‘झूठा सच’ विभाजन की त्रासदी को दर्ज करता है

आलोचक वीरेन्द्र यादव से अटल तिवारी की बातचीत

6 2,622

खेमेबंदी और मार्क्सवादी कट्टरता के चलते रामविलास शर्मा ‘झूठा सच’ के महत्व को रेखांकित नहीं कर पाए

(बातचीत  का पहला हिस्सा)

 

आपका जन्म कहां हुआ और आपकी शिक्षा-दीक्षा कहां हुई?

मेरा मूल पैतृक ग्राम जौनपुर जिले में है। वहीं 5 मार्च, 1950 मेरा जन्म हुआ, लेकिन जन्म के पहले ही वर्ष मेरे पिता पूरा परिवार लेकर लखनऊ आ गए थे क्योंकि वे यहाँ केंद्र सरकार की रेलवे सेवा में कार्यरत थे। यहीं मेरी समूची पढ़ाई लिखाई हुई और वर्ष 1972  में मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया।

घर का माहौल कैसा  था, क्या घर में हिन्दी साहित्य के प्रति पहले से किसी का रुझान था

घर का माहौल सामान्य नौकरीपेशा परिवारों की ही तरह का था। लेकिन यह जरूर था कि मेरे पिता को पत्रिकाओं और किताबें  पढ़ने का शौक था। मुझे याद है कि यशपाल की लाल कवर वाली और कुछ अन्य लेखकों की किताबें मुझे घर में ही बचपन में  देखने-पढ़ने को मिलीं थीं। उन दिनों घर में ‘नवजीवन’ अखबार और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ नियमित आता था। बाद में ‘धर्मयुग’ भी  आने लगा था।

साहित्य की दुनिया से कब सामना हुआ, किन लेखकों अथवा किन रचनाओं ने पहले-पहल आपको प्रभावित किया?

मुझे बचपन से ही पढ़ने का शौक था, कॉलेज की लाइब्रेरी से प्रेमचंद के कहानी संग्रह इशू कराकर मैंने आठवीं नवीं क्लास में  ही पढ़ना शुरू कर दिया था। लेकिन साहित्य की दुनिया से विधिवत मेरा परिचय हाईस्कूल के  बाद हुआ। घर के  पास मेरे एक  अध्यापक रहा करते थे। जिस दिन मेरी हाईस्कूल की परीक्षा समाप्त हुई उसी दिन उन्होंने मुझे दो पुस्तकें पढ़ने को दी-एक धर्मवीर  भारती की ‘गुनाहों  का देवता’ और दूसरा गुरुदत्त का कोई उपन्यास। ‘गुनाहों का देवता’ ने मुझे इस तरह बांधा कि मुझे आज गुरुदत्त के  उपन्यास का नाम भी याद नहीं है। कुशवाहा कान्त की ‘लाल रेखा’ भी इन्हीं दिनों पढ़ी थी, जिसकी धुंधली सी याद आज भी है।

शिवानी के लेखन ने भी इन दिनों आकृष्ट किया था। उनकी कहानी ‘लाल हवेली’ को पढ़कर मैंने उन्हें पत्र भी लिखा था। पढ़ने के  इस  सिलसिले के साथ ही इन्हीं दिनों कुछ  कवियों-लेखकों को भी देखने-सुनने का मौका लखनऊ के  अमीनाबाद में स्थित ‘कंचना’ चायघर  के माध्यम से हुआ, जहाँ मेरा आना-जाना एक सहपाठी के साथ शुरू हुआ, जिसके पिता उस चायघर के मालिक थे । अमृतलाल नागर,  सोहनलाल द्विवेदी, बंशीधर शुक्ल, ठाकुर प्रसाद सिंह, पत्रकार अखिलेश मिश्र, कवि दिवाकर आदि सहित बहुत से अन्य कवियों और लेखकों से मिलने, देखने-सुनने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ। यहाँ एक तेजतर्रार युवा मंडली थी, जो गोष्ठियों आदि का आयोजन  भी करती थी। उसमें आते-जाते साहित्य के कुछ संस्कार भी मेरे अंदर विकसित हुए।

आपको लिखने की शुरुआत कब और कैसे हुई?

यूं तो मेरा पहला लेख अमीनाबाद इंटर कालेज की पत्रिका ‘वंदना’ में वर्ष 1965 में प्रकाशित हुआ था, जब मैं ग्यारहवीं  कक्षा का  छात्र था। यद्यपि इसके पहले वर्ष 1962 में चीन के  हमले के  बाद मेरी एक कविता स्थानीय समाचार पत्र ‘स्वतंत्र भारत’ के  रविवारीय  परिशिष्ट के  तरुण स्तम्भ में छप चुकी थी, लेकिन विधिवत रूप से मेरा पहला लेख ‘नवजीवन’ में वर्ष 1968 में ‘अठारह वर्षीय मताधिकार’  विषय पर तब छपा था जब मैं बीए का छात्र था। इसके बाद सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन  मूलतः मेरा शुरुआती लेखन पत्रकारिता विषयक अधिक रहा।

आपने अपने को उपन्यास की आलोचना पर ही केन्द्रित रखा, इसकी कोई खास वजह रही?

