Friday, June 21, 2024
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ब्रह्मराक्षस का मुक्ति-बोध

हिंदी साहित्य में गजानन माधव मुक्तिबोध की बड़ी पहचान कवि के रूप में है, और कवि के रूप में ही प्राय: उनका मूल्यांकन हुआ है। उनके आलोचना-कर्म पर भी चर्चा हुई है। मुक्तिबोध ने कहानियां भी लिखीं, किंतु उनकी कहानियों पर बहुत कम चर्चा हुई है। या यूं कहिए कि एक कथाकार के रूप में […]

हिंदी साहित्य में गजानन माधव मुक्तिबोध की बड़ी पहचान कवि के रूप में है, और कवि के रूप में ही प्राय: उनका मूल्यांकन हुआ है। उनके आलोचना-कर्म पर भी चर्चा हुई है। मुक्तिबोध ने कहानियां भी लिखीं, किंतु उनकी कहानियों पर बहुत कम चर्चा हुई है। या यूं कहिए कि एक कथाकार के रूप में वह उपेक्षित हुए हैं। उनकी कहानियों पर चर्चा नहीं होने अथवा कम चर्चा होने का यह तात्पर्य नहीं है कि उनकी कहानियां उस स्तर की नहीं हैं कि उन पर चर्चा की जाए। अपितु, कविताओं से उन्हें जो प्रसिद्धि मिली और जितनी चर्चा हुई, उनकी कहानियां उस चर्चा में दब कर रह गयीं। यह सही है कि मुक्तिबोध ने कविता की तुलना में कहानियां कम लिखीं, किंतु मात्रा कोई मानदण्ड नहीं होता। यदि गुणवत्ता नहीं हो बड़ी से बड़ी मात्रा भी कम और मूल्यहीन है, किंतु, यदि गुणवत्ता हो तो कम मात्रा भी बहुत होती है। मूल्य मात्रा का नहीं गुणवत्ता का होता है। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, अध्यापक पूर्ण सिंह आदि अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं, जिन्होंने मात्रा की दृष्टि से बहुत अधिक नहीं लिखा किंतु उनकी रचनाओं की गुणवत्ता के कारण उनकी अपनी एक अलग पहचान है। यहां मुक्तिबोध की कहानियों की किसी अन्य रचनाकार की कहानियों के साथ तुलना करना कदापि उद्देश्य नहीं है। किन्ही दो रचनाकारों की रचनाओं के बीच तुलना करना वैसे भी सरल नहीं होता, और कई बार ऐसा करना न्याय-संगत भी नहीं होता। क्योंकि प्रत्येक रचनाकार के अनुभव, सोच और जीवन-दृष्टि प्रथक होती है। उनकी वैचारिक बुनावट प्रथक होती है। उनके शब्द, संवेदना और अभिव्यक्ति की शैली प्रथक होती है। मुतिबोध के अपने अनुभव हैं, उनके पास जीवन को देखने की अपनी दृष्टि है तथा अपने अनुभवों और विचारों को अभिव्यक्त करने की अपनी शैली है।

[bs-quote quote=”मुक्तिबोध की बड़ी पहचान कवि के रूप में है। कविता उनके अंतर्मन में रची-बसी प्रतीत होती है। शायद यही कारण है कि उनकी कहानियों की भाषा भी कवित्वपूर्ण दिखायी देतीहै। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कविता में कहानी कहने का प्रयास किया गया है। कई स्थानों पर उनके पात्र संस्कृत नाटकों की भांति अपने संवादों में ‘मेरे देवता, मेरे ध्येय’, ‘हृदय कामने’, ‘हृदयेश्वर’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। इन कहानियों में फेंटेसी भी है और आधुनिकता भी। उनके पात्र फेंटेसी और आधुनिकता के द्वंद्व का शिकार है। वे इस द्वंद्व से बाहर निकलने के लिए बेचैन हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

साहित्य सामाजिक जीवन से जुड़ा हो यह तो आवश्यक है ही, उसके साथ आवश्यक यह भी है कि साहित्यकार भी समाज से उतना ही जुड़ा हो। सौंदर्य के उपासक कहानी में भूकम्प से पीड़ित लोगों के दुख से द्रवित तथा दुखियों की सेवा के प्रति स्वयं को समर्पित करने के लिए तैयार नायिका अपने प्रेमी से कहती है, ‘अनिल, हम कवि लोग अपनी भावनाओं को ही घुमाने-फिराने में लगे रहते हैं। क्या किसी कवि को तुमने कार्य-कवि होते देखा है। होते भी होंगे पर बहुत कम। हमारी कल्पनाएं क्या भूकम्प त्रस्त लोगों को कुछ भी सुख पहुंचा सकती हैं?’ यह ‘कार्य-कवि’ शब्द कविता लिखने के साथ व्यवहारिक स्तर पर दुखी-पीड़ित लोगों कवि की सेवा, सहायता करने की प्रेरणा से युक्त है।

