Thursday, February 12, 2026
Thursday, February 12, 2026




Basic Horizontal Scrolling



पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

होमग्राउंड रिपोर्टअभाव और बदहाली में जीने वाले अकेले कलाकार नहीं हैं गोविंदराम झारा

इधर बीच

ग्राउंड रिपोर्ट

अभाव और बदहाली में जीने वाले अकेले कलाकार नहीं हैं गोविंदराम झारा

गोविंद राम झारा राज्य शिखर सम्मान और राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त झारा शिल्पियों में पहले ऐसे कलाकार हैं, जिन्हें यह सम्मान मिला। लेकिन आज वह गरीबी और बदहाल स्थिति में पुश्तैनी घर में अपनी पत्नी के साथ रहते हुए बामुश्किल जीवन काट रहे हैं। आज से पंद्रह साल पहले कैंसरग्रस्त बेटी के इलाज करवाने में आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट गए और उसके बाद वे उबर नहीं पाए। घर के अंदर जाने के दरवाजे के ऊपर एक बड़ी सी नाम पट्टिका लगी हुई है जिस पर गोविंदराम झारा का नाम लिखा हुआ है। घर में अंदर घुसने पर एक बत्ती कनेक्शन द्वारा लाइट की सुविधा मिली हुई है। जहां पर लट्टू बल्ब जल रहा था और एक कोने में बुझे हुए चूल्हे के ऊपर और आसपास एक कोने में और 5-7 बर्तन दिखे और एक छींका लटका हुआ था और नीचे बेतरतीबी से एक गुदड़ी पड़ी हुई थी। अगली दीवार पर एक बंद दरवाजा था, जिसे खोलने पर एक आँगन और आँगन से लगे हुए दो कच्चे कमरे उनके छोटे बेटे डहरु झारा और उनके परिवार का है।

एकताल गाँव की कहानी – एक 

ग्राम एकताल और गोविंदराम झारा एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। गोविंद राम झारा, इस झारा शिल्प या जिसे ढोकरा शिल्प भी कहते हैं के शिल्प गुरु हैं। आज 66-67 वर्ष की उम्र में भी वे खुद के कच्चे घर के बरामदे में कमजोर और बीमार शरीर के साथ अपने काम में मगन है। उम्र कितनी है? यह पूछने पर उन्हें अपनी जन्म की तारीख और सन याद नहीं है लेकिन एक बात जो उन्होंने बताई कि 1987-88 में जब उन्हें राष्ट्रपति अवॉर्ड मिला था, तब वे 32 वर्ष के थे और इसी 32 वर्ष से हमने गणना की। अभाव इंसान को बहुत जल्द बूढ़ा कर देती है, यही गोविंदराम झारा के साथ भी हुआ, वे बहुत बूढ़े लगने लगे हैं। और अनेक बीमारियों से ग्रस्त हैं। उन्होंने कहा जब तक शरीर चल रहा है तब तक काम करेंगे। हालांकि काम का जुनून तो है ही लेकिन शारीरिक स्थिति अब साथ नहीं दे रही है। राज्य शिखर सम्मान और राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त झारा शिल्पियों में पहले ऐसे कलाकार हैं, जिन्हें यह सम्मान मिला। लेकिन आज यह गरीबी और बदहाल स्थिति में पुश्तैनी घर में अपनी पत्नी के साथ रहते हुए बामुश्किल जीवन काट रहे हैं। आज से पंद्रह साल पहले कैंसरग्रस्त बेटी के इलाज करवाने में पूरी तरह आर्थिक और मानसिक रूप से टूट गए और उसके बाद वे उबर नहीं पाए।

घर के अंदर जाने के दरवाजे के ऊपर एक बड़ी सी नाम पट्टिका लगी हुई है जिस पर गोविंदराम झारा का नाम लिखा हुआ है। घर में अंदर घुसने पर एक बत्ती कनेक्शन द्वारा लाइट की सुविधा मिली हुई है। जहां पर लट्टू बल्ब जल रहा था और एक कोने में बुझे हुए चूल्हे के ऊपर और आसपास एक कोने में और 5-7 बर्तन दिखे और एक छींका लटका हुआ था और नीचे बेतरतीबी से एक गुदड़ी पड़ी हुई थी। अगली दीवार पर एक बंद दरवाजा था, जिसे खोलने पर एक आँगन और आँगन से लगे हुए दो कच्चे कमरे उनके छोटे बेटे डहरु झारा और उनके परिवार का है। जिसे देखकर गरीबी का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

गोविंदराम झारा के घर का प्रवेश द्वार, जहां बरसों पहले लिखी गई नाम पट्टिका भी अब धुंधली पड़ने लगी है

