लेखक की निजी ज़िन्दगी और रचना संसार के बीच का ‘नो मेंस लैंड’

सुधा अरोड़ा

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नंदिता दास की फिल्म ‘मंटो’

हमारे बेहद अजीज़ रचनाकार मंटो पर निर्मित फिल्म के रिलीज़ होने का इंतजार था !

मंटो हमारे शहर में आएं और हम मिलने न जाएँ, ऐसा भला कैसे संभव था !

हमने, पहले दिन का पहला शो, अपने ही जैसे कोई दो तीन दर्जन दूसरे मंटो प्रेमियों के साथ देखा, पर मंटो से मुलाकात नहीं हुई ! पूरा हॉल मुसलसल शुरू से अंत तक लगभग खामोश ही बना रहा, गोया कि उन सब को भी मेरी तरह वहां असली मंटो या बेकेट के किसी ‘गोदो’ के प्रकट होने का इंतज़ार था। लेकिन वे नहीं आए, बल्कि वे जितने हमारी स्मृतियों में थे, उनके सहारे हमने फ़िल्म के कुछ दृश्यों के खाली अंतराल को भर लिया।

फिल्म ख़त्म हुई तो सीट से उठने का मन नहीं हो रहा था पर परदे पर बीते ज़माने की धुंधलाई मटमैली सी स्टिल तस्वीरें क्रेडिट के साथ आ रही थीं ! फैज़ साहब की मशहूर नज़्म पूरी फिल्म को एक पोस्टर की शक्ल में तब्दील कर रही थी !

ऐसा क्यों हुआ?

फिल्म की निर्देशिका नंदिता दास ने कहा कि वे फिल्म बनाने से पहले और बनाने के दौरान छः लंबे सालों तक मंटो को जीती रहीं। तब तो फिल्म ऐसी होनी चाहिए थी कि न सिर्फ मंटो प्रेमी बल्कि मंटो से अनजान आम दर्शक भी उनकी शख्सियत का मुरीद होता और उनके रचना संसार से आलोकित होकर हॉल से बाहर निकलता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उस आम दर्शक को तो वहाँ ज़माने से सताई चंद असम्बद्ध औरतों के साथ एक सिरफिरा देवदास मिला जो किसी नाकाफी वजह पर दोस्त से रूठकर और अपने चहेते शहर बम्बई को छोड़ पकिस्तान चला गया था। एक चर्चित लेखक के अवचेतन और उसके रचना संसार तक पहुँचने के लिए यह सारा इकहरा सामान बेहद नाकाफी था।

सआदत हसन मंटो

मंटो अपनी बिरादरी की ऐसी शख्सियत है, जिनको हमने एक अरसे से उनके अफसानों और उनके किरदारों से बखूबी पहचाना है। पुस्तक प्रदर्शनियों में आज भी प्रेमचंद के बाद मंटो और इस्मत चुगताई सबसे ज्यादा पढ़े जाते हैं l मराठी भाषा के भी लगभग हर बड़े प्रकाशक ने मंटो की रचनाओं के अनुवाद बहुतायत में प्रकाशित किए हैं। राजनीति के चे ग्वेरा की तरह साहित्य में मंटो को जुनूनी हद तक एक ‘कल्ट व्यक्तित्व’ का दर्ज़ा प्राप्त है। नंदिता दास की फिल्म की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उनका मंटो अपने किसी अलौकिक क्षण में भी इन असंभव ऊंचाइयों को छूता नज़र नहीं आता जिनकी वजह से उन्हें साहित्य में वह मुकाम मिला जो किसी किसी को ही नसीब होता है। उन पर बनने वाली इस फ़िल्म के जानकारों ने रिलीज़ से पहले एक समां बाँधा था और उन्हें बहुत सारी उम्मीदें थी। लेकिन फिल्म देखने के बाद हमें सिर्फ एक खालीपन मिलता है और हमारे ढेर सारे सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं।