दरअसल मैंने हिन्दी साहित्य को पाठ्यक्रम के रूप में कभी नहीं पढ़ा। बीए में मेरे  विषय अंग्रेजी साहित्य, अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र थे और एम.ए. मैंने  राजनीति शास्त्र में किया था। मेरी पठन रुचि साहित्यिक से अधिक समाजशास्त्रीय थी। मैंने नेहरू की  ‘डिस्कवरी आफ इण्डिया’, आटोबायोग्राफी, गांधी की आत्मकथा, ख्वाजा अहमद अब्बास लिखित इंदिरा गांधी की जीवनी ‘दि रिटर्न ऑफ   दि रेड रोज’ अपने विश्वविद्यालयी दौर में अंग्रेजी  में ही पढ़ ली थी। मुझे अंग्रेजी पढ़ने का शौक था इसलिए मैंने उन्हीं दिनों हार्डी, डिकेंस के उपन्यासों और बर्नार्ड शा के  नाटकों को बहुत रुचि के  साथ पढ़ा था। ‘ब्लिट्ज’, ’लिंक’, ’न्यू एज’, ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इण्डिया’ और ‘कारवां’ आदि अंग्रेजी की पत्रिकाएं मैं  नियमित पढ़ता था। लखनऊ की गंगा प्रसाद मेमोरियल और अमीरुदौल्ला पुस्तकालय  ने मुझे शुरुआती दौर में बहुत समृद्ध किया। मेरा काफी समय यहाँ बीतता था। शुरू में मैंने  कुछ  लेख आदि अंग्रेजी में लिखे भी थे, जो ‘पायोनियर’ और ‘नार्दर्न इण्डिया पत्रिका’ में प्रकाशित भी हुए थे। लखनऊ की ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी में नियमित जाते और पढ़ते मेरी  रुचि अंग्रेजी साहित्य के आलोचनात्मक अध्ययन में हुई। ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’, ‘इन्काउन्टर’, ‘न्यू स्टेट्समैन’ आदि पत्रिकाओं से भी मेरा परिचय ब्रिटिश लाइबे्ररी में ही हुआ। इन्हीं दिनों मुझे मार्कंडेय जी द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘कथा’ और ज्ञानरंजन की ‘पहल’  देखने-पढ़ने को मिली। जब मैंने डॉ.रामविलास शर्मा की आलोचनात्मक पुस्तक ‘आस्था और सौन्दर्य’ पढ़ी तो मेरी रुचि हिन्दी उपन्यासों  के  गंभीर अध्ययन की ओर विकसित हुई। ‘मैला आँचल’ उपन्यास पर डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा लिखित आलोचनात्मक लेख मैंने  पहले  पढ़ा और उपन्यास बाद में। रामविलासजी की वाद-विवाद की आलोचनात्मक शैली ने मुझे अधिक आकृष्ट किया और साहित्य व  राजनीति की मेरी तब तक बनी समझ के  साथ हिन्दी उपन्यासों को  पढ़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक बरकरार है। यद्यपि  यह गम्भीर और दिलचस्प विरोधाभास है कि जिन डॉ. रामविलास शर्मा की कथा आलोचना पढ़कर मैं उपन्यासों के गंभीर अध्ययन की  ओर उन्मुख हुआ उनकी सोच और दृष्टि से ही आज मेरी गंभीर असहमति है। लेकिन मुझे यह शुरू से ही लगता रहा है कि हिन्दी  उपन्यासों को साहित्यिक ‟ति के रूप में तो पढ़ा जाता रहा है, पर उसकी सामाजिक निर्मिति और सन्दर्भ पर जितना ध्यान दिया जाना  चाहिए था नहीं दिया गया। यहाँ तक कि ‘गोदान’, ‘झूठा सच’, ‘मैला आँचल’ और ‘आधा गाँव’ को भी महज एक साहित्यिक संरचना के  रूप में ग्रहण किया गया जबकि उसको सामाजिक निहितार्थ कहीं अधिक प्रभावी और दीर्घकालीन महत्व के हैं । संभवतः यही वे कारण थे  जिन्होंने मुझे उपन्यास विधा पर केन्द्रित रहने के लिए  प्रेरित किया।

