनको लोगों के दिलो-दिमाग से हटाया नहीं जा सकता लेकिन उनकी निशानियों को हटाने के प्रयास हो रहे हैं और इसलिए महाड़ आन्दोलन की इन ऐतहासिक धरोहरों को विश्वस्तरीय स्मारकों में बदलने की जरूरत है। ऐसा होगा तभी हमारी भविष्य की पीढियों को पता चल सके कि उनके अधिकारों के लिए बाबा साहेब ने कैसा संघर्ष किया और किस प्रकार उनके रास्तों में पर्याप्त रोड़े लगाने के बावजूद वे अपने रास्ते पर आगे बढ़ते रहे। किस प्रकार सारी मुसीबतों को झेलते हुये उन्होंने संघर्ष किया और अपनी जीत के शानदार उदाहरण पेश कर सके।

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

3 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    गहन विश्लेषणपरक, पठनीय और विचारणीय आलेख। बधाई।

    1. राजेश कुमार बौद्ध says

      ऐसा चाहू राज मैं,जहाँ मिले सबन को अन्न।
      छोट बड़ो सब सम बसै,रैदास रहे प्रसन्न।।
      ==================
      देखते हैं कि रविदास की प्रवृत्तियां क्या है? रविदास शुरू में ही कहते हैं-

      चारों वेद करै खंडौति,
      जन रविदास करै दंडौति।
      यानि रविदास को दंडवत वही करें, जो वेदों का खंडन करें। वेदों को नकार कर ही रविदास को स्वीकार किया जा सकता है। वे राम के भक्त भी नहीं है और न सेवक,वे योग यज्ञ भी नहीं करते हैं।
      रविदास जी ऐसे समाज में ऐसी शासन व्यवस्था चाहते है जहाँ सबको भोजन मिले,कोई भी भूखा न सोये और जहाँ छोटे-बड़े की कोई भावना न रहे सभी मनुष्य समान हो और प्रसन्न रहे इसी मैं रैदास भी प्रसन्न है।

      पराधीनता पाप है,
      जान लेहु रे मीत।
      रैदास दास पराधीन सो,
      कौन करे है प्रीत।।
      रविदास वर्णव्यवस्था और उससे उत्पन्न जातिभेद तथा अस्पृश्यता का खंडन करते हैं-

      रविदास जनम के कारने,
      होत न कोई नीच।
      नर कूं नीच कर डारि है,
      ओछे करम की कीच।।
      रविदास का धर्म जातिविहीन हैं,वह मनुष्य को महत्व देता है-
      धर्म की कोई जात नहीं न जात धर्म के माह।
      रविदास चले जो धर्म पे करेंगे धर्म सहाय।।
      जातपात के फेर मह उरझि रहे सब लोग।
      मानुषता को खात है रविदास जात का रोग।।
      रविदास को न मस्जिद से कुछ लेना है, न मंदिर से कोई प्यार है। वह न अल्लाह को मानते हैं और न हरि को। स्पष्ट है कि वह न हिन्दू हैं, न मुसलमान। यथा
      मस्जिद सो कुछ घिन नहीं,
      मंदिर सो नहि प्यार।
      दोउ अल्ला हरि नहि,
      कह रविदास उजार।।
      रविदास जी विनम्र भाव से कहते है की हे मित्र, इस संसार में किसी की गुलामी स्वीकारना,उसके अधीन रहना सबसे बड़ा पाप है इसलिए मनुष्य को कभी गुलाम बन कर नहीं रहना चाहिए तथा जो गुलाम होते है उनसे कोई प्रेम भी नही करता।

      रविदास हमारो राम जी,
      दशरथ करी सूत नांहि।
      राम हमऊ मांहि ऱमि रहयो,
      बिसव कुटम्बह माहि।।
      रविदास जी कहते है की हमारे राम दशरथ के पुत्र नहीं है, हमारे राम तो हमारे शरीर में ही बसे हुए है,और सारा विश्व ही उनके लिए एक परिवार (कुटुंब) है।और वे सारे विश्व में ही रमें है।

