बॉलीवुड ने कैम्पस के जीवन और राजनीति का उथला चित्रण किया है

राकेश कबीर

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भारतीय शिक्षा व्यवस्था और उसके विभिन्न पहलुओं पर बहुत कम फ़िल्में बनी हैं। शिक्षण संस्थानों की बात करें तो तक्षशिला, नालंदा विश्वविद्यालय और अन्य स्थानों पर बने बौद्ध विहार ही औपचारिक शिक्षा के प्रारंभिक केंद्र के रूप में जाने जाते हैं। भारतीय समाज में शिक्षा के विकास क्रम को देखें तो पता चलता है कि अनौपचारिक और औपचारिक दोनों तरह का शिक्षण यहाँ प्रचलित रहा है। उपनयन और शिक्षारम्भ जैसे संस्कारों के संपन्न होने के उपरांत गुरु के आश्रम में जाकर ज्ञान प्राप्त करने के वर्णन धार्मिक और पौराणिक आख्यानों में मिलते हैं। यह भी सत्य है कि संस्कार कराने और पढ़ने का अधिकार कुछ लोगों तक ही सीमित था। वर्तमान में फॉर्मल एजुकेशन का दौर है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना एक महंगा विषय हो चुका है। शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सारी पूंजी और इन्वेस्टमेंट समाहित हो गया है। औपचारिक शिक्षा से डिग्री हासिल करना और फिर धनार्जन करना संस्थान और विद्यार्थी दोनों का उच्चतम लक्ष्य बन चुका है। शिक्षा बाजार में बिकने वाली व्यावसायिक चीज बन चुकी है। सार्वजानिक क्षेत्र के विश्वविद्यालय भी डिग्री कालेजों को सबद्धता देकर फीस वसूलने और डिग्री देने वाले संस्थानों में तब्दील होते जा रहे हैं। प्रोफेसरों का समय अध्ययन, अध्यापन और शोध के स्थान पर परीक्षा कराने, कॉपी जांचने में ज्यादा खपत होने लगा है परिणामस्वरूप शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड रहा है। प्राइवेट कालेज और यूनिवर्सिटी भारी संख्या में पूरे देश में खुले हैं लेकिन शिक्षण और शोध में गुणवत्ता की उनसे अपेक्षा करना अभी फिलहाल दूर की कौड़ी है।

भारतीय सिनेमा में कालेज-यूनिवर्सिटी कैम्पसों, अध्यापकों/प्रोफेसरों और छात्रों का प्रस्तुतिकरण अच्छे ढंग से नहीं हुआ है। कालेज कैंपस को लड़के लडकियों के मिलने, नाचने-गाने और प्रेम करने के स्थल मात्र के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। महान अध्यापक किस तरह अपने विद्यार्थियों को शिक्षित कर देश और समाज हित में कार्य करने हेतु किस तरह तैयार करते हैं और किस तरह उनमे नवाचार और रचनात्मकता का विकास करते हैं इन विषयों को गंभीरता से नहीं उठाया गया है।

 