पी.सी. जोशी द्वारा देवीशंकर अवस्थी सम्मान प्राप्त करते वीरेंद्र यादव

हिन्दी साहित्य में आप एक आलोचक के  साथ-साथ प्रेमचंद के अध्येता के  रूप में जाने जाते हैं । आपका कहना है कि गोदान’  को किसान जीवन की महागाथा के रूप में सीमित न करके भारतीय राष्ट्रवाद के क्रिटिक  के रूप में पढ़ा जाना चाहिए वहीं डॉ. रामविलास शर्मा, रूपर्ट स्नेल और निर्मल वर्मा गोदानको किसान, कर्ज और गो-दान के लिए पैसे न जुटा पाने के रूप में रेखांकित  करते हैं। इसे गोदानकी अलग-अलग व्याख्या माना जाए अथवा किसी राजनीति के  तहत यह किया गया?

मेरी दृष्टि में प्रेमचंद महज एक कथाकार नहीं थे, वे एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी भी थे जिन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन के  दौरान  गांधीजी के आह्वान पर सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दिया था और विदेशी शासन के साथ-साथ देसी सत्ता के भी तीखे आलोचक थे।  उनकी कहानियां और उपन्यास गुलाम भारत का कालपात्र सरीखी थीं । मुझे यह भी लगता है कि किसान, दलित और स्त्री को अपने  साहित्य में केन्द्रियता प्रदान करके उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन की अनुपस्थितियों की भरपाई की है। इस दृष्टिकोण से पढ़ने पर ‘गोदान’  की विराटता और राष्ट्रीय आन्दोलन की सीमा एक साथ उजागर होती है। डॉ.रामविलास शर्मा विदेशी बनाम देसी का जो महावृतांत  रचते हैं  उसमें स्वाधीनता आन्दोलन की आलोचना की गुंजाइश कम बचती है इसीलिए होरी की त्रासदी को वे व्यापक सन्दर्भ देने  से चूक  जाते हैं । निर्मल वर्मा  अपनी ‘सांस्कृतिक  राष्ट्रवादी’ दृष्टि के  चलते वहीं पहुँचते हैं, जहाँ उन्हें पहुंचना था। यह उनकी रणनीति भी हो  सकती है क्योंकि बाद के दौर में उन्होंने प्रेमचंद को ‘प्रेमचंद की परम्परा’ से मुक्त करने का अभियान ही छेड़ दिया था, लेकिन  रामविलासजी की यह कोई रणनीति न होकर उनकी व्याख्या ही थी। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रामविलासजी ने जब प्रेमचंद पर लिखा था तब कथा-आलोचना अपने प्रारंभिक दौर में थी। उनके लेखन को प्रेमचंद पर आलोचनात्मक प्रस्थान बिन्दु के रूप में लिया  जाना चाहिए नाकि अंतिम निष्कर्षात्मक लेखन के रूप में।

“बाबरी मस्जिद ध्वंस के पचीस वर्ष बाद दूधनाथ सिंह के उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ को पढ़ते हुए यह शिद्दत से अहसास होता है  कि अब ‘धर्मनिरपेक्षता’ की निरापद चर्चा से ही काम नहीं चलने वाला है बल्कि उन तत्वों की जड़ मूल से पहचान करनी होगी, जो  वर्तमान साम्प्रदायिक फासीवादी खतरे को खाद-पानी देने का काम करते हैं । इसलिए अब आवश्यकता धर्म का क्रिटिक करने की है  क्योंकि उग्र हिंदुत्व इससे ही वैधता प्राप्त करता है। मुझे लगता है कि हिन्दू धर्म की शोषक और वर्ण-जाति की विभेदकारी संरचना में  ही  सन्निहित हैं इसके विनाशक तत्व”

आपने लिखा है कि हिन्दी साहित्य में गोदानदलितों को  दया, करुणा, सहानुभूति एवं मानवीय सरोकार को फलांगती दलित आक्रोश की प्रथम रचनात्मक प्रस्तुति है। साथ ही दलितों के सशक्तीकरण की भी यह पहली साहित्यिक अभिव्यक्ति है, जबकि दलित  समाज से आने वाले अनेक लेखक तो प्रेमचंद को दलितों का विरोधी बताते हैं । पिछले वर्षों में वे प्रेमचंद की रचनाओं की प्रतियां भी  जला चुके  हैं।