प्रेम में प्रेम के अलावा अन्य कोई बंधन नहीं होता। वैचारिकता के साथ-साथ कर्तव्य-पथ चुनने की स्वतंत्रता। प्रेम बांधता नहीं, मुक्त करता है। स्त्री-पुरुष के बीच किसी प्रकार की असमानता नहीं होती प्रेम में, प्रेम होता ही तब है जब स्त्री-पुरुष दोनों समान स्तर पर आकर,अपनी-अपनी स्वतंत्रता के साथ समान रूप से सोचते और व्यवहार करते हैं। ‘सौंदर्य के उपासक’ लघु कथा में नायिका नायक से प्रथक कर्तव्य पथ चुनने के लिए नायक से अनुमति मांगती है, यथा- ‘मुझे आज्ञा दो प्रमोद, कि मैं विश्व-सेवा में उपस्थित होऊं।‘

[bs-quote quote=”प्रेम में प्रेम के अलावा अन्य कोई बंधन नहीं होता। वैचारिकता के साथ-साथ कर्तव्य-पथ चुनने की स्वतंत्रता। प्रेम बांधता नहीं, मुक्त करता है। स्त्री-पुरुष के बीच किसी प्रकार की असमानता नहीं होती प्रेम में, प्रेम होता ही तब है जब स्त्री-पुरुष दोनों समान स्तर पर आकर,अपनी-अपनी स्वतंत्रता के साथ समान रूप से सोचते और व्यवहार करते हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

काठ का सपना एक निर्धन, अभावग्रस्त परिवार का व्यथा वर्णन है। पिता की अपनी संतान के भविष्य को उज्जवल बनाने की चिंता और उसके लिए कुछ न कर पाने का अपराध-बोध है। भूखी बालिका को चूल्हे में सुनहली ज्वाला का रंग अच्छा लगता है और वह पिता की गोद से उठकर चूल्हे के पास जाकर बैठ जाती है। आर्थिक अभाव ने पति-पत्नी दोनों को प्राणहीन काठ बना दिया है, और उनकी संतान, उनकी बेटी सरोज दोनों के कंधों पर हाथ रखे जीवन की बाढ में बहे जा रही है।

मुक्तिबोध की कहानियां जीवन के गहरे यथार्थ-बोध के साथ-साथ मूल्य-बोध की कहानियां भी हैं, जिनमें जीवन के विभिन्न रूप अपने सत्य और मूल्यों के साथ प्रतिबिंवबित हुए हैं। असमानता, अन्याय, अनैतिकता, भ्रष्टाचार आदि अमानवीय विसंगतियों का प्रतिकार तथा असत्य, हिंसा, चोरी, निंदा, कटु-वचन, छल-कपट, ईर्ष्या, द्वेश, लालच आदि से मुक्त रहकर सत्य, अहिंसा, प्रेम, न्याय, सदाचरण, सदभाव का पालन करना मनुष्यता का गुण और पहचान है और प्रत्येक मनुष्य में इसकी अपेक्षा की जाती है। किंवदंती, विश्वास के आधार पर अथवा किसी प्रकार के दबाव में आकर किसी कार्य को न करके अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार निर्णय लेना और तदनुसार कार्य करना ही अंतर आत्मा की आवाज को सुनना है। किंतु आज के समय में इस प्रकार के गुणों से युक्त मनुष्य का पाया जाना अत्यंत दुर्लभ है। ऐसे लोगों को प्राय: पागल समझा जाता है। क्लॉड ईथरली में सी.आई.डी व्यक्ति कहता है, जो आदमी आत्मा की आवाज जरूरत से ज्यादा सुन करके हमेशा बेचैन रहा करता है और उस बेचैनी में भीतर के हुक्म का पालन करता है, वह निहायत पागल है। पुराने जमाने में संत हो सकता था। आजकल उसे पागलखाने में डाल दिया जाता है।

