भेड़ियों की गाथाओं के बीच हिरणों की आत्मकथा की तरह

मोहम्मद उमर

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उर्मिलेश की पुस्तक गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल उनकी स्मृति में दर्ज सुंदर-असुंदर घटनाओं और प्रसंगों का संग्रह है। इस पुस्तक में बारह संस्मरण हैं और सभी महत्वपूर्ण हैं। उर्मिलेश ने इन संस्मरणों के माध्यम से भारतीय समाज और देश के शिक्षण संस्थानों से लेकर बड़े-बड़े मीडिया संस्थाओं में व्याप्त गैर-बराबरी और जातिवाद के क्रूर और अमानवीय स्वरूप को उजागर किया है। इसके साथ ही उर्मिलेश ने साहित्य के शिखर पुरुषों से लेकर मीडिया संस्थानों में आसीन कद्दावरों के भीतर व्याप्त जातिवाद, सामंतवाद, गैर-बराबरी को सामने रखा है।

जिस तरह के साहस और ईमानदारी के साथ ‘लेखक’ ने शब्द-साधना की है, वह संस्मरणों में प्रायः अप्राप्य-सी लगती है। ‘हमारा मानना है कि संस्मरणों और आत्मकथाओं में हर कीमत पर सच आना चाहिए अन्यथा लिखना ही नहीं चाहिए। हर किसी को सहिष्णु होकर जीवन और घटनाओं के सच का सामना और सम्मान करना चाहिए। आत्म-निरीक्षण और आत्मालोचना के रास्ते ही व्यक्ति, संस्था या समाज बेहतर बनाते हैं’ गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल/ पृ.सं-9/ नवारुण / पहला जन संस्करण: जुलाई 2021)।

उर्मिलेश संस्मरणों में न सिर्फ अपने संघर्ष की कहानी कहते हैं, बल्कि उनकी दास्ताँ पढ़कर लगता है कि वह बहुजन समाज से बाहर निकले सभी युवक-युवतियों की कहानी कहते हैं। इसी पुस्तक में तीसरा अध्याय है जेएनयू के वामाचार्य और एक अयोग्य छात्र के नोट्स। इस लेख के बहाने लेखक ने ‘जेएनयू’ जैसे शिक्षण संस्थान के भीतर व्याप्त जातिवादी आचरण को खोलकर सामने रख दिया है। निस्संदेह, डॉ. नामवर सिंह एक बड़े मार्क्सवादी आलोचक थे और वे अपने लेखों, भाषणों और चर्चित पुस्तकों के चलते हमेशा याद किये जायेंगे। उनका साहित्यिक कर्म अविस्मरणीय है और बना रहेगा। नामवर जी हिंदी की ‘मार्क्सवादी आलोचना परम्परा’ में डॉ. रामविलास शर्मा के बाद उस कद के दूसरे महत्त्वपूर्ण और बड़े आलोचक थे। इसे उर्मिलेश ने भी स्वीकार किया है। ‘डॉ. नामवर सिंह को केंद्र का चैयरमैन पाकर हम जैसे दूर-दराज़ से आये छात्र गौरवान्वित महसूस करते थे।…निस्संदेह, वह बहुत अच्छा पढ़ाते थे। ‘जेएनयू में डॉ.नामवर सिंह को सुनने के बाद लगा कि हिंदी और साहित्येतिहास के मामले में वह ज्ञान के सागर हैं’….(वही, पृ. स.42) लेकिन इस रेखांकन के साथ ही वह नामवर सिंह के व्यक्तित्व के नकारात्मक पहलुओं की ओर भी इशारा करते हैं। पर उनके व्यक्तित्व का एक पहलू मुझे परेशान करता था। वह रहन-सहन और आचरण-व्यवहार में किसी सामंत (फ़्यूडल) की तरह नज़र आते थे। केंद्र के कुछेक छात्र उनका पैर छूते थे। कुछ छात्र तो उनके घर के रोज़मर्रे के कामकाज में जुटे रहते थे। जब वह चलते, कुछ छात्र और नए शिक्षक उनके पीछे-पीछे चलने लगते। कुछ लोग उनकी बिगड़ी चीज़ें बनवाने में लगते तो कुछेक ऐसे भी थे, जो नियमित रूप से कैम्पस में स्थित उनके फ़्लैट जाकर गुरुवर का आशीर्वाद ले आया करते थे..‘(वही, पृ. सं. 42-43)

