मुहावरों और कहावतों में जाति

डॉ. जयप्रकाश कर्दम

1 2,809

लोक-समाज में मुहावरों और कहावतों का बहुत महत्व है।मुहावरा शब्दों के ऐसे समूह को कहते हैं,जो अपने सामान्य अर्थ को छोड़कर किसी अन्य अर्थको व्यक्त करता है। जबकि लोक में प्रचलित हो गयी कोई बात ही उक्ति बन जाती है और लोक की उक्ति होने के कारण ही उन्हें लोकोक्ति कहा जाता है। मुहावरे और लोकोक्तियां लोक-जीवन का बिम्ब और उनकी व्याख्या हैं। मुहावरे, लोकोक्तियां और कहावतें समाज की चेतना की अभिव्यक्ति हैं। लोग क्या सोचते हैं, एक-दूसरे के प्रति उनकी किस तरह की मानसिकता और व्यवहार है, मुहावरों और कहावतों में यह बहुत स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। सामाजिक यथार्थ की बहुत सारी अंदरूनी परतें मुहावरों और कहावतों के माध्यम से खुलती हैं। भारतीय समाज में दलितों के प्रति एक अलग तरह का दृष्टिकोण और व्यवहार रहा है। दलितों पर धर्म और शास्त्रों के नाम पर वर्ण-जाति-व्यवस्था की इतनी गहरी और तीखी मार पड़ी है कि कई शताब्दियों के बाद भी वे आज तक उससे उबर नहीं सके हैं। सामन्तवाद ने आर्थिक रूप से उनकी कमर तोड़ी है तो वर्ण-जातिवाद ने सामाजिक रूप से इतना शोषित, उत्पीडित और अपमानित किया है कि मनुष्य होने की अनुभूति भी वे नहीं कर सके। अन्य कारकों के साथ-साथ मुहावरों, लोकोक्तियों और कहावतों ने भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभायी है। भारतीय समाज और दलितों की स्थिति को गहनता से देखा जाए तो दलित, समाज के अंदर एक समाज और संस्कृति के अंदर एक संस्कृति हैं। दलितों का रहन-सहन और जीवन कैसा है, ग़ैर-दलित या उच्च-जातीय लोग उनके बारे में कैसा सोचते हैं तथा ऊच्च-जातीयों के बारे में दलित किस रूप में देखते हैं, इन मुहावरों, लोकोक्तियों और कहावतों में यह सब प्रतिबिंबित होता है।

मुहावरों और लोकोक्तियों में जातीयता 

लोक-समाज में प्रचलित और यहाँ दिए जा रहे कुछ मुहावरे और लोकोक्तियों में दलित जीवन, संस्कृति और उनके बारे में ग़ैर-दलितों, विशेषत: उच्च वर्ण और जातियों की सोच और व्यवहार की झलक देखी जा सकती है।

दलितों के पास अपनी खेती की ज़मीन नहीं है, बैल उनके किसी काम के नहीं हैं। गाय की अपेक्षा वे भैंस पालते रहे हैं तथा उसका दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते रहे हैं। क्योंकि भैंस गाय से अधिक दूध देती है। दलितों के लिए भैंस गाय से अधिक उपयोगी और महत्वपूर्ण है। किंतु धर्म और संस्कृति के झाँसे में आकर बहुत से दलित भैंस की बजाए गाय की पूजा करते पाए जाते हैं। धर्म और संस्कृति जैसे शब्द किस तरह एक विचारधारा को लोक मानस के अंदर गहरे तक रोपण और पोषण करते हैं यह मुहावरा इस तथ्य की ओर इंगित करता है।

  1. हाथी के पाँव में सबका पाँव।

गाँवों में ठाकुर-ज़मींदार ही सबसे बड़े और ताक़तवर होते हैं। सही मायनों में वी ही गाँव के हाथी हैं। वे जो कह दें वही सबकी राय होती है।कमज़ोर वर्गों या दलितों द्वारा उनकी बात काटना या उसका विरोध करना हिंसा और दमन को आमंत्रित करना है। उनकी बात काटने की हिम्मत कोई नहीं करता। इसी तरह, ब्राह्मण ही सर्वाधिक शिक्षित रहे हैं, साथ ही सर्वोच्च वर्ण होने के कारण उनकी कही बात का समाज में सर्वाधिक प्रभाव होता है। शास्त्रों का हवाला देकर ब्राह्मण जो कुछ कह देते हैं समाज द्वारा वही शिरोधार्य किया जाता रहा है। संभवत: ब्राह्मण और ठाकुरों के इस वर्चस्व के संबंध में ही दलितों द्वारा यह कहा गया हो कि ब्राह्मण-क्षत्रियों का विरोध मोल न लेकर उनकी हाँ में हाँ मिलाना ही उचित है। हाथी सबसे बड़ा जानवर होता है, उसका पैर सबसे बड़ा होता है। हाथी के पैर में किसी भी जानवर का पैर आ जाता है। इस मुहावरे में हाथी को प्रतीक बनाकर ब्राह्मण-ठाकुरों के वर्चस्व पर टिप्पणी की गयी है, क्योंकि ही वे बड़े हैं, बलशाली हैं और समाज के हाथी हैं।

  1. अक़्ल बड़ी कि भैंस।

यह कहावत मूढ़ या मूर्ख क़िस्म के लोगों के लिए है। उम्र और शरीर वे कितने ही बड़े हों, यदि उनमें अक़्ल नहीं है तो उनका कोई मूल्य नहीं है। कोई वस्तु या व्यक्ति छोटा है या बड़ा यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि उसकी उपयोगिता कितनी है। उपयोगिता ही मूल्य है। उपयोगी होने से ही कोई भी वस्तु मूल्यवान और बड़ी होती है। सदियों तक शिक्षा के अधिकार से वंचित रखे गए दलित अशिक्षित होने के कारण मूढ़ और अज्ञानी ही माने जाते रहे हैं। यह मुहावरा कहीं न कहीं दलितों की आशिक्षा और अज्ञान पर कटाक्ष कर उनका उपहास करता प्रतीत होता है। वे शरीर से कितने भी बड़े क्यों न हों, ब्राह्मण की बुद्धि के समक्ष उनका अस्तित्व बौना है।