[bs-quote quote=”जाति और तदजनित ऊंच-नीच का भेदभाव, और अस्पृश्यता भारतीय समाज का एक कटु सत्य है। यह मनुष्यता के मस्तिष्क पर एक कलंक की तरह है। किंतु भारतीय समाज जाति को धर्म की तरह जीता है और इस पर दम्भ करता है। निम्न जातीय व्यक्ति से स्पर्श हो जाने से उच्च जातीय सवर्णों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है किंतु, निम्नजातीय स्त्री के साथ यौन संबंध बनाने या यौन शोषण करने में धर्म भ्रष्ट नहीं होता है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मानव-मूल्यबोध की यह चेतना कई रूपों में दिखायी देती है। ‘क्लॉड ईथरली’ कहानी में अमेरिका द्वारा जापान के शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर भयंकर तबाही मचाए जाने का घोर मानव-विरोधी कार्रवाई के रूप में प्रतिकार है। यह मनुष्यता और राष्ट्रवाद/साम्राज्यवाद के बीच द्वंद्व की कहानी है, जिसमें एक ओर अमरीका है, जो तमाम विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के प्रति कटिबद्ध है, चाहे इसके लिए उसे मनुष्यता का कितना ही हनन क्यों न करना पड़े। जबकि दूसरी ओर हिरोशिमा पर बम गिराने वाला विमान चालक है, जो अपने इस कृत्य के लिए पाप-बोध से ग्रस्त है और इस पाप-बोध से उबरने के लिए हिरोशिमा के दीन-हीन लोगों की सहायता के लिए प्रत्येक माह हिरोशिमा के मेयर को चैक भेजता है। अमरीकी सरकार के लिए वह ‘वॉर हीरो’ है, जिसे अमरीकी सरकार द्वारा इनाम दिया गया, लेकिन उसकी अपनी चेतना उसे निरपराध, निर्दोष लोगों की हत्या का दोषी मानक्र उसे धिक्कारती है कि ‘उसने पाप किया, जघन्य पाप किया है। उसे दंड मिलना ही चाहिए।‘ इसके लिए उसने सरकारी नौकरी छोड़ी, मामूली से मामूली काम किया। उसने ऐसी हरकतें कीं जिससे उसे जेल में डाला जा सके। किंतु उस ‘वॉर हीरो’ को जेल में न डालकर पागलखाने में डाला गया। वस्तुत: क्लॉड ईथरली मानवता को तहस-नहस करने वाले परमाणु युद्ध का विरोध करने वाली चेतना की आवाज का दूसरा नाम है। क्लॉड ईथरली कहीं भी हो सकता है। मनुष्यता की रक्षा के प्रति उसके जैसी बेचैनी रखने वाले लोग कहीं भी हो सकते हैं। कहानीकार के शब्दों में कहा जाए तो ‘सचेत जागरूक संवेदनशील जन क्लॉड ईथरली हैं’।

ये कहानियां मध्यवर्गीय प्रगतिशील व्यक्ति की चेतना की सहज अभिव्यक्ति हैं। यह मध्यवर्ग हिप्पोक्रेट है। वह सामान्य व्यक्ति होने का दिखावा करता है, जबकि वास्तव में स्वयं के अंदर सामान्य लोगों से श्रेष्ठ होने का भाव रखता है। अभावग्रस्त, कमजोर लोगों के प्रति सहानुभूति प्रकट करता है किंतु उनके लिए कुछ करने के अवसर पर दिखावे के लिए थोड़ा-बहुत कुछ करके हाथ पीछे खींच लेता है। ‘जंक्शन’ कहानी का नायक ठंड से ठिठुर रहे टेरीलीन की बुश्शर्ट और खाकी चड्ढी और कीमती चमड़े के जूते पहने हुए गोरे चिट्टे लड़के की मदद करता है, उसको ठंड से बचाने के लिए अपने बिस्तर में सुला देता है, क्योंकि वह किसी भले घर का, या दूसरे शब्दों में कहें तो मध्यवर्गीय प्रतीत होता है। किंतु ठंड से ठिठुरते एक अन्य लड़के के प्रति उसके मन में वैसी संवेदना नहीं होती, क्योंकि यह लड़का अच्छे, साफ कपड़े पहने हुए नहीं है, अर्थात वह गरीब है। नायक के ये शब्द मध्यवर्ग की हिप्पोक्रेटिक मानसिकता के नंगेपन को को बेरहमी से बेपरदा करती है। ‘अगर मैं ठंड से सिकुड़ते इस लड़के को बिस्तर दूं तो मेरी (दूसरों से ली हुई ही क्यों न सही) यह कीमती अलवान और यह नरम कंबल, और यह दूधिया चादर खराब हो जाएगी। मैली हो जाएगी। क्योंकि जैसा कि साफ दिखाई देती है यह लड़का अच्छे खासे साफ-सुथरे बढिया कपड़े पहने हुए थोड़े है। मुद्दा यह है कि वह दूसरे ओर निचले किस्म के, निचले तबके के लोगों की पैदावार है।‘

