हेलंग की घटना के वास्तविक पेंच को भी समझिए

विद्या भूषण रावत

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ऐसा लगता है कि उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले चमोली के हेलंग गाँव की मंदोदरी देवी ने अपने घास के मैदानों और चरागाहों की रक्षा के लिए चिपको प्रतिरोध में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मंदोदरी देवी जब अपनी गाय के लिए चरागाह से चारा ला रही थीं तब उनके साथ सीआईएसएफ के जवानों ने बदसलूकी की। हालाँकि मंदोदरी देवी ने किसी भी तरह का कोई अपराध नहीं किया था क्योंकि चारागाह गाँव समाज की संपत्ति होता है। लेकिन पुलिस ने उसके घास का गट्ठर छीन लिया और जबरन उसे पुलिस की गाड़ी मे डाल दिया।  महिला पुलिसकर्मियों ने उन्हें  पकड़ लिया और उनकी देवरानी तथा बहू के साथ पुलिस वाहन में बिठा लिया। उनके चार वर्षीय पोते को भी उनके साथ हिरासत में लिया गया और उन सभी को गांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर जोशीमठ ले जाया गया, जहां उन्हें बिना खाए-पिए छह घंटे तक बैठाया गया। बाद में उनके ऊपर अतिक्रमण के लिए जुर्माना लगाने के बाद छोड़ दिया गया।

हालांकि शुरुआती दौर में मंदोदरी देवी यह लड़ाई इस संदर्भ में जीत गई हैं कि पुलिस की बदसलूकी के सवाल पर पूरे प्रदेश में लोग आक्रोशित हो गए और मुख्यमंत्री ने घटना की जांच के आदेश भी दे दिए। सरकारी अधिकारी उनके घर आने लगे और उनकी तारीफ भी करने लगे। लेकिन यह सवाल अकेले मंदोदरी देवी तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल प्राकृतिक संसाधनों, खासकर  ‘जंगल और उसकी उपज पर अधिकार’ का बन गया। एक मामले में पुलिस की बदसलूकी की जाँच के आदेश के पहले न जाने कब से वहां के निवासियों को सार्वजनिक संपत्तियों के उपयोग से वंचित किया जाता रहा होगा। मंदोदरी देवी को स्वीकार करने का संघर्ष जारी है, लेकिन इस घटना ने राज्य में प्राकृतिक संसाधनों के बेहिसाब लूट के खिलाफ लोगों की भावना को निश्चित रूप से प्रज्ज्वलित कर दिया है। यह बहुचर्चित चिपको आंदोलन की उस वास्तविकता को भी दर्शाता है जिसे हम पर्यावरण आंदोलन के रूप में प्रचारित करते रहे हैं लेकिन पूरे संदर्भ में स्थानीय समुदायों, मुख्यतः जनजातियों के वन संपदा पर अधिकारों के सवालों को गायब कर देते हैं। ऐसा लगता है कि लोग बिना किसी उद्देश्य के पेड़ों से चिपक गए थे क्योंकि उन्हे पेड़ बचाने थे लेकिन यह सवाल विस्मृत हो जाता है कि क्यों ? जबकि यह भी हकीकत है कि  चिपको की ‘सफलता’ का परिणाम यह हुआ कि लोगों ने जंगल पर अपने  ‘पारंपरिक’ और ‘प्राकृतिक’ अधिकार खो दिये। पेड़ों को काटने के लिए बाहरी लोगों को दिए जाने वाले ठेके का लोगों ने विरोध किया, लेकिन आंदोलन की सफलता के बाद वह ‘अनुबंध’ अब ‘वन निगम’ के पास चला गया। लेकिन सच यह है कि इसके खिलाफ लड़ने वालों को, जिन्होंने जंगल की रक्षा की थी,  इस तक पहुँचने पर ही रोक लगा दी गई थी।