  1. भैंस के आगे बीन बजाना।

यह मुहावरा भी मूढ़ या मूर्ख क़िस्म के व्यक्तियों के लिए ही है। वे बहुत मोटी बुद्धि के होते हैं और सरल से सरल बात को भी नहीं समझ नहीं पाते हैं। उनको कोई भी बात समझाना भैंस के आगे बीन बजाने के समान है। दलित और दरिद्र व्यक्तियों को प्रायः मूर्ख समझा जाता है। उनकी बात का कोई मूल्य और महत्व नहीं समझा जाता है। बीन की धुन को सर्प समझता है और उस पर नाचता है, जबकि भैंस बीन की धुन को नहीं समझती है और उस पर उसका कोई असर नहीं पड़ता है। भैंस के लिए बीन की धुन का कोई अर्थ नहीं है। इसी आधार पर दलितों के बारे में यह कहकर उनकी उपेक्षा कर दी जाती है कि वे कुछ नहीं समझ सकेंगे। उनसे कुछ भी कहना भैंस के आगे बीन बजाना है। यह मुहावरा उनकी अज्ञानत का उपहास और उनके अपमान की भावना से गढा गया प्रतीत होता है।

  1. काला अक्षर भैंस बराबर।

इस मुहावरे का अर्थ यह है कि जिसे अक्षरों की पहचान और अक्षरों का ज्ञान नहीं है, उसके लिए अक्षर और भैंस में कोई अंतर नहीं है। क्योंकि अक्षर भी काले रंग के होते हैं और भैंस भी काले रंग की होती है। किंतु उनमें क्या लिखा है, उनका अर्थ क्या है, यह वे नहीं समझते हैं। भैंस पालने वाले वे लोग काले रंग की भैंस को जानते हैं, इसलिए उनके बारे में इस मुहावरे के रूप में कहा जाता है कि उनके लिए तो काला अक्षर भैंस के बराबर है। उनके इस अज्ञान का ग़लत फ़ायदा उठाकर गाँव के सामंत-साहूकार लोग छोटे-मोटे क़र्ज़ के बदले काग़ज़ों पर अपनी ओर से कुछ भी लिखकर उनसे उस पर अंगूठे लगवा लेते हैं। और इस तरह उनके घर-खेत हड़प कर उनको बेघर, कंगाल और अपने अधीन बना लेते हैं। गाँवों में व्याप्त रही बेगारी प्रथा का सबसे बड़ा कारण यही रहा है, जो बहुत से क्षेत्रों में आज भी बना हुआ है। शिक्षा से वंचित और अक्षर ज्ञान से शून्य रहने के कारण साहूकार-सामंतों द्वारा दलितों का आर्थिक तथा ब्राह्मणों द्वारा सामाजिक  और सांस्कृतिक शोषण किया जाता रहा है। आशिक्षा के दुष्प्रभावों को भली-भाँति जानने-समझने के पश्चात ही बाबा साहब अम्बेडकर ने दलितों का शिक्षित होने का आह्वान किया था और उनको समझाया था कि आशिक्षा ही उनकी समस्त शोषण और अधोगति का मूल कारण है तथा शिक्षित होकर ही वे अपने दमन, शोषण और ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ सकते हैं तथा प्रगति और विकास के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं। शिक्षा ही उनके अंदर समानता, स्वतंत्रता, स्वाभिनाम और मानवीय गरिमा का भाव पैदा कर सकती है।

  1. बामन की गाय, न धेला साटत जाय।

ब्राह्मण की गाय को कोई एक पैसे को भी नहीं पूछता। क्योंकि लोक समाज में यह विश्वास है कि ब्राह्मण देवता है। ब्राह्मण को गाय का दान करने की परम्परा है और उसके पीछे यह विश्वास है कि दान में दी गयी उस गाय की पूँछ पकड़कर दानदाता यजमान स्वर्ग चला जाएगा। ब्राह्मण को गाय देने से पुण्य मिलता है, उसकी गाय लेने से पाप लगेगा। समाज में व्याप्त यह अंधविश्वास ही दलितों को मानसिक रूप से ब्राह्मणों का ग़ुलाम बनाए हुए है।

  1. कि पालत माय, कि पालत गाय।

यह मुहावरा गाय का महत्व प्रतिपादन करता है। हिंदू समाज में गाय को सर्वाधिक पवित्र और माँ की तरह माना और पूजा जाता है। जिस तरह माँ अपना दूध पिलाकर अपने बच्चों को पालती है, उसी तरह गाय बैल, गोबर, गौमूत्र और दूध देकर समाज को पालती है। इसी आधार पर यह कहावत बनी है कि या तो गाय पालती या माँ पालती है। यह कहावत उस मानसिकता को बल प्रदान करती है जो वेद, ब्राह्मण और गाय को सर्वाधिक पूज्य तथा भारतीय संस्कृति का आधार मानती है। इस मुहावरे के माध्यम से समाज में वैदिक/हिंदू संस्कृति की जड़ों को मज़बूत करने की कोशिश दिखायी देती है। दलितों के पास अपनी खेती की ज़मीन नहीं है, बैल उनके किसी काम के नहीं हैं। गाय की अपेक्षा वे भैंस पालते रहे हैं तथा उसका दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते रहे हैं। क्योंकि भैंस गाय से अधिक दूध देती है। दलितों के लिए भैंस गाय से अधिक उपयोगी और महत्वपूर्ण है। किंतु धर्म और संस्कृति के झाँसे में आकर बहुत से दलित भैंस की बजाए गाय की पूजा करते पाए जाते हैं। धर्म और संस्कृति जैसे शब्द किस तरह एक विचारधारा को लोक मानस के अंदर गहरे तक रोपण और पोषण करते हैं यह मुहावरा इस तथ्य की ओर इंगित करता है।

