Monday, May 27, 2024
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अरविंद पासवान परिवर्तनवादी कवि हैं – दामोदर मोरे

‘मैं उसे अंबेडकरवादी कहता हूं जो संघर्ष के मैदान में बिगुल बजाता हो। जिसमें संघर्ष का संगीत हो, जिसमें जातिभेद की जंजीरें टूटने की झंकार हो। संघर्ष किसलिए? एक अच्छी जिंदगी के लिए। संघर्ष किसलिए? मनुष्यता के लिए। संघर्ष किसलिए? सामाजिक न्याय की प्रस्थापना के लिए। यह संघर्ष अंबेडकरवादी कविता का उद्देश्य है। अरविंद पासवान […]

‘मैं उसे अंबेडकरवादी कहता हूं जो संघर्ष के मैदान में बिगुल बजाता हो। जिसमें संघर्ष का संगीत हो, जिसमें जातिभेद की जंजीरें टूटने की झंकार हो। संघर्ष किसलिए? एक अच्छी जिंदगी के लिए। संघर्ष किसलिए? मनुष्यता के लिए। संघर्ष किसलिए? सामाजिक न्याय की प्रस्थापना के लिए। यह संघर्ष अंबेडकरवादी कविता का उद्देश्य है। अरविंद पासवान के कविता संग्रह-मैं रोज लड़ता हूं में इसी अंबेडकरवाद  की अनुगूंज है।’

मराठी हिन्दी के प्रसिद्ध दलित लेखक दामोदर मोरे ने दी मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली द्वारा प्रकाशित अरविंद पासवान के कविता संग्रह मैं रोज लड़ता हूं– के ऑनलाइन कार्यक्रम में स्त्रीकाल फेसबुक लाइव एवं यूटूयब  कार्यक्रम में इन बातों का जिक्र किया। इसमें लेखक अरविंद पासवान के साथ ही साहित्यकार डॉ कर्मानंद आर्य, ज्योति स्पर्श और श्वेता शेखर ने भी हिस्सा लिया।

[bs-quote quote=”दामोदर मोरे ने आंबेडकरवादी लेखन की चर्चा करते हुए उसकी विशिष्टताओं के बारे में रौशनी डाली,  कहा कि अंबेडकरवाद की जो-जो विशेषताएं हैं, वह विशेषताएं अरविंद की इन कविताओं में अभिव्यंजित होती दिखाई देती हैं। जैसे अंबेडकरवाद की एक विशेषता है कि वह ईश्वर को नकारता है। अंबेडकरवाद में बुद्ध दर्शन है। कबीर की चेतना है। ज्योतिबा फुले की चेतना है। बाबा साहेब अंबेडकर की चेतना है। यह सब ईश्वर की अवधारणा को नकारते हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

दामोदर मोरे ने कहा कि ‘बेहतर जिंदगी के लिए सामाजिक न्याय के लिए, समता के लिए, अंबेडकरी कविता एक लॉन्ग मार्च है। इस लॉन्ग मार्च में जय भीम के एक युवा सिपाही अरविंद पासवान मैं रोज लड़ता हूँ कविता संग्रह के माध्यम से शब्दों के मोर्चे में शामिल हुए हैं। इस कविता संग्रह की पहली कविता वह बाबा साहेब अंबेडकर पर है, और इसी से सूचित होता है कि उनके आदर्श कौन हैं। उनके कविता की रीढ़ कौन-सी है। उनकी कविता की प्रेरणा कौन-सी है। मोरे ने अरविंद के कविता संग्रह के शीर्षक की चर्चा करते हुए कहा कि यह शीर्षक अपने आप में एक बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां जो मैं आता है, वह बहिष्कृत भारत का, बहिष्कृत भारत के हर आदमी का प्रतिनिधित्व करता है। क्योंकि इस व्यवस्था ने क्या दिया? दुख दिया, दर्द दिया, दासता दी, अनुसूचित जाति जनजाति, एवं घुमंतू जातियों को प्रतिदिन लड़ना पड़ता है। और इसी संदर्भ में यह जो कविता संग्रह का शीर्षक है मैं रोज लड़ता हूं इस संदर्भ में भी वह मुझे बहुत ही अर्थपूर्ण लगता है। उन्होंने माना कि इस शीर्षक से बाबा साहेब के संदेश पढ़ो, शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो, का भी बोध पैदा होता है। मोरे साहब ने सवाल उठाया कि संघर्ष का स्वरूप क्या हो? और कहा कि इस संघर्ष के स्वरूप में दो तरह की बातों का पता चलता है। एक बहिर्मुखता और दूसरी अंतर्मुखता। बहिर्मुखता, बाहरी संघर्ष और अंतर्मुखता अपने मन के तल पर चलने वाला संघर्ष। जैसे कवि ने कहा है कि मैं रोज लड़ता हूं/ अपने भीतर के लोभ/ ईर्ष्या/ घृणा और द्वेष से/ और रोज हारता हूं/ मगर लड़ता हूं। इस संघर्ष का यह एक रूप है। और दूसरा रूप कौन-सा है सामाजिक व्यवस्था से लड़ने का संघर्ष। हमारे पुरखे लड़ें हैं/ श्रम और शील के हथियारों से/ जाति, वर्ण, वर्ग, नस्ल और रंग के खिलाफ। इसका मतलब इनका जो संघर्ष है, इस संघर्ष का जो दूसरा रूप है, वह जाति व्यवस्था से संघर्ष, शोषण से संघर्ष, अमानुषता से संघर्ष, अमानुष व्यवस्था से संघर्ष, अवमानना से संघर्ष, वंचितों के लिए संघर्ष और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष; यह इसका एक स्वरूप हमें दिखाई देता है।

