भारतीय आँखों पर बहुत महंगा पड़ता है अमेरिकी चश्मा

विद्या सिंह

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एक कहावत है ‘अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय’। अर्थात जिसे आप अनहोनी समझते हैं वह स्वाभाविक प्रक्रिया है और विभिन्न हालात के जद्दोजहद से वह हमारे जीवन का हिस्सा बनती है। तर्कहीन लोग इससे दुखी होते हैं लेकिन समझदार लोग पूरी कहानी की थाह लगा लेते हैं। ज्ञात नहीं आपके जीवन में यह कहावत चरितार्थ हुई या नहीं किंतु मैंने इसे प्राय: नहीं तो बहुत बार अनुभव किया है। एक प्रसंग याद आ रहा है : बेटी पहली बार मातृत्व का अनुभव करने जा रही थी। अमेरिका में उसके साथ किसी बड़ी बुजुर्ग महिला के न  होने के कारण, वह काफी घबराई हुई थी। उसने मुझसे अपने पास आने का आग्रह किया। सुना था अमेरिका में डॉक्टर बहुत महंगे हैं और वहां इलाज कराना सहज नहीं है, अतः सावधानी के तहत जाने से हफ्ता दस दिन पहले, मैंने अपने दांत के और आंख के डॉक्टरों से, दांतों और आंखों की जांच कराई। दोनों ही डॉक्टरों ने आवश्यक उपचार कर दिया। आंख के डॉक्टर ने जांच के बाद चश्मे का नंबर दे दिया साथ ही यह भी कह दिया कि अब मोतिया ऑपरेशन लायक हो गया है। चश्मा बहुत सहायक होगा नहीं, फिर भी आप बनवाना चाहें, तो बनवा लें।

कवयित्री और कथाकार विद्या सिंह

तीन महीने का समय बीत जाए तो सीधे ऑपरेशन करा लूं, यही सोच कर मैंने चश्मा बनवाने का विचार छोड़ दिया, सोचा पुराना चश्मा इतनी वफादारी तो निभा ही रहा है कि मेरा सामान्य पढ़ने-लिखने का काम हो जाता है। अमेरिका में बोरियत से अपने आप को बचाने तथा खाली समय का सदुपयोग करने के उद्देश्य से मैंने अपनी आधी लिखी अथवा दोबारा से लिखी जाने वाली रचनाओं की फाइल बना ली। कुछ पुस्तकें रख लीं, जिन्हें मैं वहां पढ़ सकूं। तयशुदा वजन के साथ सफर की अनिवार्यता के बीच पुस्तकों का इतना भार हो, मेरे पति को यह पसंद नहीं आ रहा था ।परंतु मेरी ज़िद के चलते वह बहुत विरोध नहीं कर सके। मेरे मन में उमंग हिलोरें ले रहा था कि वहां खूब फुर्सत के क्षण होंगे और उसका सदुपयोग मैं अपने लेखन में करूंगी। हो सकता है कोई नया प्लॉट सूझे और मैं उसी पर लिखूं। किंतु कहते हैं न ‘हमरे मन कछु और है, प्रभु के मन कछु और’।