  1. जल में रहकर मगमच्छ से बैर।

जिस तरह से शेर जंगल का राजा होता है और वह किसी भी जानवर को अपना शिकार बना सकता है, उसी तरह मगरमच्छ पानी का राजा है। नदी, तालाब उसके साम्राज्य हैं। जल में रहने वाले किसी भी जीव को वह खा सकता है। मगर से दोस्ती करके ही उसके साम्राज्य में कोई जीवित रह सकता है, उससे वैर या दुश्मनी करके नहीं। गाँवों में ठाकुर-ज़मींदार मगरमच्छ की तरह हैं। उनसे दुश्मनी करके कोई गाँव में रह नहीं सकता। गाँवों में अपने साथ प्रति दिन होने वाले अत्याचार की घटनाओं के विरुद्ध दलित बहुत सशक्त रूप में विरोध नहीं कर पाते हैं क्योंकि यदि वे ऐसा करेंगे तो गाँव के दबंग लोग उन पर और अधिक अत्याचार करेंगे और उनका अपने दड़बेनुमा घरों से बाहर निकलना और जीना दूभर कर देंगे। जिन दलितों ने भी ऐसा करने का साहस किया है, उनको गाँव छोड़ना पड़ा है। यह साहस सब लोग नहीं कर पाते हैं। वे पानी में रहकर मगरमच्छ से दुश्मनी नहीं कर सकते हैं।

  1. गढ़े कुम्हार भरे संसार।

बर्तन बनाता तो कुम्हार है, लेकिन उसमें पानी सारी दुनिया भरती है। यह कुम्हार द्वारा जगत के प्रति परोपकार है। यदि वह घड़ा नहीं बनाए तो न जाने कितने लोग पानी से वंचित होकर मर  जाएँगे। चर्मकार, कुम्भकार, स्वच्छकार, लोहार, बढ़ई, नाई, तेली, माली, निम्न वर्ण और जातियों के ये सब लोग उच्च वर्णों और जातियों की सेवा का कर्म करते हैं। किंतु उनकी महान सेवा के उपरांत उच्च वर्ण और जातीय लोगों द्वारा उनको निम्न और तुच्छ मानकर उनके प्रति उपेक्षा का व्यवहार किया जाता है और उन्हें घृणित समझा जाता है। इस मुहावरे में कुम्हार के योगदान की स्वीकृति का भाव है किंतु व्यावहारिक जीवन में उनको न उचित सम्मान दिया जाता है और न उनके श्रम का उचित मूल्य ही। कुम्हार द्वारा बनाए गए मिट्टी के घड़े और अन्य बर्तनों की बाज़ार क़ीमत बहुत काम होती है। वस्तुत: भारतीय समाज की यही सबसे बड़ी विडंबना है कि यहाँ श्रम का नहीं जाति का महत्व है। वर्ण-जाति-व्यवस्था के अनुसार जो जाति जितनी छोटी है उसके द्वारा किया गया उत्पादन या श्रम उतना ही सस्ता होता है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि अर्थ-व्यवस्था या आर्थिक संबंधों का आधार भी जाति है। इसका लाभ उच्च जातियों को होता है और हानि निम्न जातियों को होती है।

  1. उलटे उस्तरे से मूड़ना।

सिर मूड़ना परम्परागत रूप से नाई जाति का काम रहा है। लोक में यह प्रचलित है कि नाई बहुत चालाक होता है, किसी-किसी को वह उलटे उस्तरे से मूड देता है। इस मुहाँवरे का अर्थ है   बेवक़ूफ़ बनाना। यह मुहावरा नाई जाति पर व्यंग्य है। व्यंग्य से अधिक नकारात्मक टिप्पणी है। उलटे उस्तरे से कभी किसी को मूड़ा नहीं जा सकता है। और किसी भी बाल कटवाने को यह पता चल जाएगा कि उसके सिर से बाल नहीं कटे हैं। तब, कोई नाई कैसे किसी को उलटे उस्तरे से मूड सकता है? वस्तुत: यह कथन यह द्योतित करता है कि नाई झूठ बोलते हैं और धोखेबाज़ होते हैं।सच यह है कि अन्य दलित जातियों की तुलना में नाई का संपर्क उच्च जातियों के साथ अधिक होता है क्योंकि सभी धर्म और जातियों के लोग उससे अपने बाल कटवाते हैं। उच्च जातियों से संपर्क के कारण उनके जीवन की बहुत सी विसंगतियों, कुटिलताओं, जटिलताओं और गोपनीयताओं से भी वे अवगत होते हैं। जिस कारण उच्च जातीय लोग कहीं न कहीं आशंकित रहते हैं कि नाई उनके रहस्य न खोल उनकी सामाजिक मर्यादा को ध्वस्त न कर दे। इसलिए इस मुहावरे के द्वारा उसके ख़िलाफ़ समाज में यह प्रचारित करने की कोशिश दिखायी देती है कि नाई झूठे और चालाक होते हैं, और किसी के साथ भी धोखा कर सकते हैं। इस तरह के मुहावरे निम्न जातियों का मनोबल तोड़ने और उनकी मानवीय गरिमा को कुचलने का काम करते हैं।

  1. एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा।

करेले का स्वाद कड़वा होता है और नीम का भी। कडुवापन एक दोष है। इस कहावत का अर्थ हुआ पहले से ही एक दोष के साथ दूसरा दोष भी हो जाना। यह सर्वविदित है कि करेला और नीम का स्वाद भले ही कड़ुवा हो किंतु ये बहुत गुणकारी होते हैं। किंतु नीम का संबंध दलितों के साथ जुड़ा है। प्रकृतिपूजक दलित पीपल, कदंब, नीम कई पेड़ों को अपना देवता और गोत्र मानते हैं।   बहुत से दलित नीम को अपना गोत्र या उपनाम के रूप में लिखते हैं, यथा-निम, निम्र, निमेश, नेमिशराय, निंबालकर आदि। दलितों के घरों में नीम का पेड़ ही सर्वाधिक पाया जाता है। संभवत: दलितों के साथ जुड़ा होने के कारण ही नीम के प्रति भी समाज द्वारा नकारात्मक भाव अपनाया जाता है।