जाति और तज्जनित ऊंच-नीच का भेदभाव, और अस्पृश्यता भारतीय समाज का एक कटु सत्य है। यह मनुष्यता के मस्तिष्क पर एक कलंक की तरह है। किंतु भारतीय समाज जाति को धर्म की तरह जीता है और इस पर दम्भ करता है। निम्न जातीय व्यक्ति से स्पर्श हो जाने से उच्च जातीय सवर्णों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है किंतु, निम्नजातीय स्त्री के साथ यौन संबंध बनाने या यौन शोषण करने में धर्म भ्रष्ट नहीं होता है। ‘क्लॉड ईथरली’ नामक कहानी का पात्र अपने बारे में बताता है, ‘मैं एक बहुत बड़े करोड़पति सेठ का लड़का हूं। उनके घर में जो काम करने वालियां हुआ करती थीं, उनमें से एक मेरी मां है, जो अभी भी वहीं है। मैं घर से दूर पाला पोसा गया, मेरे पिता के खर्चे से।‘

[bs-quote quote=”मुक्तिबोध एक प्रगतिशील रचनाकार हैं, जिसमें अतार्किकता एवं अवैज्ञानिकता के लिए कोई जगह नहीं है। किंतु, उनकी लगभग प्रत्येक कहानी में ईश्वर, देवी-देवता, भाग्य, देव-दानव, राक्षस, स्वर्ग आदि शब्दावली का प्रयोग मिलता है। इन शब्दों का प्रयोग पात्रों द्वारा बोले गए संवादों से लेकर लेखक द्वारा की गयी टिप्पणियों में भी समान रूप से हुआ है। इससे यह प्रतीति होनी स्वाभाविक है कि लेखक कहीं न उस कहीं धार्मिक आस्था या अंधविश्वास से बंधा है, जिसमें पत्थरों को भगवान मानकर उनकी पूजा की जाती है। किंतु, कई स्थानों पर वह इस अंध धार्मिकता से बाहर निकलकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाता दिखायी देता है। ‘” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मुक्तिबोध की बड़ी पहचान कवि के रूप में है। कविता उनके अंतर्मन में रची-बसी प्रतीत होती है। शायद यही कारण है कि उनकी कहानियों की भाषा भी कवित्वपूर्ण दिखायी देतीहै। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कविता में कहानी कहने का प्रयास किया गया है। कई स्थानों पर उनके पात्र संस्कृत नाटकों की भांति अपने संवादों में ‘मेरे देवता, मेरे ध्येय’, ‘हृदय कामने’, ‘हृदयेश्वर’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। इन कहानियों में फेंटेसी भी है और आधुनिकता भी। उनके पात्र फेंटेसी और आधुनिकता के द्वंद्व का शिकार है। वे इस द्वंद्व से बाहर निकलने के लिए बेचैन हैं। ये कहानियां वैचारिकता से परिपूर्ण हैं, तथा कथा की कमी और अनगढता के बावजूद अपने आप में विशिष्ट हैं और बहुत कुछ कहती है।

मुक्तिबोध का अंधेरे से विशेष लगाव प्रतीत होता है। उन्होंने अंधेरे में शीर्षक से कहानी लिखी और कविता भी। और अंधेरे में प्रकाश की किरणें बिखेरने वाले चंद्रमा पर भी कविता लिखी चांद का मुंह टेढा है। इसके अलावा उनकी अन्य रचनाओं में भी किसी न किसी रूप में अंधेरा विद्यमान है। अंधेरे की दुनिया की अपनी कहानी, अपना दर्द, अपनी संवेदेनाएं है। अंधेरा व्यक्ति को डराता है, भटकाता है, किंतु अंधेरे से ही राह निकलती है। प्रकाश का मूल्य अंधेरे से है। अंधेरे के बिना प्रकाश मूल्यहीन है। अंधेरा उनकी चेतना का एक बहुत बड़ा अंग है। अंधेरा उनकी कविताओं से लेकर कहानियों तक का विषय है। अंधेरा उनकी रचनाओं में एक रूपक की तरह है, जो कई रूपों और कई अर्थों में सामने आता है। कहीं अज्ञान का अंधेरा है, कहीं अविश्वास का तो कहीं आशंकाओं और निराशाओं का अंधेरा है। कहीं विचारों का अंधेरा है तो कहीं भावनाओं का। यह अंधेरा कहीं व्यक्ति के अंदर उसकी चेतना में है तो कहीं उसकी अनुभूतियों में है। मुक्तिबोध की कहानियों से गुजरते हुए निरंतर यह आभास होता है कि लेखक की दुनियां अंधेरे की दुनियां है। चारों ओर अंधेरा व्याप्त है। एक-दूसरे को टटोलते, टकराते, गिरते-संभलते लोग अंधेरे में भटक रहे हैं किंतु अंधेरे के बीच से ही जीवन की राह तलाश करते हैं। अंधेरे की अनुभूतियां, अंधेरे के रहस्य और अंधेरे के संघर्ष, ये सब ही मुक्तिबोध की रचना-धर्मिता के आधार और उनकी जीवन-ऊर्जा के स्रोत है। अंधेरे से जूझते उनकी कहानियों के पात्र एक नई जीवन-दृष्टि का निर्माण करते हैं। यह जीवन-दृष्टि बौद्धिक स्तर पर भी दिखायी देती है और सामाजिक स्तर पर भी।

