Monday, May 4, 2026
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मेरा गाँव : 30 वर्षों के बाद गांव वापस लौटे अतुल यादव के खट्टे-मीठे अनुभव

यह कहानी लेखक अतुल यादव के गांव पांडेयपुर की है, जो 30 वर्षों बाद अपने गांव वापस लौटे हैं, अपने गांव लौटने का जिक्र उन्होंने अपने कई शुभचिंतकों, दोस्तों और गुरुजनों से किया, लेकिन किसी ने इस बारे में सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी , सभी ने कहा कि तुम्हें और आगे बढ़ना चाहिए गांव में क्या रखा है? आगे की कहानी अतुल की जुबानी...

जननायक कर्पूरी ठाकुर के जन्म शताब्दी के अवसर पर जातिवार जनगणना कराने की उठी मांग

लखनऊ। रविवार 28 जनवरी 2024 को ए ब्लाक दारूल सफा कमान हाल लखनऊ में जननायक भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर के जन्म शताब्दी के अवसर...

लखनऊ : सरकार ने दी ESMA लगाने की धमकी, किंग जॉर्ज के कर्मचारियों की हड़ताल खत्म

फिलहाल आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के वेतन बढ़ोत्तरी को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार केजीएमयू  प्रशासन और  आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के बीच वार्ता के बाद यह तय हुआ है कि आनलाइन बायोमैट्रिक की वजह से कटे हुये मानदेय का भुगतान कर दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 370 हटाने को उत्तर प्रदेश पुलिस ने माना ‘कश्मीरियों के उत्पीड़न’ को अपना अधिकार

जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला कानून जो संविधान के अनुच्छेद 370 के रूप में उल्लेखित है को अब सरकार के साथ...

महिला सुरक्षा, सशक्तीकरण का संदेश लेकर साइकिलिस्ट आशा पहुँचीं उत्तर प्रदेश

लखनऊ। देश में बढ़ते महिला उत्पीड़न की घटनाओं, बालिकाओं के साथ दुष्कर्म, छेड़छाड़ के बढ़ते मामलों से आहत मध्य प्रदेश की साइकिलिस्ट आशा मालवीय...

लखनऊ: पुलिसिया प्रताड़ना से आजिज आकर आशीष ने की आत्महत्या, दो दरोगा लाइन हाजिर

लखनऊ। जिले के रहीमाबाद थाना अंतर्गत एक प्रतियोगी छात्र आशीष कुमार रावत (22) ने रविवार दोपहर में खुदकुशी कर ली। उसका शव कमरे में...

राजनीति अजीब खेल है

राजनीति अजीब खेल है इसकी बानगी उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में उस समय देखने को मिली, जब विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भाजपा...

उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी क्या पिकनिक स्पॉट भर है?

उत्तराखंड आन्दोलन में तमाम खामियों के बावजूद एक बात, जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया, वह थी राजधानी की बात।  यह इसलिए क्योंकि अन्य राज्यों...

भेड़ियों की गाथाओं के बीच हिरणों की आत्मकथा की तरह

उर्मिलेश पेशे से पत्रकार हैं। जिस प्रकार की ईमानदारी और साहस का परिचय वह पत्रकारिता में देते हैं, वैसा ही इन संस्मरणों में। संस्मरण में आये सभी किरदारों का उर्मिलेश जैसा विश्लेषण करते हैं उससे उर्मिलेश के व्यक्तित्व और उनकी पक्षधरता का भी पता चलता है। निस्संदेह, उर्मिलेश जनपक्षधर पत्रकार और बुद्धिजीवी हैं। उर्मिलेश की भाषा-शैली, वर्णन-शैली अद्वितीय है। इन सभी संस्मरणों में एक रोचकता भी है। वास्तव में, 'गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल' न सिर्फ़ संस्मरण भर है, बल्कि अत्यंत सुसंगत और तथ्यों पर आधारित वाम और बहुजन वैचारिकी की सच्ची आलोचना भी है जिसे स्वीकार करके ही इन दोनों महत्वपूर्ण खेमों का सुसंगठित विकास सम्भव है।

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