11.चोरी चमारी।

चोरी एक अनैतिक कर्म है। जबकि चमार एक जाति है, जो भारतीय समाज-व्यवस्था में एक निम्न जाति है। चोरी के साथ चमारी शब्द जोड़ने से यह अर्थ निकलता है कि चमार अपनी जातीय प्रवृत्ति में अनैतिक होते हैं। यह चमारों का चरित्र हनन करने वाला मुहावरा है, और सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस मुहावरे का प्रयोग शिक्षित लोग भी सहजता से करते पाए जाते हैं। यह मुहावरा निश्चित रूप से उच्च जातीय लोगों द्वारा चमार अर्थात दलितों का चरित्र हनन कर उनका मनोबल तोड़ने का प्रयास है। यह दलितों के प्रति उनकी संकीर्ण मानसिकता को भी द्योतित करता है।

12.चमार चकल्लस या चमार चौदस।

अर्थहीन अथवा फ़िज़ूल की बकवास को चमार चकल्लस अथवा चमार चौदस कहा जाता है। इससे यह अर्थ निकलता है कि चमार कोई अर्थपूर्ण बात नहीं करते हैं, वे बिना सिर-पैर की अर्थहीन बात ही करते हैं। वस्तुत: जागरूक दलित लोग ब्राह्मणवादी वर्ग की वर्चस्ववादी और शोषणमूलक कुटिल नीतियों का भंडाफोड़ करते हैं। वे धार्मिक अंधविश्वास, परंपरा और पाखंडों को नहीं मानते, ईश्वर, आत्मा, परलोक, भाग्य आदि के अस्तित्व पर सवाल करते हैं तथा अपनी वैज्ञानिक और तार्किकता से आस्था और विश्वास पर खड़े वैदिक-पौराणिक चिंतन की जड़ों को हिलाते हैं तथा लोगों के मन में यह बात बैठाते हैं कि पूजा और प्रसाद धर्म नहीं होता, यह धर्म के नाम पर लूट का धंधा है। ब्राह्मणवादी वर्ग को उनकी यह बात अपने धंधे के विरुद्ध लगती है इसलिए दलितों की बातों के प्रति समाज को विकूख करने के लिए उनकी बातों को चकल्लस कहकर प्रचारित करना शुरू किया ताकि लोग उनकी बातों को न मानें तथा ब्राह्मणवादी वर्ग का धंधा चलता रहे। कबीर की बातों को भी तो ब्राह्मण वर्ग द्वारा उलटबासी अर्थात उलटी बात कहकर उनके प्रति दुष्प्रचार किया गया था। यह दोहराने की शायद आवश्यकता नहीं है कि मुहावरा भी दलितों का चरित्र हनन करता है तथा तथा उनके मनोबल को तोड़ता है।

  1. साल में चमार एक बार पिटा सही और बनिया लुटा सही।

इस मुहावरे के अनुसार चमार की साल में कम से कम एक बार पिटाई अवश्य होनी चाहिए और बनिया एक बार लुटना अवश्य चाहिए। पिटाई करने से व्यक्ति का मनोबल और स्वाभिमान टूटता है, और इसके बाद वह और अधिक दबकर और झुककर रहता है। बिना किसी अपराध या ग़लती के चमार की पिटाई क्यों होनी चाहिए? यह इस मुहावरे का मूल बिंदु है जो विचार की माँग करता है और उच्च जातियों की चमार अर्थात दलितों के प्रति घृणित मानसिकता को बेनक़ाब करता है। आशय यह है कि चमार को केवल इसलिए पीटा जाना चाहिए ताकि उसके अंदर स्वाभिमान पैदा न हो पाए, उसका मनोबल टूटा रहे और स्वयं को अपमानित और आशाय महसूस करता हुआ वह समाज के समक्ष कमर सीधी करके और सिर उठाकर सम्मान के साथ न चल सके। यदि उसके अंदर स्वाभिमान चेतना पैदा हो जाएगी तो वह उच्च जातियों के समक्ष सम्मान से सिर उठाकर चलेगा, स्वयं को निम्न और हीन नहीं समझेगा तथा अपने दमन, शोषण और उत्पीड़न का प्रतिकार करने लगेगा। यह उच्च जातियों की सामाजिक श्रेष्ठता और वर्चस्व के लिए एक चुनौती होगी। बनिया भी वेश्य होने के कारण वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण और क्षत्रियों की अपेक्षा निम्न जातीय है। किंतु, व्यवसाय-व्यापार करने के कारण वह अन्य वर्ण और जातियों की अपेक्षा अधिक समृद्ध होता है। आर्थिक समृद्धि समाज में स्वत: प्रभाव पैदा कर देती है। इसलिए आर्थिक समृद्धि के कारण बनिया का विशेष प्रभाव रहता है। उच्च जातीयों को यह स्वीकार नहीं होता कि बनिया उनसे अधिक प्रभावशाली हो जाए, इसलिए वे साल में कम से कम एक बार उसके लूटने की कामना करते हैं। उसे आर्थिक क्षति होगी तो उसका प्रभाव भी बढ़ाने से रुकेगा। इस लोकोक्ति में उच्च वर्ण और जातियों द्वारा बनिए को आर्थिक रूप से कमज़ोर करने तथा चमारों को दबाकर और अधीन रखने की मानसिकता दिखायी देती है।

  1. नंगी क्या नहावै क्या निचोड़े।

इस मुहावरे में स्त्री का नंगापन आर्थिक अभाव का सूचक है। लेकिन यह एक सच्चाई भी है कि देश के कई भागों में दलितों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय है कि स्त्रियों के पास केवल एक साड़ी होती है और इस कारण वे महीनों तक स्नान नहीं कर पाती हैं कि स्नान के बाद दूसरी साड़ी कहाँ से पहनेंगी। कई परिवारों में स्थिति इतनी भयावह है कि एक परिवार में दो स्त्रियाँ हैं लेकिन उनके पास एक ही साड़ी है। इस कारण एक समय में एक स्त्री ही घर (झोंपड़ी) से बाहर निकलती है, और दूसरी स्त्री घर के अंदर नंगी बैठी रहती है। इस मुहावरे के केंद्र में दलित स्त्रियों की दयनीयता ही है।

