Sunday, May 26, 2024
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ईशनिंदा कानूनों को समाप्त किया जाना चाहिए

यह भी एक सच्चाई है कि इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद के मुद्दे को छोड़कर आमतौर पर मुसलमानों ने किसी अन्य मुद्दे पर आंदोलन नहीं किया है। यह प्रश्न उनके लिए बहुत संवेदनशील है। यह एक वैश्विक घटना है क्योंकि इसमें पैगंबर मोहम्मद के विषय में टिप्पणी होती है। कई इस्लामी देशों में ईशनिंदा के बेहद […]

यह भी एक सच्चाई है कि इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद के मुद्दे को छोड़कर आमतौर पर मुसलमानों ने किसी अन्य मुद्दे पर आंदोलन नहीं किया है। यह प्रश्न उनके लिए बहुत संवेदनशील है। यह एक वैश्विक घटना है क्योंकि इसमें पैगंबर मोहम्मद के विषय में टिप्पणी होती है। कई इस्लामी देशों में ईशनिंदा के बेहद खतरनाक कानून हैं जिसका इस्तेमाल अक्सर असंतुष्टों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जाता है। इन ईशनिंदा कानूनों के लिए सज़ा आमतौर पर आदिम यातनापूर्ण और क्रूर तरीकों से मौत की सजा है। अक्सर, राजनीतिक नेता और धार्मिक नेता मुसलमानों के आर्थिक सामाजिक मुद्दों पर नहीं बोलते हैं और मुस्लिम समाज भी बाकी सवालों पर इतना नहीं बोलता जितना कहना चाहिए, लेकिन पैगंबर मोहम्मद के मुद्दे पर बेहद संवेदनशील हैं।

एक मजबूत भारत के लिए, हमें संवैधानिक मूल्यों का पालन करने और प्रत्येक नागरिक को समान मानने की ज़रुरत है, अपने व्यक्तिगत डोमेन में विश्वास रखें, नफरत फैलाने वाले पूर्वाग्रहों को रोकें जो केवल विभाजन को गहरा करेंगे। इसके सफल होने के लिए, हमारी संस्थाओं को उनकी स्वायत्तता के साथ-साथ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी, जब उनका उल्लंघन किया जा रहा हो या कानून को धमकी के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा हो। लोकतान्त्रिक संस्थानों की स्वयत्तता ही अंततः हमारे अधिकारों की रक्षा कर पाएगी।

भारत में ईशनिंदा कानूनों का हिंदुत्व समकक्ष गौ-संरक्षण और धर्मांतरण कानून हैं। इन सभी ‘कानूनों’ का दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष  यह है कि लोग अंतिम निर्णय के लिए अदालतों की प्रतीक्षा नहीं करते हैंऔर स्वयं कानूनों को हाथ में ले रहे हैं। भावनाओं और अफवाहों के कारण  पागल भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेती है और प्रशासन ‘असहाय’ हो जाता है या बहुसंख्यकवादी ‘भावनाओं’ के लिए हर जगह एक सहायक की भूमिका निभाता है। पिछले कुछ वर्षों में पहली बार, भारतीय मुसलमानों ने वास्तव में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी के साथ अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठाई। सीएए और एनआरसी के मुद्दे ने उन्हें परेशान किया, क्योंकि उनकी भावना को शांत करने का कोई प्रयास नहीं किया गया था और न ही पूरे समुदाय को यह विश्वास दिलाया गया था कि उन्हें भारत से बाहर नहीं निकाला जा रहा है। असुरक्षा की भावना प्रबल थी, लेकिन लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन और लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया, जबकि मीडिया के झूठ और कई राज्यों द्वारा कठोर प्रतिक्रिया से इसको दबाया गया। कई लोगों को जेल में डाल दिया गया है और उनके घरों को बुलडोज़र द्वारा ध्वस्त कर दिया गया है जो कि कानून की वैधानिक प्रक्रिया नहीं है। हमने अभी तक इसकी स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं सुनी है कि बेदखली और विध्वंस कोई रास्ता नहीं है। वास्तव में यह न केवल संविधान अपितु अंतरराष्ट्रीय कानून के भी खिलाफ हैं। आप किसी आरोपी को अपराधी घोषित नहीं कर सकते और कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना स्वयं निर्णय नहीं ले सकते। राज्य उस तरह से व्यक्तियों की तुलना में बहुत बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि राज्य को संविधान और कानून की उचित प्रक्रिया के माध्यम से वैध किया गया है।