अंधेरे का अपना सौंदर्य है। प्रतिकूलताओं के झंझावातों के बीच एक दीपक का टिमटिमाना बहुत बड़ी आश्वस्ति है। मुक्तिबोध की कहानियां जीवन के प्रति आशा से भरी हैं। ये कहानियां जीवन में व्याप्त असमानता, अन्याय, आपाधापी, अहंकार, अविश्वास, अनैतिकता और अमानवीयता के बीच मनुष्यता और मानवीय मूल्यों की तलाश की कहानियां हैं। संबंधों और मूल्यों का क्षरण मानव-समाज के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। मुक्तिबोध इस चुनौती को भलि-भांति समझते हैं और उनकी कहानियों के पात्र इस चुनौती का सामना करते दिखायी देते हैं।

शिक्षित, सम्पन्न होने के साथ-साथ उच्च्जातीय होना सभ्य या भद्रवर्ग की पहचान है। अन्यों से स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाला यह वर्ग श्रेष्ठता के दम्भ में जीता है। झूठी शान के साथ जीने वाला यह भद्रवर्ग दिखावा पसंद है। लोकतांत्रिक भारत में सामंती-व्यवस्था टूटने के पश्चातइस वर्ग की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई है। ‘क्लॉड ईथरली’ का नायक अपने बारे में बताते हुए इस तथ्य को स्वीकार करता है, यथा- ‘हां, मैं उस भद्रवर्ग का अंग हूं कि जिसे अपनी भद्रता के निर्वाह के लिए अब आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ता है।‘

मुक्तिबोध एक प्रगतिशील रचनाकार हैं, जिसमें अतार्किकता एवं अवैज्ञानिकता के लिए कोई जगह नहीं है। किंतु, उनकी लगभग प्रत्येक कहानी में ईश्वर, देवी-देवता, भाग्य, देव-दानव, राक्षस, स्वर्ग आदि शब्दावली का प्रयोग मिलता है। इन शब्दों का प्रयोग पात्रों द्वारा बोले गए संवादों से लेकर लेखक द्वारा की गयी टिप्पणियों में भी समान रूप से हुआ है। इससे यह प्रतीति होनी स्वाभाविक है कि लेखक कहीं न उस कहीं धार्मिक आस्था या अंधविश्वास से बंधा है, जिसमें पत्थरों को भगवान मानकर उनकी पूजा की जाती है। किंतु, कई स्थानों पर वह इस अंध धार्मिकता से बाहर निकलकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाता दिखायी देता है। ‘क्लॉड ईथरली’ कहानी में एक पात्र का यह कथन इसकी पुष्टि करता है, ‘लगभग पांच मिनट बाद हम उस भैरो के गेरुए, सुनहले, पन्नी जड़े पत्थर तक पहुंच गए, जो इस अत्याधुनिक युग में एक तार के खम्भे के पास श्रद्धापूर्वक स्थापित किया गया था…’।

ब्रह्मराक्षस भी इसी तरह का विषय है, जो मुक्तिबोध की चेतना में गहरे तक बैठा प्रतीत होता है। कविता, कहानी हर कहीं ब्रह्मराक्षस का जिक्र है! चाँद का मुँह टेढ़ा है में ब्रह्मराक्षस को सम्बोधित एक कविता है तो ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ नामक उनकी एक चर्चित कहानी है। मुक्तिबोध ने जिस तरह का अभिशप्त और निर्वासित जीवन जिया, उसकी पीड़ा और दंश को ब्रह्मराक्षस में अनुभव किया जा सकता है। ब्रह्मराक्षस का दर्द निर्वासन से अधिक निर्वासन के कारण का है। इतना बड़ा विद्वान और क्षमतावान होते हुए भी वह इस प्रकार का अभिषप्त निर्वासित जीवन जीने के लिए विवश क्यों है? यदि वह ब्राह्मण होता क्या तब भी उसकी यह विवशता होती, शायद नहीं। शायद तब वह पूज्य होता, उसकी विद्वता की कीर्ति दूर-दूर तक फैलती और दूर-दूर से विद्यार्थी उसके पास ज्ञानार्जन के लिए आते। वह इतने बड़े किले में अकेला है, कोई उसके पास विद्या-अर्जन के लिए नहीं आता। यहां तक कि उसके बारे में दुष्प्रचार किया जाता है कि उस किले के अंदर भूत रहता है ताकि भूत के भय से कोई उसके पास तक जाने का विचार न करे। यह एक प्रकार की अस्पृश्यता है, और ब्रहमराक्षस घृणा, उपेक्षा एवं अस्पृश्यता का दंश झेलता है। किंतु वह सच्चा विद्वान है, अपने पास आए विद्यार्थी को पूर्ण स्नेह, साधना और मनोयोग से समस्त विद्याओं की शिक्षा देकर उसे पारंगत बनाता है। ब्रह्मराक्षस शम्बूक का स्मरण कराता है। ज्ञान पर अपना एकाधिकार समझने और जताने वाले ब्राह्मणों द्वारा शम्बूक का प्रतिकार किया गया, उसकी उपेक्षा की गयी तथा उसके विरूध घृणापूर्ण दुष्प्रचार किया गया था। शम्बूक और ब्रहमराक्षस, दोनों के बीच अंतर सिर्फ इतना है कि शम्बूक के मामले में ब्राह्मणों ने राम के हाथों उसकी हत्या करवाकर ही दम लिया जबकि ब्रह्मराक्षस के मामले में उसे भूत प्रचारित कर सामाजिक जीवन से बहिष्कृत किया गया।