  1. यदि यह न कर दूँ मुझे किसी चमार (या चूहड़े) की औलाद कहना।

उच्च जातियों के लोग किसी चुनौती को स्वीकार करते समय प्रायः यह कहते हैं कि यदि मैं यह न कर दूँ तो मुझे ब्राह्मण (या क्षत्रीय आदि) की नहीं किसी चमार या चूहड़े की औलाद कहना। यह इस बात का स्पष्ट द्योतक है कि वे चमार और चूहडों अर्थात दलितों को अत्यंत तुच्छ, घृणित और हेय मानते हैं। लोक समाज में यह मुहावरा बहुत अधिक प्रचलित है। यह मुहावरा किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात हो सकती है। किंतु जाति पर गर्व करने वाले भारतीय सवर्ण हिंदू समाज को यह शर्मनाक नहीं लगता है। यदि उनको यह शर्मनाक लगता तो इस मुहावरे का और इस तरह के अन्य मुहावरे कभी अस्तित्व में नहीं आ सकते थे, और यदि इस तरह के मुहावरे बन गए और प्रचलित हो भी गए तो इस तरह के मुहावरों का प्रयोग कभी का बंद हो चुका होता।

  1. जाके पाँव ना फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।

किसके पैरों की बिवाइयाँ फटती हैं? सब जानते हैं कि बिवाइयाँ उनके पैरों की ही फटती हैं, जिनके पास पैरों में पहनने के लिए जूते नहीं होते, जो नंगे पांव रहने को अभिषप्त हैं। यह स्थिति प्रायः दलितों की होती है। वे ही सदियों से आर्थिक रूप से इतने अभावग्रस्त रहे हैं कि पेट की भूख मिटाने के लिए रोटी के अलावा शरीर ढकने के लिए कपड़े और पैरों में पहनने के लिए जूते/ जूती उपलब्ध नहीं हो पाती। दलित लोग सदियों से अनेक प्रकार के निषेध और वर्जनाओं के शिकार रहे हैं। यह तो लगभग सब जानते हैं कि बहुत से गाँवों में दलितों को घोड़ी पर बैठकर नहीं निकलने दिया जाता, बहुत से मंदिरों में उनका प्रवेश वर्जित है। किंतु यह भी एक सत्य है कि देश के बहुत से गाँवों में आज भी दलित लोग गाँव के अंदर घुटनों से नीचे धोती, सिर पर पगड़ी और पैरों में जूते-चप्पल पहनकर नहीं निकल सकते। यदि आज इक्कीसवीं सदी में भी, जब भारत एक स्वतंत्र, प्रभुत्वसंपन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य है जिसके संविधान में सभी नागरिक समान हैं और सबको समानता और स्वतंत्रता के जीने का अधिकार है, यह स्थिति है तो पहले दलितों की क्या स्थिति रही होगी इसे सहज समझा जा सकता है। वे नंगे रनहे को बाध्य थे। नंगे पैर रहने से उनके पैरों में बिवाइयाँ पड़ना आम बात थी। बिवाइयों का दर्द क्या होता है, इसको दलित ही समझ सकते थे।  कोई अन्य उनकी पीड़ा को नहीं समझ सकता था। इस मुहावरे में दलितों की दयनीयता के प्रति करुणा का भाव है।

  1. ग़रीब की जोरू सब की भाभी, अमीर की जोरू सबकी चाची।

लोक समाज में यह सामान्य सी बात है कि ग़रीब व्यक्ति को कोई सम्मान नहीं दिया जाता है, अपितु उनका उपहास किया जाता है। न उनकी बात का महत्व और मूल्य होता है और न मानवीय गरिमा का। दबंग और प्रभावशाली लोग जानते हैं कि वे ग़रीबों को कुछ भी कह लें, उनके साथ कैसा भी आपत्तिजनक, अश्लील और अमानवीय व्यवहार कर लें, वे उनके सामने मुँह नहीं खोल सकते हैं। ग़रीब भी अपनी दयनीयता को समझते हैं, इसलिए वे भी दबंग और प्रभावशाली लोगों की सारी अभद्रता, अश्लीलता और अमानवीयता को चुपचाप सह लेते हैं। इस कारण ही अमीर और प्रभावशाली लोग, जब भी अवसर मिलता है, ग़रीबों की स्त्रियों के साथ अश्लील टिप्पणी और व्यवहार करते हैं। बड़ी उम्र के अमीर और प्रभावशाली लोग भी ग़रीबों की युवा स्त्रियों को भाभी कहकर उनके साथ अश्लील मज़ाक़ और छेड़छाड़ करते हैं, जबकि ग़रीब लोग अमीर और प्रभावशाली लोगों की युवा स्त्रियों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं और अपने से कम उम्र की या गाँव रिश्ते में भाभी लगने वाली स्त्रियों को भी चाची कहकर संबोधित करते हैं कि कहीं भाभी कहने पर वह बुरा न मान जाए। यह कोई कहने की बात नहीं है कि लोक समाज में प्रायः दलित ही ग़रीब होते हैं तथा उच्च जातियों के लोग ही अमीर और प्रभावशाली होते हैं।

साधू संत लोग जाति-पाति के भेदभाव से ऊपर होते हैं। संत या साधू का वेश और जीवन अपनाने के पश्चात व्यक्ति सामाजिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह केवल मनुष्य रहता है और सबको मनुष्य के रूप में ही देखता है। वह न किसी की जाति पूछता है और जाति के आधार पर किसी के साथ व्यवहार करता है। इसलिए लोक जीवन में कहा जाता है कि साधू की जाति नहीं पूछनी चाहिए, बल्कि उससे ज्ञान की बातें पूछनी चाहिए।