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अध्याय के अंतर्गत अनुच्छेद 41, 45 और 46 में देश के नागरिकों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रावधान किया गया है। सभी आधुनिक और औद्योगिक देशों में शिक्षा की व्यवस्था राज्य द्वारा की जाती है। इस कार्य के लिए स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटी जैसी संस्थाओं की स्थापना की गयी है। निःशुल्क शिक्षा, अधिकतम अनिवार्य उपस्थति, अध्यापक-प्रोफेसर के पदों पर नियुक्तियां करना राज्य के दायित्वों में शामिल है। शिक्षा और उसके उदेश्यों पर विभिन्न विचारकों ने अपने अलग-अलग मत प्रस्तुत किये हैं। ईमाइल दुर्खीम जैसे प्रकार्यवादी समाजशास्त्रियों का मानना है कि, ‘एक समान शिक्षा से सामाजिक संगठन मजबूत होता है।’ मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य के अनुसार ‘शिक्षा उद्योगों के लिए श्रमिक शक्ति का पुनरुत्पादन करती है’। इवान इलिच डीस्कूलिंग सोसाइटी शीर्षक अपनी किताब में स्कूल को एक दबावकारी संस्था बताते हैं जो खास तरह के फ्रेमवर्क में व्यक्ति के सोच व व्यवहार को ढालती है। वास्तव में शिक्षा को एक स्वतंत्र कारक शक्ति की तरह काम करना चाहिए ताकि एक व्यक्ति की स्वतंत्र सोच विकसित हो और उसकी रचनाशीलता का विकास हो। लुई अल्थुजर के अनुसार राज्य का वैचारिक हथियार (आइडियोलॉजिकल अपेरेटस) भी है आधुनिक शिक्षा। राज्य की वैचारिकी को सपोर्ट करने वाला सिलेबस तय करना और औपचारिक शिक्षण संस्थानों के माध्यम से अध्यापकों और विद्यार्थियों में उसका प्रचार-प्रसार करना पूरी दुनिया के राष्ट्र-राज्यों में एक प्रचलित उपाय रहा है। ऐसी शिक्षा व्यवस्था शासक वर्ग के लिए सुविधाजनक होती है और उसकी नीतियों का लोग विरोध नहीं करते जिसके कारण सस्ता और सुलभ श्रम भी उपलब्ध होता रहता है।

बॉलीवुड और शिक्षा कैंपस के बीच के सरोकार अलग हैं

भारतीय सिनेमा में कालेज-यूनिवर्सिटी कैम्पसों, अध्यापकों/प्रोफेसरों और छात्रों का प्रस्तुतिकरण अच्छे ढंग से नहीं हुआ है। कालेज कैंपस को लड़के लडकियों के मिलने, नाचने-गाने और प्रेम करने के स्थल मात्र के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। महान अध्यापक किस तरह अपने विद्यार्थियों को शिक्षित कर देश और समाज हित में कार्य करने हेतु किस तरह तैयार करते हैं और किस तरह उनमे नवाचार और रचनात्मकता का विकास करते हैं इन विषयों को गंभीरता से नहीं उठाया गया है। मानव विज्ञानों में सिद्धांतों की खोज, प्राकृतिक विज्ञानों में नए शोध और जनहित की तकनीकों की खोज जैसे विषयों पर केन्द्रित फिल्मों पर भी अभी तक

 कोई उल्लेखनीय काम नहीं हुआ है। प्रेम एक बेहद खूबसूरत भावना है और शिक्षा संस्थानों में युवा हृदय में इसका पनपना कोई बुरी बात नहीं लेकिन रुपहले परदे वाले निर्माता स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर टाइप फिल्मों में शिक्षण संस्थाओं की भूमिका मात्र यही तक सीमित कर देते हैं जो उनकी सस्ती व्यावसायिक मानसिकता का परिचायक है। शिक्षण संस्थानों के सामाजिक, सांस्कृतिक, और राजनीतिक पहलू भी होते हैं। व्यक्ति और समाज को दिशा देने और बृहत्तर रूप में राष्ट्र के स्वरूप निर्धारण में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों तथा अध्यापकों की अति महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यहाँ हम यह जान्ने की कोशिश करेंगे कि बॉलीवुड फिल्मों में इस महत्वपूर्ण विषय को कितना महत्व दिया गया है और किस तरह का चित्रण किया गया है।

शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को समानता और नैतिकता आधारित एक महान समाज और राष्ट्र निर्माण का होना चाहिए परन्तु जब डॉ पायल तड़वी, रोहित वेमुला, डेल्टा मेघवाल जैसे दलित-पिछड़े/वंचित समाजों के विद्यार्थियों को अपने सहपाठियों के भेदभाव और शोषण से तंग आकर आत्महत्या करनी पड़ती है तब हमारे आधुनिक शिक्षा संस्थानों के सामने एक गम्भीर सवाल खड़ा होता है। हमारे देश के कई विद्वान यह बताते नहीं थकते कि जाति और जातिवाद अब बीते दिनों की बात हो चुके हैं। दीपांकर गुप्ता, अरविन्द एम शाह जैसे समाजशास्त्री तो गाँव और जाति को इक्कीसवी सदी में समाप्त होने की झूठी घोषणा तक कर देते हैं। लेकिन दुखद सत्य यह है कि देश के शिक्षण संस्थान एक ऐसे पब्लिक स्फीयर के रूप में मौजूद हैं जहां जातिवाद अभी भी जिंदा ही नहीं है जिसकी सबूत उपर वर्णित घटनाएँ हैं। सन 2007 में इंडिया अनटच्ड शीर्षक डाकुमेन्ट्री में डायरेक्टर स्टालिन के. ने देश में प्रचलित विभिन्न प्रकार के छुआछूत को प्रस्तुत किया था जिसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली कैंपस में भी जातिवाद और छुआछूत का दृश्य मौजूद था। सामाजिक न्याय की कब्रगाह बनते शिक्षण संस्थानों के कैंपस खतरनाक स्थिति की तरफ संकेत करते हैं।

शिक्षा व्यवस्था से सम्बंधित प्रमुख फ़िल्में

जागृति (1954), दो आँखें बारह हाथ (1957), प्रोफेसर (1962), बूँद जो बन गयी मोती (1967), परिचय (1972) इम्तिहान (1974), बुलंदी (1980), सर (1993), मास्टर जी (1985), अग्निपथ 1990 & 2012, कुछ कुछ होता है (1998), रोकफोर्ड (1999), मोहब्बतें (2000), हजारों ख्वाहिशें ऐसी (2005), हासिल (2003), मुन्नाभाई एम् बी. बी. एस. (2003), इश्क विश्क (2003), स्वदेश (2004), युवा (2004), मै हूँ ना (2004), हजारों ख्वाहिशें ऐसी (2005) ब्लैक (2005) इकबाल (2005) रंग दे बसंती (2006), चक दे इंडिया (2007), जाने तू या जाने ना (2008), तारे जमीन पर (2007), दिल दोस्ती एक्स्ट्रा (2007) गुलाल (2009), थ्री इडियट्स (2009), वेकअप सिड (2009) दो दूनी चार (2010), पाठशाला (2010) आरक्षण (2011), फालतू (2011), कालेज कैंपस (2011) स्टेनली का डब्बा (2011), , चक्रव्यूह (2012) नानबान (2012), राँझना (2013), 2 स्टेटस (2014), यारियां (2014), निल बट्टे सन्नाटा (2015), चाक एंड डस्टर (2016), फुकरे (2013 & 2017), हिंदी मीडियम 2017, जुड़वाँ 2 (2017), हाफ गर्लफ्रेंड (2017), हिचकी (2018), सुपर 30 (2019), स्टूडेंट ऑफ़ द इयर (2012 & 2019), बाटला हाउस (2019), अंग्रेजी मीडियम (2020)

बूँद जो बन गयी मोती (1967) एक ईमानदार स्कूल मास्टर सत्यप्रकाश के जीवन और कार्यों पर आधारित है यह फिल्म। सत्यप्रकाश (जितेन्द्र) एक मेहनती और सच्चाई का पक्ष लेने वाला अध्यापक है और नये तरीकों से बच्चों को पढ़ाना चाहता है जिसके कारण वह अक्सर मुश्किलों में फंसता रहता है। फिल्म के एक आइकोनिक गीत के प्रस्तुतीकरण को देखें तो दीवारों से मुक्त प्रकृति के बीच मास्टर सत्यप्रकाश और उनके विद्यार्थी एक गीत गा रहे हैं –वो कौन चित्रकार है जो शान्तिनिकेतन वाले गुरु रबीन्द्रनाथ टैगोर की याद दिलाता है।

