हमारा लक्ष्य – (लघु नाटक)

कल्याणी मुखर्जी

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( आज 6 अगस्त है, आज से 76 वर्ष पहले दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराया. कभी न भुलाए जाने वाले दिनों में से एक. बम गिराने के बाद जो तबाही वहां देखने-सुनने को मिली उसके लिए क्रूरता या भयानक शब्द बहुत छोटे हैं,  हम जब उस समय की फोटो देखते हैं तो दहल जाते हैं. बाकी वहां के लोगों की जीवट को क्या कहें. उन्होंने दुनिया के सामने बेजोड़ जीवंतता का मयार रखा है, उस समय परमाणु बम गिराने वाले लोगों तथा दूसरे पात्रों की बातचीत को एक छोटे से नाटक के रूप में लिखा गया है. उस भयानक दिन को याद करने का मतलब अमानवीय कृत्य में कालकवलित लोगों को श्रद्धांजलि  देना है और आने वाली पीढ़ी को सतर्क करना है. अमेरिका की इस क्रूरता के लिए कभी माफ़ नहीं किया जा सकता है. राष्ट्रीय विज्ञान नाट्य प्रतियोगिता में नेहरु विज्ञान केंद्र मुंबई में खेले गए इस नाटक का रूपांतरण एवं निर्देशन रायगढ़ की जानी-मानी रंगकर्मी कल्याणी मुखर्जी ने किया था जिसके लिए उन्हें प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ. इसका कथानक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार कमलेश्वर के उपन्यास कितने पाकिस्तान के एक अंश पर आधारित)

 

पात्र परिचय

1.विश्व जनमत   2. हिरोशिमा    3. ट्रूमैन

4. एडवर्ड टेलर   5. जनरल ग्रोबस एवं न्यूज रीडर-एक    6 न्यूज़ रीडर-दो   7. आर्थर क्रैआपटन

8. ओपन हायमर  9. खबरी-एक    10. खबरी दो  11. आक्रांता  12. अर्दली

 

(सभी का एक साथ स्टेज में प्रवेश, एक के हाथ में ग्लोब है जिसे लेकर वे पूरे स्टेज में घूमते हैं ग्लोब को उठाते हैं एक दूसरे पर फेंकते हैं और खेलते हैं, छीनते हैं )

गीत

मनुष्य मनुष्य मैं सर्वशक्तिमान हूं
धरा को चाहूं खोद दूं, नदी को चाहूं मोड़ दूं ,
पहाड़ों पर मैं चढ़ चला
इतिहास कितने गढ़ चला
मैं सर्वशक्तिमान हूं ।
मिसाइल मेरी खोज है
एटम से अपनी मौज है
न्यूट्रान भी गुलाम है
हाइड्रोजन बम तो शान है
मैं सर्वशक्तिमान हूं
आकाश में मैं उड़ रहा
धरा पर तेज दौड़ता
हवा को पीछे छोड़ता
अंतरिक्ष को मैं भेदता
चांद पर कदम रखा
मंगल की मुझको चाह है बसाऊं ग्लोबल बस्तियां
प्लूटो भी मेरी राह है
मनुष्य मनुष्य मैं सर्वशक्तिमान हूं।

विश्व जनमत- कोई है? कोई है? कितना सूनापन? कहां गए लोग? क्या हो गया है यहां? इतनी बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं  किस कदर ढह गई है?
धुल-धुआं, अरे कोई है? इतना बड़ा शहर..हवा इतनी गरम.. चारों और दुर्गंध…मेरी सांस रुक रही है… किसने किया यह सब! किसने किया हमारा घर बर्बाद !! क्या-क्या यह प्रकृति की मार है? प्राकृतिक आपदाए भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी, बाढ़ कैटरीना, रीटा लहरें
या या इन सबसे भी कोई संघातिक घटना युद्ध:::::
महायुद्ध….
अरे कोई है!! कोई तो बताओ हमें!
यह मृत्यु यंत्रणा क्यों?
खबरी 1-  सुनिए..सुनिए महामानव ! विश्व जनमत ..मेरी बात सुनिए.. मौत से मुक्ति के लिए कुछ कीजिए, कुछ कीजिए श्रीमान!!
पूरा विश्व विज्ञान के नित नए प्रयोग से अचंभित और आक्रांत है। युद्ध के लिए रोज नए-नए खोज किए जा रहे हैं।
खबरी दो- संसार की तमाम प्रयोगशालाओं में भीषणतम और अधिकतम मौत का उत्पादन शुरु करने की होड़ लगी हुई है।सफल परीक्षण के बाद अब युद्ध मे रत राजनैतिक सत्ताएं मौत का थोक उत्पादन करना चाहती है:::::: कुछ कीजिए …नहीं तो ब्रह्माण्ड से पृथ्वी का नामोनिशान मिट जाएगा।