प्रतिरोध में पत्र

मंदोदरी देवी का संघर्ष

मंदोदरी देवी की कहानी उस विश्वास का प्रतिबिंब है जहां लोग जंगल या हमारे घास के मैदानों, चरागाहों  का संरक्षण करते हैं क्योंकि यह उनका और उनके मवेशियों का पोषण करता है। यह प्रकृति और मनुष्य का पारस्परिक संबंध है जो दरअसल एक दूसरे का पूरक है, लेकिन यह सब तब तक सही था जब तक वन संपदा का व्यवसायीकरण नहीं हुआ था। अब इन प्राकृतिक संसाधनों को  उन लोगों से खतरा है जिन्हें हिमालयी राज्य में ‘विकास’ लाने के लिए ‘सुविधा’ दी जा रही है। उत्तराखंड नदियों का राज्य है और इन खूबसूरत हिमालयी नदियों को देखना एक आनंद है,  जो अंततः गंगा के निर्माण में योगदान करती हैं, लेकिन हम देख रहे हैं कि कैसे ‘विकास’ के नाम पर पहाड़ों को काट कर उसका गर्द-गुबार नदियों में डाला जा रहा है। मंदोदरी देवी और अन्य महिलाएं इसी का विरोध कर रही थीं। वे पेड़ों को काटने के विरुद्ध बोल रही थीं। अपने गौचर और चारागाह बचाने के लिए कह रही थीं।

पिछली 15 जुलाई  को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें दिखाया गया था कि एक बूढ़ी औरत अपनी पीठ पर पशुओं के लिए  हरा चारा लेकर जा रही थी। उसे सीआईएसएफ के जवानों द्वारा रोका जा रहा है। वे महिला को रुकने और घास का चारा उन्हें सौंपने के लिए कह रहे थे। लेकिन निर्दोष पहाड़ी महिला अपनी मेहनत की कमाई  इन अधिकारियों को देने के लिए तैयार नहीं थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उसकी गलती क्या है? वह किसी की चोरी कर चारा नहीं ला रही थी और उस चरागाह से ला रही थी जो उन्होंने बहुत मेहनत से बचा के रखा था। लेकिन प्रसाशन की ताकत के आगे एक अकेला व्यक्ति क्या कर सकता है। जब महिला ने अपना गट्ठर देने से इनकार कर दिया तो सीआईएसएफ की दो महिला कांस्टेबलों  ने उन्हें पकड़ लिया और उसके 4 साल के पोते को पुलिस की जीप में बैठा दिया।

सीआईएसएफ के लोगों द्वारा जबरन घास छीन ली गई (चित्र गूगल से साभार)

थोड़ी देर बात मंदोदरी देवी की पुत्री और देवरानी को भी पुलिस ने जबरन अपनी जीप मे डाल दिया औरउन्हें जोशीमठ पुलिस स्टेशन ले जाया गया जो हेलंग गांव से करीब 8 किलोमीटर दूर था। उन्हें छह घंटे तक रखा गया और 250 रुपये का चालान करने के बाद छोड़ दिया गया। बताया गया कि पुलिस ने उन पर वे धारायें लगाईं जो शराब पीकर दंगा-फसाद करने वालों के लिए होती हैं। बेशक यह बहुत शर्मनाक बात है।

बात वहीं खत्म हो जाती लेकिन मंदोदरी देवी के साथ-साथ स्थानीय कार्यकर्ता अतुल सती की लड़ाई ने मीडिया में इस मुद्दे को उठाकर कहानी का दूसरा पहलू पेश कर दिया। प्रशासन हमेशा की तरह एक पहले से तैयार की गई कहानी के साथ सामने आया और बताया कि यह घसियारी महिला और उसका परिवार घर के पास की एक ‘सरकारी भूमि’ पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे, जहां टीएचडीसी (टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन), जो एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है और अब उत्तराखंड में कई अन्य ‘हाइड्रो’ परियोजनाओं को विकसित करने में शामिल है, गाँव के छात्रों के लिए एक खेल का मैदान तैयार कर रहा है। दरअसल स्थानीय लोग तो जानते हैं कि खेल का मैदान तो एक बहाना था। असल सवाल था इस जगह को डम्पिंग ज़ोन में तब्दील करना ताकि निर्माण कार्य मे निकल रहे मलबे को वहां फेंका जा सके।