[bs-quote quote=”ब्रह्मराक्षस ज्ञान से भरा और खुले विचारों वाला एक मनीषी है, जो किसी का अहित नहीं करता अपितु दम्भ और पाखण्ड से मुक्त कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। इसलिए वह अपने शिष्य को, अपने प्राप्त ज्ञान को स्वयं तक सीमित न रखकर उसका प्रसार करने की सीख देता है। शिष्य की शिक्षा पूर्ण होने पर वह उस से कहता है, ‘ज्ञान का पाया हुआ उत्तरदायित्व मैंने पूरा किया। अब मेरा यह दायित्व तुम पर आ गया है। जब तक मेरा दिया तुम किसी और को न दोगे तब तक तुम्हारी मुक्ति नहीं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

बहिष्कार अपने आप में सामाजिक हत्या है। सामाजिक हत्या, शारीरिक हत्या से अधिक कष्टदायक होती है, क्योंकि शारीरिक हत्या में व्यक्ति एक बार हत्या का दर्द सहता है, जबकि सामाजिक हत्या में उसे रोज हत्या के दर्द से गुजरना पड़ता है। ब्रह्मराक्षस इसी दंश को सहने के लिए विवश है। बहिष्कृत और अस्पृश्य ब्रह्मराक्षस को अपना गुरू मानकर उससे शिक्षा प्राप्त करने वाला ब्राह्मण विद्यार्थी भी अस्पृश्य और बहिष्कृत है, इसीलिए जब वह विद्यार्थी ‘चिड़ियों के घोंसलों और बर्रों के छत्तों-भरे सूने ऊंचे सिंहद्वार के बाहर निकला तो एकाएक राह से गुजरते हुए लोग ‘भूत’ ‘भूत’ कहकर भाग खड़े हुए।‘

यह कहानी इस ओर भी इंगित करती है कि असली ब्रहमराक्षस वह नहीं बल्कि स्वयं को गर्व से महाज्ञानी कहने वाले वे लोग हैं जो ज्ञान के मामले में मूढ किंतु ज्ञान के दम्भ में चूर रहकर भोले-भाले लोगों का शोषण करते हैं। काशी ऐसे दम्भी ब्राह्मणों का गढ है। कहानी के अनाम पात्रों के बीच वार्तालाप में यह बात अभिव्यक्त होती है, जिनमें से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कह रहा था, ‘अरे, वह भट्ट। नितांत मूर्ख है और दंभी भी। मैंने जब उससे ईशावास्योपनिषद की कुछ पंक्तियों का अर्थ पूछा, तो वह बोखला उठा। इस काशी में कैसे-कैसे दंभी इकट्ठे हुए हैं।‘