  1. मानो तो देव नहीं तो पत्थर।

यह मुहावरा धार्मिक आस्था और विश्वास तथा उसके प्रतिकार के बीच द्वंद्व को अभिव्यक्त करता है। लोक समाज धार्मिक आस्था और विश्वासों को मानता है। इस विश्वास के चलते ही ईश्वर को मानता है तथा अनेक प्रकार के देवी-देवताओं की पूजा करता है। ब्राह्मणवादी वर्ग लोक मानस में इस विश्वास को बनाए रखने और इसे पुख़्ता करने के लिए हर संभव प्रयास करता है। जबकि चार्वाक, लोकायत और बौद्ध मत से प्रभावित समाज का एक वर्ग ईश्वर को नहीं मानता। दलितों का संबंध संत, सिद्ध, नाथ और बौद्ध धर्म के साथ रहा है। सभी दलित संत निर्गुण और निराकार के उपासक रहे हैं। वे मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते। गौतम बुद्ध अनित्यवादी है। बौद्ध दर्शन ईश्वर जैसी किसी नित्य, शाश्वत सत्ता का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता। बौद्ध और संतों के इस प्रभाव के कारण दलितों में आयी चेतना देवी-देवताओं की शक्ति पर संदेह और सवाल करती है तथा देवी-देवताओं को पत्थर की शक्तिहीन मूर्तियाँ मानकर इनकी पूजा से विमुख रहती हैं। समाज में विभिन्न मटोम के बीच संतुलन बनाने वाला भी एक वर्ग होता है। मूर्तिपूजक और मूर्तिभंजक दोनों के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से सामज्जस्यवादियों द्वारा यह मुहावरा गढ़ा गया प्रतीत होता है, ताकि दलितों की भावना भी शांत रहे और ईश्वर के प्रति विश्वास भी बना रहे।

  1. साँच को आँच नहीं।

दलितों का शोषण असत्य, अतार्किक और अवैज्ञानिक सिद्धांतों, मान्यताओं और परंपराओं के आधार पर किया जाता रहा है। झूठ और धोखे से ही उनका आर्थिक शोषण किया गया है। वे जानते थे कि उनके साथ धोखा और छल किया गया है, सत्य कुछ और है। किंतु अपनी सामाजिक-आर्थिक दयनीयता और बेबसी के कारण वे शोषक़ वर्ग का प्रतिकार नहीं कर सकते थे। ऐसे में उनके पास स्वयं को यह समझाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था कि सच कभी नहीं मरता। देर-सबेर सच सामने आएगा और उनको न्याय मिलेगा। शोषक़ वर्ग द्वारा ही उनको यह सिखाया जाता है कि सत्य कभी छिपता नहीं है। यदि तुम्हारे साथ असत्य और अन्याय हुआ है तो एक न एक दिन वह सामने अवश्य आएगा। इसके अलावा अशिक्षित और दरिद्र होने के कारण दलितों को जो कुछ सहना पड़ा है उसे सुनकर ही हृदय काँप जाता है, दलित इस यथार्थ के भक्त भोगी हैं। वे यह जानते हैं कि यदि उन्होंने असत्य बोला और वह पकड़ा गया तो उनको बहुत कठोर दमन और यन्त्रणा का शिकार होना पड़ेगा। इसलिए वे  सत्य के मार्ग पर चलते हैं तथा असत्य बोलने अथवा असत्य कर्म करने से से डरते हैं। कष्ट सहकर भी वे सत्य का मार्ग नहीं छोड़ते। उनको सत्य से उम्मीद होती है। इस मुहावरे के पीछे ये दोनों ही मानसिकताएँ दिखायी देती हैं।

20.ग़रीबी में आटा गीला।

तंगी के समय में किसी बाधा का आ जाना। आटे में अधिक पानी गिर जाने से उसकी रोटी नहीं बन सकती। वह किसी उपयोग का नहीं रह जाता।ग़रीब भूखे व्यक्ति को बड़ी मुश्किल से थोड़ा बहुत आटा मिले और ग़लती से उसमें अधिक पानी गिर जाए तो वह भूखा का भूखा रह जाता है। यह मुहावरा ऐसे ही भूखे ग़रीब लोगों की त्रासदी को अभिव्यक्त करता है। साथ ही, दलितों को जागृत भी करता है कि उन्हें सावधानी से कार्य करने चाहिए ताकि आटा गीला होने जैसी स्थिति न आ पाए।

  1. घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या?

हम सब जानते हैं घोड़ा घास खाता है तभी ज़िंदा रहता है। यदि वह घास से दोस्ती कर ले और घास खाना बंद कर दे तो क्या खाकर वह जीवित रहेगा? यह मुहावरा सीख देता है यह सामान्य कि  जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक है, उनके साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।दलित वर्ग श्रमिक वर्ग है, जो दूसरों के घर, खेत और कारख़ानों में काम करके अपनी आजीविका चलाता है। यदि वह मुक्त में काम करने लगे और अपनी मेहनत का पारिश्रमिक लेना बंद कर दे तो उसकी आजीविका कैसे चलेगी? गीता का निष्काम कर्म का दर्शन श्रमिकों को पारिश्रमिक की माँग या कामना न करके निष्काम भाव से अपना कर्म करने की प्रेरणा देता है। अर्थात फल की कामना न करके केवल श्रम करो। उसके बदले मालिक जो कुछ भी दे दे, उसे स्वीकार करो। कम हो तो प्रतिकार नहीं करो। देश में बंधुवापन की प्रथा शुरू होने के पीछे बहुत कुछ गीता के इस दर्शन ने काम किया है। गीता श्रीकृष्ण के मुख से निकला उपदेश है, जो स्वयं भगवान हैं, इसलिए उनके मुख से निकले शब्दों के पालन को भगवान की इच्छा और धर्म का आदेश बताकर दलितों का सदियों तक शोषण किया जाता रहा है। निष्काम-कर्म का यह दर्शन दलितों को अपने श्रम के बदले मालिक से उचित पारिश्रमिक माँगने के रोकता है। इस मुहावरे में गीता के निष्काम कर्मयोग का प्रतिकार दिखायी देता है।

