सत्ता चौरी चौरा शताब्दी वर्ष मनाकर, बहुजनों के नायकत्व में लड़े गए सामंत विरोधी चौरी-चौरा विद्रोह का अपहरण करना चाहती है(कथाकार, इतिहासकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा से अपर्णा की बातचीत )

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राजे-रजवाड़े तो सदा से निम्नजातियों को असभ्य, डाकू, अपराधी या लुटेरे ही मानते थे

(चौथा और अंतिम हिस्सा )

 

आपकी कहानियों में अनेक मुस्लिम पात्र हैं। संभवत: हिंदी में यह एक विरल परिघटना है। प्राय: मुस्लिम चरित्र कहानियों से बाहर कर दिए गए हैं जबकि आपने उन्हें बहुत संवेदनशीलता से चित्रित किया है। कैसे आप इनको अपने इतने करीब पाते हैं?

मैंने ऐसे समाज से जिन्दगी की यात्रा शुरू की जहां होली, दीवाली, ईद, मुहर्रम, हिन्दू-मुस्लिम एक साथ मनाते हैं। ताजिया बनाने का खर्च दोनों वहन करते हैं। कीर्तन गायकी में मुसलमान भी शामिल होते हैं और होलिका दहन की लकड़ी जुटाने में सबसे आगे मुसलमान लड़के होते हैं। दोनों एक दूसरे की संस्कृतियों में घुसे पड़े हैं। यही कारण है कि मेरी अधिकांश कहानियों के पात्र हिन्दू और मुस्लिम दोनों है। कहने का आशय सिर्फ यह है कि समाज में हो रहे तमाम उथल-पुथल की प्रतिछाया पड़ने के बावजूद अब भी गांवों में दोनों संप्रदाय के लोग, एक-दूसरे से घुले-मिले है। इन तमाम तथ्यों को मैंने अमीन मियां सनक गये हैं, हाकिम सराय का आखिरी आदमी, संशय और कुमार्गी कहानियों में व्यक्त किया है। मैं जिस समाज में पला-बढ़ा हूं, वहां हिन्दू-मुस्लिम एक साथ रहते आए हैं। उनसे अलग होकर मेरा जीवन बंजर हो जायेगा।

एक समीक्षक ने एक बार मेरे पात्रों को देखकर लिखा था कि कहीं कहानीकार ने सायास तरीके से अपनी हर कहानी में मुस्लिम पात्र तो नहीं डाला है? एक आलोचक ने लिखा कि ‘मुस्लिम औरतें मांग में सिंदूर?’ कहीं यह अतिरेक तो नहीं? अब मैं उन्हें कैसे समझाता कि अभी भी निकाह के बाद सिंदूर लगाने का रिवाज हमारे पूर्वांचल के मुस्लिम समाज में मौजूद है। हां, समाज के विभाजनकारी तत्वों के प्रतिरोध के कारण कुछ पढ़े-लिखे या शहरों की यात्रा कर आये मुस्लिम परिवारों में यह रिवाज़ अब कम हुआ है मगर समाप्त नहीं हुआ है। मेरी हाल की कुछ कहानियों- अमीन मियां सनक गये हैं गांव के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों की शिनाख़्त करने का प्रयास है।

लोक कलाएं, बहुजनों की देन हैं। ये उनकी कलाएं हैं। ये वाचिक परंपरा में अनपढ़ों की कलाएं हैं। सारे के सारे लोकगीत अनपढ़ स्त्रियों और बहुजनों ने गाया है। सारे के सारे जातीय नृत्य बहुजनों के हैं। लोक संस्कृतियां बहुजनों की सांस्कृतिक विरासत हैं तो उनके गीत, उनके इतिहास और समाजशास्त्र हैं। आज कुलीनतावादी समाज लोक कलाओं के संरक्षण के नाम पर उनको आगे बढ़ा रहा है, जिनका अतीत लोक कलाओं से केवल मनोरंजन करना रहा है। उन्होंने खुद लोक कलाओं में अपने को नहीं उतारा है।

आपके पहला काव्य संग्रह का नाम आशा है और आपकी जीवनसंगिनी का नाम भी आशा है। क्या यह संग्रह उनके लिए ही था? उसके बाद दूसरा काव्य संग्रह आया क़ैद में है ज़िंदगी क्या सच में ज़िंदगी क़ैद में हो गई थी?