      रविदास मदिरा का पीजिए,
      जो चढ़ी-चढ़ी उतराय।
      नाम महारस पीजिए,
      जो चढ़ नहीं उतराय।।
      रविदास जी कहते है की लोगो को ऐसी मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए,जिसका नशा जल्दी ही उतर जाए,बल्कि ऐसे ज्ञान रस का सेवन करना चाहिए,जिसका नशा एक बार चढ़ने के बाद फिर कभी नहीं उतरे, अर्थात जीवन का अन्धकार सत्संग से दूर होता है।अतः ज्ञानवान साधू सन्तों से संपर्क मे रहना चाहिये।
      .
      का मथुरा,का द्वारका,
      का कशी हरिद्वार।
      रविदास खोजा दिल अपना,
      ताऊ मिला दिलदार।।
      रविदास जी तीर्थ भ्रमण को व्यर्थ बताते है,वे कहते है की मेरा भगवान न तो मथुरा में निवास करता है,न द्वारका में न ही कशी और हरिद्वार में उसे खोजना तो व्यर्थ है।क्योंकि मेरा मालिक तो मेरे दिल में रहता है,व्यर्थ के आडम्बर से क्या लाभ।

      रविदास बांभन मत पूजिए,
      जो होवे गुण हीन।
      पूजिए चरन चंडाल के,
      जो हो ज्ञान प्रवीन।।
      रविदास जी कहते है अगर ब्राम्हण में गुण नहीं है तो उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए,बल्कि उस चांडाल के चरणों को पूज लेना उचित है जो गुणों से युक्त है।यहाँ उनका अभिप्राय है की मनुष्य जाती के आधार पर ऊँचा नहीं होता है बल्कि गुण व कर्म से श्रेष्ठ होता है।

      रविदास सत मति तिअरगिये ,
      जो लो घट मांहि प्रान।
      सत भृष्ट करी जगत मांहि,
      सदा होत अपमान।।
      रविदास जी सदबुद्धि की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते है की सदबुद्धि का कभी भी त्याग मत कीजिये क्योंकि जिस तरह से हमारे शरीर में सांसो का संचार हो रहा है, उसी प्रकार सदबुद्धि का भी।इसलिए आदमी जिस दिन भ्रष्ट हो गया उसी दिन से संसार में उसका मान-सम्मान भी नष्ट हो जाएगा और मान सम्मान के बिना जीवन व्यर्थ है।
      इस प्रकार हम रविदास को भी एक ऐसे धर्म के व्याख्याता के रूप में देखते हैं,जो हिन्दू मुसलमान के धर्मों से पृथक हैं। समतावादी है और मानववादी है।
      इस प्रकार हम देखते हैं रविदास की मुख्य प्रवृत्तियों में गुरु को मानना, आतम राम को मानना, अवतारवाद का विरोध,छुआछूत और जातिभेद का खंडन तथा हिन्दू मुसलमान से परे मानव धर्म का समर्थन है।
      दलित संत श्रमजीवी हैं, कठोर श्रम करके जीविका कमाते हैं। इसी श्रम का हिन्दू व्यवस्था ने शोषण और दोहन किया है।उन्हें सामाजिक हीनता का शिकार बनाया है तथा उनको आर्थिक रूप से परतंत्र बनाकर उनके विकास को रोका है।
      संत रविदास की जीवनी पर नजर डालें तो पाते हैं उन्होंने अपने समाज के बारे में कहा कि मेरा ऐ दलित समाज यज्ञ नहीं करते हैं और न वेदों के ज्ञान में आस्था रखते हैं। वे ब्राह्मण को श्रेष्ठ नहीं मानते,वरन् मनुष्य को श्रेष्ठ मानते हैं और उसका सम्मान उसके गुणों से करते हैं। रविदास जी हरिभक्त नहीं थे।उनकी दृष्टि में हरि का कोई महत्व नहीं था।