  • वे कौन से कारण हैं जिनसे मंटो आज भी इतने प्रासंगिक बने हुए हैं ?
  • वह क्या है आखिर जो आम युवा पाठकों के बीच मंटो की इतनी विशिष्ट पहचान बनाता है?
  • हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की राजनीतिक हकीकत के बीच का वह कौनसा ‘नो मैन्स लैंड’ है, जिसपर मंटो की कहानियां भरपूर वार करती हैं?
  • क्या इस असाधारण और ज़हीन लेखक की दुनिया मात्र non conformist बनने और परिवार को उपेक्षित कर सिर्फ सिगरेट और शराब में डूबने तक सीमित थी ?
  • वह कौनसा अनुभव संसार था जिसने उसे इतनी मारक कहानियाँ रचने पर मजबूर किया?
  • वह क्या था जिससे वह ताउम्र भागता रहा?
  • वे कौनसे रसायन हैं, या थे, जो मंटो को लेखक के अलावा और कुछ होने या बनने की मोहलत नहीं दे रहे थे ?

कुल मिलाकर मंटो के लेखन में आखिर ऐसा क्या था जो उसे यादगार बनाता था वरना तो हर अफसाना-निगार मंटो हो जाता। इस्राइली लेखक एमोस ओज़ अपने रचनाकर्म के बारे में लिखते हुए एक जगह कहते हैं कि ‘अपने आपसे शत प्रतिशत सहमत होने की स्थिति में मैं कभी कहानी नहीं लिखता। तब मैं आलेख लिखता हूँ ! रचना का जन्म तभी होता है जब मैं पाता हूँ कि मैं बहुत से विपरीत दृष्टिकोणों, बहुत से प्रतिकूल दावों और कई परस्पर विरोधी भावात्मक प्रक्रियाओं से घिर गया हूँ !’

मंटो जैसे लेखक पर बनी फिल्म भी इसी तरह की विरोधी भावात्मक प्रक्रियाओं में गहरे उतरे बगैर नहीं बनायी जा सकती। ‘मंटो’ फिल्म इस पड़ताल तक पहुँचने की महत्वाकांक्षा से विहीन दिखाई देती है।   

फिल्म में उन समस्याओं और सवालों को ज़रूर उठाया गया है जिसे आज के समय में भी जोड़कर देखा जा सकता है और जो आज भी हमारे देश की विकराल समस्याएँ हैं, निर्देशक इसके लिए बधाई की हकदार हैं कि वे आज के माहौल के कुछ सवालों से मंटो के बहाने मुठभेड़ कर पाई ! आज जब मारे जाने के लिए मुसलमान होना ही काफ़ी है, फिल्म में कुछ गहरे तंज करने वाले संवाद हैं – “इतना मुसलमान तो हूँ ही कि मारा जा सकूँ !

 

मंटो एक बेचैन आत्मा थे जिसने अपने लेखन से करोड़ों पाठकों को उद्वेलित कर दिया था। निश्चय ही उनके प्रासंगिक बने रहने की वजहें सबसे पहले वे विषय थे जो इतने वर्षों बाद आज भी समाज में रह रहकर अपना बदसूरत चेहरा दिखाते हैं। दूसरा, उन्हें बयान करने का वह अंदाज़ है जो दिल की भीतरी तहों से बिना किसी रुकावट के सीधे कागज़ पर उतर जाता है! एक आम पाठक टुकड़े टुकड़े जोड़कर भी ‘मंटो’ फ़िल्म से मंटो की एक मुकम्मल तस्वीर नहीं बना पाता – उस लेखक की, जिसके हाथ में हर वक्त शराब की बोतल है और जिसका रवैया अपने चाहने वालों और परिवार के प्रति एक बेहद तक गैरजिम्मेदाराना है।