राज्य को कानून के शासन का पालन करने के लिए उदाहरण स्थापित करना चाहिए, ताकि लोग इसका पालन करें। डराने-धमकाने से लोग कभी-भी प्रक्रियाओं और नियमों का पालन नहीं करेंगे। अगर ऐसा होता तो पश्चिमी देश सबसे बुरे हालात में होते, क्योंकि उनके पास सड़कों पर पुलिस की न्यूनतम संख्या है और लोग बिना किसी डंडे के डर के कानून का पालन करते हैं। यह जिम्मेदारी तभी आती है जब राज्य और उसके नागरिकों के बीच विश्वास होता है। राज्य यहां लोगों को डराने-धमकाने के लिए नहीं है। संचार के ऐसे चैनल खोलने चाहिए जो इन दिनों गायब हैं। अनुशासन की प्रक्रिया में हम मध्यपूर्व या चीन से नहीं अपितु पश्चिम से बहुत कुछ सीख सकते हैं। राष्ट्र जबरन अनुशासन से आगे नहीं बढ़ते अपितु लोगों में स्वयं अनुशासन की भावना से आगे बढ़ते हैं।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि नूपुर शर्मा की उग्र और अमर्यादित भाषा के खिलाफ मध्य पूर्वी देशों से जो आवाजें आईं, वे ऐसे देश थे जहां ईशनिंदा एक अपराध है और उसकी सज़ा मृत्युदंड है। नूपुर शर्मा ने भले ही यहां संघ परिवार के एजेंडे को पूरा करने के लिए जान-बूझकर बात की हो, लेकिन जो लोग मौत की सज़ा का सामना कर रहे हैं या इन देशों में इसका इंतजार कर रहे हैं। वे निर्दोष मानवतावादी, धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी हैं, जिन्हें बहुसंख्यक कट्टरपंथियों ने सिर्फ इसलिए फंसाया क्योंकि उन्होंने इसका विरोध किया था। वह उन समाजों में कुछ अलग विचार रखते थे और बहुसंख्यक समुदाय या लोगों के धार्मिक दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे। पाकिस्तान जैसे देश में गरीब ईसाई समुदाय के खिलाफ ईशनिंदा कानून का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। उनमें से अधिकांश वास्तव में धर्मान्तरित दलित हैं। वह भी चूड़ा या वाल्मीकि समुदाय से हैं। 10 साल के लड़के पर ईशनिंदा का आरोप कैसे लगाया जा सकता है? एक अनपढ़ सफाईकर्मी पर ईशनिंदा का आरोप कैसे लगाया जा सकता है? यह पाकिस्तान में हो रहा है और अब हम उसी पैटर्न पर चल रहे हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि मध्य पूर्वी देश, जहां लोग नूपुर शर्मा के खिलाफ मुखर थे, वे ही उदयपुर में हुए जघन्य हत्याकांड पर चुप क्यों रहे? समस्या यह है कि उदयपुर हत्याकांड को लेकर लोगों ने जिस तरह का तर्क दिया, वह अक्सर पुजारियों के बीच सुनने को मिलता है। लेकिन वे भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव पर नहीं बोलते हैं। तथ्य यह है कि मुसलमान मुश्किल में हो सकते हैं और गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक समाजों में भेदभाव का सामना कर सकते हैं, लेकिन यह किसी भी इस्लामी राष्ट्र के लिए मुद्दा नहीं है क्योंकि वे भी ‘धर्म खतरे में है’ के जुमले पर ज्यादा ऐक्टिव हैं। इस्लाम जैसा ऐतिहासिक और शक्तिशाली धर्म हो या हिंदू या ईसाई धर्म, ये सब किसी की छोटी-छोटी टिप्पणियों से खतरे में नहीं पड़ सकता। एक अभद्र भाषा या एक टिप्पणी, जिससे हम असहमत हैं, जिन्हें अकादमिक या कानूनी रूप से भी नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन ऐसे कृत्यों से निपटने के लिए आदिम बर्बर तरीकों को बढ़ावा देने की कोई आवश्यकता नहीं है।