फिल्में दिखाती हैं कि अभी भी कैम्पस की राजनीति में सामंतवाद और फासीवाद हावी हैं

हासिल (2003) तिग्मांशु धुलिया की इस कल्ट फिल्म में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति और उससे जुड़े तमाम स्याह पहलुओं को उजागर किया है। रणविजय सिंह (इरफ़ान खान), गौरी शंकर पांडे (आशुतोष राणा) दो छात्रनेता.. अनिरुद्ध (जिम्मी शेरगिल) और निहारिका (ऋषिता भट्ट) दोस्त और प्रेमी युगल हैं। कुम्भ मेला भी है। इलाहाबाद-प्रयागराज के आसपास का वातावरण है, जातीय सामाजिक संरचना है, भाषा है और कैंपस में जातीय संघर्ष और वर्चस्व की जंग भी है। तथाकथित छात्र नेता गौरी शंकर पांडे एक मुठभेड़ के दौरान रणविजय सिंह को धमकाते हुए कहता है कि अब तुम पिछड़ों का झंडा मत उठा लेना और चुनाव तक यूनिवर्सिटी में दिखाई मत देना नहीं तो अगली बार जान से मार दिए जाओगे। इस संवाद से लगता है कि रणविजय सिंह किसी पिछड़ी जाति का छात्र नेता है। उसके गाँव का दृश्य देखकर भी ऐसा ही लगता है, जहाँ उसके परिवार के एक आदमी की हत्या कर दी जाती है। जातिवाद और क्षेत्रवाद आधारित गुटबाजी और संघर्ष कैंपस राजनीति की मूलभूत विशेषता है। पूर्व के ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इस विश्वविद्यालय से देश के अनेक मशहूर नौकरशाह, राजनेता, कवि/शायर, साहित्यकार, न्यायाधीश और विधिवेत्ता अध्यनोपरान्त विभिन्न देशों और सम्पूर्ण भारत में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं परन्तु हिंसक छात्रसंघ राजनीति इसकी छवि को कलंकित ही करती रही है। हासिल फिल्म की ही भांति तांडव (2021) फिल्म भी राजनीतिक दल और छात्र राजनीति के आपसी सम्बन्धों को चित्रित करती है। यह छात्र राजनीति को नए कलेवर में प्रस्तुत करती है जहाँ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जगह जेएनयू कैम्पस ले लेता है। जाति आधारित गोलबंदी और हिंसा पूर्वांचल के साथ-साथ देश के अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यमान रही है। महिलायें और बहुसंख्यक समाज के विद्यार्थी इस राजनीति में केवल मूकदर्शक और वोटर की भूमिका में रहें हैं। अन्य चुनावों की भांति ही छात्र राजनीति में भी जातीय चेतना और जातीय समीकरणों का निर्णायक प्रभाव रहता है। पिछले दो दशकों में संख्याबल और वोट के महत्व को समझकर विश्वविद्यालयों के कैम्पसों में नयी लामबन्दियां शुरू हो गयी हैं जिसके कारण पिछले कुछ सालों में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के छात्र भी छात्र संघ चुनावों में न केवल प्रतिभाग कर रहे हैं बल्कि जीत भी रहे है। उच्च शिक्षण संस्थानों खासकर डिग्री कालेजों और विश्वविद्यालयों में हिंसक छात्र राजनीति पर नियंत्रण लगाकर पठन-पाठन का माहौल को बेहतर बनाने के उद्देश्य से माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तत्कालीन सरकार ने लिंगदोह कमेटी गठित की। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 2006 में जमा की और 28 नवम्बर 2006 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने लिंगदोह कमिटी के सिफारिशों के आधार पर ही चुनाव कराने का सर्कुलर जारी कर दिया। इस कमेटी की सिफारिशों ने छात्र संघों को बहुत कमजोर कर दिया। आज कैम्पस में चुनाव का होना या न होना यूनिवर्सिटी या कालेज प्रशासन की दया और मनमर्जी पर निर्भर हो गया है।

