विमल, कंवल और उर्मिलेश (चौथा भाग) डायरी (14 अगस्त, 2021)

nawal kishor kumar

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सुबह 5 बजकर 37 मिनट हुए हैं और मैंने उर्मिलेश की नयी किताब गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल के आखिरी अध्याय किसे धोखा दे रहे हैं  सदी के महानायक’! को पढ़कर खत्म किया। इन दिनों मेरी पढ़ने की गति में दिलचस्प बदलाव आया है। पहले होता यह था कि कोई भी एक किताब हाथ में लेता तो उसे अधिकतम दो दिनों में पढ़कर खत्म कर देता था।अब मैं करता यह हूं कि किताबों को धीरे-धीरे पढ़ता हूं। एक दिन में केवल अध्याय या फिर बहुत हुआ तो दो अध्याय। शायद एक वजह और भी है। वजह यह कि अब मेरे पास पढ़ने को कई किताबें हैं। चार-पांच किताबें हर महीने आ जाती हैं। कुछ किताबें मुझे भेज दी जाती हैं तो कुछ किताबों को खरीद भी लेता हूं। लेकिन इससे किताबों के महत्व पर कोई असर नहीं पड़ता। हर किताब महत्वपूर्ण है। यहां तक कि वे किताबें भी जिनके रचयिता बड़े-बड़े तीसमारखां हैं। मुझे दक्षिणपंथियों और वामपंथियों की किताबों को पढ़ने में अब कोई परेशानी नहीं होती। हर किताब में लेखक के निहित उद्देश्य को समझने का प्रयास करना अच्छा लगता है। फिर इससे यह भी बात सामने आती है कि देश और दुनिया में अन्य लोग क्या सोच रहे हैं और क्या नहीं सोच रहे हैं।

बीते आठ दिनों से डॉ. कुमार विमल, कंवल भारती और उर्मिलेश को एक खास मकसद से पढ़ रहा था। मकसद यह था कि बहुजन समाज के इन तीन लेखकों के लेखन के केंद्रीय विषय क्या रहे हैं और कौन अपने विषय के बिल्कुल करीब रहे। किसने कितना सच लिखा है और किसने कितना झूठ, इसका आकलन करने की हैसियत मेरी नहीं है और ना ही इतनी समझ। फिर भी मैं इस आधार पर आकलन जरूर कर सकता हूं कि इन तीनों में किसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया और क्यों किया।

मैं अपना यह अनुभव इसलिए भी दर्ज कर रहा हूं क्योंकि मुझे बेहद खास अनुभव हुए हैं और इन्हें दर्ज किया जाना जरूरी है। मसलन, डॉ. कुमार विमल की किताबों के कीवर्ड्स सीमित नहीं होते। फिर चाहे जब वह सौंदर्य शास्त्र से संबंधित लिखते हैं या फिर हाशिए के लोगों के लिहाज से हिंदी साहित्य की समालोचना प्रस्तुत करते हैं।

मैं अपना यह अनुभव इसलिए भी दर्ज कर रहा हूं क्योंकि मुझे बेहद खास अनुभव हुए हैं और इन्हें दर्ज किया जाना जरूरी है। मसलन, डॉ. कुमार विमल की किताबों के कीवर्ड्स सीमित नहीं होते। फिर चाहे जब वह सौंदर्य शास्त्र से संबंधित लिखते हैं या फिर हाशिए के लोगों के लिहाज से हिंदी साहित्य की समालोचना प्रस्तुत करते हैं।

मेरा अनुमान है कि वैश्वीकरण ने लेखन की विधा को गहरे ढंग से प्रभावित किया है। अब हिंदी के लेखक भी चेतन भगत के जैसे होते जा रहे हैं। मतलब यह कि वे पहले कीवर्ड्स तैयार करते हैं। इसके तहत वे एक योजना बनाते हैं। योजना के तहत यह तय करते हैं कि वे जो किताब लिखने जा रहे हैं, वह किसके लिए उपयोगी होगा और जिनके लिए उपयोगी होगा, उनकी संख्या कितनी है। वे यह भी तय करते हैं कि यदि किताब प्रकाशित हुई तो उसे कितने लोग खरीदेंगे। फिर वे यह भी तय करते हैं कि लोग क्यों खरीदेंगे। यानी वे एक रणनीति बनाते हैं ठीक किसी पटकथा लेखक के जैसे।