यह तो आपने रूपक स्थापित कर दिया। हां, यह कह सकती हैं कि विश्वविद्यालयी जीवन की कविताएं मूलत: रूमानियत से सराबोर होती हैं। शादी के बाद पत्नी के नाम से ही पहला संग्रह छपवाया। यद्यपि ज़िंदगी का कैद में होना नितांत विनोदपूर्ण बात से सिवाय कुछ नहीं। आशा ने कभी भी ज़िंदगी को कैद नहीं किया अपितु उसे और गतिशील बनाया।

आजादी से पहले जो भी आन्दोलन हुए उसमें बहुजन समुदाय का भरपूर योगदान था लेकिन उनके योगदान का कहीं भी सही दस्तावेज़ीकरण नहीं हुआ, ब्रिटिश सरकार ने बहुजन समाज के आंदोलनकारियों के नाम अपराधी के रूप में दर्ज किये। उन दिनों बहुजन समाज के लोग शिक्षा से वंचित रहे थे लेकिन आजादी के बाद शिक्षा को लेकर चेतना आई। लोग शिक्षित हुए। अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं लेकिन उन लोगों ने कभी साहित्य या इतिहास की किताबों को पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई। इस वजह से गलत जानकारी के विरुद्ध किसी ने कभी कोई आपत्ति दर्ज नहीं की लेकिन आपने गजेटियर, देश-विदेश के संग्रहालयों के दस्तावेज़ों के माध्यम से तथ्यों को एकत्रित कर बहुजन समाज के ऐसे लोगों को नायक के श्रेणी में शामिल करने का साहस क्यों और कैसे किया?

बहुजन समाज पर यह दोष नहीं मढ़ा जा सकता। अंग्रेजों की सत्ता सामंतों और राजे-रजवाड़ों के सहारे चल रही थी। राजे-रजवाड़े तो सदा से निम्नजातियों को असभ्य, डाकू, अपराधी या लुटेरे ही मानते थे। वही भाषा अंगे्रजों ने अपनाई। बहुजन समाज की शिक्षा, अंग्रेजों द्वारा खोले गए स्कूलों से शुरू हुई। उससे पूर्व तो उन्हें शिक्षा मिली ही नहीं। उसकी शिक्षा काल एक शताब्दी से ज्यादा नहीं है। अभी बहुजन समाज शैक्षिक रूप से खड़ा ही होने की प्रक्रिया में था कि शिक्षा का व्यावसायीकरण कर, उसे लंगड़ा बनाने का कुचक्र रच दिया गया। बहुजन आंदोलनों की विशेषता यह थी उनमें जो आक्रोश था, वह सामंती प्रभुओं के प्रति था और वही वर्ग पढ़ा-लिखा था। वही बहुजन का शोषक था। तो क्या बहेलिये, हिरणों का इतिहास लिखेंगे? नहीं न! अकादमियों में उसी वर्ग का प्रभुत्व है। ऐसे में बहुजन समाज से आए लोगों को ही यह दायित्व निभाना होगा।

इसलिए मुझे लगा कि बहुजन विद्रोहों पर काम किया जाना चाहिए। बहुजनों के सैकड़ों नायकों को सामने नहीं आने दिया गया है। उसका कारण यह है कि उन्होंने स्थानीय सामंतों के साथ-साथ ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध  बगावत की थी। मुख्यधारा के इतिहासकार, जो ज्यादातर सामंती परिवेश से आए हैं, यह कतई नहीं चाहते हैं कि बहुजन नायकों के संघर्षों को सामने लाया जाए। उन्हें इस बात का डर है कि इससे शोषकों के विरुद्ध जनांदोलनों को बल मिलेगा।

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यह वर्ष चौरी-चौरा घटना का शताब्दी वर्ष है। इस वर्ष शासन बहुत ही बड़े पैमाने पर इसे मनाते हुए उसमें शहीद (सरकार जिन्हें अब तक अपराधी मानती रही है) लोगों को याद किया। अचानक क्यों इस घटना पर इनका ध्यान गया? क्या आपको लगता है यह सरकार का प्रायश्चित है या कोई राजनीतिक ड्रामा।

कोई प्रायश्चित नहीं करने जा रही वर्तमान सत्ता।  यह सत्ता, शताब्दी वर्ष मनाकर, बहुजनों के नायकत्व में लड़े गए सामंत विरोधी चौरी-चौरा विद्रोह का अपहरण करना चाहती है। वह निम्नजाति के नायकों को ओझल कर, चौरी-चौरा स्मारक पर उन सामंतों की मूर्तियां स्थापित कर चुकी है जिनका उस विद्रोह से कोई लेना-देना नहीं था। अगर वाकई में शहीदों के प्रति थोड़ी बहुत सहानुभूति थी तो विद्रोह के केन्द्र, डुमरी खुर्द गांव को आदर्श गांव के रूप में विकसित कर दिया गया होता। मगर ऐसा नहीं किया गया। करोड़ों रुपए विज्ञापनों पर खर्च हुए मगर डुमरी खुर्द गांव में झाड़ू तक नहीं लगा। मैं पांच फरवरी को डुमरी खुर्द गांव में था। शहीदों के परिवार ठगे महसूस कर रहे थे।