यह छात्र राजनीति को नए कलेवर में प्रस्तुत करती है जहाँ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जगह जेएनयू कैम्पस ले लेता है। जाति आधारित गोलबंदी और हिंसा पूर्वांचल के साथ-साथ देश के अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यमान रही है। महिलायें और बहुसंख्यक समाज के विद्यार्थी इस राजनीति में केवल मूकदर्शक और वोटर की भूमिका में रहें हैं। अन्य चुनावों की भांति ही छात्र राजनीति में भी जातीय चेतना और जातीय समीकरणों का निर्णायक प्रभाव रहता है।

 

राजनीतिक पार्टियों द्वारा छात्र राजनीति में दखल का मुद्दा नया नहीं है। भारत की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों और क्षेत्रीय दलों के भी स्टूडेंट विंग विभिन्न कालेज और विश्वविद्यालयों के परिसरों में सक्रिय हैं। एनएसयूआई, एबीवीपी, एसऍफ़आई और आईसा जैसे छात्र संगठन राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कैम्पसों में सक्रिय हैं। ये संगठन अपने सम्बंधित राजनीतिक दलों के सहयोग व निर्देशन में अपने पार्टी की विचारधारा का प्रचार-प्रसार शिक्षण संस्थानों में करते रहते हैं। इन छात्र संगठनों का प्रमुख उद्देश्य छात्र संघों में चुनावों में हिस्सेदारी करके जीत हासिल करना भी होता है। कैम्पस की राजनीति में भाग लेने वाले छात्र नेता आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति में भी प्रतिभाग करते हैं। पंचायतीराज और नगरनिकाय चुनावों में चेयरमैन और सभासद से लेकर सांसद, विधायक सभी स्तरों पर चुनाव लड़कर जीतना इनका कैरियर बन जाता है। कैम्पस राजनीति का गहराई से अध्ययन किया जाय तो पता चलता है कि केवल स्टूडेंट ही नहीं प्रोफेसर साहबान भी राजनीतिक गुटबंदी में छात्रों के साथ सक्रीय भूमिका निभाते हैं। पार्टियों से जुडाव के परिणामस्वरूप ही उन्हें संसद, विधानसभा सदस्य, कुलपति और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां पाने का अवसर मिलता रहता है।

