रीढ़दार पत्रकार पत्रकार नहीं होते (डायरी, 5 अगस्त, 2022)

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कल फिर जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में एक घटना घटित हुई। स्थानीय पुलिस के द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार आतंकवादियों ने गदूरा इलाके में बाहर से आये मजदूरों के उपर ग्रेनेड फेंका, जिससे एक बाहरी मजदूर की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गये। इस घटना के बारे में दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता ने खबर प्रकाशित किया है और इसका शीर्षक है– पुलवामा में आतंकी हमले में प्रवासी मजदूर की मौत। हर लिहाज से यह बेहतर शीर्षक है और मुझे लगता है कि इसके लिए अखबार के संपादक को बधाई दी जानी चाहिए।
शीर्षक में कोई त्रुटि नहीं है। यह सत्य को बता रहा है। वजह यह कि जम्मू-कश्मीर में काम करने गया कोई मजदूर प्रवासी ही कहा जाएगा। पहले भी यही कहा जाता था जब राज्य में धारा 370 लागू था। तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है कि अब वहां 370 के प्रावधान लागू नहीं हैं। दूसरी बात यह कि मरने वाला मजदूर और दोनों घायल मजदूर बिहार के हैं। अब बिहार के हैं तो इस बारे में शीर्षक में लिखने का कोई महत्व नहीं है। यदि महत्व होता तो अखबार का शीर्षक होता– “पुलवामा में आतंकी हमले में बिहारी मजदूर की मौत”। तीसरी बात यह कि मरनेवाले मजदूर का नाम मोहम्मद मुमताज है, जो कि बिहार के सकवा परसा नामक जगह का रहनेवाला था। वहीं दोनों घायल मोहम्मद आरिफ और मोहम्मद मजबूल बिहार के रामपुर के रहनेवाले हैं। इस लिहाज से भी देखें तो जनसत्ता अखबार के उपरोक्त शीर्षक में कोई त्रुटि नहीं है। अगर मजदूर हिंदू होते तब यह कहा जा सकता था कि शीर्षक में त्रुटि है। हालांकि मुझे लगता है कि जनसत्ता वाले तब गलत नहीं करते और शीर्षक रखते– “पुलवामा में आतंकी हमले में हिंदू मजदूर की मौत”। मैं यह बात बिना किसी बात के नहीं कह रहा। आज ही जनसत्ता के पहले पन्ने की बॉटम स्टोरी है– “पाकिस्तान में 1200 साल पुराना हिंदू मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खुला”। इसमें भी कोई त्रुटि नहीं है, क्योंकि सबके मंदिर अलग-अलग हैं। हिंदुओं का मंदिर अलग होता है। उसके शिखर पर भगवा झंडा होता है। कभी-कभी यह लाल भी होता है। राम का मंदिर अलग होता है, दुर्गा का मंदिर अलग होता है, ब्रह्मा का मंदिर अलग होता है। बौद्ध धम्म में तो मंदिर का कोई स्थान ही नहीं। जैन धर्म में मंदिर का चलन नहीं होता था। मठ शब्द का इस्तेमाल होता था, लेकिन मठ अब मंदिर बन चुके हैं। तो मूल बात यही है कि सबके मंदिर अलग-अलग होते हैं।

कप्पन मूल रूप से केरल के हैं और अझीमुखम नामक मलयालम समाचार पत्र के संवाददाता तथा केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई के सचिव हैं। इन्हें अक्टूबर, 2020 में यूपी पुलिस ने तब गिरफ्तार कर लिया था जब वे हाथरस में एक दलित लड़की बलात्कार के बाद उसकी जीभ काट लेने व रीढ़ की हड्डी तोड़ देने तथा पुलिस द्वारा आनन-फानन में उसकी लाश को जला देने के मामले की रिपोर्टिंग करने अपने दो अन्य साथियों के साथ जा रहे थे।