‘लेखक’ ने नामवर सिंह के व्यक्तित्व के विषय में अपने जो भी व्यक्तिगत अनुभव साझा किए हैं, जो भी प्रश्न उठाएं हैं, उन्हें एक क्षण में ‘मनगढ़ंत’ या ‘झूठ’ या ‘घटनाओं को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने वाला’ कहा जा सकता है। लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ की 75वीं वर्षगाँठ पर लखनऊ में आयोजित एक विशेष समारोह में 8 अक्तूबर, 2011 को डॉ.नामवर सिंह ने कहा, ‘आरक्षण के चलते दलित तो हैसियतदार हो गए हैं लेकिन बाह्मण-ठाकुर के लड़कों की भीख माँगने की नौबत आ गयी है‘(वही, पृ. 39) वाले प्रसंग पर आपकी राय क्या होगी! यह सिर्फ डॉ.नामवर सिंह की बात नहीं है, बल्कि देश के सभी शिक्षण संस्थानों में बैठे प्रगतिशील सवर्ण शिखर पुरुषों (कुछेक को छोड़कर) का सच है! क्या यह ‘प्रगतिशीलता’ वायवीय बुलबुले सी नहीं है, जो क्षणभंगुर होता है। वास्तव में, यह सिर्फ मेरा, नामवर जी या जेएनयू के प्रगतिशीलहिंदी अध्यापकों-प्रोफेसरों का सच नहीं है, सम्पूर्ण हिंदी क्षेत्र में व्याप्त बड़े बौद्धिक सांस्कृतिक संकट, कथनी-करनी के भेद, हमारे शैक्षणिक जीवन, ख़ासकर विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के हिंदी विभागों की बौद्धिक-वैचारिक दरिद्रता का भी सच है‘(वही, पृ. 40) डॉ.नामवर सिंह पर की गई इस टिप्पणी या प्रसंग का उद्देश्य व्यक्तित्व के अनादर का नहीं है बल्कि ‘आत्म-निरीक्षण और आत्मालोचना के रास्ते ही व्यक्ति, संस्था या समाज अपने को बेहतर बनाते हैं‘( गा.में क्रि.कॉ., आरम्भ से पहले, पृ. 9) इसे डॉ.नामवर सिंह के व्यक्तित्व पर प्रहार सा नहीं लिया जाना चाहिए। उर्मिलेश स्वयं प्रगतिशील लेखक एवं बुद्धिजीवी हैं, इसलिए उनकी यह टिप्पणी प्रगतिशील खेमें का सच्चा ‘आत्म-निरीक्षण’ और ‘आत्मालोचना’ है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।

पुस्तक में ‘पहला संस्मरण’ इलाहाबाद विश्वविद्यालय और ‘छायावाद’ के प्रमुख स्तम्भों में से एक, महादेवी वर्मा जी से जुड़ा हुआ है। ‘संस्मरण’ का शीर्षक है ‘हमने इस महादेवी को देखा था!’ ‘उर्मिलेश’ विश्वविद्यालय के छात्र थे और  ‘डायमंड जुबिली हॉस्टल’ में रहते थे। लेखक ने एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन किया है, उन्हीं दिनों कैम्पस में एक भयानक घटना हुई। कुछ बेहद ज़रूरी और प्रासंगिक मुद्दों को लेकर आन्दोलनरत छात्रों पर भीषण पुलिस लाठीचार्ज हुआ। कई छात्रनेता गिरफ्तार कर नैनी जेल भेज दिए गए‘(हमने इस महादेवी को देखा था, पृ. 17) ‘इलाहाबाद विश्वविद्यालय’ और यहाँ के छात्र आंदोलनों का इतिहास बेहद पुराना रहा है। छात्र आंदोलन समय-समय पर होते आए हैं, और इन आंदोलनों ने देश की राजनीति को भी प्रभावित किया है। इस प्रभाव से राजनीति की दिशा भी मुड़ी है। छात्र आंदोलनों में भाग लेने वाला प्रत्येक छात्र अपने क्षेत्र, प्रदेश या फिर राष्ट्रीय राजनीति में जाए, यह जरूरी नहीं है। किंतु, इन आंदोलनों में जुड़ने का परिणाम होता है कि वह अपने साथ होने वाले अन्याय के विरूद्ध आवाज़ उठाने वाले वाला सजग नागरिक जरूर बन जाता है। छात्र राजनीति और आंदोलन का उद्देश्य सिर्फ नेता ही बनाना नहीं है बल्कि एक जिम्मेदार जागृत नागरिक बोध भी उत्पन्न कराना है। लेकिन सत्ता हमेशा ऐसे छात्र आंदोलनों को दबाने की कोशिश करती है। उसका उद्देश्य, ऐसे रचनात्मक विद्रोहों को जल्द शांत करना होता है, तभी अक्सर छात्र आंदोलनों पर लाठीचार्ज जैसी बेहद क्रूर और दमनकारी कार्रवाई होती हैं। सत्ता ऐसे आंदोलनों की शक्ति से परिचित होती है, और इसीलिए, वह इन्हें कुचलने का प्रयास करती है।