अनुराग कश्यप द्वारा निर्मित गुलाल (2009) राजस्थान की पृष्ठभूमि में विभिन्न जातियों के छात्र नेताओं के बीच जारी वर्चस्व के जंग का चित्रण करती है। राजशाही और जमींदारी टूटने का दर्द फिल्म के पहले ही दृश्य में केके मेनन के भाषण में स्पष्ट हो जाता है जो आजादी के पहले वाली राजशाही को स्थापित करने का संकल्प दिलाते हुए दिखते हैं। उसे लगता है कि सरदार पटेल और नेताओं ने उन्हें धोखा दिया जिसे उनके अधिकार छीन लिए जिसे पुनः हासिल करने का वक्त आ गया है। मुन्नाभाई एमबीबीएस (2003), तारे जमीन पर (2007) और थ्री इडियट्स (2009) भारतीय शिक्षा व्यवस्था में नकल, जुगाड़ और रट्टा मार पढ़ाई करके सौ प्रतिशत अंक पाने के लिए विद्यार्थियों पर दबाव बनाये जाने के मुद्दों को प्रमुखता से उठाती हैं। प्रतिभाओं के नैसर्गिक विकास के स्थान पर बाजार और कैरियर के दबाव ने ऐसी पीढ़ी को तैयार किया है जो अपने मूल्य और नैतिकता से दूर खुद में इन्वेस्ट किये गए पूंजी को जल्द से जल्द कमाकर वापस पा लेने के लिए अंधी दौड़ में शामिल होने को आतुर है। तारे जमीन पर के गुरु जी रामशंकर निकुम्भ इस बात से बेहद दुखी हैं कि लोग अपने बच्चों को रेस का घोड़ा बनाना चाहते हैं। थ्री इडियट्स में भी आमिर खान रणछोड़ दास चांचण नामक स्टूडेंट की भूमिका में अपने प्रिसिपल, दोस्तों और दर्शकों को अंधी रेस करने के स्थान पर पसंद के काम करने और काबिल बनने की सलाह देते हैं जिससे लोग सीखने पर जोर दें, न कि बिना समझे रटने पर। मुन्ना भाई सीरिज की दोनों फिल्में औपचारिक शिक्षा और ऊँची डिग्री के स्थान पर एक अच्छा संवेदनशील इंसान बनाने को ज्यादा बेहतर मानती हैं, जिस सोच की आज के समय में बेहद कमी है। निल बट्टे सन्नाटा (2015) स्कूल कालेज में अपने विद्यार्थी जीवन में हम सभी ने मजाक में इस मुहावरे को कई बार सुना होगा। कमजोर स्टूडेंट्स को टेस्ट या एग्जाम में कम नम्बर मिलने, फेल होने का भय दिखाने के लिए इसका प्रयोग गुरूजी लोग अक्सर करते हैं। अश्विनी अय्यर तिवारी सामाजिक मुद्दों पर सार्थक सिनेमा बनाने की पक्षधर हैं। फिल्म की नायिका चन्दा सहाय मेट्रिक फेल है और उसकी बेटी अपेक्षा को पढने-लिखने में कोई रुचि नहीं है। दोनों आगरा शहर में रहते हैं। माँ मेहनत-मजदूरी करके बेटी को पढ़ाना चाहती है ताकि उसकी बेटी को दूसरों के घरों में बाई बनकर चौका बर्तन न करना पड़े। चंदा और उसकी बेटी की मदद एक नेकदिल महिला डॉक्टर करती है जिसके घर में चंदा काम करती है, ताकि दोनों अच्छे से रह सकें और अपु अच्छे से पढ़ाई कर सके। चंदा खुद को ‘मिसरानी’ बोलती है क्योंकि वह दूसरों के घरों में खाना बनाने का काम करती है। फिल्म के अंतिम दृश्य में चन्दा की बेटी अपेक्षा/अपु आईएएस इंटरव्यू बोर्ड को बताती है कि वह आईएएस इसलिए बनना चाहती है कि उसे माँ की तरह बाई का काम न करना पड़े। चंदा की मालकिन महिला डॉक्टर और अपु का सहपाठी (जो माँ-बेटी दोनों को मैथ पढ़ाकर उनके अंदर अंकों के डर को भगाने का काम करता है) और स्कूल प्रिंसिपल भी दोनों माँ-बेटी का सहयोग करते हैं जो फिल्म के मानवीय पहलू को दिखाता है और भरोसा दिलाता है कि शिक्षा को एक महंगी बाजारू कमोडिटी बना देने के बाद भी मानवीयता के आधार पर सहयोग करने वाले लोग समाज में अभी भी मौजूद हैं। आनंद कुमार का सुपर 30 का आइडिया भारत ही नहीं पूरी दुनिया में एक फेनोमिना बन चुका है। गरीब लेकिन प्रतिभावान बच्चों को उच्च शिक्षा तक ले जाने के लिए आनन्द द्वारा किये गए प्रयास सराहनीय हैं। यहाँ अमेरिकी समाजशास्त्री शमूएल स्तोउफेर, ई.एच.सदरलैंड और रॉबर्ट मर्टन के सन्दर्भ समूह के सिद्धांत का ज़िक्र करना समीचीन होगा जिसमें उन्होंने बताया है कि जिस व्यक्ति के पास अभाव की स्थिति होती है उसके मन में सापेक्षिक वंचना की भावना एक प्रेरक का काम करती है ताकि वह जीवन में आगे बढ़ सके और वो सारी चीजें अर्जित कर सके जिनकी उसके पास कमी है। ऐसी प्रेरणा से संचालित व्यक्ति जीवन में सफल भी रहते हैं। भारतीय समाज में विभिन्नताओं के कारण ऐसे तमाम उदाहरण वास्तविक जीवन से मिल जाते हैं। फिल्म में अपु अधिकारी बनकर अपनी और माँ की सामजिक स्थिति को सुधारना चाहती है लेकिन आज ऐसे भी उदाहरण देखने को मिल रहें है कि शाह फैसल, कन्नन गोपीनाथ जैसे युवा आईएएस अधिकारी सिस्टम में एडजस्ट न कर पाने पर नौकरी से इस्तीफा देकर दूसरे क्षेत्रों में काम करना चाहते हैं।

