राजनीतिक और सांस्कृतिक ‘सुट्टा’  (डायरी 6 जुलाई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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 सौंदर्य का मापदंड भी सापेक्ष ही होता है। निरपेक्ष नहीं होता। यह संभव ही नहीं है। रंगभेद के आधार पर भेदभाव की बुनियाद यही है। वैसे तो यह पूरे विश्व में है लेकिन भारत में इसके साथ अन्य विभाजनकारी तत्व शामिल हो जाते हैं। इनमें सबसे अहम है जातिवाद। जातिवाद और रंगभेद के साथ नस्लवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मतलब यह कि किसी का रंग केवल गोरा होने से खूबसूरत नहीं हो जाता। उसके लिए जाति और नस्ल भी मायने रखती है।
आज यह बात दर्ज करने के पीछे दो वजहें हैं। पहली वजह एक खुला पत्र है, जिसके ऊपर सत्तर से अधिक उनलोगों ने हस्ताक्षर किये हैं, जो पूर्व में विभिन्न अदालतों के न्यायाधीश व वरिष्ठ नौकरशाह रह चुके हैं। इसके अलावा इन सभी में एक कॉमन बात यह भी है कि ये सभी (अपवाद में एक-दो को छोड़कर) ऊंची जातियों के हैं। कुछ नामों पर गौर फरमाएं– सेवानिव‍ृत्त न्यायाधीश क्षितिज व्यास (बंबई हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश), सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएम सोनी (गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश), राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रहे आरएस राठौर तथा प्रशांत अग्रवाल, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसएन ढींगरा के अलावा सेवानिव‍ृत्त लेफ्टिनेंट वी के चतुर्वेदी, सेवानिवृत्त एअर मार्शल एसपी सिन्हा आदि।
तो सत्तर से अधिक इन महान महानुभावों ने सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन न्यायाधीशद्वय न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला के द्वारा नुपूर शर्मा के खिलाफ की गयी टिप्पणी के खिलाफ खुला पत्र लिखा है। अपनी टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट के इन दो न्यायाधीशों ने कहा था कि नुपूर शर्मा के विवादित बयान की वजह से देश में अनेक घटनाएं घटित हुईं। यहां तक कि उदयपुर में एक व्यक्ति की हत्या भी शर्मा के गैर-जरूरी और भड़काऊ बयान की वजह से ही हुई।

सुप्रीम कोर्ट के इन दो न्यायाधीशों का विरोध करनेवाले 70 से अधिक महान महानुभावों का कहना है कि खंडपीठ की टिप्पणी न्यायिक लोकाचार के अनुरूप नहीं थी और सुप्रीम कोर्ट ने लक्ष्मण रेखा पार कर दी। इनके मुताबिक नुपूर शर्मा को सभी मामलों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के इन दो न्यायाधीशों का विरोध करनेवाले 70 से अधिक महान महानुभावों का कहना है कि खंडपीठ की टिप्पणी न्यायिक लोकाचार के अनुरूप नहीं थी और सुप्रीम कोर्ट ने लक्ष्मण रेखा पार कर दी। इनके मुताबिक नुपूर शर्मा को सभी मामलों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
खैर, यह तो जाति से जुड़ा मसला है। नुपूर शर्मा ऊंची जाति की हैं तो ऊंची जातियों के महान लोग उनके पक्ष में खड़े हो गए हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है। पहले भी होता रहा है। सुप्रीम कोर्ट की अवमानना अब कोई बड़ी बात नहीं रह गई है। अब नुपूर शर्मा वाले मामले में ही देखें कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार इसलिए लगाई थी कि उसने उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया। लेकिन आजतक उसकी गिरफ्तारी नहीं की गई है।
मैं तो सोच रहा हूं सुप्रीम कोर्ट के बारे में। केंद्र सरकार कैसे उसके साख की धज्जियां उड़ा रही है। लेकिन आप गौर से देखेंगे तो इसमें भी सौंदर्यशास्त्र के तत्व विद्यमान हैं। यह सौंदर्यशास्त्र है वर्चस्ववाद का। वर्चस्ववाद कभी भी खुद को बैकफुट पर नहीं ले जाना चाहता है। कहने का मतलब यह है कि जब-जब नुपूर शर्मा के मामले में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की टिप्पणी का जिक्र आएगा, तब हर बार सत्तर से अधिक महान महानुभावों के खुले पत्र का (सामूहिक अवमानना का) जिक्र भी जरूर होगा।
अब एक दूसरा मामला फिल्म का है। फिल्म का नाम है– काली। इस फिल्म के पोस्टर के खिलाफ देश भर के काली भक्तों ने अभियान छेड़ रखा है। जगह-जगह मुकदमे दर्ज कराए जा रहे हैं। फिल्म के पोस्टर में एक महिला, जिसका रंग नीला दिखाया गया है और होंठों पर खूब गहरा लिपिस्टिक है, आंखों में काजल है और आभूषणों से सजी-धजी है, वह सिगरेट का सुट्टा मार रही है।
डाक्यूमेंट्री ‘काली’ की निर्माता लीना मनिमेकलाई
इस संबंध में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने खासा दिलचस्प बयान दिया है। उनका कहना है कि वह काली भक्त हैं और वह जिनकी आराधना करती हैं, वह मांसाहार भी करती हैं और दारू भी स्वीकार करती हैं।
वैसे सुट्टा मारनेवाले देवताओं में शंकर का नाम सबसे ऊपर है। सावन का महीना आने ही वाला है। बिहार के सुल्तानगंज से लेकर देवघर तक की कांवर यात्रा करनेवाले लाखों नौजवान गांजा फूंककर, भांग खाकर करीब सवा सौ किलोमीटर की दूरी पैदल तय करेंगे। लेकिन इससे क्या? सुट्टा मारने का अधिकार तो बस केवल दो लोगों को ही है। एक तो पुरुषों को और दूसरी वे महिलाएं जो किसी सुट्टा मारनेवाले किसी गुरु की शिष्याएं बन चुकी हों।
लेकिन सुट्टा मारनेवाली महिलाओं का सौंदर्य सुट्टा मारने से कम नहीं होता। मैं तो नेहरू प्लेस परिसर में अनेक महिलाओं को सुट्टा मारते देखता हूं और मेरे मन में उनके प्रति सम्मान में कोई अंतर नहीं होता। लेकिन कुछ लोग होते हैं, जिन्हें खून पीती काली को देखना अच्छा लगता है, सिगरेट पीती हुई काली नहीं।
वैसे सौंदर्य के हिसाब से देखें तो काली और शंकर में गजब की समानता है। दोनों के वस्त्र लगभग एक जैसे ही हैं। काली के गले में नरमुंड डालकर और उसकी जिह्वा को बाहर निकालकर चित्रकारों ने विद्रूप कर दिया है। लेकिन शंकर की तस्वीर तो एकदम अलहदा है।

