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jaiprakash kardam

मजबूत कहानीकार होने के बावजूद मुक्तिबोध एक कवि की छवि से क्यों नहीं मुक्त हो पाए?

मुक्तिबोध की बड़ी पहचान कवि के रूप में है। कविता उनके अंतर्मन में रची-बसी प्रतीत होती है। शायद यही कारण है कि उनकी कहानियों की भाषा भी कवित्वपूर्ण दिखायी देतीहै। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कविता में कहानी कहने का प्रयास किया गया है। कई स्थानों पर उनके पात्र संस्कृत नाटकों की भांति अपने संवादों में ‘मेरे देवता, मेरे ध्येय’, ‘हृदय कामने’, ‘हृदयेश्वर’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। इन कहानियों में फेंटेसी भी है और आधुनिकता भी। उनके पात्र फेंटेसी और आधुनिकता के द्वंद्व का शिकार है। वे इस द्वंद्व से बाहर निकलने के लिए बेचैन हैं।

अरविंद पासवान परिवर्तनवादी कवि हैं – दामोदर मोरे

‘मैं उसे अंबेडकरवादी कहता हूं जो संघर्ष के मैदान में बिगुल बजाता हो। जिसमें संघर्ष का संगीत हो, जिसमें जातिभेद की जंजीरें टूटने की...

कविता में मोचीराम की प्रशंसा कवि धूमिल की ब्राह्मणवादी चाल है?

पहला भाग पेट की भूख इस बात की परवाह नहीं करती कि कौन छोटा है और कौन बड़ा है। जहाँ से भी व्यक्ति का पेट...

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