लिखने के पहले मार्केटिंग स्ट्रेटेजी बनाने की इस विधा के बारे में करीब तीन साल पहले मेरे एक मित्र ने बताया था। वह मुंबई में रहकर फिल्मों के लिए कहानियां और संवाद लिखते हैं। उनकी लिखी कहानी पर फिल्म तो एक ही बनी है लेकिन वे बताते रहते हैं कि दो और फिल्मों की शूटिंग चल रही है। हां, कई फिल्मों में उन्होंने संवाद लेखन जरूर किया है। उनके मुताबिक कई बार तो होता यह है कि कहानी कैसी होनी चाहिए, इसकी जानकारी उसे पहले ही दे दी जाती है।

कहानी को केवल लिख देने मात्र से कहानीकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। कहानी को बेचने की कला भी आनी चाहिए। मतलब यह कि आप कैसे उसको प्रजेंट करते हैं। फिर कहानी को एक प्रजेंटेबुल बनाने के लिए उसे गुलदस्ते के जैसा सजाया जाता है। फिर उसे उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, जिसके पास कहानी को समझने की सलाहियत भी होती है और पैसे खर्च करने की कुव्वत भी। मेरे मित्र के मुताबिक, अब कहानी लिखने के लिए आइडिया पहले से तय कर लिया जाता है।

 

मैं भी कहां से कहां पहुंच गया। मैं बात कर रहा था डॉ. कुमार विमल, कंवल भारती और उर्मिलेश की। इनमें पहले दो लेखकों से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूं। डॉ. विमल से तो पहले से ही था। वे खुद को क्रांतिकारी बुद्धिजीवी नहीं मानते थे। किताबों के प्रेमी आदमी थे। खूब पढ़ते और खूब लिखते थे। यहां तक कि इसी वजह से वे अपना ध्यान तक नहीं रखते थे। एक बार वे बीमार पड़े। तब घर में सुमित्रा आंटी अकेली थीं। शायद डॉ. कुमार विमल सर ने ही उन्हें ऐसा करने को कहा हो, सुमित्रा आंटी ने फोन किया और घर आने का निर्देश दिया। यह महज संयोग था कि उस वक्त मैं अपने ससुराल गया हुआ था जो कि कंकड़बाग के पोस्टल पार्क इलाके में है। डॉ. विमल के घर से करीब दो-ढाई किलोमीटर की दूरी है। मेरे ससुर राजभवन सिंह को भी डॉ. विमल अच्छे से जानते थे। राजभवन सिंह अच्छे साहित्यकार हैं। वे कविताएं लिखते हैं। सरकारी नौकरी में थे। शायद इसलिए भी राजनीतिक मुद्दों पर नहीं लिखते होंगे। हिंदू धर्म के मिथकों पर उन्होंने अनेक महाकाव्य लिखा। इनमें द्रौपदी, दमयंती, कृष्ण आदि पर महाकाव्य शामिल हैं। उनकी कविताई में छायावाद का प्रभाव दिखता है। मेरे ससुर जी ने केवल दो राजनीतिक व्यक्तित्वों पर महाकाव्य लिखा है। एक का शीर्षक है – “लोहिया चरित मानस” और दूसरे का शीर्षक है – “नेताजी सुभाषचंद्र बोस”।

खैर, उस दिन जैसे ही सुमित्रा आंटी का फोन आया, मैं दस मिनट में ही उनके घर पहुंच गया। अंदर गया तो देखा कि डॉ. विमल चौकी पर लेटे हैं और ऑक्सीजन का मास्क नाक पर लगा है। उन्हें सांस लेने में परेशानी होती रहती थी। इसलिए ऑक्सीजन सिलिंडर का इंतजाम पहले से रखते थे। आंटी ने कहा कि कुछ देर इनके पास बैठो, मैं डाक्टर से मिलकर आती हूं। इन्हें अकेले नहीं छोड़ना चाहती।

अब हम दो जन थे। एक डॉ. विमल और दूसरा मैं। करीब पांच मिनट हुए होंगे आंटी को बाहर गए हुए। डॉ. विमल ने ऑक्सीजन मास्क हटा दिया और कहने लगे कि इतनी जल्दी कैसे आ गए। अभी तो मैंने सुमित्रा से कहा था कि वह आपको फोन कर दे।