रायगढ़ के दक्षिण में मात्र 14 किलोमीटर उड़ीसा के सीमावर्ती इलाके में एकताल गाँव बसा हुआ है। ओड़ीशा राज्य से लगा होने की वजह से गाँव की भाषा और रहन-सहन, खान-पान में ओड़िया संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता हैं। यहाँ की कुल आबादी 2200 है और झारा जनजाति के 120 परिवार निवास करते हैं। इनमें से लगभग 20 परिवार इस शिल्प कला से अपना परिवार चला रहे हैं। कुछ परिवार घरेलू जरूरत के सामान बनाते हैं और इन झारा जनजाति के बाकी बचे हुए बहुत से लोग अपना पुश्तैनी काम छोड़कर आसपास मजदूरी करने और ईंटा भट्टे में काम करने जाते हैं।

गोविंदराम झारा के पास बातचीत के सिलसिले में दो बार जाना हुआ। (पहली बार रायगढ़ के जाने-माने पेंटर और बैंक से रिटायर हुए मनोज श्रीवास्तव के साथ,जिन्हें एकताल गाँव का एक-एक कलाकार पहचानता है और बहुत सम्मान देता है और दूसरी बार छोटे भाई अभिषेक के साथ) दोनों ही बार वे अपने घर के बरामदे में काम करते हुए मिले। उनसे बातचीत करते हुए यह एहसास हुआ कि इस उम्र में भी उनकी याददाश्त बहुत अच्छी है। क्योंकि जैसे ही उनसे उनके अतीत के बारे मैंने कुछ पूछा – उन्होंने हाथ में लिए जाने वाले काम को नीचे रख मुझसे बातचीत की और पुरानी बातों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि पहले भी हम यही काम करते थे लेकिन उन दिनों का झारा शिल्प में इत्तनी विविधिता नहीं होती थी। पहले हमारे समाज के द्वारा झारा, चटवा (झारा और चटवा दोनों ही रसोई में उपयोग आने वाले बर्तन) पोरा-बैला, लक्ष्मी, जलाजेल (जानवरों के गले में बांधी जानी वाली घंटी), घुँघरू, करार (पैसा रखने वाला छोटा बॉक्स), जागरदीया ही बनाया जाता था और गाँव-गाँव ले जाकर बेचते थे। लोग अपनी जरूरत की चीजें लेते थे। उन्होंने बताया कि चौथी तक पढ़ाई करने के बाद दस वर्ष की उम्र से ही पिताजी बुद्धूराम के साथ लग गए और पिता से ही इस काम को सीखा।

गोविंदराम झारा सन 1982 में एकताल आ गए थे और तब से इसे ही अपना कर्मक्षेत्र बना लिया। उनके दादा छोटे नागपुर (झारखंड) से उड़ीसा आ गए थे। जहां पिताजी के नाना और मामा का घर था और उसके बाद पिता बुद्धूराम ने छतीसगढ़ के एकताल में आकर अपना काम स्थापित किया। एकताल छत्तीसगढ़ और ओड़ीशा का सीमावर्ती गाँव है, शायद इसीलिए उन्होंने यहाँ आकर बसने की सोची। हालांकि उन्होंने संदेह जाहिर करते हुए कहा कि झारखंड में हम मलार जनजाति के रहे होंगे जो घुममकड़ी प्रवृति के होते हैं। लेकिन यहाँ आने के बाद हमारे लोग गाँव-गाँव लोहे-पीतल के झारा बनाकर बेचते थे और खरीदने वाले हमें हमेशा झारा वाले के नाम से संबोधित करते और इसी वजह से आज हम झारा जनजाति के लोग कहे जाने लगे हैं। हम आदिवासी हैं लेकिन छतीसगढ़ सरकार हम झारा जनजाति को आदिवासी समुदाय में शामिल नहीं कर रही है और न ही कोई जाति प्रमाणपत्र दे रही है। यह त्रासदी है क्योंकि आदिवासी होते हुए भी हमारे बच्चों को पढ़ाई और नौकरी में किसी भी तरह का सरकारी लाभ नहीं मिल पा रहा है। सभी बच्चे आठवीं-दसवीं तक पढ़कर रोजी-रोजगार में लग जा रहे हैं। पढ़ने का मन होने के बाद भी हम लोगों की ऐसी स्थिति नहीं है कि पढ़ाई का खर्चा उठा पाएं। उनका कहना सच था, इस बस्ती में रहने वाले तीन-चार लोगों को छोड़कर सभी गरीबी का सामना कर रहे हैं। जबकि गोविंदराम झारा के परिवार में झारा शिल्प के काम के लिए 5 सदस्यों को राष्ट्रपति सम्मान और राज्य का शिखर सम्मान मिल चुका है। जिसमें दो महिलायें भी शामिल हैं।