मंटो में चीज़ों को बेबाकी से कहने की जो कशिश और जो जुनून था, उसके पीछे उनकी रचना प्रक्रिया के खुलने का इंतज़ार हम फिल्म में कर रहे थे। लेकिन फिल्म में मंटो के जीवन की भौगोलिक घटनाओं और उनकी रचनाओं के चंद असम्बद्ध दृश्य ही हासिल हुए। फिल्म में लेखक मंटो और उनकी रचनाओं के बीच का ‘एलिएनेशन’ इस कदर है कि कई जगह आम पाठक उनकी कहानी की घटनाओं से लेखक मंटो का रिश्ता तक समझ नहीं पाता। ज़ाहिर है कि ऐसे लेखक की संश्लिष्ट रचना भूमि पर फिल्म बनाना हर एक के बूते की बात नहीं है। निस्संदेह नंदिता दास के भीतर इस विषय पर फिल्म बनाने का निर्णय लेते समय ऐसी ही एक बेचैनी रही होगी जिसकी वजह से उन्होंने मंटो जैसी मुश्किल शख्सियत को अपनी फिल्म के लिए चुना और नंदिता जैसी ज़हीन अभिनेत्री और फ़िराक फिल्म की निर्देशक से हमें उम्मीद भी हुई थी कि मंटो की कहानियों के जिन किरदारों से हम अच्छी तरह वाकिफ हैं, फिल्म में उनसे लेखक के अन्तरंग रिश्तों को हम बेहतर समझ पायेंगे। लेकिन एकाध दृश्य को छोड़कर ऐसा हुआ नहीं। मंटो का सेन्स ऑफ ह्यूमर भी उस तरह से नहीं दिखा जैसा उनके लिखे दूसरे अदीबों और दोस्तों पर लिखे बेजोड़ ख़ाकों में दिख जाता है।

मंटो के समूचे लेखन को दो खानों में बांटा जा सकता है ! एक, जब वह बंबई में थे और तमाम तरह के सामाजिक मुद्दों पर लिख रहे थे, जिसमें बंबई शहर के अंतर्विरोध थे, विसंगतियां थीं, एक लेखक की जिंदगी की मुफलिसी थी, संघर्ष थे, बेइंतहा दोस्त थे, फिल्में थी, बंबई की रंगीनियां थीं, तवायफें थीं और आम औरतें थीं !

मंटो का अलहदा किस्म का लेखन तब सामने आया जब वह बंबई छोड़कर पाकिस्तान चले गए ! सरहद पार के मुल्क जाने के बाद शुरू हुई एक लेखक की दूसरी पारी की जिंदगी और रचनात्मक यात्रा जिसने दिल दहला देने वाली कहानियां दी — खोल दो , टोबा टेक सिंह ! छोटी सी कहानी ‘खोल दो’ दिल दहला देती है ! कहानी को कई लोगों ने अपनी अपनी तरह से आंकने की कोशिश की ! उस पर नाटक भी खेले गए। माया कृष्ण राव ने तो सिर्फ अपने नृत्य की भंगिमाओं से पूरी कहानी को उजागर किया- बिना एक भी शब्द कहे! यह कहानी को इंटरप्रेट करने का उनका अपना तरीका था ! विभाजन की त्रासदी अपने आप में इतनी दहशतनाक है कि उस से गुजरने वाला आदमी अपने दिमाग में खरोंच डाले बिना सामान्य नहीं रह सकता !

फिल्म में उन समस्याओं और सवालों को ज़रूर उठाया गया है जिसे आज के समय में भी जोड़कर देखा जा सकता है और जो आज भी हमारे देश की विकराल समस्याएँ हैं, निर्देशक इसके लिए बधाई की हकदार हैं कि वे आज के माहौल के कुछ सवालों से मंटो के बहाने मुठभेड़ कर पाई ! आज जब मारे जाने के लिए मुसलमान होना ही काफ़ी है, फिल्म में कुछ गहरे तंज करने वाले संवाद हैं – 'इतना मुसलमान तो हूँ ही कि मारा जा सकूँ !'

 

उस दौर की कहानियों के किरदारों को फिर से अपने सामने जीवित देखना आपको बेचैन कर देता है। ‘खोल दो’ कहानी को फ़िल्म में देखने के बाद बहुत सी आंखें नम हुई होंगी, बरसी भी होंगी, इसी त्रासदी पार दूसरी बार जब टोबा टेक सिंह से मुलाकात हुई और आंखें नम होने को ही थी कि हॉल की बत्तियां जल गईं। एक अकस्मात झटके के साथ फिल्म समाप्त हुई — युवा मंटो के 42 साल की उम्र में जाने की सूचना इतनी आकस्मिक थी कि हम उसके लिए तैयार नहीं हो पाए और एक सकते में मौत की खबर दर्शकों पर चस्पां कर दी गई। हॉल से उठकर जाने में पैर बहुत भारी हो रहे थे। बार-बार मुझे यह लगता रहा कि मंटो के किरदारों से किरदारों की तरह मिलना हम नहीं चाहते थे, उनमें उस असली मंटो को देखना चाहते थे जो इतना सब लिख चुकने के बाद भी अव्यक्त रह गया। आखिर एक बेहतरीन लेखक दिमागी स्तर पर कितने ऊबड़ खाबड़ टीलों से गुज़र कर सिर्फ 42 की उम्र में रुखसत हुआ होगा।