[bs-quote quote=”मोरे ने माना कि बाबा साहेब ने इस समाज की सोच बदली जिससे समाज बदला और साहित्य का भूगोल भी बदला। साहित्य में लोकतान्त्रिक सोच का निर्माण हुआ। एक नया इतिहास गढ़ा गया। बाबा साहेब ने जो उनकी जाति के न थे; ऐसे बुद्ध को गुरु माना। जो उनकी जाति के न थे; ऐसे कबीर को गुरु माना। जो उनकी जाति के न थे; ऐसे ज्योतिबा राव फुले को गुरु माना। यह मैं क्यों कह रहा हूं; इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि बाबा साहब ने स्वयं अपनी सोच बदली और सोच बदलने के लिए इस समाज को मजबूर किया। जरूरत है समाज की,सोच बदलने की।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

दामोदर मोरे ने आंबेडकरवादी लेखन की चर्चा करते हुए उसकी विशिष्टताओं के बारे में रौशनी डाली,  कहा कि अंबेडकरवाद की जो-जो विशेषताएं हैं, वह विशेषताएं अरविंद की इन कविताओं में अभिव्यंजित होती दिखाई देती हैं। जैसे अंबेडकरवाद की एक विशेषता है कि वह ईश्वर को नकारता है। अंबेडकरवाद में बुद्ध दर्शन है। कबीर की चेतना है। ज्योतिबा फुले की चेतना है। बाबा साहेब अंबेडकर की चेतना है। यह सब ईश्वर की अवधारणा को नकारते हैं। इसी का दर्शन अंबेडकरवादी कविता में दिखाई देता है। अंबेडकरी कविता की दूसरी विशेषता यह है कि वह अंध-विश्वास को बारूद-सा उड़ा देती है। अंधविश्वास को तहस-नहस कर देना अंबेडकरवादी कविता की विशेषता है।

अंबेडकरवादी कविता की एक और विशेषता है कि वह विसंगति पर चोट करती है। इस संग्रह की कविताओं में कई जगहों पर कवि ने विसंगतियों पर चोट की है। समाज में क्या दिखाई देता है कुआं खोदते हैं वंचित, बहिष्कृत, लेकिन उस कुआं का पानी भरने का अधिकार न अछूतों को, न वंचितों को। सवर्णों के घर का निर्माण यही वंचित, अछूत मजदूर करते हैं, लेकिन बाद में उसी घर में उनका प्रवेश नकारा जाता है। मंदिर या मूर्ति का निर्माण कौन करता है? यही वंचित, लेकिन वहां उनको प्रवेश नहीं मिलता और वहां उनका उत्पीड़न होता है। इसीलिए कवि कहता है: स्नेह और आंसू मिश्रित गिलाबे से/जिन्होंने पाथे अपने घर/ उन्हें  बेदखल किया गया/ उन्हीं  के घर से। इस तरह विसंगतियों पर चोट करना कवि की कविता का एक विशेष सृजनधर्म है। कविता जब शिखर अवस्था में पहुंचती है, तो आखिरी पंक्ति बहुत बेहतरीन इस्तेमाल किया है कवि ने। कवि कहता है बस प्रतिरोध की एक दुनिया बनाना शेष है, बाबा साहेब का दर्शन अरविंद की रचनाओं में लक्षित होता है।