  1. जात न पूछो साधु की।

तात्पर्य यह है कि साधू संत लोग जाति-पाति के भेदभाव से ऊपर होते हैं। संत या साधू का वेश  और जीवन अपनाने के पश्चात व्यक्ति सामाजिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह केवल मनुष्य रहता है और सबको मनुष्य के रूप में ही देखता है। वह न किसी की जाति पूछता है और जाति के आधार पर किसी के साथ व्यवहार करता है। इसलिए लोक जीवन में कहा जाता है कि साधू की जाति नहीं पूछनी चाहिए, बल्कि उससे ज्ञान की बातें पूछनी चाहिए। प्रश्न यह है कि कौन सा ज्ञान साधक पास होता है? साधू को कौन से विज्ञानों का ज्ञान होता है जिसे उससे ग्रहण करने पर लोक परंपरा बल देती है। साधू केवल ईश्वर की, आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक, इहलोक-परलोक, भाग्य, नियति, पाप-पुण्य अथवा वेद पुराणों की बात करता है। साधु-वर्ग वर्ण-व्यवस्था, जातिगत ऊंचनीच और भेदभाव तथा तदजनित शोषण, दमन, अन्याय और अत्याचारों का विरोध नहीं करता, अपितु इस धार्मिक-सामाजिक असमानता और अन्याय का प्रतिकार की चिंगारियों को धार्मिक उपदेशों से शांत करने का कार्य करता है। जीवन की समस्याओं का समाधान नहीं बताता, और न जीवन के शोषण, उत्पीड़न, अभाव, अन्याय, दु:ख़ों से मुक्ति का कोई उपाय बताता है। वह केवल स्वर्ग के सपने दिखाता है तथा स्वर्ग सुख की चाह पैदा कर स्वर्ग जाने का उपाय अथवा मोक्ष प्राप्ति पर बल देता है। जन्म-मरण ईश्वर के बंधन से मुक्त होकर ईश्वर के पास, उसके श्रीचरणों में जाकर परम सुख पाने की प्रेरणा देता है। ईश्वर की उपासना और भक्ति के तरीक़े बताता है। इससे बहुत से प्रपंच, पाखंड, और अंधविश्वासों को बल मिलता है और उनका पोषण होता है। इससे धर्म के नाम पर पाखंड का उद्योग फलता-फूलता है और धर्म के इस धंधे पर क़ाबिज़ पुजारी-पुरोहित वर्ग की आर्थिक समृद्धि और सामाजिक वर्चस्व स्थापित होता है। पुजारी-पुरोहित वर्ग वर्ण-जातिगत भेदभाव से मुक्त नहीं होता तथा वर्ण-जाति-व्यवस्था का पोषण और संरक्षण करता है। पुजारी-पुरोहित, अपवादों को छोड़कर, ब्राह्मण ही होते हैं और साधुओं की जमात अपनी शिक्षा और उद्यम के द्वारा ब्राह्मण वर्ग के हितों का पोषण करता है। ब्राह्मण वर्ग का धर्म के नाम पर यह धंधा फलता-फ़प्पलता रहे इसलिए इस वर्ग द्वारा ही यह प्रचारित किया गया कि साधू की जाति नहीं पूछनी चाहिए, उससे ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। जबकि सच्चाई यह है कि बहुत से साधू अपने वर्ण और जाति से मुक्त नहीं हो पाते और शुचिता का पूरा ध्यान रखते हैं। इसका कारण भी यह है कि अधिकांश साधू ब्राह्मण अथवा उच्च जातियों के होते हैं, जो थोड़े-बहुत निम्न जातियों के होते भी हैं वे भी अपने अज्ञान और अन्य साधुओं के प्रभाव में धार्मिक पाखंडों का ही पोषण करते पाए जाते हैं। इस सब के परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि यह मुहावरा ब्राह्मण वर्ग के हितों का पोषण करने वाला है, तथा दलित वर्ग का शोषण करने वाला है।

  1. एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा।

नीम को लेकर भी कई कहावतें लोक साहित्य में हैं। नीम का स्वाद कड़ुवा है। उस पर लगने वाला फल अर्थात निम्बोली भी कड़ुवी होती है। कड़ुवापन नीचता और दुष्टता का प्रतीक भी होता है इसलिए उसके प्रति लोगों के मन में नकारात्मकता का भाव होता है। इसके विपरीत आम मीठा फल देता है, इसलिए आम के पेड़ को पसंद किया जाता है तथा उसके प्रति सकारात्मकता का भाव होता है। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि नीम का संबंध दलितों के साथ है। नीम उनके जीवन और संस्कृति का हिस्सा है। प्रकृति-पूजक और प्रकृति से सहचर्य रखने वाले दलित अपने घर-आँगन में नीम का पेड़ लगने को प्राथमिकता देते हैं। नीम दलितों का एक गोत्र है। नीम या नीम से बनाने वाले बहुत से उपनाम दलितों द्वारा अपने नाम के साथ प्रयुक्त किए जाते हैं, जैसे- निम्र, निमेष, नैमिशराय, निमगड़े आदि। इसलिए नीम के प्रति कटुता या दुष्टता का भाव प्रकट करने वाली लोकोक्तियाँ अथवा कहावतें प्रकारांतर से दलितों को दुष्ट बताकर उनके प्रति हेयता का भाव प्रकट करती हैं।

  1. पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।

वास्तविक जीवन में दुःख और कष्ट भोगने वाला व्यक्ति सपनों में ही सुख का अनुभव करता है। किंतु पराधीनता इतनी कष्टकारी होती है कि उसमें सपने में भी सुख नहीं मिलता। क्योंकि पराधीन व्यक्ति के सपनों पर भी पराधीनता का साया रहता है। देश के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान, रामचरित मानस में लिखी गोस्वामी तुलसीदास की यह कहावत बहुत लोकप्रिय थी। इसने समाज के एक बड़े वर्ग में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध क्रांति की चेतना के प्रसार में योगदान दिया था। शताब्दियों पहले लिखी यह उक्ति उस दौर में सामान्य भारतवासियों के लिए विशेष रूप से अर्थवान हो गयी थी। किंतु दलितों के लिए इस कहावत का विशेष अर्थ और महत्व आज भी बना हुआ है। कारण, अंग्रेज़ों की दासता और आधिपत्य से देश के मुक्त और स्वाधीन हो जाने के बाद भी दलित अभी तक स्वाधीनता का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। वे अभी भी सामाजिक-आर्थिक पराधीनता के शिकार हैं तथा उच्च वर्ण एवं वर्गों के अधीन बने हुए हैं। वे कभी सुख का अनुभव नहीं कर पाते हैं।