 

हर रचनाकार या तो पहले जीता है, फिर उस अनुभव पर किरदार रचता है या कल्पना से भी वह किसी पात्र का सृजन करता है तो लिखते समय वह उसे पूरी तरह से जी रहा होता है। फिल्म में उन किरदारों को जीने वाला मंटो हमें कहीं नहीं मिलता। एक छोटी सी तब्दीली के साथ अगर यह अंत होता कि मंटो जिस बेचैन मनःस्थिति से गुजर रहे थे उसमें वह एक सपना देखते हैं जिसमें वे खुद बौराए से खड़े हैं – सरहद के नो मैंस लैंड पर जिसका मन आधा उधर है, आधा इधर। जो नहीं जानता कि कैसे किधर जाना है ? टोबा टेक सिंह कौन था आखिर ? छूटे हुए सूत्रों को जोड़ने के लिए किसी भी कृति में कल्पना का सहारा लेना जायज़ है ! कहीं न कहीं टोबा टेक सिंह खुद मंटो थे और यह एक फ़िल्म थी जिसमें निर्देशक इतनी छूट तो ले ही सकता था। अगर टोबा टेक सिंह का वह किरदार विनोद नागपाल ने नहीं बल्कि नवाजुद्दीन बने मंटो ने खुद निभाया होता तो उस किरदार और मंटो का एक दूसरे में विलीन होना हमें आश्वस्त करता और फिल्म दोनों को एकाकार करती हुई समाप्त होती जिसका सांकेतिक अर्थ बहुत दूर तक जाता।

यहाँ पोलिश लेखक तादियूस बोरोवस्की याद आते हैं जिन्होंने सदी के सबसे स्याह हादसे जर्मनी के होलोकास्ट पर जब लिखा –’गैस के चेंबर में इस ओर से जाएं ….’ तो बेशक घोर त्रासदी के बावजूद उसमें ह्यूमर का पुट भी मौजूद था और लिखने के बाद खुद बोरोवस्की को लगा होगा कि अब वह उस विभीषिका के खौफ़नाक साये से मुक्ति पा लेंगे पर यह उनकी खुशफहमी थी ! बेचैनी समाप्त नहीं हुई और वे लगातार उस होलोकास्ट की विभीषिका से गुजरते रहे और लिख चुकने के 4 साल बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली ! टोबा टेक सिंह की कहानी में भी मुझे कुछ कुछ उस जुनून को झेल न पाने की कवायद दिखाई देती है ! बेशक मंटो ने आत्महत्या नहीं की लेकिन आत्महंता बनकर अपने आप को जिस तरह मौत की ओर धकेला, वह आत्महत्या से कम भी नहीं था। वह सिर्फ एक लेखक का गैर जिम्मेदार पारिवारिक और हद दर्जे तक जुनूनी होने का ही उदाहरण नहीं था।

जब हिंदुस्तान में मंटो की लिखी कहानी पर बनी फिल्म ‘गालिब’– जिसके संवाद राजेन्द्र सिंह बेदी ने लिखे थे — बॉक्स ऑफिस पर सफल होकर झंडे गाड़ रही थी, मंटो पाकिस्तान में अपनी रोटी रोजी की लड़ाई में मुब्तिला थे ! यह एक लेखक के लिए कितना बड़ा पैराडॉक्स है कि वह ताजिंदगी मुफलिसी और रोटी रोज़ी की जद्दोजेहद में लगा रहता है जिसका सीधा असर उसके परिवार और उसके संबंधों पर पड़ता है, उसके जाने के बाद न सिर्फ उसका अपना गाँव शहर बल्कि पूरे विश्व में उसकी रचनाएँ कामयाबी के नए मुकाम छूती हैं ! इस स्थिति को मंटो पर बनी फिल्म में बखूबी दिखाया या फ़िल्मी ज़बान में कहें तो ‘एक्सप्लॉयट’ कर एक विराट अंत तक पहुँचाया जा सकता था ! क्या आज भी गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ के शायर की परिणति की झलक हर भाषा के हर समय के लेखकों में हम देख नहीं रहे हैं ?

