Wednesday, July 17, 2024
होमTagsRaigarh

TAG

raigarh

झारा शिल्प के विकास के लिए बना वर्क शेड स्वयं अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा है

एकताल गाँव की कहानी - दो  रायगढ़। झारा शिल्प जिसे बेलमेटल कलाकृति या ढोकरा शिल्प भी कहा जाता है को देखकर सहज ही अंदाजा होता...

यदि पहाड़ की ऊंचाइयों से डर जाती तो लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल होता

याशी जैन ने पहले कभी ऐसा नहीं सोचा था कि पर्वतारोही बनना है, बस मन में कुछ अलग करने की इच्छा थी जैसा कि...

अभाव और बदहाली में जीने वाले कोई पहले कलाकार नहीं हैं गोविंदराम झारा

एकताल गाँव की कहानी - एक  ग्राम एकताल और गोविंदराम झारा एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। गोविंद राम झारा, इस झारा शिल्प या...

बारह वर्षों में कहाँ तक पहुँचा है तमनार का कोयला सत्याग्रह

बात 5 जनवरी 2008 की है, जब गारे 4/6 कोयला खदान की जनसुनवाई गारे और खम्हरिया गाँव के पास के जंगल में की गई। वास्तव में ढाई सौ एकड़ में फैला हुआ यह जंगल गाँव वालों के निस्तारण की जमीन थी, जिसे बहुत चालाकी से वन विभाग ने सन 1982 में रेशम परियोजना के लिए हासिल कर लिया था। गाँव वालों को इस बात के लिए सहमत किया कि रेशम परियोजना में उन लोगों को काम मिलेगा और आर्थिक आधार पर उन्हें मजबूती मिलेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ बल्कि रेशम विभाग और वन विभाग की मिलीभगत से यह जमीन मुफ़्त में ही जिंदल उद्योग को कोयला खनन के लिए दे दी गई।

क्या सोच रहे हैं विस्थापन की दहशत के बीच तमनार के लोग

तमनार विकासखंड में महाजेनको यानी महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड को खनन के लिए 2015 में खदान आबंटित हुई है। तमनार विकासखण्ड में...

सामुदायिक वन अधिकार से कितना बदलेगा आदिवासियों का जीवन

हर घर, पेड़-पौधे, सड़क के किनारे स्थित दुकानों पर कोयले की परत बिछी दिखती है, यहाँ तक कि सड़क की धूल भी कोयले के चूरे से काली हो गई है। यहाँ प्रकृति में हरियाली नहीं करियाली दिखाई देती है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक है। कोयला खनन और भूमि अधिग्रहण को लेकर यहाँ पिछले बीस वर्षों से लगातार विरोध और आंदोलन चल रहा है। यह आदिवासी बहुल क्षेत्र है, लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि हमारे कोयला संसाधनों पर पूँजीपतियों का अधिकार क्यों?

जनता की लड़ाई के सिवा मेरे पास कुछ भी नहीं है – सविता रथ

सविता रथ का परिवार काफी पढ़ा-लिखा और नौकरीपेशा रहा है लेकिन सविता सरकारी नौकरी छोड रायगढ़ जिले के आदिवासीबहुल इलाके में पूँजीपतियों के खिलाफ डटकर लड़ाई लड़ रही हैं।

इस सरकार का संकल्प किसानों को मजदूर बनाने का है

आज हम रायगढ़ शहर से दस किलोमीटर दूर संबलपुरी गाँव पहुंचे, जो आदिवासीबहुल गाँव है, जो एक समय अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के साथ प्राकृतिक संपदा और वहां मिलने वाले फल और खाद्य संसाधनों से भरा-पूरा था। तेंदू, आंवला, हर्रा, बहेड़ा, चार, कुर्रू, महुआ, डोरी, खेकसा के घने जंगल थे, जहाँ से इन सबको मौसम के अनुसार इकट्ठा कर आदिवासी स्त्रियाँ शहर में बेचने आया करती थीं जिनका खेती-किसानी के अलावा यह एक अन्य आर्थिक आधार था।

अब हम लोग क्या करें सुभाष भैया?

साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार भारत में 6 मार्च  2000 से 20 नवंबर 2021 तक आतंकवाद से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 14050 नागरिक, 7363 सुरक्षा बलों के सदस्य,23342 आतंकवादी/अतिवादी एवं 1195 अज्ञात लोगों समेत कुल 45950 लोग मारे गए हैं। हमारे लिए यह एक संख्या हो सकती है जिसकी घट-बढ़ पर हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं लेकिन इन हजारों परिवारों की त्रासदी को समझने के लिए हमें वृद्ध त्रिपाठी दंपत्ति के उदास चेहरे को बांचना होगा जिनका सब कुछ खत्म हो गया है।

हमारा लक्ष्य – (लघु नाटक)

( आज 6 अगस्त है, आज से 76 वर्ष पहले दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराया. कभी न भुलाए...

ताज़ा ख़बरें