विद्या का जहां तक संबंध है ब्राह्मण-परम्परा में ब्रह्म-विद्या ही सर्वोच्च विद्या है, जिसमें ब्रह्म को जानना ही सब कुछ जान लेना है। जिसने ब्रह्म को जान लिया वह ब्राह्मण है। ब्राह्मणों द्वारा लिखित समस्त तथाकथित शास्त्रों में ब्रह्मवाद या ब्राह्मणवाद का प्रतिपादन, पोषण, संरक्षण और प्रसार का प्राधान्य है। ब्राह्मणों द्वारा लिखित ब्रह्म-विद्या के सारे ग्रंथ, जिन्हें शास्त्र कहा जाता है, संस्कृत में हैं, इसलिए संस्कृत और संस्कृत में लिखे शास्त्रों का ज्ञान ही विद्या है। जिसे इनका ज्ञान हो वही विद्वान और जो इनका ज्ञान कराए वही गुरू है। संस्कृत को देवभाषा माना गया है, और ब्राहमणों की शुचितावादी नीति के चलते जिसका पढना, लिखना, बोलना और सुनना शूद्र एवं अंत्यजों के लिए प्रतिबंधित रहा है। यह ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के लिए विद्या है, किसी अब्राह्मण, विशेष रूप से ब्राह्मण-विरोधी के लिए यह वर्जित है। ब्राह्मण का चाटुकार अब्राह्मण भले ही इस विद्या को सीख ले, किंतु यदि कोई शूद्र, अंत्यज देवभाषा और उसमें लिखे ग्रंथों को पढे तो यह ब्राह्मणों के एकाधिकार वाले साम्राज्य में घुसपैठ है, जो ब्राह्मणों के लिए नितांत असह्य एवं अस्वीकार्य रही है। ब्राह्मणवाद की दृष्टि से देखा जाए तो यह एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र की सम्प्रभुता के हनन जैसा मामला है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण के समान है। ब्राह्मणों द्वारा स्वयं को देव और अपने विरोधियों को दानव घोषित किया, जिसके अनुसार दुनियां में जितनी भी अच्छाईयां, नैतिकता और श्रेष्ठताएं हैं वे ब्राह्मण में निहित हैं और जितनी भी बुराइयां, अनैतिकता, एवं हेयताएं हैं या हो सकती हैं, दानव उन सब का घर हैं। यही कारण है कि ब्रह्म विद्या का ज्ञाताहोकर भी कोई दानव या राक्षस ऋषि, महर्षि या मनीषी नहीं हो सकता, वह ब्रह्मराक्षस ही हो सकता है। जो संस्कृत जानता है वह सभ्य है, और जो संस्कृत नहीं जानता वह असभ्य और गंवार है। ‘लड़का, जो देहाती था, अब गुरू से संस्कृत में वार्तालाप भी करने लगा।‘ इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जिस तरह आज अंग्रेजी का वर्चस्व है। गांव देहात में रहने वाले अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित लोग हिंदी या अन्य भाषाएं जानते हैं, जबकि नगरों में रहने वाले शिक्षित, सम्भ्रांत लोग अंग्रेजी बोलते हैं। अंग्रेजी जानने वाले लोग अंग्रेजी न जानने वाले लोगों को हेय और हीन समझते हैं, उसी प्रकार संस्कृत काल में संस्कृत जानने वालों की तुलना में संस्कृत नहीं जानने वालों को हेय और हीन समझा जाता है। सवर्णों-ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों-अंत्यजों को हीन मानने का यह भी एक आधार था। संस्कृत भाषा और शास्त्रों का ज्ञान चूंकि सबके लिए नहीं है, यह गुप्त ज्ञान है, इसके सार्वजनिक होने पर इसमें निहित संकीर्णताएं, कुटिलताएं और षड़यंत्र गोपनीय नहीं रहेंगे। पर्दाफाश होने पर उनका प्रतिकार होगा जो उनके वर्चस्व एवं अस्तित्व के लिए खतरा हो सकता है।

भारतीय समाज में ज्ञान के साथ ब्राह्मण का इतना दीर्घ जुड़ाव है कि किसी भी मनीषी को प्राय: ब्राह्मण ही समझा या माना जाता है। लोक समाज में यह सामान्य धारणा है कि ज्ञानी या गुरु ब्राह्मण होता है। इस कहानी में भी ब्रह्मराक्षस का शिष्य मनीषी ब्रह्मराक्षस को देखता है तो ब्राह्मण ही समझता है। ‘तेजस्वी ब्राह्मण का देदीप्यमान चेहरा, जो अभी-अभी मृदु और कोमल होकर उस पर किरनें बिखेर रहा था, कठोर और अजनबी होता जा रहा है।‘ कहानीकार द्वारा भी ब्रह्मराक्षस को ब्राह्मण ही कहा गया है, यथा- ‘ब्राह्मण ने कठोर होकर कहा, ‘तुमने यहां आने का कैसे साहस किया? यहां कैसे आए?’