झारा या ढोकरा शिल्प की कलाकृतियाँ

आपका काम कैसे चल रहा है? इस बात पर बताया कि पहले जैसे तो नहीं चल रहा है क्योंकि अब तो पहले जैसी ताकत नहीं रही और कच्चे माल की कीमत में बहुत वृद्धि हो गई है जिसके कारण मुश्किल होती है। इस कला के बारे में दूर-दूर तक लोग जान तो गए हैं लेकिन बाजार में बैठे दलाल सामान तो निकलवा देते हैं लेकिन हमको फायदा कम ही हो पाता है। स्थिति तो आप देख ही रहे हैं।

मैंने उनसे पूछा कि उन दिनों फोन या मोबाइल तो था नहीं तब आपको पुरस्कार की सूचना कैसे मिली? तब उन्होंने जो जवाब दिया मुझे बहुत अच्छा लगने के साथ आश्चर्य हुआ कि पुरस्कार के लिए संपर्क करने वालों के पूरे नाम उन्हें याद था। 1984-85 में शिखर सम्मान मिलने से पहले मध्य प्रदेश भारत भवन से ओमप्रकाश स्वर्णकार, अखिलेश वर्मा और अर्चना मैडम आई थीं। वे तीनों हमारे गाँव एकताल आए। उस समय रायगढ़ से यहाँ आने के लिए कोई पक्की और अच्छी सड़क नहीं थी। उन लोगों ने मेरा काम देखा हालांकि काम में जितनी विविधता आज है, उन दिनों नहीं थी। उन्होंने एक क्विंटल 60 किलोग्राम पीतल के सामान बनाने का ऑर्डर दिया। जिसे मैंने अपने घर वालों के साथ मिलकर पंद्रह दिनों में बना लिया। वे तीनों रायगढ़, सत्तीगुड़ी चौक में स्थित होटल में रुके थे। मैंने तैयार सामान वहाँ पहुंचा दिया। उसके बाद मैं भी पुरस्कार लेने भोपाल चला गया, जहां एकतीस हजार रुपया और प्रशस्ति पत्र मिला।

घर के अंदर पहुँचने पर गरीबी अपनी कहानी खुद कह रही है

वर्ष 1987-88 में राष्ट्रपति अवॉर्ड की घोषणा हुई। शिल्पकला विभाग के डिप्टी डायरेक्टर मुश्ताक खान दिल्ली से यहाँ आये और मुझे लेकर दिल्ली गये। मुझे यह पुरस्कार झारा कलाकृति करमा पर मिला था, जो छतीसगढ़ के आदिवासियों द्वारा किए जाने वाले नृत्य में विशेष तरह से तैयार होते हैं। यह पुरस्कार राष्ट्रपति आर वेंकटरमन द्वारा प्रदान किया गया था। मैंने सम्मान देखने की मंशा ज़ाहिर की तो उन्होंने कहा पता नहीं कहाँ रखा हुआ है और किस हालात में है। लेकिन छोटे बेटे डेहरु झारा ने बताया कि किसी भाई के पास पेटी में रखा होगा। उन्होंने यह भी बताया कि  दिल्ली में एक महिना क्राफ्ट म्यूजियम में रहते हुए बहुत सी कलाकृतियाँ बनाईं। शिल्पगुरु गोविंदराम झारा को 2009 में छतीसगढ़ शासन द्वारा दाऊ मंदराजी सम्मान के बाद 2013 में भारत सरकार द्वारा शिल्प गुरु की उपाधि से नवाजा गया। 