      राजेश कुमार बौद्ध
      संपादक
      हिन्दी मासिक पत्रिका “प्रबुद्ध विमर्श ”
      कार्यालय-डॉ भीमराव अम्बेडकर पुस्तकालय एण्ड पब्लिकेशन-रामपुर नयागाॅव,गोरखनाथ,गोरखपुर,उत्तर प्रदेश, Mob.n.9616129934, Email- prabuddhvimarshgkp@gmail.com

  2. राजेश कुमार बौद्ध says

    ऐसा चाहू राज मैं,जहाँ मिले सबन को अन्न।
    छोट बड़ो सब सम बसै,रैदास रहे प्रसन्न।।
    ==================
    देखते हैं कि रविदास की प्रवृत्तियां क्या है? रविदास शुरू में ही कहते हैं-

    चारों वेद करै खंडौति,
    जन रविदास करै दंडौति।
    यानि रविदास को दंडवत वही करें, जो वेदों का खंडन करें। वेदों को नकार कर ही रविदास को स्वीकार किया जा सकता है। वे राम के भक्त भी नहीं है और न सेवक,वे योग यज्ञ भी नहीं करते हैं।
    रविदास जी ऐसे समाज में ऐसी शासन व्यवस्था चाहते है जहाँ सबको भोजन मिले,कोई भी भूखा न सोये और जहाँ छोटे-बड़े की कोई भावना न रहे सभी मनुष्य समान हो और प्रसन्न रहे इसी मैं रैदास भी प्रसन्न है।

    पराधीनता पाप है,
    जान लेहु रे मीत।
    रैदास दास पराधीन सो,
    कौन करे है प्रीत।।
    रविदास वर्णव्यवस्था और उससे उत्पन्न जातिभेद तथा अस्पृश्यता का खंडन करते हैं-

    रविदास जनम के कारने,
    होत न कोई नीच।
    नर कूं नीच कर डारि है,
    ओछे करम की कीच।।
    रविदास का धर्म जातिविहीन हैं,वह मनुष्य को महत्व देता है-
    धर्म की कोई जात नहीं न जात धर्म के माह।
    रविदास चले जो धर्म पे करेंगे धर्म सहाय।।
    जातपात के फेर मह उरझि रहे सब लोग।
    मानुषता को खात है रविदास जात का रोग।।
    रविदास को न मस्जिद से कुछ लेना है, न मंदिर से कोई प्यार है। वह न अल्लाह को मानते हैं और न हरि को। स्पष्ट है कि वह न हिन्दू हैं, न मुसलमान। यथा
    मस्जिद सो कुछ घिन नहीं,
    मंदिर सो नहि प्यार।
    दोउ अल्ला हरि नहि,
    कह रविदास उजार।।
    रविदास जी विनम्र भाव से कहते है की हे मित्र, इस संसार में किसी की गुलामी स्वीकारना,उसके अधीन रहना सबसे बड़ा पाप है इसलिए मनुष्य को कभी गुलाम बन कर नहीं रहना चाहिए तथा जो गुलाम होते है उनसे कोई प्रेम भी नही करता।

    रविदास हमारो राम जी,
    दशरथ करी सूत नांहि।
    राम हमऊ मांहि ऱमि रहयो,
    बिसव कुटम्बह माहि।।
    रविदास जी कहते है की हमारे राम दशरथ के पुत्र नहीं है, हमारे राम तो हमारे शरीर में ही बसे हुए है,और सारा विश्व ही उनके लिए एक परिवार (कुटुंब) है।और वे सारे विश्व में ही रमें है।

