Friday, April 19, 2024
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प्रकाश झा की मजबूरी (डायरी, 25 अक्टूबर 2021)

जाति और जातिगत हितों को भारत में सबसे अधिक महत्व ब्राह्मण वर्ग के लोग देते हैं। इसका एक ताजा उदाहरण है फिल्मकार प्रकाश झा, जो इन दिनों भाजपा द्वारा शासित प्रदेश मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अपनी अगली वेब सीरीज आश्रम-3 की शूटिंग कर रहे हैं। घटना कल रविवार को शाम करीब पांच बजे […]

जाति और जातिगत हितों को भारत में सबसे अधिक महत्व ब्राह्मण वर्ग के लोग देते हैं। इसका एक ताजा उदाहरण है फिल्मकार प्रकाश झा, जो इन दिनों भाजपा द्वारा शासित प्रदेश मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अपनी अगली वेब सीरीज आश्रम-3 की शूटिंग कर रहे हैं। घटना कल रविवार को शाम करीब पांच बजे की है। भोपाल के पुराने जेल परिसर में प्रकाश झा अपने सहयोगी कलाकारों के साथ शूटिंग कर रहे थे। तभी वहां बजरंग दल के कार्यकर्ता हाथों में लाठी-डंडा-हॉकी स्टिक आदि लेकर पहुंच गए। उन्होंने कलाकारों को पीटा। मार खाने वाले कलाकारों में बॉबी देओल भी रहे, जिनके बड़े भाई सन्नी देओल भाजपा के सांसद हैं। मिल रही जानकारी के अनुसार बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने महिला कलाकारों को भी नहीं छोड़ा। यहां तक कि स्वयं प्रकाश झा को लात-घूंंसे जड़े। उन्हें इस बात के लिए तमाचे जड़े गए कि वे अपनी वेब सीरीज के माध्यम से हिंदू धर्म की भावनाओं को आहत कर रहे हैं। बजरंग दल वाले जब उन्हें पीट रहे थे तब वे जय श्री राम का उद्घोष कर रहे थे।
इस दौरान पुलिस को सूचना दी गयी और पुलिस ने प्रकाश झा और उनके सहयोगी कलाकारों को बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के चंगुल से मुक्त कराया। लेकिन कमाल की बात है कि प्रकाश झा ने अपने एवं अपने सहयोगियों के ऊपर हुए हमले की प्राथमिकी तक दर्ज नहीं करायी।
मैं उनका फेसबुक और ट्विटर अकाउंट देख रहा हूं। यहां भी प्रकाश झा ने कोई टिप्पणी नहीं की है। यहां तक कि यह भी नहीं लिखा है कि उनके ऊपर हमला हुआ है। कल देर शाम जानकारी मिलने पर मैंने उनके व्यक्तिगत मोबाइल नंबर पर फोन कर उनकी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मेरा फोन रिसीव नहीं किया। यह मुमकिन है कि जब मैंने उन्हें फोन किया हो, तब वे व्यस्त रहे हों।

[bs-quote quote=”मुझे तो उनकी फिल्म गंगाजल और अपहरण की याद आ रही है, जब उन्होंने लालू प्रसाद की छवि को दागदार बनाने के लिए फिल्मों का उपयोग किया। इन दोनों फिल्मों में प्रकाश झा ने जातिसूचक शब्दों का खूब इस्तेमाल किया। इसके बावजूद उनके उपर किसी ने हमला नहीं किया। लेकिन अब जबकि वे आश्रम के जरिए हिंदू धर्म के बाबाओं की पोल खोल रहे हैं तो उनके उपर हमला किया जा रहा है और वे चुप हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

खैर, सवाल यह है कि प्रकाश झा ने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई? एक वजह तो यह हो सकती है कि वे इस बात को समझते हैं कि इस घटना के अधिक प्रचार से बजरंग दल के उन्मादी कार्यकर्ताओं का महिमामंडन होगा और आने वाले दिनों में उनके ऊपर और हमले होंगे। दूसरी वजह यह हो सकती है कि वे इस बात को समझते हैं कि मध्य प्रदेश में भाजपा का शासन है और इसमें बजरंग दल के लोग भी शामिल हैं। ऐसे में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाने का कोई फायदा नहीं है। एक तीसरी वजह यह हो सकती है कि वे अपनी जाति और जातिगत हितों को संरक्षित करना चाह रहे हों।