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धर्म या उसकी बुरी प्रथाओं की आलोचना करने के अधिकार और अभद्र भाषा के बीच अंतर करना पड़ेगा 

सबसे खतरनाक चीजें जो हम आज देख रहे हैं, वह यह है कि घृणा की भाषा बढ़ी हैं और दूसरे धर्मों को निशाना बनाया जा रहा है। टेलीविजन चैनल जान-बूझकर इन बहसों को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में अभद्र भाषा या घृणा बढ़ाने वाली भाषा के खिलाफ एक कानून होना चाहिए, क्योंकि इनका इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है और समाज का ध्रुवीकरण किया जा रहा है। दुर्भाग्य से, चुनावों के दौरान चले नफरत भरे भाषणों के लिए किसी को कोई सज़ा नहीं मिली, क्योंकि चुनाव आयोग कुछ नहीं कर सका, क्योंकि इसमें सत्ताधारी दल का शीर्ष नेतृत्व शामिल था।

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इन घृणास्पद भाषणों का विरोध संवैधानिक, लोकतान्त्रिक मूल्यों से ही होना चाहिए न कि अभद्र भाषा या हिंसा के ज़रिए।  लेकिन दुर्भाग्य से यह लगातार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि इस प्रकार की भाषा या टिप्पणियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। याद रखें, अभद्र भाषा से अभद्र भाषा को खत्म नहीं किया जा सकता है।  लेकिन अब यह एक सुनियोजित रणनीति भी है ताकि धर्म के नाम पर दो समाज एक-दूसरे से भिड़ते रहे और असल मुद्दों से भटक जाए। अभद्र भाषा वास्तव में विपरीत पक्ष में एक वातावरण बनाती है जहां उसका लाभ उठाने वाले नेताओं का समान समूह उभरता है और फिर वे अपने-अपने समुदायों की ‘भावनाओ’ पर नियंत्रण करने के लिए एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। नतीजा यह है कि सुधारों के लिए बहुत कम जगह बचती है और उसमें कोई बहस नहीं होती। आप अपने धार्मिक मूल्यों की समस्याओं पर चर्चा नहीं कर सकते हैं कि कैसे सुधार करना है, क्योंकि ‘खतरे में धर्म’ और ‘आलोचना से परे धर्म’ की बाइनरी में, हम वास्तव में धर्म के कट्टरपंथियों के हाथों में खेलते हैं जो नहीं चाहते हैं कि कोई सुधार या बातचीत हो।

 

 बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले, ईवीआर पेरियार ने ब्राह्मणवादी पदानुक्रमित समाज में जाति व्यवस्था की बुराइयों के बारे में बात की। शहीद भगत सिंह ने हमारे जीवन में धर्म के प्रभुत्व के बारे में बात की, कहा कि तर्कसंगत होना और लोगों के हित में काम करना क्यों महत्वपूर्ण है? हम सभी के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि हम किसी विशेष धर्म को चुनिंदा रूप से लक्षित न करें, बल्कि व्यापक रूप से देखें कि अधिकतर धर्मों में अद्भुत मानवीय विचार हैं जो सार्वभौमिक सत्य को बढ़ावा देते हैं। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि संगठित धर्मों ने मानवता के खिलाफ कई जघन्य अपराधों को भी जन्म दिया है और उनका नेतृत्व किया है। आधुनिक समाज में, हमें धर्म के सार्वभौमिक विचारों को एक साथ लाने की ज़रूरत है, लेकिन अगर कोई इससे असहमत है तो भी नाराज़ नहीं होना चाहिए। धार्मिक मुद्दों पर हमारी भावना बहुत आसानी से आहत होती है लेकिन लोगों के मुद्दों पर नहीं। अगर डॉ. अंबेडकर और हमारे समाज के अन्य महान नायकों ने धर्म या परम्पराओं की आलोचना नहीं की होती तो अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के मुद्दे नहीं आते या अवैध नहीं होते। आज हमारे पास जो संविधानसम्मत बराबरी के कानून हैं, जिन्होंने छुआछूत और जातिभेद को असंवैधानिक करार दिया या महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिया या सभी को वोट देने का अधिकार दिया। वे हमारी तथाकथित गौरवशाली परम्पराओं से नहीं आए, अपितु हमारी संविधान सभा के सदस्यों, बाबासाहब, फुले, पेरियार जैसे लोगों के सतत संघर्ष का नतीजा है।

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मैं मानता हूं कि जब हम धर्म की आलोचना करते हैं तो उसके पीछे कोई शरारत नहीं की जानी चाहिए और इसमें एक बौद्धिक ईमानदारी होनी चाहिए। दुनिया भर में मानववादी लोग आज भी धर्म की आलोचना किसी समुदाय या व्यक्ति को अपमानित या शर्मिंदा करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि धार्मिक लोगों या सरकारों के हमले से व्यक्तियों की रक्षा करने के लिए कर रहे हैं जो हर बुराई और गलत को सही ठहराते हैं। दुनिया भर में धर्म समय के साथ बदलते भी हैं लेकिन यह भी सच है कि उनमें से कोई, कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि उनकी ‘पवित्र’ चीजें हमेशा जांच के लिए होती हैं। लेकिन निश्चित रूप से यह एक आम समझ होनी चाहिए कि हमें उन लोगों के खिलाफ पूर्वाग्रह विकसित नहीं करना चाहिए, जो इस धर्म, उस धर्म या किसी धर्म को नहीं मानते। कम से कम हमारे कानूनों, संविधानों और संस्थानों को इस संबंध में निष्पक्षता दिखानी चाहिए और लोगों की आस्था के मामले में बिल्कुल तटस्थ रहना चाहिए, लेकिन जब भी किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन उसकी कुछ चीजों के कारण या कुछ सिद्धांतों का पालन नहीं करने के कारण होता है, तो हस्तक्षेप करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमारी लड़ाई आमजन की भलाई के लिए है, न कि किसी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ जो कुछ आस्था को नहीं मानते हैं।

हम समुदायों और व्यक्तियों को बदनाम नहीं कर सकते क्योंकि, धर्म इतनी सदियों तक जीवित रहा लेकिन वह इसकी महानता के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि इसकी एक मजबूत सामाजिक-सांस्कृतिक पूंजी है। यह दुखद है जबकि धर्म और धार्मिक लोग-समुदाय आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और लोकतांत्रिक अधिकारों का आनंद ले रहे हैं। धार्मिक समाज किसी भी निष्पक्ष आलोचना को बर्दाश्त करने में असमर्थ हैं। ऐसे समाजों में गैर-धार्मिक होने का अधिकार भी स्वीकार्य नहीं है। इसके खिलाफ बहुसंस्कृतिवाद सबसे बेहतर औज़ार है, क्योंकि तभी हम अपने धर्मों और विश्वास को पूरी तरह से व्यक्तिगत डोमेन में रखना और सार्वजनिक स्थानों के लिए एक आम एजेंडा विकसित करना सीखेंगे। दुनियाभर में, लेखक, मानवतावादी धर्मों की आलोचना करते रहे हैं और उनके अपने विचार हैं। बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा कि मैं ईसाई क्यों नहीं हूं,  किसी और को इस्लाम से समस्या थी और कई अन्य लोगों ने ब्राह्मणवाद या हिंदू धर्म की आलोचना की। इसी तरह चर्चा होनी चाहिए क्योंकि आलोचना हमें खुद को बेहतर बनाने में मदद करती है। आलोचना लोगों या समुदायों को अपमानित करने के लिए नहीं है। पवित्र पुस्तकों में लिखी गई हर बात सच नहीं हो सकती है और हमें अन्य समुदायों के साथ भी हाथ मिलाने की जरूरत है।