मोरे ने माना कि बाबा साहेब ने इस समाज की सोच बदली जिससे समाज बदला और साहित्य का भूगोल भी बदला। साहित्य में लोकतान्त्रिक सोच का निर्माण हुआ। एक नया इतिहास गढ़ा गया। बाबा साहेब ने जो उनकी जाति के न थे; ऐसे बुद्ध को गुरु माना। जो उनकी जाति के न थे; ऐसे कबीर को गुरु माना। जो उनकी जाति के न थे; ऐसे ज्योतिबा राव फुले को गुरु माना। यह मैं क्यों कह रहा हूं; इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि बाबा साहब ने स्वयं अपनी सोच बदली और सोच बदलने के लिए इस समाज को मजबूर किया। जरूरत है समाज की,सोच बदलने की।

उन्होंने कहा कि अरविंद ने दूसरे अंबेडकरवादी कवियों की तरह चाहे वह नामदेव ढसाल हों, लोक कवि वामन कर्डक हों, जय प्रकाश कर्दम हों या कर्मानंद हों; अपनी आंखें औरों के सपनों से जोड़ दी है। और इसी कारण यह कवि एक जाति के दायरे में अपनी बात नहीं कहते, उन्होंने अपना दायरा बढ़ा दिया है। जिस तरह मुर्ग़ी अंडे पे बिठाई जाती है तो मुर्गी के अंडों से कई तरह के छोटे-छोटे चूजे (बच्चे) बाहर निकलते हैं, बाद में वह उसे अपने पर में झांकती है और अपना प्रेम देती है। मुर्गी ऐसा नहीं कहती कि तू चला जा, तू हट जा। उसी तरह बाबा साहब ने संविधान के पर के नीचे सभी को सामाजिक न्याय दिया, बंधुता दी, समता दी। यह जो विचार दृष्टि है, यही विचार दृष्टि अंबेडकरवादी कवि की है, इसे उन्होंने  अपनाई और इसी कारण वे अपनी आंखें आदिवासियों के सपने से जोड़ते हैं। घुमंतुओं के सपनों से जोड़ते हैं। कोई  फातिमा बहन के सपने से जोड़ते हैं। स्त्री चाहे सवर्ण हो या बहिष्कृत उनके दर्द से अपनी आंखें जोड़ते हैं, और उनके दर्द की टीस को महसूस करते हैं। उन्हे वह दर्द अपना लगता है। और वह दर्द कवि की कविताओं में छलक जाता है। और इसी कारण यह कविता-संग्रह एक ऊंचाइयों को छूता है। उन्होंने माना कि सामाजिक प्रतिबद्धता और कलात्मकता का मधुर संगम इस कविता-संग्रह में मिलता है।