विश्व जनमत- क्या कह रहे हो तुम लोग!

खबरी एक- हम ठीक कह रहे हैं श्रीमान! लोस अलामोस की प्रयोगशाला में अब अणु और परमाणु बमों का निर्माण चल रहा है। ओपन हाईमर जॉन मेनली, टेलर, फर्मी, सृष्टि संहारक बमों का निर्माण कर रहे हैं।

खबरी दो- जर्मनी तो अब लगभग हार चुका है, रुसी सेनाओं ने तो घुटने तोड़ दिए हैं उनके, जर्मनी कभी भी आत्मसमर्पण कर सकता है! तब..तब बमो की जरूरत ही क्या है ??

खबरी एक- जर्मन वैज्ञानिक विज साकर और हाईजनवर्ग घोर राष्ट्रवादी हैं ,इसलिए वे भी जी जान से अपने देश में बम विकसित करने में लगे हुए हैं।

विश्व जनमत – और सोवियत यूनियन!!
खबरी एक- वहां स्टालिन ने कुर्चातोव को मौत उत्पादन का काम सौंप दिया है ।
विश्व जनमत-  ब्रिटेन….ग्रेट ब्रिटेन के बारे में बताओ!!
खबरी एक- ब्रिटेन में अधिकांश विदेशी भौतिक शास्त्री हैं। फिश तो है ही। फ्रांस से जूलियट क्यूरी के दो सहयोगी भी वहां आ गए हैं।
चलिए चलकर देखें और सुने कि बाकी लोकतंत्र के लिए छटपटाते देशों का रुख क्या है।
(नेपथ्य में एक जबरदस्त धमाका, कोलाहल, आर्तनाद)

नेपथ्य से- पृथ्वी कांप उठी है, जैसे कोई विशाल उल्कापात हुआ है। धूल, धुआं, धुंध, हाहाकार, अग्नि की लपटें’, जलती हुई हवा, सूर्य के तापमान से स्पर्धा करता तापमान, विषैले विकिरण वृत में फैलता रेडियोधर्मी पारावार। धरती की फटी धमनियों से निकलती रक्त की नदियां। चारों ओर चितकार, हाहाकार ।।

न्यूज़ रीडर एक-   6अगस्त,1945
अमेरिका द्वारा हिरोशिमा पर एटमी हमला.. पृथ्वी पर प्रलय, पूरा शहर तबाह, पूरा शहर धूलिस्नात।

न्यूज़ रीडर दो-  नमस्कार .. नागासाकी पर 9 अगस्त, 1945 को गिरने वाले परमाणु बम ने पुन: मचाई तबाही। चारों ओर हाहाकार.. पूरा शहर नष्ट प्रलय और मृत्यु का तांडव जारी है, आज का विशेष समाचार बुलेटिन यही समाप्त होता है।
आक्रांता-
इन बंद कमरों में मेरी सांस घुट जाती है ,
खिड़कियां खोलता हूं तो जहरीली हवा आती है।

विश्व जनमत- कौन? कौन हो तुम ..? तुम हिरोशिमा…

हिरोशिमा –  हां ! मैं हिरोशिमा..
मैं आपके पास आया हूं। मैं अपने जख्म दिखाना चाहता हूं। जो न्याय मैं पाना चाहता था मुझे नहीं मिला,
इसलिए मैं, विश्व जनमत मैं आपके पास आया हूं ।