लेखक ने बताया है कि विश्वविद्यालय में लाठीचार्ज की घटना के कुछ दिनों बाद ही डायमंड जुबिली हॉस्टल का सालाना जलसा होने वाला था। मुख्य अतिथि के रूप में महादेवी वर्मा और तत्कालीन कुलपति प्रोफ़ेसर हजेला का नाम तय हुआ। हॉस्टल वार्डन और अधीक्षक साहबों के दबाव में आकर कुलपति साहब को बुला तो लिया गया पर हॉस्टल के छात्रों के एक हिस्से में इसे लेकर रोष था‘(वही, पृ.16)‘..छात्रों पर भीषण लाठीचार्ज के चलते उनकी छवि बहुत खराब हो चुकी थी‘(वही)। छात्रों के लिए यह असह्य था। कुलपति का स्वागत सम्भव नहीं था। छात्रों पर लाठीचार्ज जैसे बर्बरतापूर्ण कृत्य के वे ही जिम्मेदार थे। एक दिन पहले की रात हमारे कुछ मित्रों ने तय किया कि समारोह के मंच पर जैसे ही कुलपति महोदय आकर आसीन हों, उनके स्वागतमें मंच के ठीक सामने बैठे कुछ छात्रों की तरफ से वाइस चांसलर मुर्दाबादऔर लाठीचार्ज के दोषी वीसी वापस जाओजैसे नारे शुरू हो जाने चाहिए‘(वही, पृ.16) लेकिन एक समस्या थी। हमें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि समारोह में ऐसे दृश्य पैदा होने पर महादेवी जैसी मृदु, शालीन और लगभग अराजनीतिक समझी जाने वाली कवियत्री की क्या प्रतिक्रिया होगी‘(वही, पृ.17) लेकिन विरोध जरूरी था, हुआ भी। ‘..मैं ऐसे कुलपति का अपने हॉस्टल प्रांगण में कैसे स्वागत कर सकता हूँ, जिनके निर्देश पर विश्वविद्यालय में लाठी-गोली लेकर भारी पैमाने पर पुलिस आयी और हम सबको मारना पीटना शुरू कर दिया‘(वही, पृ.17) इसके बाद छात्रों ने मिलकर ‘कुलपति’ का विरोध किया और वह बीच में चले गए। छात्रों का विरोध सफल रहा। किंतु, अब डर था कि ‘महादेवी जी कहीं नाराज़ तो नहीं होंगी’। जिस ‘प्रतिक्रिया’ की अटकलें लगाई जा रही थीं, वह कुछ इस तरह थी।

आज तुम लोगों ने यहाँ अपने हॉस्टल में मेरे सामने जो कुछ किया, उसका मैं नैतिक समर्थन करती हूँ। निर्दोष बच्चों पर लाठीचार्ज कराने का किसी को अधिकार नहीं है। यह सिर्फ़ अनैतिक ही नहीं है, बर्बर कृत्य है जो विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस ने मिलकर किया-कराया। मैं उस दिन के अखबारों में छपी ख़बरों को पढ़कर बहुत परेशान हुई थी। शांति और अहिंसक ढंग से प्रदर्शन करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हम लोकतंत्र हैं‘(वही, पृ.19)

महादेवी जी की यह टिप्पणी साहित्यकार-बुद्धिजीवी वर्ग की पक्षधरता को स्पष्ट करती है। यह टिप्पणी ऐतिहासिक है। महादेवी जी का कृतित्व तो महान था ही, उनका व्यक्तित्व भी महान था। साहित्यकार को जनपक्षधर होना चाहिए, तभी का वह ‘जन’ का होता है। सत्ता और बड़े प्रतिष्ठानों से साँठ-गाँठ होने पर पद और पुरस्कार तो मिल जाते हैं, लेकिन जनता के ह्रदय में विराजना है तो ‘कबीर’ सा ‘असहमति’ का साहस होना चाहिए। ‘पद’ भले सत्ता देती हो लेकिन ‘कद’ जनता देती है। महादेवी जी की यह टिप्पणी सिर्फ़ बुद्धिजीवियों की पक्षधरता को ही रेखांकित नहीं करती, बल्कि यह तमाम जनांदोलनों, छात्र आंदोलनों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