काव्य कर्म की चर्चा करते हुए मोरे ने कहा कि काव्य-कला और बाकी कलाओं का एक गहरा रिश्ता होता है। जैसे फूल का सुगंध से रिश्ता होता है, चांदनी का चांद से रिश्ता होता है, उसी तरह काव्य-कला का बाकी कलाओं से से भी रिश्ता होता है। काव्य-कला का संगीत-कला से रिश्ता होता है, यहां काव्य-कला का संगीत-कला से कैसा रिश्ता है अभिव्यंजित हुआ है यह मैं दोहराना चाहता हूं। इसका कारण भी है। इसके कारण मुझे एक दूसरी बात कहनी पड़ेगी कि, कवि का जो व्यक्तित्व होता है, कविता व्यक्ति के व्यक्तित्व की महक होती है। कवि के व्यक्तित्व का रंग हमें कविता में दिखाई देते हैं। यहां अरविंद पासवान की कविताओं में व्यक्तित्व के कौन से रंग हमें दिखाई देते हैं, यह दिलचस्प बात है। अरविंद पासवान के व्यक्तित्व का एक रंग है, उनकी सुरीली आवाज। उनकी रसिकता। उनका संगीत प्रेम। और उनका संगीत प्रेम, उनकी रसिकता, उनकी सुरीली आवाज कई रचनाओं में अभिव्यंजित हुई है। कवि की सांगीतिक शैली का दर्शन यहां हुआ है। आप देख सकते हैं। कविता ‘वह सदमें में है’ कवि कहता हैः गुजरो उस घर के राह से तो/ मंद्र सप्तक के गहरे तल से उठते करुण राग।’ यहां मंद्र सप्तक क्यूं आया है। जिसको संगीत की जानकारी नहीं है, उससे पूछिए वह चुप रहेगा। वह बोलेगा- वह गांव मैंने देखा नहीं। वह गांव मैं गया ही नहीं। तो ये मंद्र सप्तक यहां क्यूं आया, क्योंकि  संगीत क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। कवि की एक और कविता है ‘मिरासिन’, जिसमें संगीत का जिक्र आया है, देशराग’ में गाओ, ‘दर्द राग गाओ, वैसे कई संदर्भ इस कविता में आये हैं, लेकिन कवि के कविता का विषय ही एक गाने वाली औरत है। इस विषय पर कविता लिखना कवि का संगीत प्रेम दर्शाता है।

अरविंद पासवान सच्चे अर्थों में परिवर्तनवादी कवि हैं। परिवर्तन सन्मुखता उनकी कविता की एक विशेषता मुझे दिखाई देती है। क्योंकि परिवर्तनवादी चेतना सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक, शैक्षिक और गैर बराबरी पर डंके की चोट करती है वह सामाजिक लोकतंत्र की बात करती है। आर्थिक लोकतंत्र की बात करती है। शैक्षिक लोकतंत्र की बात करती है। साहित्यिक जनतंत्र की बात करती है। तुम अमीर क्यों और हम गरीब क्यों? आपके हाथ में कलम और हमारे हाथ में झाड़ू क्यों? आपके हाथ में किताब और हमारे हाथ में मैले के टोकरे क्यों? ऐसे सवाल खड़े करना परिवर्तनवादी चेतना की अंबेडकरवादी चेतना की विशेषता है। यही परिवर्तनवादी चेतना अरविंद की कविता में अभिव्यंजित हुई है।

इस मौके पर कवि डॉ. कर्मानंद आर्य ने कहा कि एक ऐसा समय था जब हम लगातार जाति और वर्ण से जूझ रहे थे, लेकिन जाति और वर्ण से आगे जो एक वर्गीय चरित्र बना है, उस वर्गीय चरित्र में अरविंद पासवान ने अपनी बहुत सशक्त अभिव्यक्ति दी है, चाहे वह भाव में हो या भाषा में। हम तो साहित्य के विद्यार्थी रहे हैं और हमे यह मालूम है कि अच्छा रचनाकर वही होता है जिसकी रचना से हम उसे स्मरण करते है, पहचानते हैं। इसमें अरविंद सफल हैं। मैं उन्हे एक रचनाकार के तौर पे, संस्कृतिकर्मी के तौर पे, एक संगीतज्ञ के तौर पे जानता हूं। उनके गाये गीतों को गजलों को सुनता रहता हूं। जो युवा पीढ़ी है, इक्कसवीं सदी की पीढ़ी है और जो हमारे सरोकार थे, या हैं जिन चीजों को लेकर हमारा दलित साहित्य आगे बढ़ा था, उनमें चाहे वह सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियाँ हों, चाहे जो धरातल है; समानता, स्वतंत्रता या बंधुता हो, उस जमीन पर युवा पीढ़ी रचना कर्म में रत हैं। अरविंद ऐसे रचनाकार हैं जिनके यहाँ विविधता है, वैविध्य है। वहाँ पीड़ा है, दुख भी है। लेकिन उस पीड़ा और दुख के साथ प्रकृति और प्रेम का सुंदर रूप भी आता है। जो गाँव कि स्थिति है या उनकी स्थितियों में जो बदलाव है वह पहले की रचनाओं में दिखाई नहीं पड़ती थी, अब की पीढ़ी की रचनाओं में वह परिलक्षित होता है। अबके जो संघर्ष है, उसमें पहले की अपेक्षा लचीलापन आया है। पहले की रचनाओं में आक्रोश ज्यादा था, अब आक्रोश की जगह करुणा आई है। कवि की कविता ‘अमंग देई’ से इसे महसूसा जा सकता है। ऐसी कविताओं में कवि की करुणा उभर के बाहर आती है। आप सब जानते हैं कि दलित साहित्य ने लोगों की अभिरुचियां बदली हैं। लोगों ने उन विषयों पर जाकर सोचना शुरू किया है, जहां पर वे नहीं सोचते थे। अरविंद के काव्य शिल्प की चर्चा करते हुए कर्मानंद ने कहा कि इनकी कविताओं की एक विशेषता यह भी है कि वहां छंद भी मिल जाएँगे, लयात्मकता मिल जाएंगी, और उसके साथ बड़ी बात यह है कि अरविंद की कविता किसी को चिढ़ाने का काम नहीं करती है। मतलब कवि अपनी बात कहने के लिए किसी का हृदय नहीं दुखाते। वे उससे संवाद की इच्छा रखते हैं। यह अच्छी बात है कि युवा रचनाकार बहुत विरल और अच्छे ढंग से लिख रहे हैं।