प्रेमचंद को दलित दृष्टि से प्रश्नांकित करते हुए यह ध्यान दिया जाना जरूरी है कि प्रेमचंद अपने समय में दलित मुद्दों के साथ  खड़े थे  या उससे विमुख थे। प्रेमचंद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और मैथिलीशरण गुप्त का समय एक था, लेकिन जिस समय प्रेमचंद वर्णाश्रम  व्यवस्था को जड़ मूल से नष्ट करने का आह्वान कर रहे थे, आचार्य शुक्ल उसकी औचित्य सिद्धि कर रहे थे और मैथिलीशरण गुप्त वर्ण  व्यवस्था के हृास पर संतप्त हो रहे थे। मुझे लगता है कि प्रेमचंद को सम्पूर्णता में पढ़ने के  बाद उनकी दलित पक्षधरता को प्रश्नांकित  किए जाने का न कोई औचित्य है और  न आधार। प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में दलित पात्रों की प्रतिरोधी चेतना डॉ. आम्बेडकर  की सोच की अनुगामी न होकर उनकी सहवर्ती थी। 1927 में डॉ. आम्बेडकर ने महाड़ आन्दोलन के दौरान ‘मनुस्मृति’ जलाई थी उसी वर्ष प्रेमचंद ने ‘मंदिर’ कहानी लिखी थी, जिसकी दलित पात्र सुखिया मंदिर के  पुजारी से बेधड़क कहती है कि ‘मेरे छू लेने से ठाकुरजी  को छूत लग गयी?…मेंरे छूने  से ठाकुर जी अपवित्र हो जायेंगे। मुझे बनाया तो छूत नहीं लगी? लो, अब कभी ठाकुरजी को छूने नहीं  आऊँगी। ताले में बंद रखो। पहरे बैठा दो। तुम सबके सब हत्यारे हो।’ ‘कायाकल्प’ उपन्यास का दलित चौधरी जमींदार को मुंहतोड़ जवाब देता है, ‘जब लात खाते थे तब खाते थे। अब न खायेंगें।’ ‘गोदान’ का सिलिया-मातादीन प्रसंग तो सभी जानते हैं जब दलितों ने  पंडित मातादीन के  मुंह में हड्डी का टुकड़ा डालकर चुनौती दी थी कि ‘तुम हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते, लेकिन हम तुम्हें चमार बना  सकते हैं।’ कितने लोगों को याद है कि ‘कर्मभूमि’ उपन्यास में शूद्र कामगार जातियों की हड़ताल कराकर प्रेमचंद ने 1932 में दलितों की  प्रतिरोधी एकता का जो सन्देश दिया था वह आज भी महज एक चाहत ही है। दरअसल जो प्रेमचंद को ‘सामंत का मुंशी’ कह कर  लांछित करते रहे हैं, वे प्रेमचंद लेखक से मुखातिब न होकर प्रेमचंद के  गैरदलित होने से अधिक उद्विग्न थे  क्योंकि प्रेमचंद की दलित

पक्षधरता उनकी उस सैद्धांतिकी में सुराख करती थी जो ‘दलित ही दलित की पीड़ा व्यक्त कर सकता है’ के विचार पर टिकी थी।  जिन्होंने पिछले वर्षा  प्रेमचंद की ‘रंगभूमि’ को जलाया था उनमें से कई अब अपने इस ‟त्य पर शर्मिंदा भी हैं।

यशपाल को एक युगदृष्टा लेखक मानते हुए आपने लिखा है कि वह तात्कालिकता का अतिक्रमण कर मानव मूल्यों की गतिशीलता की पहचान का हुनर रखते थे, जबकि कुंवर  नारायण को झूठा सचमें कवि दृष्टि का अभाव दिखता है तो डाॅ. रामविलास  शर्मा ने यशपाल की समझ पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया है। ऐसी बातें करते हुए क्या झूठा सचको आलोचना के दायरे से बाहर धकेलने  का काम नहीं किया गया?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ‘झूठा सच’ सरीखे कालजयी उपन्यास को लेकर कुंवर  नारायण सरीखे शीर्ष बौद्धिक ने जहाँ कविता की  कसौटी उपन्यास पर लागू करते हुए उसे अनजाने ही सीमित किया, वहीं डॉ. रामविलास शर्मा प्रगतिशील लेखक संघ की तत्कालीन  खेमेबंदी और मार्क्सवादी कट्टरता के  चलते उसके  ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करने से वंचित रह गए, लेकिन इसके बावजूद ‘झूठा सच’ आज हिन्दी के गौरव ग्रन्थ के रूप में स्थापित ही नहीं है बल्कि उसके विश्लेषण और महत्व की नई दिशाएं खुली हैं । विभाजन की  त्रासदी को यदि ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ की तर्ज  पर किसी एक साहित्यिक कृति के माध्यम से व्यापक फलक पर पढ़ा और समझा जा  सकता है तो वह ‘झूठा सच’ ही है।

कथाकार यशपाल के साथ वीरेन्द्र यादव एक कार्यक्रम में

आप मानते हैं कि राही मासूम रजा ने आधा गांवमें हाशिए के  लोगों का जो वृतान्त रचा है वह इतिहास की क्षतिपूर्ति सरीखा है। शायद आप यह कहना चाहते हैं कि इतिहासकारों ने हाशिए के लोगों को भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से विलगाने का काम किया है। 