उर्मिलेश की एक विशेषता है, वह जब भी किसी बड़े बुद्धिजीवी, साहित्यकार या बड़ी शख़्सियत के विषय में विचार करते हैं तो उक्त व्यक्तित्व के अच्छे और बुरे, इन दोनों पहलुओं पर विचार प्रकट करते हैं। वह किरदारों से प्रभावित तो होते हैं, लेकिन ऐसा नहीं कि व्यक्ति पूजा में लीन हो जाएं। विश्लेषण में वह पूरी तरह ईमानदार नज़र आते हैं। राजेन्द्र यादव पर केंद्रित संस्मरण हिंदी का अनोखा डेमोक्रेट में वह राजेंद्र यादव का मूल्यांकन उनके प्रशंसक या विरोधी बनकर नहीं, अपितु संतुलित-विवेकसम्मत दृष्टिकोण से मूल्यांकन करते हैं। ‘भक्त’ या ‘विरोधी’ बनकर मूल्यांकन सम्भव नहीं है। असहमति हो सकती है, लेकिन उसे प्रकट करने का भी विवेक होता है। आलोचना की भाषा सड़क की भाषा नहीं हो सकती!

राजेन्द्र यादव ने ‘हंस’ का सम्पादन किया। इस प्रकार, उन्होंने प्रेमचंद की विरासत को आगे बढ़ाया। राजेन्द्र यादव ने कवियों, कथाकारों, आलोचकों की नई पीढ़ी को तैयार किया। ‘स्त्री विमर्श’, ‘दलित विमर्श’ के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय है। कितने साहित्यकार उनके ऋणी होंगे। वह निर्भीक लेखक थे, इसके साथ एक बेहतरीन सम्पादक भी। उर्मिलेश के लेख को पढ़कर लगता है, आप राजेन्द्र जी के लेखन, विश्लेषण एवं निष्कर्षों से सहमत असहमत हो सकते हैं लेकिन उनके विरोधी नहीं। व्यक्तिगत आचरण-व्यवहार में वह बेहद सरल थे।

“..पहली ही मुलाकात में राजेंद्र जी ने रस रंजनकी तैयारी कर दी। मुझे अचरज हुआ। ऐसा पहली बार देखा कि कोई बड़ा लेखक, जिसके उपन्यास और कहानियों-लेखों को हम जैसे लोग अपने कॉलेज के दिनों में पढ़ते थे, वह पहली ही मुलाकात में हमारे जैसे युवा पत्रकार के साथ बड़े दोस्ताना अंदाज़ में पेश आ रहा है”(हिंदी का अनोखा डेमोक्रेट, पृ.60)

राजेन्द्र जी के व्यक्तित्व में बहुत सी खूबियाँ थीं। ‘जाति वर्ण की संकीर्णताओं से वह ऊपर उठ चुके थे‘(वही, पृ.69) राजेन्द्र जी के व्यक्तित्व और लेखन का विरोध करने वालों की कमी नहीं थी। बेशक उनके भीतर बहुत सी खामियाँ खोजी जा सकती हैं, लेकिन उन्हें जातिवादी, वर्णवादी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने मंडल आयोगकी सिफ़ारिशों को लेकर उठे विवाद में जैसा साहित्यिक हस्तक्षेप किया, वैसा किसी दूसरे बड़े साहित्यकार ने नहीं किया।..बहुतेरे कूपमण्डूकों और वर्णवादी सोच के साहित्यकारों, लेखकों और विश्वविद्यालयीय शिक्षकों को मंडल-मामले में राजेंद्र जी के विरुद्ध दुष्प्रचार करते देखा गया‘(वही, पृ.68) राजेन्द्र जी हमेशा सामाजिक न्याय के पक्षधर रहे। उर्मिलेश ने राजेन्द्र जी को ‘हिंदी का अनोखा डेमोक्रेट’ कहा है और वह थे भी। ‘राजेन्द्र जी के व्यक्तित्व में मुझे जो पहलू बेहद महत्वपूर्ण लगा, वह था-उनका सहज-साफ़ और काफ़ी हद तक लोकतांत्रिक होना। उनकी पीढ़ी और यहाँ तक की बाद के हिंदी लेखकों में भी ऐसी लोकतांत्रिकता और सहजता कम देखने को मिलती है‘(वही, पृ.63) लेकिन ‘तमाम गुणों के साथ राजेन्द्र जी के पास अवगुणों की पोटली भी थी।…कई बार ऊँटपटाँग काम करके उसका बचाव भी किया करते थे‘(वही, पृ. 82)।..अपने शुरुआती साहित्यिक दौर की अराजकतावादी-विरासत और यौनिकता सम्बन्धी अपनी कुछ ख़ास कुंठाओं से अगर वह पूरी तरह बाहर आ सके होते तो मेरा आकलन है कि वह और भी ज़्यादा बड़े बदलाववादी, क्रांतिदर्शी चिंतक और लेखक बनकर उभरते‘(वही, पृ.69)