  1. बाबा आवै न घंटा बाजै।

न बाबा आएगा, न घंटा बजेगा। अर्थात किसी विशेष शर्त के पूरा न होने पर कार्य सिद्ध नहीं होना। इस कहावत का मूल महाभारत की कथा में मिलता है। कथा इस प्रकार है- ‘महाभारत के बाद पांडवों को नींद नहीं आती थी। एक दिन कृष्ण जी से कहने लगे थे, भगवन हम तो रातों जागते हैं, हमारी आँखों के सामने बड़ी भयानक डरावनी शक्ल दिखायी देती हैं, इसी सबब से नींद नहीं आती। कृष्ण बोले सच कहते हो, तुम्हारे हाथों से बड़े ख़ून बहे हैं। पांडव कहने लगे भगवन इसका कोई उपाय भी है तो बताओ। कृष्ण जी बोले आप एक यज्ञ करें और सब को भोजन खिलाएँ, यज्ञ पूरा होने पर ये सब बीमारी बंद हो जाएँगी।पांडव बोले हम कैसे जान पाएँगे कि यज्ञ पूरा हो गया। कृष्ण जी बोलेएक घंटा आकाश में टाँगवाते हैं। यज्ञ पूरा होने पर इस घंटे की आवाज़ बिन बजाये आपको सुनाई देगी, समझ लेना यज्ञ पूरा हो गया। तब पांडव यज्ञ कराते हैं, उस यज्ञ में बड़े साधु संत ज्ञानी धानी आचार्य ब्राह्मण सभी जातियों के सभी स्त्री पुरुष भोजन पाकर सब चले गए, परंतु घंटा नहीं बजा। पांडवों ने कृष्ण जी से कहा भगवन घंटा तो बजा नहीं। कृष्ण बोले कोई संत महात्मा रह गया है। भगवान आप अपने योग बल से देखो कौन कहाँ रह गया है। तब कृष्ण जी ने बताया एक शूद्र जाति का साधु रह गया है, उसको लिवा कर लाओ।सुपच उसका नाम है, जंगल में फलानी जगह झोंपड़ी में रहता है। भीमसेन चल दिए। उसी झोंपड़ी पर पहुँच जाते हैं। भीमसेन ने पूछा, ‘संत जी आप किस नाम से जाने जाते हैं। संत जी बोले मुझको सुपच कहते हैं। भीमसेन बोला संत जी आपको भगवान कृष्ण जी ने बुलाया है हस्तिनापुर को चलिए। संत जी बोले वो कृष्ण क्यों नहीं आया। भीमसेन के मन में आग भड़क उठी और अपने मन में सोच रहा था, अरे इस नीच को और इसकी झोंपड़ी को अभी पाताल में पलट दूँ। संत जी ने भीमसेन की सारी बात समझ लीर बोले भीमसेन कोई बात नहीं, आप ऐसा करें, मेरी झोंपड़ी में खूँटी से मेरी माला को उतार लाओ और अपना लंगोट बदल कर अभी चलता हूँ। भीमसेन झोंपड़ी में खूँटी से माला उतारते हैं तो हाथ से नहीं छूते, और सोचते हैं कहीं छूट न लग जाए, तो अपने खांडे से उतारते हैं। खांडा माला के वज़न से नब जाता है।, माला नहीं उतरती खूँटी से। सुपच संत ने कहा भीमसेन माला नहीं उतरे तो आ जाओ देरी हो रही है। भीमसेन संत जी को साथ लेकर चल देते हैं। सुपच संत ने कहा भीमसेन तुम मेरी माला को खूँटी से न उतार सके तो मुझे और झौंपडी को पाताल कैसे पहुँचा देते। ये बात सुनकर भीमसेन सुपच के चरणों में गिर पड़ा और संत जी से क्षमा माँजी। चलकर हस्तिनापुर आ जाते हैं। पता होने पर द्रौपदी ने अनेक प्रकार के भोजन तैयार किए, तब संत जी को भोजन के लिए आसन बिछाया। संत जी आसन पर बैठ गए। अनेक प्रकार के भोजन संत जी के सामने रखे थे, संत जी एक बड़े बर्तन में सब को पलट कर एक जगह मिलाने लगे। ऐसा देखकर द्रौपदी के मन में विचार उठ रहे थे, इस महात्मा को भोजन पाने की तमीज़ नहीं है, ये तो कोई नीच जाति का साधु बासें सूखे झूठे टुकड़े खाने वाला है। संत जी द्रौपदी की बातों को परख कर फ़ौरन उठाकर चल दिए। किसी आदमी ने पूछा द्रौपदी से संत जी ने भोजन नहीं पाया, ये अभी आए थे अभी चल दिए। अब बाबा न आवे, और न घंटा बाजे….ये बातें कृष्ण ने सुनी तो पूछने लगे कि अब संत जी कहाँ गए। पता चला कि शहर से बाहर निकल गए, तब कृष्ण जी वहाँ पहुँचे और अपना सर संत सुपच के चरणों में रख दिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि आप हस्तिनापुर को वापस लौट चलो, आपको भोजन पाकर जाना होगा। बहुत प्रार्थना करने पर संत जी राज़ी हो गयीर कृष्ण जी अपने साथ हस्तिनापुर लौटा लाए। तब कृष्ण जी ने द्रौपदी से भोजन तैयार कराया, जब संत जी ने तीन बार अपने मुँह में भोजन लिया था, जब पांडवों को तीन बार घंटे की आवाज़ कानों में सुनाई पड़ी, तब पांडवों का यज्ञ पूरा हुआ था।’1

संदर्भ

  1. ज्ञानी रतन सिंह, बौद्धिक कसौटी एवं दुःख का निवारण, पृष्ठ-41-43

(पहली किस्त)

1 Comment
  1. […] मुहावरों और कहावतों में जाति […]

Leave A Reply

Your email address will not be published.