 धर्म को निजी और संवैधानिक मूल्यों को सामान्य एजेंडा होने दें

आज दुनिया एक वैशिवक गांव हो गई है। हमें एक दूसरे की मदद की जरूरत है। समुदाय अपना स्वयं का अनुभव लाते हैं जो अंततः हमें एक साथ बढ़ने में मदद करते हैं। भारत जैसा देश विभिन्न सभ्यताओं का पिटारा है और सभी एक दूसरे के  पूरक हैं। हमारी भोजन की आदतें, व्यंजन, सांस्कृतिक मूल्य प्रणाली केवल इस विविधता के साथ बढ़ती और मजबूत होती है। इसलिए हमें उस मानसिकता से बाहर आने की जरूरत है जो हमें हर समय विभाजित करती है और इतिहास को सही करने का प्रयास करती है। आप केवल इतिहास से सबक सीख सकते हैं। आप वास्तव में इसे ठीक नहीं कर सकते, क्योंकि सैकड़ों अन्य लोग हैं जो आपसे समान प्रश्न पूछ सकते हैं। अगर हिंदू मुसलमानों या ईसाइयों से जवाब मांगते हैं, तो दलित, आदिवासी, ओबीसी ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग से उन्हीं सवालों के जवाब मांगते हैं। दूसरों को नीचा दिखाने के लिए अतीत को मत खोदो। इसे ठीक करने के लिए अतीत को मत खोदो या राजनीति मत करो क्योंकि खुदाई केवल हमारी धर्मनिरपेक्ष नींव को कमजोर करेगी।

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हमारे संविधान, हमारी संस्थाओं को मजबूत और स्वायत्त बनाने की जरूरत है ताकि राजनेता भले ही अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म का इस्तेमाल करने की कोशिश करें, फिर भी इन संस्थानों को खड़ा होना चाहिए और विभाजन की ताकतों से इनकी रक्षा होनी चाहिए। एक बार जब कानून सभी पर समान रूप से लागू हो जाएगा तो चीजें बेहतर होंगी और भारतीय के रूप में हमें अपनी विरासत पर गर्व होगा जो यह सुनिश्चित करती है कि विभिन्न धर्म, संस्कृतियां, भाषाएं, जातीयताएं यहां न केवल रहें बल्कि इसका पूरा आनंद भी लें। आइए, हम संबंध बनाकर और संवैधानिक मूल्यों का पालन करके भारत की विविधता को मजबूत करें जो हमारी जन्म-आधारित पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं करती, बल्कि हमें हमारी नागरिकता के आधार पर समान मानती है। यह समझना जरूरी है कि बढ़ती नफ़रत और फूट हमें कहीं नहीं ले जाएगी बल्कि हमें कमजोर ही करेगी। एक मजबूत भारत के लिए, हमें संवैधानिक मूल्यों का पालन करने और प्रत्येक नागरिक को समान मानने की जरूरत है। हमारी संस्थाओं को उनकी स्वायत्तता के साथ-साथ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। लोकतान्त्रिक संस्थानों की स्वयत्तता ही अंततः हमारे अधिकारों की रक्षा कर पाएगी।

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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