सामान्य तौर पर मैं क्षेत्रीयता के दायरे में सीमित नहीं रहता। लेकिन दुख होता है जब अपने राज्य के गरीब मजदूर किसी दूसरे राज्य में किसी भी कारणवश मारे जाते हैं। हालांकि दुख तो तब भी होता है जब किसी घटना का संबंध बिहार से नहीं होता। बिहार के मामले में दुख अधिक होता है। यह मैं स्वीकार करता हूं।
दरअसल, क्षेत्रीयता के इस अहसास का शिकार केवल मैं ही नहीं हूं। हमारे देश की अदालतें भी हैं। मसलन, इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने कल एक फैसला सुनाया और उसने कप्पन की जमानत याचिका को खारिज कर दी। कप्पन मूल रूप से केरल के हैं और अझीमुखम नामक मलयालम समाचार पत्र के संवाददाता तथा केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई के सचिव हैं। इन्हें अक्टूबर, 2020 में यूपी पुलिस ने तब गिरफ्तार कर लिया था जब वे हाथरस में एक दलित लड़की बलात्कार के बाद उसकी जीभ काट लेने व रीढ़ की हड्डी तोड़ देने तथा पुलिस द्वारा आनन-फानन में उसकी लाश को जला देने के मामले की रिपोर्टिंग करने अपने दो अन्य साथियों के साथ जा रहे थे। उन्हें तबसे यूएपीए एक्ट के तहत जेल में रखा गया है। कल उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने पहली नजर में पुलिस द्वारा लगाये गये आरोपों को सच माना। यूपी पुलिस का आरोप है कि कप्पन राज्य में रिपोर्टिंग करने नहीं, अशांति फैलाने जा रहे थे और उनके खिलाफ धनशोधन का भी मामला बनता है। इस संबंध में लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने एनआईए बनाम जहूर अहमद शाह वटाली मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उदाहरण भी दिया। जज महोदय ने यह भी टिप्पणी की कि आखिर कप्पन जा क्यों रहे थे, जबकि वह किसी भी मीडिया संस्थान से संबद्ध नहीं थे।
अब यह बात न तो सोचने की जरूरत है और ना ही समझने की कि कप्पन का कसूर क्या था। एक पत्रकार इस देश के किसी हिस्से में रिपोर्टिंग करने जा सकता है। मैं तो स्वयं देश के अलग-अलग हिस्सों में गया हूं। हाथरस, जहां जाते समय कप्पन को रोका गया, मैं वहां भी गया। मेरे साथ और लोग भी थे। इनमें डॉ. हेमलता महिश्वर, डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी, डॉ. रजत रानी मीनू, डॉ. पूनम तुषामड़ और प्रो. सीमा माथुर शामिल हैं।
तो यह कोई मामला ही नहीं है कि कप्पन का कसूर क्या रहा। मेरे हिसाब से उसके तीन कसूर हैं। एक तो यह कि वह केरल के हैं और केरल यूपी में नहीं आता। वैसे अभी के राजनीतिक हालात में केरल भारत का हिस्सा होकर भी केंद्र के लिए हिस्सा ना होने के बराबर है। कप्पन का दूसरा कसूर यह है कि वह दलित-बहुजन हैं। यदि ब्राह्मण होते तो उनका कसूर नहीं होता। उनका तीसरा कसूर यह है कि वह संवेदनशील पत्रकार हैं।
पढ़िए –

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हम पत्रकारों को संवेदनशील बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। हमें अपनी रीढ़ निकालकर अलग रख देनी चाहिए। तभी हम सच्चे पत्रकार माने जाएंगे और अदालतें भी हमें पत्रकार मानेंगी। रीढ़दार पत्रकार नहीं हो सकते।
मैं ठीक कह रहा हूं न मी लार्ड? कल ही एक कविता सूझी–
उन घरों के नाम
जिनमें चिराग नहीं जलते
उन तमाम खंडहरों के नाम
जिनकी दीवारें
तोपों से ढाह दी गयीं
उन झोपड़ियों के नाम
जिनका अस्तित्व 
शहर के नाम पर मिटा दिया गया
उन हथेलियों के नाम
जिनमें मेंहदी के रंग कभी छूटे ही नहीं
उन अनाथों के नाम
जिनकी जिंदगी धर्म के नाम पर
तबाह कर दी गयी
उन पहाड़ों के नाम
जिनकी अंतड़ियां चीर
निकाल लिया गया है सबकुछ
उन गांवों के नाम 
जहां के लोग
बंदूक के दम पर निकाले जा चुके हैं
उन पेड़ों के नाम
जिनके पत्ते ही नहीं
जड़ों को भी जर्द किया जा चुका है।
हां, जर्द पत्तों के नाम
और जर्द जड़ों के नाम
जो हमारे अंदर हैं
और हमारे बाहर भी।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

 

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