युवा कवयित्री और मन का मुहल्ला की माडरेटर ज्योति स्पर्श ने पुस्तक के शीर्षक की चर्चा करते हुए कहा कि मैं रोज लड़ता हूं एक मुहावरा है कि लिफाफा देख के खत का मजमून भांप लेते हैं। शीर्षक लगभग सारी बातें आपके सामने उपस्थित कर देता है। मैं रोज लड़ता हूं शीर्षक मानीखेज है। ज्योति ने कहा कि लड़ाई है तो दुख है, परेशानियां हैं, कष्ट हैं और असमानता है जिसकी बात अलग-अलग कोण से कवि अपनी कविताओं में उठाते हैं। कई बार बहुत कम पंक्तियों की कविताओं में भी बहुत मारक बात कह जाते हैं। एक कविता में कवि ने कहा है कि लड़ेंगे, मरेंगे लेकिन मिटेंगे नहीं। यह लड़ना अंतिम बिन्दु या लक्ष्य नहीं है। यह शुरुआत है। लड़ने के लिए जब हम अपने को तैयार करते हैं तो हम उन दुश्वारियों को, बल्कि उन तकलीफ़ों को, साज़िशों को पहचानते हैं और पहचानने के बाद उसके अस्तित्व को खतरा है कि हम मिट भी सकते हैं, बावजूद इसके हम लड़ना चाहते हैं, लड़ते हैं; यह बहुत बड़ी बात है। इसलिए यह शीर्षक सार्थक है और उन सारी बातों को स्थापित करने का प्रयास है। उन्होंने माना कि ये कविताएं महज वैसी कविताएं नहीं हैं जो किसी वैद्य की पर्ची के द्वारा लिखित है और उसके बदले में हम उन चीजों को रच रहे हैं। ये बिना किसी वैद्य की पर्ची के लिखी गई कविताएं हैं। ये जी गई कविताएं हैं। कवि अपने संघर्ष को शॉर्ट कट लेके खत्म नहीं करना चाहता है। चरण-दर-चरण लेखक हर उस संघर्ष को जिया है, हर मोड़ पर जी रहा है। बिना इस डर के, की जो चीजें चल रहीं हैं साजिशन; जो न केवल बाहर की हैं, बल्कि हमारे वर्ग की हैं, अपने वर्ग की हैं और जिन चीजों से हम लड़ रहें हैं तमाम साज़िशों ने मुखौटे पहन रखें हैं, हमारे स्वर में स्वर मिलाते हुए लड़ने का शायद स्वांग भरते हैं; इन चीजों की पहचान कवि को बहुत अच्छी तरह से है। कवि खतरों को, साज़िशों की पहचान कर शिनाख्त करता है कि वह खतरे बाहरी कम, भीतरी ज्यादा हैं। कवि का कर्म सत्ता के बहुरुपिये चरित्र को भी बखूबी पहचानता है। ऐसी कविताएं किसी कमरे में बैठके नहीं लिखी जा सकती। यह कविताएं वैसी नहीं हैं जैसी कि भाई-भतीजावाद के खिलाफ, दहेज के खिलाफ कमरे में बैठकर कविताएं लिखी जाएं और अवसर मिलते ही उसी वाद और दहेज पर मर मिटें। शोषण और अवसर का हर मौका लपक के लेने और फिर शोषण के विरुद्ध कवितायें लिखने वालों के लिए एक जवाब है, अरविंद की कविताएं।