    रविदास मदिरा का पीजिए,
    जो चढ़ी-चढ़ी उतराय।
    नाम महारस पीजिए,
    जो चढ़ नहीं उतराय।।
    रविदास जी कहते है की लोगो को ऐसी मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए,जिसका नशा जल्दी ही उतर जाए,बल्कि ऐसे ज्ञान रस का सेवन करना चाहिए,जिसका नशा एक बार चढ़ने के बाद फिर कभी नहीं उतरे, अर्थात जीवन का अन्धकार सत्संग से दूर होता है।अतः ज्ञानवान साधू सन्तों से संपर्क मे रहना चाहिये।
    .
    का मथुरा,का द्वारका,
    का कशी हरिद्वार।
    रविदास खोजा दिल अपना,
    ताऊ मिला दिलदार।।
    रविदास जी तीर्थ भ्रमण को व्यर्थ बताते है,वे कहते है की मेरा भगवान न तो मथुरा में निवास करता है,न द्वारका में न ही कशी और हरिद्वार में उसे खोजना तो व्यर्थ है।क्योंकि मेरा मालिक तो मेरे दिल में रहता है,व्यर्थ के आडम्बर से क्या लाभ।

    रविदास बांभन मत पूजिए,
    जो होवे गुण हीन।
    पूजिए चरन चंडाल के,
    जो हो ज्ञान प्रवीन।।
    रविदास जी कहते है अगर ब्राम्हण में गुण नहीं है तो उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए,बल्कि उस चांडाल के चरणों को पूज लेना उचित है जो गुणों से युक्त है।यहाँ उनका अभिप्राय है की मनुष्य जाती के आधार पर ऊँचा नहीं होता है बल्कि गुण व कर्म से श्रेष्ठ होता है।

    रविदास सत मति तिअरगिये ,
    जो लो घट मांहि प्रान।
    सत भृष्ट करी जगत मांहि,
    सदा होत अपमान।।
    रविदास जी सदबुद्धि की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते है की सदबुद्धि का कभी भी त्याग मत कीजिये क्योंकि जिस तरह से हमारे शरीर में सांसो का संचार हो रहा है, उसी प्रकार सदबुद्धि का भी।इसलिए आदमी जिस दिन भ्रष्ट हो गया उसी दिन से संसार में उसका मान-सम्मान भी नष्ट हो जाएगा और मान सम्मान के बिना जीवन व्यर्थ है।
    इस प्रकार हम रविदास को भी एक ऐसे धर्म के व्याख्याता के रूप में देखते हैं,जो हिन्दू मुसलमान के धर्मों से पृथक हैं। समतावादी है और मानववादी है।
    इस प्रकार हम देखते हैं रविदास की मुख्य प्रवृत्तियों में गुरु को मानना, आतम राम को मानना, अवतारवाद का विरोध,छुआछूत और जातिभेद का खंडन तथा हिन्दू मुसलमान से परे मानव धर्म का समर्थन है।
    दलित संत श्रमजीवी हैं, कठोर श्रम करके जीविका कमाते हैं। इसी श्रम का हिन्दू व्यवस्था ने शोषण और दोहन किया है।उन्हें सामाजिक हीनता का शिकार बनाया है तथा उनको आर्थिक रूप से परतंत्र बनाकर उनके विकास को रोका है।
    संत रविदास की जीवनी पर नजर डालें तो पाते हैं उन्होंने अपने समाज के बारे में कहा कि मेरा ऐ दलित समाज यज्ञ नहीं करते हैं और न वेदों के ज्ञान में आस्था रखते हैं। वे ब्राह्मण को श्रेष्ठ नहीं मानते,वरन् मनुष्य को श्रेष्ठ मानते हैं और उसका सम्मान उसके गुणों से करते हैं। रविदास जी हरिभक्त नहीं थे।उनकी दृष्टि में हरि का कोई महत्व नहीं था।

    राजेश कुमार बौद्ध
    संपादक
    हिन्दी मासिक पत्रिका “प्रबुद्ध विमर्श ”
    कार्यालय-डॉ भीमराव अम्बेडकर पुस्तकालय एण्ड पब्लिकेशन-रामपुर नयागाॅव,गोरखनाथ,गोरखपुर,उत्तर प्रदेश, Mob.n.9616129934, Email- prabuddhvimarshgkp@gmail.com

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