हिंदी-भाषी क्षेत्र में वामपंथी राजनीति की विफ़लता का उर्मिलेश ने सच्चा विश्लेषण किया है। ‘गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल की आवाज़ें’ में लेखक ने मुख्य रूप से गाज़ीपुर की वामपंथी राजनीति और वहाँ के बुद्धिजीवियों की चर्चा की है, किंतु कम्युनिस्ट राजनीति की विफ़लता के जो कारण बताएं हैं, वह कुछ अंतरों के साथ लगभग हिंदी-भाषी क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में लागू होते हैं। वामपंथी दलों के भीतर व्याप्त सवर्णवाद-वर्णवाद ने इन दलों को  अपने उस सर्वहारा से ही दूर कर दिया जहाँ से वामपंथ की वैचारिकी को भरपूर शक्ति मिलती थी।

क्रिस्टोफर कॉडवेल ‘फ़ासीवाद के धुर-विरोधी लेखक-विचारक और बौद्धिक योद्धा थे’। स्पेन में फासिस्टों से लड़ते हुए 13 फ़रवरी, 1937 को वह शहीद हो गए। कॉडवेल ने मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की धारणा को विकसित किया। ऐसे महत्वपूर्ण विचारक-लेखक पर गाज़ीपुर के डॉ.पी.एन. सिंह ने पीएच.डी लिखी। इसी कारण, इस संस्मरण को उर्मिलेश ने नाम दिया-गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल की आवाज़ें। पी.एन. सिंह के व्यक्तित्व और लेखन पर उर्मिलेश ने विस्तृत चर्चा की है, इसके साथ ही वह गाज़ीपुर के अन्य वामपंथी बुद्धिजीवियों-नेताओं में सरजू पांडेय, विश्वनाथ शास्त्री और पब्बन राम का भी ज़िक्र किया है। उर्मिलेश इन वामपंथी बुद्धिजीवियों-नेताओं के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करना नहीं भूलते हैं। इस रेखांकन के साथ उन सभी कारणों की खोज करते हैं जिसके चलते वामपंथी राजनीति गाज़ीपुर से ही नहीं समूचे परिदृश्य से गायब सी हो जाती है।

मीडिया संस्थानों के भीतर व्याप्त जातिवाद, गुटबाजियों पर उर्मिलेश ने खुलकर लिखा है। स्वयं पत्रकार होने के नाते वह मीडिया संस्थानों के भीतर की वास्तविकता से परिचित हैं। जातिवाद-वर्णवाद भारतीय समाज का सच है। जब सच है तो कोई भी संस्थान इससे अछूता नहीं हो सकता। उर्मिलेश ने मीडिया संस्थानों के भीतर के अपने कटु-मृदु अनुभवों, संघर्षों को अपने संस्मरणों में बुना है। ‘पत्रकारिता में हमारे पहले दफ़्तर के लोग’ अत्यन्त महत्वपूर्ण और पठनीय संस्मरण है। ‘महत्वाकांक्षाओं और लिप्साओं का मारा एक सम्पादक’ एम.जे.अकबर पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण संस्मरण है जिसमें एम.जे.अकबर की निजी कुंठाओं और महत्वाकांक्षी रवैये को सामने रखते हैं। एक ऐसा पत्रकार जो लंबे समय तक सियासतदानों में क़दम-क़दम पर कमियाँ खोजता था और जनता को बताता था, वह स्वयं ही उन सियासतदानों का आदमीकैसे बन गया? अपनी निजी कुंठाओं और बेशुमार महत्वाकांक्षाओं का वह न सिर्फ़ शिकार बना, अपितु सियासत का पिटा हुआ चेहरा भी‘(महत्वाकांक्षाओं और लिप्साओं का मारा एक सम्पादक/ पृ.200)