ब्राह्मण के लिए शुचिता बहुत महत्वपूर्ण रही है। यह सामाजिक श्रेष्ठता की द्योतक और वर्चस्व का आधार है। ऋषि परम्परा में ब्राह्मण ऋषियों द्वारा कुल गोत्र जानकर उसके आधार पर ही शिष्य बनाया जाता था। प्राय: उच्च कुल और वर्ण के लोगों को ही वे अपना शिष्य बनाते थे। किसी दानव या राक्षस का ब्राह्मण से शिक्षा प्राप्त करना इसीलिए असम्भव था। किंतु ब्रह्मराक्षस इस वर्ण-शुचिता की संकीर्णता से मुक्त है, इसलिए वह ज्ञान प्राप्ति के लिए शरण में आए शिष्य का कुल, गोत्र, वर्ण नहीं पूछता। केवल इतना पूछता है, ‘तूने निश्चय कर लिया है?’ इस प्रश्न में शिष्य की ज्ञान प्राप्ति हेतु दृढ-निश्चय की परीक्षा के साथ-साथ यह प्रश्न भी निहित है कि क्या तुम समाज-बहिष्कृत और अस्पृश्य ऋषि का शिष्य बनने के लिए तैयार हो।

ब्रह्मराक्षस ब्राह्मणवाद के समक्ष एक चुनौती बनकर खड़ा है। कोई राक्षस यदि ब्रह्मज्ञानी हो जाए तो ब्राह्मणवाद के लिए यह आवश्यक है कि उसका ज्ञान उस तक ही सीमित ही रहे, विस्तार न पाए। ताकि उनके गुप्त ज्ञान की गोपनीयता और उसके आधार पर समाज में उनका वर्चस्व बना रहे। शम्बूक की हत्या उसके ज्ञान का विस्तार न होने देने के षड़यंत्र का ही परिणाम था। यदि शम्बूक की हत्या नहीं होती और वह जीवित रहता तो बहुत सम्भव है कि पुरजोर तरीके से ब्राह्मणवाद को नकारकर समतामूलक समाज की स्थापना हेतु जो काम आज के समय में डॉ. अम्बेडकर ने किया है, वह काम सदियों पहले शम्बूक द्वारा कर दिया गया होता। उनके ज्ञान और चेतना का विस्तार उसी समय में शूद्र-अतिशूद्र समाज में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध प्रतिकार का बीजारोपण कर देता, जिससे समाज-परिवर्तन की दिशा में एक बड़ी क्रांति का सूत्रपात हो सकता था। शम्बूक की हत्या ने उन्हें उस काल का अम्बेडकर होने से रोक दिया था। ब्रह्मराक्षस अपने बारे में कहता भी है, ‘मैं प्रवृत्तिवादी हूं, साधू नहीं।’ प्रवृत्तिवादी व्यक्ति निरंतर सक्रिय रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहता है। ज्ञान और चेतना का जितना अधिक से अधिक प्रसार हो, उतना ही मनुष्यता के हित में है। ब्रह्मराक्षस ज्ञान से भरा और खुले विचारों वाला एक मनीषी है, जो किसी का अहित नहीं करता अपितु दम्भ और पाखण्ड से मुक्त कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। इसलिए वह अपने शिष्य को, अपने प्राप्त ज्ञान को स्वयं तक सीमित न रखकर उसका प्रसार करने की सीख देता है। शिष्य की शिक्षा पूर्ण होने पर वह उस से कहता है, ‘ज्ञान का पाया हुआ उत्तरदायित्व मैंने पूरा किया। अब मेरा यह दायित्व तुम पर आ गया है। जब तक मेरा दिया तुम किसी और को न दोगे तब तक तुम्हारी मुक्ति नहीं।‘ इसमें कोई अति-मानवीयता अथवा अलौकिकता नहीं, अपितु इसमें मानव-कल्याण और मनुष्यता-बोध ही है।

जयप्रकाश कर्दम जाने-माने चिंतक,आलोचक और कथाकार हैं।

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4 COMMENTS

  1. कहानियों की
    समीक्षा अच्छी है .इसमें कोई दो राय नहीं कि कहानियों की समीक्षा नहीं के बराबर हुई .इसके अलावा मुक्तिबोध की एक साहित्यिक की डायरी को मैं उनकी बेहतरीन सृजन मानता हूँ .

  2. जय भीम सर …आपने कथाकार मुक्तिबोध की मौलिक एवं सारगर्भित समीक्षाएँ करके मुक्तिबोध को नये सिरे से साहित्य में स्थापित किया। मुक्तिबोध को कथाकार के रूप में बारीकी से रूबरू करवाकर आपने कृतज्ञ किया।

  3. कर्दम जी ने कहानियों की बहुत अच्छी समीक्षा की है,एक नए दृष्टिकोण से।यह कहना सही है कवि के रूप में ही उनका मूल्यांकन अधिक किया गया है,अतः समीक्षा के लिए कहानियों का विशेष रूप से चयन अर्थ गर्भित है जिससे सामाजिक सन्दर्भ ज्यादा खुलते हैं।कर्दम जी ने कहानियों में समाज सन्दर्भित मानवीय मूल्योको रेखांकित करने और कहीं कहीं परंपरागत कमजोरियों को पकड़ने में भी अपनी सन्तुलित दृष्टि का परिचय दिया है।

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