दरअसल मुद्दा सिर्फ ‘आधा गाँव’ या किसी अन्य उपन्यास का नहीं है, बात है इतिहास-दृष्टि की। पारम्परिक इतिहास दृष्टि  हाशिए के समाज से इतिहास को देखने का अवकाश प्रदान नहीं करती। राही मासूम रजा ‘आधा गाँव’ उपन्यास में इतिहास के  ‘महावृतांत’ से औपन्यासिक यथार्थ को न गढ़कर तत्कालीन सामाजिक यथार्थ और राजनीतिक घटनाक्रम के द्वारा इतिहास के सच को  तलाशते हैं । इस प्रक्रिया में उन्हें वह अनुपस्थितियाँ भी दिखती हैं जो ऐतिहासिक आख्यानों में अवश्य हैं । उल्लेखनीय यह भी है कि राही  मासूम रजा इसे तब कर सके जब इतिहास के अध्ययन की ‘निम्नवर्गीय दृष्टि’ (सबाल्टर्न) विकसित नहीं हुई थी। राही अपने औपन्यासिक  कथ्य में मुमताज और झिंगुरिया सरीखे पात्रों के  माध्यम से भारतीय मुसलमान और दलित वर्ग की उस नियति को रेखान्कित  करते हैं, जो  मुस्लिम लीग और डॉ. आम्बेडकर की राजनीति से परिभाषित होकर राष्ट्रीय आन्दोलन से विलग किये जाने के लिए अभिशप्त था।  मुमताज शहीद होकर भी सन बयालीस के  शहीदों में अपना नाम न दर्ज करा पाया और झिंगुरिया की परम्परा में तो शहादत जैसी  राष्ट्रीय पदावली का प्रवेश निषिद्ध ही है।

शायद इसी कारण हिन्दी के इतिहास केन्द्रित उपन्यासों  पर बात करते हुए आप निष्कर्ष निकालते हैं कि ये उपन्यास इतिहास  पुरुषों की गौरवगाथा बनकर अथवा घटनाओं एवं तिथियों की तालिका बनकर रह गए, जबकि कमलापति त्रिपाठी लिखित उपन्यास  पाहीघरऔर बेदखलकी इतिहासगाथा नहीं बल्कि दृष्टि महत्वपूर्ण है। 1857 के विद्रोह को केंद्र में रखकर लिखा गया पाहीघरजिस  तरह से आन्दोलन की सत्ता संरचना का विखंडन करता है वह इस आन्दोलन के कई मिथकों का भेदन करता है, जबकि सावरकरअमृतलाल नागर, डॉ. रामविलास शर्मा एवं बिपिन चन्द्र तथ्यों को ओझल करते हुए औपनिवेशिकता बनाम भारतीयता का इतिहास विमर्श  पेश करते हैं। शायद आप इन लेखकों द्वारा 1857 के  विद्रोह को जनक्रांति  एवं स्वतंत्रता का पहला संग्राम बताने को लेकर असहमत हैं?

यह सही है कि ‘1857’ की परिघटना को लेकर मेरा नजरिया इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम न मानने का रहा है जबकि  डॉ.रामविलास शर्मा इसे ‘जनक्रांति’ तक करार देते हैं । 1857 की 150वीं जयन्ती के अवसर पर मैंने  इस पर ‘1857 का मिथक और विरासत’  शीर्षक लेख भी लिखा था। मेरा मानना है कि यदि 1857 का विप्लव सफल हा ेता तो उससे जिस विकलांग राष्ट्रवाद का जन्म होता वह  विनायक दामोदर सावरकर के ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के ‘स्वधर्म’ और ‘स्वराज्य’ के रास्ते हिन्दू राष्ट्रवाद तक पहुँचता। कमलाकांत  त्रिपाठी के उपन्यास ‘पाहीघर’ का सामाजिक वृतांत मेरी इस अवधारणा की पुष्टि भी करता है, लेकिन यहाँ दिलचस्प यह है कि स्वयं  कमलाकांत त्रिपाठी वैचारिक रूप से ‘1857’ को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ही मानते हैं लेकिन उनका उपन्यास अनजाने ही उनकी अपनी  अवधारणा के  विरुद्ध जा खड़ा होता है। यहाँ मुझे बालजाक याद आते हैं, जिनके उपन्यास उनकी अपनी सामंती वैचारिक पक्षधरता के शानदार क्रिटीक के रूप में प्रस्तुत होते हैं। दरअसल कमलाकांत त्रिपाठी ने अनजाने ही अवध की रियाया का विमर्श जिस प्रामाणिकता  के  साथ औपन्यासिक कथ्य में प्रस्तुत किया है वह स्वयंमेव 1857 के जनक्रांति’ के विमर्श को खारिज कर देता है। ‘पाहीघर’ के  इतिहास-चक्र में वाजिद अली शाह की सत्ता से बेदखली, ईस्ट इण्डिया कंपनी और रानी विक्टोरिया द्वारा अवध की सत्ता का अधिग्रहण,  1857 का विप्लव और इसी बीच जयकरन अहीर की खेत से बेदखली, मालगुजार द्वारा उसकी बेटी के दैहिक शोषण व मौत के हालात  का बनना फिर सबसे त्रस्त होकर  जयकरन द्वारा आत्महत्या करना अवध के प्रभुत्ववादी इतिहास विमर्श को निम्नवर्गीय (सबाल्टर्न) सन्दर्भ  प्रदान करता है। इतिहास की प्रभुत्वकारी अवधारणा के प्रतिपक्ष के रूप में प्रस्तुत ‘रियाया’ का यह विमर्श उपन्यास विधा की उस सामथ्र्य  का परिचायक है जो ‘जनक्रांति’ के विमर्श की ओट में भारतीय समाज की सत्ता संरचना की अनदेखी नहीं करती।