च्च…च्च….च्च…

पच्चीस मार्च की सुहानी भोर! मेरे लिए यह कॉलेज में सत्र का आखिरी दिन था, क्योंकि इसके बाद मैं जुलाई में कॉलेज आने वाली थी। कॉलेज में परीक्षाएं चल रही थीं। मेरी सात से दस की ड्यूटी थी। मैंने कंट्रोल रूम, जहां से परीक्षाएं संचालित होती हैं, के दरवाजे से भीतर प्रवेश किया ही था कि मेरे हाथ से चश्मा जमीन पर ऐसे टपक पड़ा जैसे अनायास आम के पेड़ से पका आम। उन दिनों मुझे चश्मे की आदत नहीं थी और किसी से बात करने से पहले मैं चश्मा हाथ में ले लिया करती थी, जिसकी वज़ह से आंख से अधिक चश्मा हाथ में रहता था। च्च…च्च कई स्वर साथ में उभरे। मेरा त्वरित उत्तर था, ‘कोई बात नहीं मुझे नया चश्मा बनवाना था। वह तो बस आलस्य कर रही थी, अब बन जाएगा।’ यह गनीमत थी कि मेरे पास छब्बीस मार्च का पूरा दिन था। मुझे 27 मार्च की सुबह दिल्ली के लिए निकलना था, जहां से मेरी फ्लाइट थी। डॉक्टर द्वारा दिया गया नंबर घर में था अतः चाहते हुए भी मैं चश्मे का आर्डर रास्ते में न दे सकी। शाम पांच बजे मैं अपने पति के साथ निकली। ‘चश्मा बनाने की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को दें जो परफेक्ट बनाए’, यह सोच कर काफ़ी सोच-विचार के बाद एचआर भट्ट चश्मे वाले को जिम्मेदारी सौंपने का मन बनाया। वहां कारीगर ने बताया बाइफ़ोकल चश्मा एक दिन में नहीं बन सकता। हमने कहा, ‘चलो अलग- अलग बना दो।’ उसने हमें अगले दिन शाम पांच बजे चश्मा देने का वादा किया। उसे पूरा समय देते हुए हम अगले दिन ठीक पांच बजे दुकान पर उपस्थित थे। मालूम हुआ एक घंटा और लगेगा। हम उस समय का उपयोग किसी अन्य कार्य में कर सकते थे किंतु लौटने पर दुकान कहीं बंद न मिले! मरता क्या न करता पति- पत्नी आपस में नोक-झोंक करते हुए, धरने वाली मुद्रा में जमकर बैठ गए। अंततः दुकानदार ने हमें चश्मे दिए और संभवत: टेस्ट भी कराया।‌ अब अमेरिका की मेरी तैयारी पूरी थी। प्लेन में पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी, अतः दूर वाला चश्मा लगाए, खिड़की से उड़ते हुए बादलों के भव्य दृश्य का आनंद उठाते हुए मैं शाम  छह बजे अमेरिका पहुंच गई।

बेटी-दामाद मुझे लेकर कॉस्को पहुंचे। नंबर हमारे पास था,बहुत से फ्रेम देखने के बाद एक फ्रेम पर हमारी सहमति बनी, जो काफी शुरुआती कीमत का था, जिसकी कीमत सत्तर डॉलर थी। हमने फ्रेम उठाया और उस कारीगर से मिले, जिसे चश्मा बनाना था। उसे हमसे बहुत सी जानकारी चाहिए थी हमने उसे‌ सब बता दिया जब कीमत पूछी तो बनवाई मिला कर डेढ़ सौ डॉलर बैठा।अब असली मुद्दे पर बात आई कि कब तक मिलेगा! मालूम हुआ इक्कीस दिन लग जाएंगे। बच्चों, इतने दिन में तो इंडिया से बनकर आ जाएगा।

मेरा चश्मा हर शब्द का सहोदर पैदा कर देता

वहां पहुंचने पर, अमेरिका की भव्यता का आरंभिक आकर्षण बीतने के‌ बाद शुरू हुआ बोरियत का दौर। दिमाग इतना कुंद हो गया कि कुछ सोचने समझने की क्षमता ही नहीं रही। बाहर- भीतर का सन्नाटा जैसे मेरे भीतर ही पसर गया। उस समय तक कोरोना काल का‌ भी अनुभव नहीं था, अन्यथा वह सन्नाटा इतना कष्टप्रद न लगता। ‘कैसा शहर है! न कोई पास में दुकान, न टेलिफ़ोन बूथ ,न कोई आवाज़। अंतर्राष्ट्रीय काल- दरों का हव्वा, बेटी के फ़ोन के प्रयोग से भी  वंचित किए हुए था। परिणामत: मेरे पास पढ़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। अपने निर्णय‌ पर मैं  गर्वित हुई, किंतु असली समस्या तो अब शुरू होनी थी। मैंने पुस्तक पढ़नी आरंभ की कि, जैसे लोग पानी के साथ वानी यूं ही जोड़ लिया करते हैं, उसी तरह, मेरा चश्मा हर शब्द का सहोदर पैदा कर देता। लिहाजा शब्द अपनी परछाई के साथ मिल कर मेरे लिए मुश्किल पैदा कर देते। परिणाम की गंभीरता से अनजान, मैं आंखों पर अत्याचार करते हुए पढ़ती रही। दो-तीन दिन बीते होंगे कि आंखें लाल हो गई लगा इस चश्मे से काम नहीं चलेगा। यह तय हो गया कि चश्मा ठीक नहीं बना था।