फिल्म में उन समस्याओं और सवालों को ज़रूर उठाया गया है जिसे आज के समय में भी जोड़कर देखा जा सकता है और जो आज भी हमारे देश की विकराल समस्याएँ हैं, निर्देशक इसके लिए बधाई की हकदार हैं कि वे आज के माहौल के कुछ सवालों से मंटो के बहाने मुठभेड़ कर पाई ! आज जब मारे जाने के लिए मुसलमान होना ही काफ़ी है, फिल्म में कुछ गहरे तंज करने वाले संवाद हैं – ‘इतना मुसलमान तो हूँ ही कि मारा जा सकूँ !’

फिल्म में मंटो की मनोभूमि पर गहरी शोध की अपेक्षा गलत नहीं थी। उनके जीवन की घटनाओं और उनके  किरदारों से तो हम वाकिफ थे लेकिन उन दोनों के आपसी रिश्ते को हम फिल्म में समझना चाहते थे। उसके लिए थोड़ी सी कल्पना की ज़रूरत थी ! बायोपिक होते हुए भी उसकी गुंजाईश फिल्म के माध्यम में हमेशा रहती है ! यह सवाल भी बचा रह जाता है कि फिल्म को आम दर्शकों तक ले जाने की एक ईमानदार कोशिश क्यों नहीं की गई ? जो साहित्य से वाकिफ भी नहीं है, वह इस फिल्म से अपने साथ क्या लेकर जाएगा ?

मंटो फिल्म मसान या शिप ऑफ थीसियस की तरह तो थी नहीं कि जिसका कंटेंट इतना फिलोसॉफिकल और कंपलेक्स हो कि उसको आम पब्लिक के लिए हैंडल न किया जा सके ! यह एक बायोपिक थी ! बायोपिक की पहुँच आम जनता तक हो सकती है और होनी चाहिए !

 

मंटो एक बायोपिक है। बायोपिक हमेशा ऐसी शख्सियत पर बनाई जाती है जो कहीं न कहीं हमें खास लगती है ! जिसकी जिंदगी के संघर्ष से हम एक मुकाम से आगे उसकी रचनाओं को समझने और सराहने की प्रक्रिया तक पहुँचते हैं। उसकी पहुंच भी आम जनता तक ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए। शायद इसीलिए गीता फोगट हो या मेरी कॉम, महेंद्र सिंह धोनी या अजरुद्दीन या मिल्खा सिंह–फर्क बस इतना है कि खिलाड़ियों और अभिनेताओं  की आखिरी मंजिल एक सफलता होती है और यह सफलता यहां भी है जिसमें एक लेखक किसी आत्महंता की तरह स्वयं अपने खिलाफ खड़ा दिखाई देता है और अंततः उसमें डूब जाता है।

मंटो फिल्म मसान या शिप ऑफ थीसियस की तरह तो थी नहीं कि जिसका कंटेंट इतना फिलोसॉफिकल और कंपलेक्स हो कि उसको आम पब्लिक के लिए हैंडल न किया जा सके ! यह एक बायोपिक थी ! बायोपिक की पहुँच आम जनता तक हो सकती है और होनी चाहिए !

मंटो हमारे लिए बेगाने नहीं ! उनके किरदार टोबा टेक सिंह और खोल दो का बदहवास पिता हमारे भीतर रचा-बसा है। यह फिल्म मंटो की जिंदगी के एक बेहद अहम किरदार – उनकी बीवी सफिया से हमारी मुलाक़ात करवाती है जिसका श्रेय ज़हीन निर्देशक नंदिता दास को जाता है। रसिका दुग्गल ने उसे जिस तरह अंडरप्ले किया है, सिर्फ़ देखने के बाद ही समझा जा सकता है। बहुत कम संवाद, पर उसकी आँखें बोलती हैं।