श्रीपत राय ने श्रीलाल शुक्ल लिखित उपन्यास राग दरबारीको बहुत बड़ी ऊब का महाग्रन्थकहा था, नेमिचन्द्र जैन  ने उसे  असंतुष्ट, क्षुब्ध व्यक्ति की बेशुमार शिकायतों और खीझ भरे आक्षेपों का अंतहीन सिलसिलाकरार दिया था तो आपका कहना है कि  अवध की वाकपटुता व व्यंग्य विनोद में रची-पगी इस उपन्यास की भाषा हाई काॅमेडीका ऐसा रूप ग्रहण करती है जहां सब कुछ   प्रहसन में बदल जाता है। वहीं भारतीय ग्रामजैसी किताब लिखने वाले समाजशास्त्री डॉ. श्यामाचरण दुबे का कहना था कि विराट  समाजशास्त्रीय कल्पना वाले 20 विद्वान ग्रामीण यथार्थ के बारे में जो नहीं कह सकते, वह राग दरबारीमें श्रीलाल शुक्ल ने कह दिया  है। पिछले पांच  दशक में राग दरबारीने पठनीयता और साहित्यिक स्वीकृति  के  अनेक कीर्तिमान भी रचे हैं । इसके  बावजूद आप राग  दरबारीको स्वीकृत अर्थों  में ग्राम केन्द्रित  उपन्यास नहीं मानते हैं, इस बारे में कुछ  बताएं।

‘राग दरबारी’ उपन्यास को लेकर यह निर्विवाद तथ्य है कि उसने लोकप्रियता और साहित्यिक गुणवत्ता के बीच के  अंतर को  मिटाया है। उसने हिन्दी पाठकों की साहित्यिक अभिरुचि निर्मित करने में भी भूमिका का निर्वहन किया है। इसे जनतंत्र की देशज  पैरोडी के रूप में उचित ही पढ़ा जाता रहा है, लेकिन यह भारतीय गाँव की प्रामाणिक तस्वीर इसलिए नहीं है क्योंकि इसके केंद्र में  खेतिहर समाज न होकर वह परजीवी वर्ग है जो पारम्परिक रूप से सत्ता के साथ हित संतुलन करता रहा है। इस उपन्यास को ग्राम्य  उपन्यास के रूप में ग्रहण करने में सबसे बड़ी बाधा उपन्यासकार की भारतीय गाँव को लेकर वह उपहास और विनोद दृष्टि है जिसके  निशाने पर समूचा ग्रामीण जीवन है। सच यह है कि ‘राग दरबारी’ गाँव की जिन्दगी का उतना बड़ा वृतांत नहीं है जितना उन निहित  स्वार्थों एवं अवांछनीय तत्वों  का जो शहर और गाँव का फर्क मिटाते हुए हर कहीं मौजूद हैं । यह ध्यान देने की बात है कि ‘राग दरबारी’  में होरी, धनिया, मनोहर, बलराज, गोबर सरीखे  संघर्षशील, दुखी और उत्पीडित पात्र लगभग नदारद हैं । इसीलिए ‘राग दरबारी’ ग्राम्य  जीवन की अधूरी तस्वीर है। अपने उत्कृष्ट रूप में यह ‘विलायती तालीम में पाए हुए  जनतंत्र’ और नेहरू युग की ‘माइक्रो आलोचना’ है।