बेटी मुझे आंख के डॉक्टर के पास ले गई, नंबर लेने के लिए । डॉक्टर वाला पर्चा, जिसमें चश्मे का नंबर था, चश्मे की दुकान पर ही रह गया था। बेटे से स्कैन करके भेजने को कहा तो चश्मे का नंबर तो उसके हाथ आया नहीं, उसके स्थान पर पुराने पर्चे स्कैन करके भेज दिए, जिन्हें देख कर मैंने सिर पीट लिया। आज से बारह साल पहले चालीस डॉलर उस डॉक्टर की फीस थी। मैंने झट चालीस डॉलर को रुपए में बदला और परेशान हो उठी। मेरी भूल से बेटी को परेशान होना पड़ा। डॉक्टर ने नंबर दे दिया, अब  चश्मा बनवाने की जद्दोजहद थी। मालूम हुआ चश्मे का सस्ते से सस्ता फ्रेम साठ डॉलर का है और लेंस की कीमत मिलाकर चश्मे की कीमत एक सौ सत्तर डॉलर बैठ जाएगी और चश्मा पंद्रह दिन में मिल पाएगा। मैं बेटी को झट से बाहर ले आई,”इतने दिन में तो बेटा भारत से भेज देगा, इसके बाद भी  सस्ता पड़ेगा।”

उसके बाद हम एक भारतीय स्टोर में गए, जहां एक अपरिचित सज्जन ने मुझसे हिंदी में ‘नमस्ते’ कहा। उनके चश्मे ने मुझे आकृष्ट किया और मैं उनसे पूछ बैठी, “भाई साहब आप ने चश्मा पहना हुआ है, इसीलिए आपसे पूछ रही हूं, सही कीमत में चश्मा कहां बनेगा?”

राज़ की बात बताने की मुद्रा अपनाते हुए वह मेरे थोड़ा और निकट सरक आए, “यह चश्मा दस वर्ष पुराना है। इंडिया से ही लाया था। यहां चश्मे इतने महंगे हैं कि बच्चे भले कहते रहें, बहुत पुराने फैशन का फ्रेम है, मैं कहता हूं कोई बात नहीं।” इसके बाद वह मुझे निहायत दयनीय दिखने लगे। फिर भी वह बेटी से बोले, “आप कास्को‌ जाइए,  विज़न नाम से एक दुकान है। वहां सही चीज मिलेगी।”

प्रस्ताव पारित हुआ कि चश्मे भारत से ही मंगाए जाएंगे

अगली शाम बेटी-दामाद मुझे लेकर कॉस्को पहुंचे। नंबर हमारे पास था,बहुत से फ्रेम देखने के बाद एक फ्रेम पर हमारी सहमति बनी, जो काफी शुरुआती कीमत का था, जिसकी कीमत सत्तर डॉलर थी। हमने फ्रेम उठाया और उस कारीगर से मिले, जिसे चश्मा बनाना था। उसे हमसे बहुत सी जानकारी चाहिए थी हमने उसे‌ सब  बता दिया जब कीमत पूछी तो बनवाई मिला कर डेढ़ सौ डॉलर बैठा।अब असली मुद्दे पर बात आई कि कब तक मिलेगा! मालूम हुआ इक्कीस दिन लग जाएंगे। “बच्चों, इतने दिन में तो इंडिया से बनकर आ जाएगा।” चश्मे की कीमत और मिलने वाला समय सुन कर मैंने कहा। “कल जेसीपेनी चलेंगे,‌वहां एक बड़ी सी‌‌ दुकान‌ है, वहां जल्दी मिल जाना चाहिए।” बेटी के प्रस्ताव पर दमाद ने सहमति की मुहर लगाई और अगले दिन हम उस चश्मे की दुकान पर उपस्थित थे किंतु आठ बजे से पहले ही दुकान बंद हो चुकी थी। बड़े से शीशे के दरवाजे के भीतर से तमाम चश्मे तथा फ्रेम दिख रहे थे, जिन्हें हम लाचारगी से देख रहे थे। अगले दिन दामाद के ऑफिस से आते ही हम फिर उसी दुकान के लिए रवाना हुए। वहां जल्दी मिलने का आश्वासन तो मिला‌ किंतु एक एक लेंस पर अतिरिक्त डॉलर देने पड़ते। चश्मे की कीमत 300 डॉलर बैठ रही थी। मैंने तुरंत अपनी आदत के अनुसार उसे रुपए में बदला और बेटी को साफ़ मना कर दिया। बेटी-दामाद चूंकि कई दिन, मुझे लेकर, चश्मा बनवाने बाजार जा चुके थे,अतः एकदम बैरंग वापस आना उन्हें ठीक नहीं लगा। क्योंकि मैं मॉर्निंग वॉक पर जाती थी, अतः मुझे उन्होंने जूते दिलवाए और सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि चश्मे भारत से ही मंगाए जाएंगे।

उस दिन मुझे अपने देश पर बहुत प्यार आया कि हमारे पास गर्व करने की बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं,जो अमेरिका में नहीं हैं।

विद्या सिंह जानी-मानी कवयित्री और कथाकार हैं।

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