कवयित्री श्वेता शेखर ने कहा कि मैं रोज लड़ता हूं में ‘लड़ना’ बहुआयामी शब्द है। इस शब्द पर गौर करने से हमें पता चलता है कि लड़ना अपने अंतर-मन से भी हो सकता है, समाज से भी हो सकता है, वैचारिकी के स्तर पर भी हो सकता है। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो उसके जन्म के साथ ही संघर्ष शुरू हो जाता है। वह किस परिवेश में जन्म लेता है, और किन परिस्थितियों में जीवन बसर करता है, यह मायने रखता है। कवि की कविताओं से उनके दुख, उनकी पीड़ा अभिव्यक्त होती है जो, केवल कवि की तकलीफ नहीं है, बल्कि वैसी रचनाएं समाज की पीड़ा का प्रतिनिधित्व करतीं हैं। ‘माई’ कविता की चर्चा करते हुए श्वेता ने कहा कि यह केवल कवि की कविता नहीं है, बल्कि हर उस मां की कविता है जो अकेले बच्चों का पालन-पोषण करती हैं। श्वेता ने माना कि कविता वही बड़ी होती है जो सब लोगों की बात करे या जिसमें सबकी बात हो। अरविंद की कविताओं में सबकी बात है, सबका संघर्ष है। संवेदना के स्तर पर कवि की सघनता उम्दा है। जो कविताएं छोटी भी हैं, वह मारक हैं। बच्चों को विषय बनाकर लिखी गई कविताएं ‘चांद’ और ‘फूल’ लाजवाब है। कवि कम शब्दों में भी अपनी अभिव्यक्ति का विस्तार अर्थ के साथ पूरा करता है, वैसी ही एक कविता है ‘उन्हे है गम’। रचनाकार की रचनाएं पाठक के लिए बिलकुल खुली हुई हैं। पाठक उसमें अपना अर्थ तलाश सकते हैं, कोई भी पीड़ित अपने को इससे सम्बद्ध कर सकते हैं। ये रचनाएं किसी से लड़ती भिड़ती नहीं हैं, वह संवाद करती हैं। शमशेर बहादुर सिंह की पंक्तियाँ हैं बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही, वैसी ही बात अरविंद की कविताओं में झलकती है।

इस मौके पर अरविन्द पासवान ने कुछ कविताएं पढ़ीं और अपने विचार भी साझा किये। उन्होंने कोरोना महामारी से दो-चार होती दुनिया और लोगों की त्रासदी की चर्चा करते हुए कहा कि इस महामारी ने दुनिया को कहीं का नहीं छोड़ा है। असंख्य लोग दुनिया छोड़ गये। परिवार का परिवार मिट गया। बच्चे अनाथ हो गए। दुख और घना हुआ है। दुख ने हमें तोड़ा है। मरोड़ा है। कहीं का नहीं छोड़ा है। वेदना दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। तकलीफ़ें कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं। लेकिन हां, इन तकलीफ़ों से हमें जूझना है, हमें पार पाना है। इस मौके पर कवि अरविंद ने अपनी कविता- ‘नन्ही-सी चिड़िया कागज की’, ‘बच्चे’, माई,तथा शाहजहां और दशरथ मांझी आदि कविताओं का पाठ किया।

इस पूरी अवधि में सुधीर रंजन, गजाला तबस्सुम, सुरेश महतो, जयराम पासवान, राकेश पाठक, सुशील कुमार भारद्वाज, डॉ मुसाफिर बैठा, बिभाष, मनोज झा, अशोक कुमार प्रजापति, विनय कुमार सिंह, आर्नव और प्रवीणा एक्सेस के जुड़ाव ने कार्यक्रम को एक जीवंत पाठकीय हस्तक्षेप से जीवंत गरिमा से भर दिया।

 

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