सम्मान मिलने की सूचना जानकर मुझे लगा कि कोई बड़ा बदलाव होगा लेकिन वैसा हुआ नहीं। उन्होंने यह जरूर बताया कि जहां पहले घासफूस की झोपड़ी थी वह मिट्टी के कच्चे घर में तब्दील हो गया। उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्का घर बन जाता लेकिन उसके लिए लिखा-पढ़ी होने के बाद भी उसमें मिलने वाली सहायता राशि आज तक प्राप्त नहीं हुई। रोशनी के नाम पर सरकारी योजना के तहत एक बत्ती कनेक्शन से बिजली आ गई। सम्मान मिलने से नाम हुआ लेकिन आर्थिक दिक्कतें अब भी कम नहीं हुईं। और यह दिक्कत तब और बढ़ गई जब बेटी को कैंसर हो गया और उसके इलाज में बहुत पैसा खर्च हुआ। यहाँ तक कि कर्ज लेना पड़ा। पुरस्कार मिलने के बाद सरकार की तरफ से खेती के लिए ढाई एकड़ जमीन इस गाँव से कुछ दूरी पर मिली। सोचा था कि उस पर खेती-बाड़ी करेंगे लेकिन उस जमीन में बहुत पत्थर थे और खेती के हिसाब से बंजर थी। वह जमीन ऐसे ही पड़ी रही लेकिन बेटी के कैंसर के इलाज के लिए उसे बेचना पड़ा। ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा। उसके बाद भी वह पूरा नहीं पड़ा और बेटी को भी नहीं बचा पाए। और आज तक कर्ज चुका रहे हैं। यह सब उनके लिए कहना बहुत ही दुखदायी था। मुझे यह तो एहसास हुआ कि जितनी बार यह बात दोहराते होंगे उतनी ही बार बेटी की बीमारी के दिनों को फिर-फिर जीते होंगे।

गोविंदराम झारा की रसोई और रहने का एकमात्र कमरा

अनेक बार विदेश जाने का मौका भी मिला। जिसमें वे जापान, फ्रांस, सिंगापुर, हाँगकाँग जैसे लगभग दस देशों में अपनी कलाकारी का प्रदर्शन कर चुके हैं। समय-समय पर अपने देश में होने वाले मेलों में स्टॉल भी लगाते रहे हैं लेकिन अब यह बहुत कम चुका है क्योंकि मेले के लिए दो या तीन लोगों का चुनाव होता है। युवा पीढ़ी अब इसका नेतृतव संभाल रही है। एक समय शिल्प कला बोर्ड हमारे बनाई कलाकृतियों को खरीदती थी लेकिन आज वहाँ भी खरीद-फरोख्त का काम नहीं हो रहा है। इससे आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

बुनकरी के काम में महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पाती

उन्होंने बताया कि सम्मानित कलाकार को हर माह 5000 रु पेंशन मिलती है, मुझे भी मिलती है  जो नाकाफ़ी है। जितनी पेंशन मिलती है उससे दवा कराएं या पेट भरें। गोविंद झारा को सांस की बीमारी के साथ चर्मरोग है, आँखों से कम दिखता है मगर किसी बीमारी की जांच करवाने के लिए पैसे नहीं है। लेकिन कलाकारी के प्रति जुनून इतना है कि उन्होंने कहा जब तक दम है और काम करने की ताकत तब तक इसमें रमे रहेंगे।

राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय अनेक सम्मान से नवाजे गए शिल्प गुरु गोविंदराम झारा इस उम्मीद में कि आने वाले दिन बेहतर होंगे

सात बेटों का भरापूरा परिवार होने के बाद भी अपने मिट्टी के घर में मात्र दो प्राणी गोविंदराम झारा अपनी पत्नी तिया झारा के साथ रह रहे हैं। तिया झारा भी शिल्प कलाकार हैं और उन्हें भी सम्मान प्राप्त हुआ है। लेकिन अब उम्र की थकान के कारण बहुत काम नहीं कर पाती हैं। सात बेटों के बाद भी आप अकेले रहते हैं? इस प्रश्न के जवाब में गोविंदराम झारा ने कहा कि मैं चाहता हूँ सभी बेटे अपनी जिम्मेदारी समझे और अपना परिवार खुद संभाले इसलिए जैसे-जैसे बेटों की शादी होती गई, वैसे-वैसे हमने उनकी गृहस्थी अलग कर दी। सभी पास-पास रहते हैं और ध्यान रखते हैं। यह उनकी सोच का व्यवहारिक पक्ष था। एक खास बात कि इनके परिवार में छ: लोग राष्ट्रपति और राज्य स्तरीय सम्मान से सम्मानित हैं। जिनमें चार पुरुष और दो महिलायें हैं।

 हमारे देश में सरकारी सम्मान प्राप्त किसी कलाकार के अभाव और तकलीफ की यह कोई पहली कहानी नहीं है। सम्मान मिलने के बाद यह कलाकार गुमनामी की ज़िंदगी जी रहे हैं। यह इनका दुर्भाग्य है। आते-आते उन्होंने जरूर कहा कि दवा के लिए कुछ पैसे दे दीजिए। मैंने उन्हें जो दिया उसी से खुश होकर सांस की बीमारी में उपयोग आने वाला इनहेलर दिखाते हुए कहा कि यह खत्म हो गया है, आज इसे मँगवा लूँगा।

अपर्णा
अपर्णा
अपर्णा गाँव के लोग की संस्थापक और कार्यकारी संपादक हैं।
6 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Bollywood Lifestyle and Entertainment