विश्व जनमत-  तो अब क्या किया जाए! हिरोशिमा…
तबाही करने वाले इन बमों को जिन वैज्ञानिकों ने बनाया है, और वे सारे राजनेता जिन्होंने इसे चलाया है, वे अभी तक खुलेआम घूम रहे हैं। उनकी कोई सजा तो तय कीजिए, नहीं तो उनके हौसले बेकाबू हो जाएंगे।

विश्व जनमत – उन्हें बुलाया जाए

अर्दली – अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रूमैन हाजिर हो …मैनहट्टन प्रोजेक्ट के सर्वेसर्वा जनरल ग्रॉब्ज.. हाजिर हो.. वे सारे परमाणु वैज्ञानिक ओपन हायमर, फार्मी, टेलर, अर्थर क्रोम्टन, कोनेट, जनता की अदालत में हाजिर हो…

हिरोशिमा-  यही है ..यही है…वे सब राक्षस ,हत्यारे, मानवीय सभ्यता और संस्कृति के अक्षम्य दुश्मन।

आक्रांता- इस खचाखच भरी अदालत में एटमी परीक्षण में मरने वाली तितलियों के पंख मौजूद हैं, दम तोड़ते मूंगे और मोती भी है, मुरझाते जल पुष्प एक और खड़े हैं। ओह प्राणी जगत, वनस्पति जगत, दूषित हवा में सांस लेने को बाध्य सभी उपस्थित हैं।

हिरोशिमा-  यह मामला तो सीधे-सीधे नृशंस मानव हत्या का है, क्योंकि अमेरिकी प्रेसिडेंट के पास एटमी हमले का कोई कारण और औचित्य नहीं था। ट्रूमेन उत्तर दो….भूमध्य सागर में मूसोलीनी ध्वस्त हो चुका था, सोवियत सेनाओं के सामने हिटलर और उसका बर्लिन घुटने टेक चुका था। हिटलर अपनी आत्महत्या की तैयारी कर चुका था। और…और जापान !! वह भी तो समर्पण के लिए तैयार था ! तब तुम्हें इतने मारक और संघारक परमाणु बमों द्वारा आक्रमण करने की क्या जरुरत थी?

ट्रूमैन- यह हमारा सैनिक फैसला था।

हिरोशिमा- लेकिन तुम्हारे सैनिक तंत्र ने तो आक्रामण के लिए टोक्यो, योकोहामा, ओसाका, क्योटो को चुना था। वह क्योटो जहां जापान का सम्राट रहता था।

ट्रूमैन-  मैं…… हम……

हिरोशिमा- तब तो तुम केवल 9 दिन पुराने प्रेसिडेंट थे, जब तुमने जापान पर आणविक आक्रमण का अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला लिया था।

ट्रूमैन- यह सही है।

हिरोशिमा-  परमाणु बम की जरूरत तो तुम्हें जर्मनी के विरुद्ध थी फिर तुमने इसे जापान पर गिराने का फैसला क्यों लिया?

ट्रूमैन-   इसके दो कारण थे…. पहला तो यह कि हम नहीं चाहते थे कि परास्त जापान पर रूस का कब्जा हो, हमने 6 अगस्त को हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था, हम पराजित जापान को अपने अधिकार में रखना चाहते थे। लेकिन 8 अगस्त को रूस ने जापान के खिलाफ युद्ध घोषित कर मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया था। रूस को रोकने के लिए और जापान की सत्ता पर मौत का खौफ जारी करके हम अपने बमो की ध्वंसात्मक तबाही का अंदाजा भी लेना चाहते थे।

हिरोशिमा- इसके लिए तुम यह प्रयोग किसी सागर, मरुस्थल या पर्वतीय प्रदेश में भी कर सकते थे?

 ट्रूमैन –  मैं  सैनिक फैसलों में दखल नहीं देना चाहता था। वैसे भी हम पहला परीक्षण न्यू मैक्सिको के मरुस्थल में कर चुके थे, क्योंकि सैनिक तंत्र को बमो की मानव मृत्यु क्षमता के आंकड़े जमा करने थे।

हिरोशिमा-  और आप एडवर्ड टेलर, महान आविष्कारक !आपका पक्ष का था?