लोकरंग की तयारी करते सम्भावना कला मंच के कलाकार

अब आते हैं आपकी सांस्कृतिक रुचि की तरफ जिसमें आप वर्ष 2008 से लगातार ‘लोकरंग’ का आयोजन करते आ रहे हैं। एक तरफ आपकी नौकरी, दूसरी तरफ आपका लेखन और तीसरा क्षेत्र लोककला को मंच मुहैय्या कराना, यह आपने क्यों और कैसे सोचा?

लोक कलाएं, बहुजनों की देन हैं। ये उनकी कलाएं हैं। ये वाचिक परंपरा में अनपढ़ों की कलाएं हैं। सारे के सारे लोकगीत अनपढ़ स्त्रियों और बहुजनों ने गाया है। सारे के सारे जातीय नृत्य बहुजनों के हैं। लोक संस्कृतियां बहुजनों की सांस्कृतिक विरासत हैं तो उनके गीत, उनके इतिहास और समाजशास्त्र हैं। आज कुलीनतावादी समाज लोक कलाओं के संरक्षण के नाम पर उनको आगे बढ़ा रहा है, जिनका अतीत लोक कलाओं से केवल मनोरंजन करना रहा है। उन्होंने खुद लोक कलाओं में अपने को नहीं उतारा है। निम्नजातीय लोक कलाकारों को संरक्षण देना या उन कलाओं के सामाजिक पक्ष को बढ़ाने के बजाय, केवल मनोरंजन पूर्ण लोक कलाओं को आगे करना, कुलीनतावादी समाज की सोच है। वर्ष 2008 में हमने लोक कलाओं के सामाजिक पक्ष को सामने लाने के उद्देश्य से ‘लोकरंग’ की शुरुआत की है। यह आयोजन जन कलाओं को जनता द्वारा, जनता के लिए प्रस्तुत करने का एक प्रयास है, जो फूहड़पन के विरुद्ध, जनसंस्कृति के संवर्द्धन के लिए शुरू किया गया है।

मुझे लगा कि बहुजन विद्रोहों पर काम किया जाना चाहिए। बहुजनों के सैकड़ों नायकों को सामने नहीं आने दिया गया है। उसका कारण यह है कि उन्होंने स्थानीय सामंतों के साथ-साथ ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध बगावत की थी। मुख्यधारा के इतिहासकार, जो ज्यादातर सामंती परिवेश से आए हैं, यह कतई नहीं चाहते हैं कि बहुजन नायकों के संघर्षों को सामने लाया जाए। उन्हें इस बात का डर है कि इससे शोषकों के विरुद्ध जनांदोलनों को बल मिलेगा।

यह कैसे आपके मन में आया कि ऐसा आयोजन गाँव में ही करना चाहिए, जहाँ सैकड़ों लोगों की व्यवस्था करना कठिन होता है जबकि शहरों में आप आसानी से व्यवस्था कर सकते हैं?

गांव की कलाओं को गाँव में मंच नहीं मिलेगा तो महानगरों में तो केवल सुविधाभोगी समाज उससे मनोरंजन करेगा। गांव में जब आप लोक कलाकारों को सम्मान देते हैं तो गंवई समाज अपनी संस्कृति और कला से सीखता है। उसे सम्मान की दृष्टि से देखता है। जीवन दृष्टि पाता है। अपनी थाती को वह बेकार नहीं समझता। शहरी लोग लोक कलाकारों को देखने गांवों में क्यों नहीं जाते? वे गांव में, कलाकारों के पास जाएं। यह क्या कि कलाकार उनके दरवाजे पर आकर उनका मनोरंजन करे। यही तो अभिजात्यवर्गीय सोच है जिसका निषेध हमें करना है।

‘लोकरंग’ आयोजन में आम कलाकार होते हैं और कलाओं के संवर्द्धन हेतु कुछ मंजे कलाकारों को भी हम स्थान देते हैं। ‘लोकरंग’ की शोहरत का ऐसा प्रभाव पड़ा है कि विदेशी कलाकार अपने व्यय पर पधारते हैं। हम उन्हें केवल ठहराते और खिलाते हैं। हर साल इस आयोजन का प्रारम्भ गांव की महिलाएं करती हैं। वे पारम्परिक गीत गाती हैं। लोकगीतों की वास्तविक रचयिता वे ही हैं।

‘लोकरंग’ की तैयारी की क्या प्रक्रिया होती है?