“दरअसल साहित्य को लेकर हिन्दी ही नहीं वैश्विक स्तर पर ‘कला बनाम यथार्थ’ और ‘स्वायत्तता बनाम सोद्देश्यता’ की बहस रही है। साहित्य की अभिजनवादी दृष्टि विषयवस्तु और तकनीक की शुद्धता की आग्रही होकर प्रायः शाश्वत, सार्वकालिक और स्थायी मूल्यों की आड़ में देश और समाज के व्यापक प्रश्नों से विमुख होकर व्यक्तिवादी आस्वादपरक साहित्य की पैरोकारी करती रही है। प्रेमचंद, यशपाल, राही मासूम रजा, भीष्म साहनी और जगदीश चन्द्र सरीखे लेखक इसीलिए कभी अभिजनवादी रुचि के लेखकों द्वारा न पसंद किए गए और न उनकी ‟तियाँ ही इन लेखकों की चर्चा में शामिल हुईं। रेणु का उपन्यास ‘मैला आँचल’ अकेला ऐसा अपवाद है जो कलावादियों या अभिजन लेखकों द्वारा भी पसंद किया गया, लेकिन इसके मूल में ‘मैला आँचल’ की काव्यमयता, लोकजीवन, प्रति चित्रण आदि के तत्व ही प्रधान थे इसका जीवन राग और सामाजिक-राजनीतिक चेतना नहीं। ”

दूधनाथ सिंह ने आखिरी कलाममें साम्प्रदायिक फासीवाद के  लिए जिम्मेदार लोगों को कठघरे में खड़ा किया है वहीं उससे  लड़ने वाली शक्तियों (कथित धर्मनिरपेक्ष) को भी निशाने पर लिया है, लेकिन आजाद हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिक फासीवाद आज सबसे  अधिक भयावह दौर में है। क्या साम्प्रदायिक फासीवाद एक वास्तविकता नहीं बन गया है, क्या इसके असली कारकों की पहचान करने  की जरूरत नहीं है, जिनसे यह मानस पलता है। इन कारकों की पहचान करने की वकालत आपने भी की है। प्रश्न इस बात का है कि  इन कारकों की पहचान करने के लिए किस तरह के दृष्टिकोण की जरूरत है और मौजूदा समय में इन कारकों से कौन लड़ेगा?

बाबरी मस्जिद ध्वंस के पचीस वर्ष बाद दूधनाथ सिंह के उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ को पढ़ते हुए यह शिद्दत से अहसास होता है  कि अब ‘धर्मनिरपेक्षता’ की निरापद चर्चा से ही काम नहीं चलने वाला है बल्कि उन तत्वों की जड़ मूल से पहचान करनी होगी, जो  वर्तमान साम्प्रदायिक फासीवादी खतरे को खाद-पानी देने का काम करते हैं । इसलिए अब आवश्यकता धर्म का क्रिटिक करने की है  क्योंकि उग्र हिंदुत्व इससे ही वैधता प्राप्त करता है। मुझे लगता है कि हिन्दू धर्म की शोषक और वर्ण-जाति की विभेदकारी संरचना में  ही  सन्निहित हैं इसके विनाशक तत्व। यह अकारण नहीं है कि मंदिर के  नाम पर सवर्णवादी राजनीति का मुकाबला मंडल की ताकतें ही  करती रही हैं। यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि उत्तर भारत में जिन लोहियावादी और अम्बेडकरवादी राजनीतिक दलों और शक्तियों पर  साम्प्रदायिक फासीवाद का मुकाबला करने का दायित्व था वे स्वयं वोट बैंक की राजनीति के चलते उसी सवर्णवादी मुहावरे में राजनीति  करने लगी हैं। गुजरात के चुनाव में हिन्दुत्वादी मुद्दों से न टकराना भारतीय राजनीति के लिए एक गलत संकेत है, इसके  दूरगामी  दुष्परिणाम हो  सकते हैं। मुझे लगता है कि अब राजनीतिक दलों के  फ्रेम से बाहर एक ऐसी सांस्कृतिक और तर्कवादी मुहिम को संगठित  करने की जरूरत है जिसके मूल में समता, समानता और संवैधानिक मूल्य समाहित हों । एक ऐसी समग्र मुहिम की जरूरत है जो  साम्प्रदायिकता, जाति आधारित शोषण और कार्पोरेट आर्थिक नीतियों से नागरिक आन्दोलन के  स्तर पर मुठभेड़ की मुद्रा में हो। वाम  वैचारिकी से जुड़े गैर पार्टी संगठन इसमें एक सकारात्मक भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। भीमा कोरेगांव, ऊना और सहारनपुर से उठी  प्रतिरोध की आवाजें इस दिशा के संकेत हैं।