एडवर्ड टेलर- मैं एडवर्ड टेलर! सिद्धांतत: मैं इस कृत्य के पक्ष में नहीं था। मैं नहीं चाहता था कि इंसान को कीड़े मकोड़े की तरह मारा जाए, लेकिन मेरी एक ना चली. मैं खुद अपने आविष्कार की भयावहता और मारक क्षमता के संभावित परिणामों लेकर पछता रहा था।

हिरोशिमा – तो तुमने यह परमाणु बम विकसित थी क्यों किया?
अरे दरिंदों! देखो! मेरे इस विदग्ध शरीर को..मेरे दोस्त नागासाकी को…

एडवर्ड टेलर-  यह तो विशुद्ध विज्ञान की मौलिक प्रगति का एक चरण था। विज्ञान नैतिक या अनैतिक नहीं होता ।उसकी नैतिकता या अनैतिकता का सवाल तब उठता है जब मानव हित या अहित के संदर्भ में उसकी उपयोगिता तक की जाती है।
जब मैंने देखा कि बमों  का परीक्षण मानव बस्ती पर करने का फैसला लिया जा रहा है… तब मेरी आत्मा दहल उठी थी।
मैने-…… मैने स्वयं अपने को धिक्कार था।

हिरोशिमा- प्रेसिडेंट ट्रूमैन ! तब तो तुम सिर्फ 9 दिन पुराने शासक थे, जब तुम्हे पहली बार इन घातक बर्बर बमों की सूचना दी गई थी। क्या तब तुम्हारी आत्मा पर नैतिकता ने कोई दस्तक नहीं दी थी?
यह अमानुषिक और बर्बर फैसला इन तीनों राक्षसों ने लिया था, इसने.. इसने…और इसने….।
यह सभी हिटलर मूसोलिनी की तरह मात्र युद्ध अपराधी नहीं हैं, यह उससे भी संगीन मानव अपराधी है ।
यही है वह राक्षस स्टिम्सन,, जिसने राजनीति के लिए विज्ञान की इस विरल खोज की दिशा ही बदल दी, और इसी जनरल ग्रोबस ने कहा था।

जनरल ग्रोब्स- हमारे बम सैनिक सत्ता के प्रतीक हैं।। जापान पर इसका प्रयोग जल्द से जल्द किया जाना चाहिए ताकि हम इन बमों की मारक क्षमता पर आश्वस्त हो सके। इनका इस्तेमाल उन घनी बस्तियों में होना चाहिए जहां हथियारों के कारखाने और मजदूरों के रिहायशी इलाके हों।

हिरोशिमा- और यह हैं मेनहट्टन प्रोजेक्ट के डायरेक्टर! ओपन हाईमर!!  महान वैज्ञानिक! क्या आपको पता नहीं था कि इसका प्रयोग राजनेता मानव बस्ती में करेंगे? मुझ पर जो परमाणु बम गिराया गया था उसका विस्फोट 450 मील दूर से देखा गया था। इसमें लाखों लोग हताहत हुए। बताइए आपने ऐसा बम क्यों बनाया?

ओपन हायमर- मैं बम के मानव बस्ती में गिराए जाने के विरुद्ध था। मैं बहुत विचलित और दुखी था; इसलिए मैंने तत्काल ही डायरेक्टर का पद त्याग दिया था।

हिरोशिमा- और यह महान भौतिक शास्त्री , आर्थर क्रोमटन !! इसने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था…….

आर्थर-  मुझे दो ही चीजें सबसे अधिक पसंद है, भौतिक विज्ञान और रेगिस्तान !!
मैं हमेशा सोचता था कि इन दोनों का मिलन कभी भी नहीं हो सकता, परंतु आज….. आज मेरे सामने दोनों एकाकार होकर मौजूद है। चमत्कारी भौतिक विज्ञान और सामने फैला हिरोशिमा नागासाकी का रेगिस्तान।

हिरोशिमा-  ये हत्यारे हैं…… यह मानव जाति के शत्रु हैं, इनको कीड़े पड़े! इनका रक्त सड़ते तक बहते रहे।
इन रक्त जीवी राक्षसों को इस अदालत में मृत्युदंड दिया जाए।