दलित चिंतक तुलसीराम पर उर्मिलेश ने तुलसीराम के व्यक्तित्व का मूल्यांकन बेहद ठोस और प्रामाणिक लगता है। तुलसीराम जेएनयू के दिनों में उर्मिलेश के मित्र थे। संस्मरण में तुलसीराम के साथ बिताए अपने दिनों को याद करते हुये, वह उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ-‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ का भी बेहद संतुलित, सटीक और विवेकपूर्ण मूल्यांकन भी करते हैं।

उर्मिलेश की पुस्तक ‘गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल’ में दिए सभी संस्मरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और विस्तृत चर्चा की माँग करते हैं। किंतु, यहाँ सभी संस्मरणों पर विस्तार से बात नहीं हो सकी है। जम्मू कश्मीर के बेहद प्रतिष्ठित मशहूर पत्रकार शुजात बुख़ारी पर लिखा संस्मरण उनकी नृशंस हत्या एवं उसके राज के दफन हो जाने पर सवाल भी करता है एवं एक महत्वपूर्ण और ईमानदार पत्रकार के किरदार का सच्चा विश्लेषण भी है*(देखें ‘कश्मीर के बारे में सोचते ही चिनार की तरह तुम्हारा चेहरा उभरता है/गा. में क्रि. कॉडवेल)। इसके अलावा, ‘सदी के महानायक’ कहे जाने वाले फ़िल्मस्टार अमिताभ बच्चन पर उर्मिलेश ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। वह गम्भीर और महत्वपूर्ण मुद्दों पर ‘महानायक’ की चुप्पी पर वह सवाल करते हैं। ‘सीधी बात है, वास्तविक जीवन में वह उन ग़रीबों-उत्पीड़ितों के पक्ष में नहीं दिखना चाहते, जिनके पक्षधर-चरित्रों को पर्दे पर जीते हुए उन्होंने इस महादेश में भारी शोहरत कमाई‘(गा. में क्रि. का./किसे धोखा दे रहे हैं सदी के महानायक‘/पृ.224)

उर्मिलेश पेशे से पत्रकार हैं। जिस प्रकार की ईमानदारी और साहस का परिचय वह पत्रकारिता में देते हैं, वैसा ही इन संस्मरणों में। संस्मरण में आये सभी किरदारों का उर्मिलेश जैसा विश्लेषण करते हैं उससे उर्मिलेश के व्यक्तित्व और उनकी पक्षधरता का भी पता चलता है। निस्संदेह, उर्मिलेश जनपक्षधर पत्रकार और बुद्धिजीवी हैं। उर्मिलेश की भाषा-शैली, वर्णन-शैली अद्वितीय है। इन सभी संस्मरणों में एक रोचकता भी है। वास्तव में, ‘गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल’ न सिर्फ़ संस्मरण भर है, बल्कि अत्यंत सुसंगत और तथ्यों पर आधारित वाम और बहुजन वैचारिकी की सच्ची आलोचना भी है जिसे स्वीकार करके ही इन दोनों महत्वपूर्ण खेमों का सुसंगठित विकास सम्भव है। वाम और बहुजन-दलित वैचारिकी को एक दूसरे के करीब भी आना होगा क्योंकि चाहे संघर्ष समाजवाद के लिए हो अथवा सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के लिए, इन दोनों वैचारिकी का नज़दीक आना संघर्ष को और मजबूत और दृढ़ आधार प्रदान करेगा। सवर्ण प्रगतिशील बुद्धिजीवी हों या बहुजन-दलित बुद्धिजीवी, दोनों को अपनी आत्मालोचना, आत्म-विश्लेषण से कतराना नहीं चाहिये क्योंकि ‘आत्म-निरीक्षण और आत्मालोचना के रास्ते ही व्यक्ति, संस्था या समाज अपने को बेहतर बनाते हैं‘ ( गा.में क्रि.कॉ., आरम्भ से पहले, पृ. 9)

मोहम्मद उमर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम ए की तैयारी कर रहे हैं।

1 Comment
  1. Kunal Meshram says

    Bahut badiya vishaleshan ????????

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