इन तीन वजहों के अलावा मुझे कोई और चौथी वजह नहीं दिखती है। यदि हम यह इमेजिन करें कि प्रकाश झा लालू प्रसाद की छवि को बिगाड़ने के लिए कोई वेब सीरीज बना रहे होते और उनके उपर राजद के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया होता तो क्या तब भी प्रकाश झा प्राथमिकी दर्ज नहीं कराते?
मुझे तो उनकी फिल्म गंगाजल और अपहरण की याद आ रही है, जब उन्होंने लालू प्रसाद की छवि को दागदार बनाने के लिए फिल्मों का उपयोग किया। इन दोनों फिल्मों में प्रकाश झा ने जातिसूचक शब्दों का खूब इस्तेमाल किया। इसके बावजूद उनके उपर किसी ने हमला नहीं किया। लेकिन अब जबकि वे आश्रम के जरिए हिंदू धर्म के बाबाओं की पोल खोल रहे हैं तो उनके उपर हमला किया जा रहा है और वे चुप हैं।
खैर, प्रकाश झा बतौर प्रोफेशनल बेहतरीन रहे हैं। उनकी जाति और जातिगत पक्षधारिता को छोड़ दें तो मुझे गर्व भी होता है कि वे बिहार के हैं और कमाल की फिल्में बनाते हैं। उनके ऊपर हुआ यह हमला निंदनीय है। लेकिन यह बेहतर होता कि प्रकाश झा डरने के बजाय बजरंग दल के उन्मादी कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराते।
बहरहाल, कल मैं भारतीय दंड संहिता की धारा 504 का अध्ययन किया, जो किसी भी व्यक्ति के लिए अपशब्द कहे जाने के मामले में लागू होता है। दरअसल दो दिन पहले एक चाय दुकान पर एक घटना घटित हुई। एक आदमी दूसरे व्यक्ति को उसकी मां-बहन-बेटी को गालियां दे रहा था। दूसरे व्यक्ति ने विरोध किया तो पहले व्यक्ति ने हाथ भी उठा दिया। तभी जानकारी मिली कि दोनों बिहार के ही हैं। पहला व्यक्ति ऊंची जाति का है और दूसरा व्यक्ति ओबीसी समुदाय का है।
जब यह सब मेरे सामने हो रहा था तभी मेरी जेहन में यह सवाल आया था कि क्या इसके लिए कोई कानून नहीं है? मुझे लगा कि पॉक्सो एक्ट की तर्ज पर एक विशेष कानून हो जिससे स्त्री सूचक गालियों के उपयोग पर रोक लगे। मैंने दिल्ली हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन, जो कि एक उम्दा साहित्यकार भी हैं,  से इस संबंध में अनुरोध किया तो उन्होंने कहा कि पॉक्सो नाबालिग बच्चों के लिए है। गालियों के मामले में आईपीसी में एक अलग से धारा है।

[bs-quote quote=”बहरहाल, एक वरिष्ठ साथी ने मेरी बात के जवाब में कहा कि यदि ऐसा हुआ तो पूरा देश ही जेल बन जाएगा। एक अन्य वरिष्ठ साथी ने कहा कि यदि ऐसा हुआ कि गाली देने से जेल होने लगे तो 90 फीसदी पुरुष और 60 फीसदी महिलाएं जेल में होंगीं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

अरविंद जैन जिस धारा के बारे में बता रहे थे, वह धारा है– 504। इसके तहत ऐसा कोई भी शब्द जिससे कि किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचता हो तो इस धारा के तहत मुकदमा दर्ज कराया जा सकता है। इस कानून का दोषी साबित होने पर दो साल तक की सजा निर्धारित है। लेकिन इस मामले में तीन अहम बातें हैं। पहला तो यह कि यह संज्ञेय अपराध जरूर है, लेकिन जमानतीय है। दूसरा यह कि इस धारा के तहत मामला तभी दर्ज कराया जा सकता है जब यह साबित हो कि अपशब्द कहने वाले ने जानबूझकर सामने वाले के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए अपशब्द कहा हो।
सबसे महत्वपूर्ण यह कि इस कानून की परिभाषा में स्त्रीसूचक अपशब्दों के उपयोग का उल्लेख ही नहीं है। मुझे लगता है कि इस कानून में यदि यह बात शामिल कर दी जाय और इसका प्रचार-प्रसार वैसे ही किया जाय जैसा कि पॉक्सो एक्ट का किया गया है, तो मुमकिन है कि पुलिस के अधिकारी भी इस मामले में संवेदनशील होंगे। साथ ही लोग किसी के द्वारा गालियां दिये जाने के बाद मुकदमा भी दर्ज करवा सकेंगे।
बहरहाल, एक वरिष्ठ साथी ने मेरी बात के जवाब में कहा कि यदि ऐसा हुआ तो पूरा देश ही जेल बन जाएगा। एक अन्य वरिष्ठ साथी ने कहा कि यदि ऐसा हुआ कि गाली देने से जेल होने लगे तो 90 फीसदी पुरुष और 60 फीसदी महिलाएं जेल में होंगीं।
मेरी अपनी राय है कि कानून तभी कारगर होता है जब उसकी परिभाषा स्पष्ट हो। फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कितने लोग जेल में जाएंगे। मुझे लगता है कि यदि हर राज्य में आईपीसी की धारा 504 के तहत मामले दर्ज होने लगे और हर महीने कम से कम दस मामलों में भी कार्रवाई हो तथा मीडिया इन मामलों को तवज्जो दे तो मुमकिन है कि इस कानून के संबंध में लोगों की जागरूकता बढ़ेगी और भारत मां-बहन-बेटियों की गाली से मुक्त हो सकेगा।
काश प्रकाश झा भी हिम्मत करते और कम से कम 504 के तहत ही मामला दर्ज कराते!

 नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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