विकास के नाम पर

जिला प्रशासन ने हेलंग गाँव में ‘विकासात्मक’ कार्य को बाधित करने के प्रयास के लिए मंदोदरी देवी और उनके परिवार के खिलाफ बोलने के लिए ग्राम प्रधान और सरपंच का इस्तेमाल किया । यह चौंकाने वाला मामला था क्योंकि एक छोटी-सी घटना के लिए पूरा प्रशासन, एक स्थानीय महिला जो एक विधवा है और वास्तव में अपने गांव के सामान्य संपत्ति-संसाधनों की रक्षा कर रही थी, को बदनाम करने पर उतर आया था।

इस प्रकार झूठे आरोप लगाकर एक निर्दोष महिला को पुलिस के हाथों अपमानित होते देख पूरे प्रदेश में आक्रोश छ गया। इस घटना ने उत्तराखंड के लोगों को नाराज कर दिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और अन्य नागरिक समाज संगठनों तथा  व्यक्तियों ने इस घटना की एक स्वर में निंदा की और फिर 24 जुलाई को हेलंग चलो का कॉल दिया। इस घटना की खबर के कारण पूरे प्रदेश में फैलते आक्रोश की स्थिति में मुख्यमंत्री ने घटना की जांच के आदेश दिए और बाद में जिला प्रशासन के कई अधिकारी मंदोदरी देवी के घर का दौरा करने लगे और वन संरक्षण के लिए उनकी चिंताओं की सराहना की। अब इस मुद्दे को वास्तविक रूप में समझना अत्यंत आवश्यक है।

 

असली कहानी कुछ और है  

हेलंग की कहानी यह थी कि  मंदोदरी देवी और उनका परिवार टीएचडीसी द्वारा अपने गांव के एकमात्र चरागाह भूमि पर कब्जा करने के प्रयास का शुरू से  विरोध कर रहा है। प्रसाशन की कार्यवाही यानि टीएचडीसी को मैदान बनाने के लिए अनुमति वास्तव में राजस्व आयुक्त और सचिव पीएस जंग पांगी द्वारा हस्ताक्षरित 27 जनवरी 2014 के उस सरकारी आदेश का स्पष्ट उल्लंघन था , जिसमें सभी जिला मजिस्ट्रेटों और राजस्व अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया था कि चरागाह भूमि या गौचर का उपयोग या हस्तांतरण चरागाह के अलावा किसी अन्य उद्देश्य के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया गया है।

बेरहमी से ध्वस्त किये जाते इलाके

हेलंग के पूरे घटनाक्रम में जो बात छिपी रह गई वह यह थी कि मंदोदरी देवी ने अपने गांव की चरागाह की रक्षा के लिए बहुत पहले अधिकारियों को एक पत्र लिखा था। लेकिन इसकी न केवल अनदेखी की गई बल्कि प्रशासन द्वारा यह बताया गया कि कोई अन्य ‘ग्रामीण’ उसके साथ नहीं था और वह एकमात्र परिवार था जो उन गांवों के ‘विकास’ के लिए बाधा उत्पन्न करने की कोशिश कर रहा था, जहां कंपनी बच्चों के लिए खेल का मैदान बनाना चाहती थी। मंदोदरी देवी का कहना है कि उनका परिवार ही है जिसके पास मवेशी हैं क्योंकि अधिकांश अन्य ग्रामीण पलायन कर चुके हैं और जो हैं वे मवेशी नहीं रखते हैं। इसलिए, उसकी चिंता गाँव के चरागाह  की रक्षा करने की थी। निश्चित रूप से, सरकारी अधिकारियों, वन विभाग या राजस्व विभाग को पता होगा कि यह भूमि चरागाह भूमि थी, लेकिन उन्होंने जमीन को खेल के मैदान के नाम पर आबंटित किया। सच तो यह है कि इसका उपयोग टीएचडीसी द्वारा किए जा रहे कार्य के कचरे को डंप करने के लिए किया जाना था, लेकिन अधिकारी लोग जानते हैं कि किस तरीके से यह काम किया जाए। इसलिए पूरी कहानी गाँव के बच्चों के लिए खेल के मैदान बनाने की बात से निकली ताकि कोई उसका विरोध न कर सके।