फैज़ अहमद फैज़ और अन्य साहित्यकारों के साथ वीरेन्द्र यादव

हिन्दुस्तान के  परिप्रेक्ष्य में लिखे गए अंग्रेजी उपन्यासों का अध्ययन करते हुए आपने लिखा है कि अंग्रेजी में साहित्यिक कृतियों को उत्पाद ही नहीं बनाया जा रहा बल्कि सट्टा बाजार में पेश किया जा रहा है।…जहाँ पहले आओ पहले पाओ का सिद्धांत लागू होता है।  क्या इस कड़ी में अब चेतन भगत और अमीश त्रिपाठी सरीखे नाम नहीं जुड़ने चाहिए? इसके साथ ही अरुंधति राय ने अपने उपन्यास  दि गॉड ऑफ  स्माल  थिंग्समें जुड़वा भाई-बहन के बीच जिस नाजुक दैहिक सम्बन्धों को कलात्मक सच्चाई के  रूप में पेश किया था।

उसे ही जयदीपराय भट्टाचार्य और राजकमल झा ने अपनी कृतियों में इस्तेमाल किया। इस पर आपने सवाल उठाया है कि क्या यह  अंग्रेजी साहित्य का वह यौन मुहावरा है, जिसकी बोली अच्छे दामों में लग रही है। यहां दो सवाल हैं कि क्या भारत में मुद्दों का अकाल  है जो अंग्रेजी के  इन लेखकों को ऐसे विषय चुनने पड़ रहे हैं  अथवा वह उन मुद्दों की तरफ देखना नहीं चाहते हैं और दूसरा क्या  अंग्रेजी के यौन मुहावरे वाली बीमारी हिन्दी में घर नहीं कर गई है?

मैंने  अंग्रेजी उपन्यासों  पर अपना लेख बीस वर्ष पूर्व लिखा था तब मैंने सलमान रुश्दी, उपमन्यु चटर्जी और पंकज मिश्रा का  उल्लेख जिन सन्दर्भों में किया था अब वह पूरी तरह बदल गया है। ये लेखक कुछ लटकों-झटकों और भारतीय यथार्थ को कुछ खास  नुसखों के  साथ प्रस्तुत कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी स्वीकृति  मनवाने के लिए उत्सुक अवश्य थे, लेकिन इनका लेखन स्तरीय साहित्यिक लेखन के दायरे में ही था। लेकिन इन दो दशकों में चेतन भगत, अमीश त्रिपाठी आदि लेखकों की जो नई नस्ल अंग्रेजी  लेखन के  नाम पर आई है वह पूरी तरह तुरंता और बाजारू है जो ‘यूज एंड थ्रो’ के नियम के  अनुसार लिखने और बिकने का धंधा  करती है। पर, इसी दौर में भारतीय अंग्रेजी लेखकों की एक ऐसी जमात भी आई है जिसने पूरी गंभीरता के साथ लिखते हुए अपनी  जगह बनाई है। झुम्पा लाहिरी, किरण देसाई, सोनारा झा, कोटा नीलिमा, मनु जोसेफ आदि कुछ ऐसे ही उल्लेखनीय नाम हैं । इस दौर में अमिताभ घोष ने अपने औपन्यासिक लेखन द्वारा भारतीय अंग्रेजी लेखन को जो नई गरिमा प्रदान की है वह सचमुच यादगार है। यह  सुखद है कि आज के  बदले हुए संदर्भों में  भारतीय अंग्रेजी लेखक भी किसान आत्महत्या, दलित, आदिवासी व नक्सलवाद सरीखे विषयों  को भी कथात्मक बनाने लगे हैं । एक दौर में राजकमल झा आदि ने अपने लेखन में  ‘इन्सेस्ट’ सरीखे जिन विषयों को एक चलन के रूप में अपनाया था अब वह भी भारतीय अंग्रेजी उपन्यासों में उस तरह से नहीं उपस्थित है। न ही मुझे यह लगता है कि सेक्स और विकृति  का यह कथ्य नकल या फैशन के रूप में इधर के हिन्दी उपन्यासों में उपस्थित है।

अटल तिवारी पत्रकारिता के प्राध्यापक हैं और दिल्ली में रहते हैं 

बातचीत क्रमशः

6 Comments
  1. Vijay Sharma says

    गांव के लोग ब्लॉग पहली बार देखा. ऐसी मानीखेज वार्ता प्रकाशित करने हेतु साधुवाद. अगले खंड का इंतजार है.

  2. Alka Tiwari says

    बहुत ही सार्थक और महत्वपूर्ण चर्चा??

  3. आनंद says

    मेरे लिए उपरोक्त कथन को दोहराना काफ़ी होगा : “गांव के लोग ब्लॉग पहली बार देखा. ऐसी मानीखेज वार्ता प्रकाशित करने हेतु साधुवाद. अगले खंड का इंतजार है.”

  4. स्वतंत्र मिश्र says

    बहुत बढ़िया लगा। साधुवाद

Leave A Reply

Your email address will not be published.