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ग्राउंड रिपोर्ट

इज़राइल में भारतीय मजदूरों की ज़िंदगी दाँव पर लगा रही सरकार

उत्तर प्रदेश सहित देश से मजदूरों को इज़राइल भेजने की आवेदन प्रक्रिया और तैयारी ज़ोरों से की जा रही है। उससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार मजदूरों को जल्द ही इज़राइल भेजेगी। लेकिन, अभी मजदूरों के जीवन और स्थिति को लेकर भी कई सवाल ऐसे हैं, जिनका जबाव देना बाकी हैं।

इज़राइल और हमास के बीच जंग जारी है। इस दौरान इज़राइल ने भारत से एक लाख मजदूरों की मांग की है। इन मजदूरों की मांग इज़राइल ने तब की, जब करीब 90000 फिलिस्तीनियों के वर्क परमिट कैंसिल कर दिया। इज़राइल ने भारत से श्रमिक इसलिए मांगे कि युद्ध में हुयी इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षति को संवार सके।

भारत से इजराइल भेजे जाने वाले मजदूरों का कम से कम एक वर्ष और अधिकतम 5 वर्ष के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया जाएगा। इज़राइल भेजने के लिए ऐसे मजदूरों की पहचान की गई है, जो चिनाई, टाइलिंग और पत्थर बिछाने में पारंगत है।

वहीं, श्रमिकों को इज़राइल पहुँचने के लिए, 3 साल का श्रम विभाग में पंजीकरण आवश्यक है। श्रमिकों की उम्र 21 से 45 वर्ष के बीच होना चाहिए। श्रमिकों को आने-जाने का खर्चा खुद वहन करना होगा। इसके अलावा, श्रमिकों की योग्यता 10वीं पास होनी चाहिए। बेसिक अंग्रेजी बोलनी भी आनी चाहिए। डॉक्यूमेंट की बात करें, तो आधार कार्ड, पासपोर्ट और बैंक अकाउंट होना आवश्यक है।

इन अनिवार्यताओं के आधार पर श्रमिक इज़राइल जाने के लिए, श्रम विभाग में अपना रजिस्ट्रेशन करा सकता है। इसके बाद साक्षात्कार और मेडिकल प्रक्रिया होगी। फिर, इजराइल भेज दिया जाएगा।

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इज़राइल में मजदूरों की आय और सुविधा की ओर रुख करें, तो मजदूरों को 1 लाख 34 हजार रुपये प्रति माह सैलरी मिलेगी। आवास की सुविधा मुफ्त रहेगी। साथ-साथ मजदूरों को 15 हज़ार का बोनस प्रति माह मिलेगा।

भारत के श्रमिकों को इस्रराइल में रहने व रोजगार देने का कार्य एनएसडीसी इंटरनेशनल (नेशनल स्किल डेवेलपमेंट कार्पोरेशन इंटरनेशनल) और पीआईबीए (पापुलेशन, इमिग्रेशन एंड बोर्डर अथारिटी) एजेंसी कर रही हैं। एनएसडीसी इंटरनेशनल कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय भारत सरकार के अधीन कार्यरत है। वहीं पीआईबीए इजराइल सरकार के अधीन कार्य करने वाली एजेंसी है।

देश में कई राज्यों से इज़राइल जाने के लिए मजदूर अब रजिस्ट्रेशन भी करवा रहे हैं। ऐसे में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश में भी मजदूरों के रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुके हैं। भारत से इज़राइल जाने वाले एक लाख मजदूरों में, उत्तर प्रदेश से 10 हज़ार मजदूर शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश में कितने मजदूर इज़राइल जाने के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं, इसके आकड़े को जब हम देखते हैं तब मीडिया रिपोर्ट से ज्ञात होता है कि, प्रदेश के खीरी जिले से 46 मजदूर, आगरा से 50, गाजियाबाद, हापुड़ और बुलंदशहर से 658, मिर्जापुर से 216, बांदा से 400 मजदूरों ने इज़राइल जाने के लिए आवेदन किया है।

उत्तर प्रदेश सहित देश से मजदूरों को इज़राइल भेजने की आवेदन प्रक्रिया और तैयारी ज़ोरों से की जा रही है। उससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार मजदूरों को जल्द ही इज़राइल भेजेगी। लेकिन, अभी मजदूरों के जीवन और स्थिति को लेकर भी कई सवाल ऐसे हैं, जिनका जबाव देना बाकी हैं।

इज़राइल में मजदूर सर्वाइव कैसे करेंगे? क्योंकि इज़राइल का प्राकृतिक वातावरण, खान-पान, रहन-सहन, संस्कृति में काफी अंतर है। वहीं, मजदूरों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर संकट रह सकता है। एक मसला यह भी है कि मजदूरों का काम कैसा रहेगा?

क्योंकि मई में इज़राइल के विदेश मंत्री एली कोहेन की भारत यात्रा के दौरान एक समझौता हुआ था। तब दावा किया गया था कि, इजराइल में 42,000 भारतीय मजदूर भेजे जाएंगे। इन मजदूरों में से 34,000 मजदूर कंस्ट्रक्शन फील्ड में काम करेंगे। मगर, इजराइल का कंस्ट्रक्शन बाजार भारतीयों के लिए नया होगा। ऐसे में, मजदूरों का काम चुनौतीपूर्ण और असुरक्षित हो सकता है।

वहीं, मजदूरों को इज़राइल भेजने के लिए हरियाणा और यूपी सरकार ने विज्ञापन भी निकाले। उत्तराखंड की सरकार भी इस पर विचार कर रही है। यह तीनों भाजपा शासित राज्य हैं। लेकिन, गैर भाजपा शासित राज्यों में ऐसी कोई चर्चा नहीं है।

गौरतलब है कि, नवंबर में देश की दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने इस कदम का विरोध करते हुए एक साझा बयान जारी किया था। इस बयान में तीन बातें थीं। पहली, इजरायल में तेरह लाख फलस्तीनी मजदूर काम करते हैं। उन्हें यह बेरोजगार करने की कोशिश है। दूसरी, इससे भारतीय मजदूरों की जान खतरे में पड़ जाएगी, क्योंकि इजरायल के साथ हमास का युद्ध चल रहा है। तीसरी, यह समझौता फलस्तीन विरोधी है और फलस्तीनी मजदूरों के मानवाधिकार का उल्लंघन है। 

ट्रेड यूनियनों ने भारत और इजरायल के इस समझौते को रद्द करने की मांग की थी। इस मांग के सम्बंध में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि उन्हें ऐसे किसी समझौते या डिमांड की जानकारी नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने 11 नवंबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया था कि मजदूरों को लेकर जिस अनुरोध या आंकड़ों की बात की जा रही है, वे उससे अवगत नहीं हैं। 

अब जबकि यूपी और हरियाणा सरकार ने विज्ञापन निकाल दिए हैं तो उसमें भी झूठ बोला जा रहा है कि मजदूरों को सुरक्षित स्थान पर काम करने के लिए भेजा जाएगा। सच्चाई यह है कि काम वहीं होगा जहां युद्ध से विनाश हुआ है। वे इलाके युद्धग्रस्त हैं। बिलकुल सुरक्षित नहीं हैं। इजरायल ने चूंकि फलस्तीनी मजदूरों को भगा दिया है, तो निर्माण का सारा काम ठप पड़ा है। यानी भारत सरकार पैसे का लालच देकर अपने मजदूरों को मौत के मुंह में झोंकने के प्रचार कर रही है। वो भी ज्यादातर उन जिलों में जहां मुसलमान आबादी ज्यादा है।

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