घसियारी योजना

उत्तराखंड सरकार अपने मवेशियों के लिए जंगल से चारा इकट्ठा करने वाली महिलाओं के लिए, जिन्हें घसियारी कहा जाता है, को  सम्मान देने का दावा करती है। चारा लेने के लिए जंगलों में जाने वाली गांव की महिलाओं की परेशानी देखकर अब सरकार एक ‘अनोखा’ विचार लेकर आई है जिससे उनके अनुसार इन घसियारियों की सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। इसकी घोषणा फरवरी 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने की थी लेकिन यह योजना सितंबर 2021 में ही शुरू हो सकी। घसियारी योजना मूल रूप से पशुओं के चारे के निजीकरण की प्रक्रिया है जिसे सरकार द्वारा विभिन्न स्थानों पर तय की गई 7771 दुकानों पर बेचा जाएगा। चारे की कीमत 3 रुपये प्रति किलोग्राम होगी। सरकार का कहना है कि वह चारे के लिए जंगल जाने के लिए गांव की महिलाओं का दर्द नहीं देख सकती और इसलिए वह अपने घर के आस-पास इन दुकानों से चारा खरीद कर अपने पशुओ को खिला पायेंगी जिससे उनका समय भी बचेगा और परेशानिया भी खत्म हो जाएंगी।

घर घर घास पहुँचाने की योजना (चित्र गूगल से साभार)

हम नहीं जानते कि जिन परिवारों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, वे अपने चारे का भुगतान कैसे करेंगे? पहाड़ों में वास्तव में गायों से अधिक बकरियाँ  हैं और निश्चित रूप से हमारे पारंपरिक पशुचारक समुदाय अपनी बकरियों या गायों को बाजार से चारा खरीदकर नहीं खिला सकते हैं। यह विचार कि पारंपरिक काम बेकार है और इसलिए बाजार के लिए चीजें खरीदने का विकल्प कुछ भी नहीं है, वास्तव में लोगों को जंगल और जल संसाधनों से दूर रखने की एक चतुर चाल है। सच बात तो यह है कि यह केवल चारा नहीं है जिसके लिए लोग, विशेष रूप से महिलाएं, जंगल या उनके घास के मैदानों में जाती हैं, बल्कि यह समाजीकरण की प्रक्रिया भी है। इसलिए इस तरह की योजनाएं विफल होने के लिए बाध्य हैं क्योंकि वे यहां समुदायों को रोजगार या सहायता प्रदान करने के लिए नहीं हैं, बल्कि जंगल और नदियों से उनके पारंपरिक अधिकार छीन लेने के लिए तैयार की गई हैं।

स्थानीय समुदाय और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन

इसलिए, हेलंग के मुद्दे को बड़े संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि कैसे उत्तराखंड के मूल निवासी समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंचने के अधिकार से वंचित किया जाता है, जबकि निजी कंपनियों को राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से धन निकालने की अनुमति दी जाती है। हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं कि उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों — गढ़वाल में चमोली और उत्तरकाशी तथा कुमाऊं में बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ में बड़ी संख्या में आदिवासी या जनजाति की आबादी है, जिनके अधिकारों का इस पूरे ‘विकास’ के नाम पर अतिक्रमण किया जा रहा है। इस आदिवासी प्रश्न की जानकारी लोगों को तब भी नहीं दी जाती थी जब चिपको का मुद्दा प्रमुखता से आया था और अब भी शायद इसलिए नहीं दी जाती ताकि वे अपने मुद्दों को उठाने के लिए अपना नेतृत्व खड़ा न कर सकें।  सत्ता और अभिजात वर्ग आमतौर पर ऐसे खेल खेलता है और उन स्थानों पर भी कब्जा कर लेता है जहां से  इन समुदायों के बीच से एक प्राकृतिक नेतृत्व उभरने की संभावनाए होती हैं।

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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