द्विज कमाल के चोर हैं। जब मैं उन्हें चोर कह रहा हूं तो मेरा आशय उनके इस गुण से है कि वह बड़ी खूबसूरती से दूसरों की अच्छाई पर कब्जा कर लेते हैं। शंकर का बिंब भी उनका ओरिजनल बिंब नहीं है। गोंड संस्कृति में संभूसेक एक पुरखा के रूप में उल्लेखित हैं। एक ऐसे पुरखा जो अपने लोगों के राजा हैं। वह बहादुर हैं। वह चांद को अपने माथे पर धारण करता है। नदियों का वह सबसे बड़ा संरक्षक है और इतना कि उसे सर्वोपरि मानता है। संगीत का स्वर जब उसके डमरू से निकलता है तो पूरा जंगल-पहाड़ नाच उठता है। ऐसे शंकर पर यदि द्विज कन्याएं गौरा और पार्वती रिझ गयीं तो आश्चर्य कैसा।

सचमुच शंकर एक ऐसे पुरूष के रूप में नजर आते हैं, जिनकी तुलना हम रॉयल इनफील्ड बुल्लेट से कर सकते हैं। मतलब जितना डेकोरेशन बुल्लेट में किया जा सकता है, उतना किसी और दो पहिया में संभव ही नहीं है। मुझे आज भी शौक है कि मेरे पास एक बुल्लेट हो और उसमें मैं तमाम प्रयोग करूं। ठीक वैसे ही जैसे द्विजों ने शंकर के साथ किया है। माथे पर चंद्रमा, गले में सांप, हाथ में डमरू, कमर में मृगछाला, त्रिशुल, जटा में गंगा। सोचकर देखिए तो कितने सारे बिंब हैं एक अकेले शंकर में। इनके आगे तो दुर्गा जैसी सुंदरी का सौंदर्य भी नहीं टिकता। यह अलग बात है कि वह गहने से लदी हुई दिखती है और उसके पास आक्रामक हथियार हैं और एक दर्जन बाहें हैं।
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जातिवाद की रात में धकेले गए लोग जिनका दिन में दिखना अपराध है

शंकर एक आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता है। उसके पास ब्रह्मा की तरह चार मुंह नहीं है। उसके पास विष्णु के जैसा चार हाथ भी नहीं है। उसके माथे पर मुकुट तक नहीं है। है तो केवल एक जटा। जटा मुकुट पर भारी पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे कि पीला वस्त मृगछाला के आगे अपनी चमक खो देता है। शंकर रहता भी कहां है, यह भी देखिए। वह महलों में नहीं रहता। हिमालय पर रहता है। जंगलों का वासी है। उसके सहयोगी भी कौन हैं, यह भी देखिए। बैल है, भूत हैं, पिशाच हैं। पूरा का पूरा समाजशास्त्र है शंकर के बिंब में।
हालांकि यह सच है कि द्विज कमाल के चोर हैं। जब मैं उन्हें चोर कह रहा हूं तो मेरा आशय उनके इस गुण से है कि वह बड़ी खूबसूरती से दूसरों की अच्छाई पर कब्जा कर लेते हैं। शंकर का बिंब भी उनका ओरिजनल बिंब नहीं है। गोंड संस्कृति में संभूसेक एक पुरखा के रूप में उल्लेखित हैं। एक ऐसे पुरखा जो अपने लोगों के राजा हैं। वह बहादुर हैं। वह चांद को अपने माथे पर धारण करता है। नदियों का वह सबसे बड़ा संरक्षक है और इतना कि उसे सर्वोपरि मानता है। संगीत का स्वर जब उसके डमरू से निकलता है तो पूरा जंगल-पहाड़ नाच उठता है। ऐसे शंकर पर यदि द्विज कन्याएं गौरा और पार्वती रिझ गयीं तो आश्चर्य कैसा।
बचपन से एक लोकगीत सुनता आया हूं। यह विद्यापति का गीत है –
गौरा तोर अंगना।
बर अजगुत देखल तोर अंगना।
एक दिस बाघ सिंह करे हुलना।
दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना॥
हे गौरा तोर…
कार्तिक गणपति दुई चेंगना।
एक चढथि मोर एक मुसना॥
हे गौर तोर…
पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना।
सम्पति मध्य देखल भांग घोटना॥
हे गौरा तोर…
खेती न पथारि शिव गुजर कोना।
मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना॥
हे गौरा तोर ।
भनहि विद्यापति सुनु उगना।
दरिद्र हरन करू धएल सरना॥

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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