अपने लेखन से रोटी रोजी चलाने वाले एक कलाकार की पत्नी किन तकलीफों से गुजरती है और उसके चेहरे पर तल्खी नहीं आती। एक तरफ़ जिंदगी चलाने की बेबसी और अपने जीनियस शौहर के लिए बेइंतहा प्यार – दोनों के बीच की जद्दोजेहद उसकी आंखों में दिखाई देती है, बहुत कुछ कह जाती है l

मंटो कहता है कि मैं छोड़ना चाहता हूं तुम्हें l

एक चुप्पी के बाद …..कहते हो तो मैं चली जाऊंगी, फिर चुप्पी… तुम्हारा केस निपट जाए l

सफ़िया का अद्भुत किरदार  खड़ा करना – यह  फेमिनिस्ट कार्यकर्त्ता नंदिता दास के ही बूते का था !

मंटो फिल्म की एक उपलब्धि सफिया जरूर है !

जब साहित्य को या किसी किताब को फिल्म के परदे पर लाया जाता है तो भी इस बात की भरपूर कोशिश की जाती है कि व्यावसायिक समझौते किए बगैर भी उसकी पहुंच दर्शकों के बड़े वर्ग तक हो ! आखिर क्यों कला फ़िल्म फैंडरी का निर्देशक अपनी दूसरी फ़िल्म सैराट को एक बड़े वर्ग के लिए तैयार करने की ठान लेता है क्योंकि फ़िल्म एक किताब नहीं जिसमें सिर्फ एक अदद सिरफिरे लेखक की मशक्कत है, फ़िल्म के लिए बड़ी पूँजी और सामूहिक प्रयास की दरकार होती है इसलिए विषय कोई भी हो, उसको दूर दूर तक पहुँचाने के  लिए एक बड़ा वितान भी चाहिए !

मुझे बहुत अच्छा लगता अगर ‘मुल्क’ की तरह, फिल्म मंटो बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रहती  जिसकी मंटो जैसे किरदार में पूरी संभावनाएं थी –  निर्देशक ने यह मौका खो दिया | एक आर्ट फिल्म से आगे बॉक्स ऑफिस पर भी कामयाब होने के सारे उपादान (ingredients) मंटो के चरित्र में थे ! यूँ ही ऐसा नहीं हुआ कि पहले दिन का पहला शो देखने के बाद कोई फ़िल्म उस शख्सियत को पढने सराहने वाले दर्शक को इतना बेचैन कर दे कि उस पर लिखे बिना निजात न मिले !

यह फिल्म की समीक्षा नहीं, सिर्फ अपनी बेचैनी को दूर करने के लिए लिखे गए चंद अलफ़ाज़ हैं !

सुधा अरोड़ा जानी मानी कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    🙏👌💐
    बहुत बढ़िया समीक्षात्मक विश्लेषण। पठनीय और विचारणीय भी। यह वाकई अफसोस की बात है कि नंदिता दास 6 वर्षों की कड़ी मेहनत और ईमानदार कमिटमेंट के बावजूद परदे पर उस अमर लेखक मंटो के व्यक्तित्व, कृतित्व, संघर्षों, अंतर्द्वंद्वों और बेचैनियों को परदे पर उतार पाने में आंशिक रूप से ही सफल हो पाईं।

    दरअसल मंटो का जीवन उनकी कहानियों के पात्रों की तरह इतना संत्रस्त, मनोवैज्ञानिक तौर पर जटिल और सामान्य लीक से हटकर बिलकुल अलहदा, अबूझ और अप्रत्याशित रहा है कि जिसे आसानी से समझ पाना और समझा पाना या साधारणीकरण कर पाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। लेकिन नंदिता दास की कम से कम इस बात के लिए तारीफ़ जरूर की जानी चाहिए कि उन्होंने एक कड़ी चुनौती को स्वीकार करने और मंटो की शख्शियत को सिनेमा के पर्दे पर उतारने का जोखिम उठाया और उस चुनौती को अंजाम तक पहुंचाने की अपने तईं पूरी कोशिश की।

    सुधा मैडम को इस गहन एवं सारगर्भित विश्लेषण के लिए साधुवाद और शुभकामनाएं।

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