‘लोकरंग’ का आयोजन गैरव्यावसायिक ढंग से, गाँववालों द्वारा किया जाता है। लोकरंग सांस्कृतिक समिति इसका संचालन करती है और गांव के दलित, हिन्दू-मुस्लिम, सभी मिलकर एक साथ इस आयोजन में जुटते हैं। गांव के सदस्य आपसी सहमति से इस आयोजन की रूपरेखा तय करते हैं। कलाकारों को बुलाने, ठहराने और खिलाने-पिलाने की व्यवस्था गांव वाले ही करते हैं। सभी सदस्य को कार्यक्रम के बारे में राय देने का पूरा अधिकार होता है। सारे निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं। महीनों पूर्व सदस्यों इसकी तैयारी में जुटते हैं। आवश्यक धन की व्यवस्था करते हैं। गांवों में जाते हैं। लोगों से मदद लेते हैं और उन्हें आमंत्रित करते हैं।

अक्सर लोग अपने आयोजनों में नामी कलाकारों को बुलाते हैं जबकि मैंने ‘लोकरंग’ में ऐसे कलाकरों को बुलाया जाता है, जिनकी कला विधा लुप्त होने की कगार पर है। जैसे बहरुपिए, धोबी नाच, बाउल गीत आदि।

‘लोकरंग’ आयोजन में आम कलाकार होते हैं और कलाओं के संवर्द्धन हेतु कुछ मंजे कलाकारों को भी हम स्थान देते हैं। ‘लोकरंग’ की शोहरत का ऐसा प्रभाव पड़ा है कि विदेशी कलाकार अपने व्यय पर पधारते हैं। हम उन्हें केवल ठहराते और खिलाते हैं। हर साल इस आयोजन का प्रारम्भ गांव की महिलाएं करती हैं। वे पारम्परिक गीत गाती हैं। लोकगीतों की वास्तविक रचयिता वे ही हैं। आसपास के गांवों में प्रचलित फरुवाही नृत्य, हुड़का, पखावज और पंवरिया नृत्यों को पहली बार भव्य मंच पर उतारने का श्रेय लोकरंग को जाता है। हमारे अधिकांश कलाकार पहली बार मंच पर अपनी प्रस्तुतियां दिए हैं। इससे उन्हें लगता कि उनकी कला केवल भाीख मांगने का साधन नहीं है, अपितु, सम्मान से देखी जाने वाली कला है। कलाकारों को उनकी कला विशिष्ट बनाती है।

युवा दिनों में आपने जिन सपनों को देखा था क्या वे सब पूरे हुए? और आगे आने वाले दिनों की क्या योजनाएं हैं?

सपने कभी पूरे नहीं होते। आंशिक पूरे हो जाएँ, वही बहुत है। ऐसा कुछ हद तक हुआ है। मैंने अपने गांव के बहुत से युवाओं को बुरी आदतों, बुरी संगतों से बचाया है। आर्केस्ट्रा संस्कृति का निषेध करवाया है। पठन-पाठन और सामाजिक चिंतन की ओर उन्हें मोड़ा है। भाईचारे की संस्कृति में जीने और हिन्दू-मुस्लिम एकाकार जीवन का आनंद समझाया है। इतना तो संतोष है ही।

आपके परिवार की नई जनरेशन के बच्चों का आपके काम लेखन या ‘लोकरंग’ से कोई सरोकार और लगाव दिखाई देता है?

बहुत तो नहीं। ज्यादातर लड़के बाहर जा चुके हैं। उनकी अपनी ज़िंदगी, अपने तौर-तरीकों से चल रही है। हां जब तक वे मेरे पास रहे, ‘लोकरंग’ में शामिल होते रहे। काम करते रहे लेकिन उनके सामाजिक सरोकार निश्चय ही गांवपरस्त नहीं दिख रहे।

अपने जीवन की इस यात्रा के लिए कभी आत्मकथा लिखने की सोचते हैं?

समय मिलेगा तो जरूर लिखूंगा। वैसे मेरी तमाम कहानियों में मेरे सरोकार, लोकरंग की परिकल्पना, सामाजिक संघर्ष और बहुजनों का उत्पीड़न ही व्यक्त हुआ है। समय मिलेगा तो आत्मकथा भी लिखूंगा।

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी सम्पादक हैं ।

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