विश्व जनमत- नहीं नहीं। धूर्त: दुष्ट ;दुर्जन मानव हंताओ के लिए मृत्यु तो वरदान बन जाएगी: क्योंकि यमराज की यंत्रणा  स्थल भी इन अधम आत्माओं  को स्वीकार नहीं करेगा..सृष्टि के इतिहास में यह जघन्य तम और कल्पनातीत पाप का अकेला उदाहरण है। पापियों की पाप की पराकाष्ठा है।

एटम युग की पुराण कथा के हिंसक राक्षस के रूप में यह जाने जाएंगे।
इनकी नैतिक आत्माओं का कोई अंतिम विश्राम स्थल नहीं होगा। हत्या से यह शौक मुक्त नहीं होंगे। आत्महत्या से इन्हें पश्चाताप प्राप्त नहीं होगा। प्रेत भी विक्षिप्त नहीं होते ,परंतु ….परंतु यह तीनों पागल प्रेत आत्माओं के रूप में सृष्टि के अंत तक माथा पटकते रहेंगे .और इन अधम आत्माओं के माथा पटकने की आवाज मनुष्य के विवेक पर हमेशा दस्तक देती रहेगी और और………

अर्दली-  क्या हुआ आपको:

क्या हुआ आपको!!

विश्व जनमत-  दिल की बस्ती में बहुत ही तेज दर्द उठ रहा है। हम जीना चाहते हैं, इस सुंदर दुनिया में विद्वेष से दूर ….शांतिपूर्वक हम जीना चाहते हैं

आक्रांता- विज्ञान के विध्वंसत्मक स्थितियों की अपेक्षा आज आवश्यकता है, नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग मानवीय सभ्यता के विकास में करें।

(सभी पात्र द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित करने के पश्चात)

  1. परमाणु बमों का प्रयोग कितना मार कितना घातक।

2. कौन जीता और हारा कौन?

3. पर अब रिएक्टरो का इस्तेमाल रचनात्मक कार्य के लिए किया जा रहा है ।

4. ब्रेडर रिएक्टर तो ऐसा रिएक्टर है जिसमें इंधन खर्च होने से और अधिक इंधन बनता है।

5. कच्चे तेल की बढ़ती मांग और कीमत से है बेहतर।

परमाणु इंधन की आपूर्ति हो निरंतर।।

6. कृतिम आयिसोटॉप का इस्तमाल कृषि उद्योग और चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति ला दिया है।
7. इस समय विश्व की कुल उर्जा का 10% और भारत में तीन प्रतिशत भाग परमाणु ऊर्जा से प्राप्त होता है इसे बडाना है।

8. स्वतंत्र और स्वदेशी तकनीक से परमाणु इंधन प्राप्त करना है

9.परमाणु इंधन प्राप्त करने के लिए यूरेनियम, पलूटोनियम से भी अधिक सहायक है थोरियम।

10. थोरियम के बर्न हो जाने के बाद जो मानक प्राप्त होता है वह अद्वितीय है।

11. भारत एक मात्र ऐसा देश है जिसने उच्च बर्न अप पर थोरीयम को स्वदेशी तकनीक से विकसित किया है।

12. अब वैज्ञानिक न्यूक्लियर फ्यूजन को नियंत्रित करने में लगे हैं। इससे विद्युत निर्माण की समस्या काफी हद तक कल होगी।

13. हम इस दिशा में अन्वेषण जारी रखेंगे और मानव हित, खुशहाली और कल्याण के लिए कार्य करते रहेंगे।।
और यही हमारा “लक्ष्य” है….

गीत

प्यार आदमी का आदमी से होने दो,
प्यार होने दो, प्यार होने दो।।

आज मुक्ति का शुभग विहान है।
मनुष्य कल्पना से भी महान है।।
अतीत दीन हीन वर्तमान से परे।
दुलार आदमी का आदमी से होने दो।।
प्यार होने दो, प्यार होने दो।।

(आभार – मुझे कहां ले आए कोलंबस, संजय गणेश के नाटक के गीत का अंश।)

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