मैंने बताया कि मैं ससुराल आया हुआ था। वहां से आपका घर बहुत नजदीक है। फिर उन्होंने पूछा कि ससुराल कहां है आपका ससुराल। मैंने उन्हें पोस्टल पार्क, बुद्ध नगर, रोड नंबर -2 के बारे में बताया। फिर उन्होंने मुझसे मेरे ससुर जी का नाम पूछा। मैंने बता दिया।

तो आप राजभवन बाबू के दामाद हैं। मैं उनसे परिचित हूं। संभवत: दो या तीन बार हमारी मुलाकात हुई है। उनका “द्रौपदी” महाकाव्य मैंने देखा है। तो एक काम करें। आप अभी जाएं और मेरी बेटी को साथ ले आएं। मैं भौंचक्क रह गया। वह मेरी पत्नी की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राजभवन बाबू की बेटी मेरी भी तो बेटी है। और आज तो वह इतने नजदीक है। उससे मिलवाइए।

खैर, करीब आधे घंटे में सुमित्रा आंटी वापस आ गयीं और मैंने डॉ. कुमार विमल सर के आदेश का अनुपालन भी किया। हमदोनों मियां-बीवी उनके घर में थे। रीतू तो सुमित्रा आंटी के साथ अंदर थी। अध्ययन कक्ष में मैं सर के पास था। उनसे मैंने यह जानना चाहा कि आखिर क्या वजह है कि आप इतना पढ़ते और लिखते हैं कि खुद का ध्यान भी नहीं रखते। मेरे सवाल पर हंसते हुए उन्होंने कहा कि मैं शब्दों के संग जीता हूं। ये मुझे फूल, नदी, पहाड़, रेगिस्तान जैसे लगते हैं। इन्हें छोड़कर मैं कहां और क्या देखूं।

उस दिन उन्होंने कहा कि हर किताब का विषय स्पष्ट होना चाहिए और लेखन में ईमानदारी बहुत जरूरी है। किताब का शीर्षक और उसके कंटेंट में संबंध का होना बहुत जरूरी है। कई बार लोग अपनी किताब को हिट कराने के लिए भड़काऊ या फिर खूब गूढ अर्थ वाला शीर्षक रख देते हैं लेकिन कंटेंट के साथ ईमानदारी नहीं करते। ऐसे लेखकों को भी पढ़ना चाहिए लेकिन अनुसरण नहीं करना चाहिए। ऐसे लेखक एक समय तक तो याद किए जाते हैं, लेकिन समय के बाद कोई उन्हें याद भी नहीं करता।

मैं डॉ. विमल सर के इसी कथन को कसौटी मानकर पढ़ता हूं और फिलहाल मैं यह कह सकता हूं कि जितने ईमानदार डॉ. विमल और कंवल भारती रहे हैं, उर्मिलेश नहीं रहे हैं। अबतक मैंने उर्मिलेश जी की तीन किताबों को पढ़ा है। इनमें गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल  तो एकदम नई है। इसके पहले उनकी किताब क्रिस्टेनिया मेरी जान (2016) और एक “झेलम किनारे दहकते चिनार” (2004) को पढ़ा है। इन तीनों किताबों में से अंतिम किताब यानी “झेलम किनारे दहकते चिनार” का शीर्षक और उसका कंटेंट एक-दूसरे से संबंधित रहे हैं। पूरी किताब में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन हालातों की विस्तृत चर्चा है। यह किताब हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो जम्मू-कश्मीर के बारे में जानना और समझना चाहता है। लेकिन शेष दो किताबों में उर्मिलेश ने इसका ध्यान नहीं रखा है।

मसलन, गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल शीर्षक से पाठक भ्रमित हो सकते हैं। विश्व स्तरीय वामपंथी विद्वान रहे कॉडवेल को लेकर मन में कई सवाल उठते हैं। लेकिन पढ़ने पर निराशा हाथ लगती है। ले-देकर पी एन सिंह क चरित्र चित्रण है इस अध्याय में। कॉडवेल के बारे में भी उर्मिलेश ने जानकारी दी है, लेकिन वह बेहद संक्षिप्त है और एक तरह से औपचारिकता का निर्वाह भी।

क्रमश: जारी

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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