हिंदी मीडियम (2017) अंग्रेज देश से चले गए लेकिन कॉन्वेंट स्कूल और अंग्रेजी मीडियम से शिक्षा को इस कदर स्थापित कर गए कि अंग्रेजी भाषा में शिक्षा ही बड़ी सफलता का आधार है। दूर देहात में खेतों के बीच दो कमरे के घर में भी कॉन्वेंट स्कूल खड़े हो चुके हैं और अंग्रेजी माध्यम के नाम पर माँ-बाप की जेब ढीली करने में लगे हैं। दिल्ली जैसे महानगर में तो अच्छे स्कूलों में दाखिले के लिए पेरेंट्स तक को परीक्षा देनी पड़ती है। पेरेंट्स का आर्थिक वर्ग, उनकी अंग्रेजी भाषा की जानकारी और इंग्लिश स्पीकिंग स्किल देखकर ही बच्चों को प्रवेश दिया जाता है ताकि स्कूल का रिजल्ट शत-प्रतिशत बरकरार रखी जा सके। ऐसे स्कूल एक ब्रांड की तरह स्थापित हैं और शिक्षा के बाजार में उनकी बड़ी डिमांड है। हिंदी मीडियम फिल्म के माध्यम से दिल्ली में रहने वाले मध्यम वर्गीय परिवारों की सोच, इंग्लिश मीडियम स्कूलों के नखरे और सारी आपाधापी को यथार्थ ढंग से दिखाया गया है। इरफ़ान खान जैसे प्रतिभावान अभिनेता और अन्य कलाकारों की अदाकारी ने इस महत्वपूर्ण विषय की गंभीरता को रेखांकित और प्रस्तुत करने का शानदार काम किया है। भारत की राजधानी दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में एलिट ब्रांडेड महंगे स्कूलों में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाना जंग जीतने जैसा है। आपके पास पैसा हो, आप महंगे कपडे और जूते पहनते हों, महंगी गाड़ियों में चलते हो तो चला करें अगर आपको अच्छी ब्रिटिश या अमेरिकन स्टाइल में अंग्रेजी बोलने नहीं आती है तो शहर के क्लबों की शाम वाली पार्टियों में आपके लिए घुस पाना मुश्किल है। इसी तरह आपके बच्चों का निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में प्रवेश ले पाना सबसे मुश्किल काम है। इस फिल्म के व्यवसायी दम्पति राज बत्रा और उसकी पत्नी मीता अपनी बेटी का प्रवेश ऐसे नर्सरी स्कूल में दिलाना चाहते हैं जहाँ माँ-बाप को भी एंट्रेंस एक्जाम पास करना अनिवार्य है। इसके लिए दोनों क्या-क्या जतन करते हैं ये सब देखने लायक है। इसके लिए सबसे पहले दिल्ली के चांदनी चौक जैसे गलियों वाले पुराने मुहल्ले से साउथ दिल्ली के पाश इलाके में घर लेना होता है। घर लेने के बाद भी मुश्किलें कम कहाँ होती हैं। थक हारकर दम्पति को गरीब होने का नाटक करना पड़ता है ताकि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए राइट टू एजुकेशन कानून 2009 के तहत किये गए प्रावधान के अंतर्गत ही प्रवेश मिल जाये। इसके लिए वे दिल्ली के स्लम में रहने वाले परिवारों से मिलते और बात करते हैं ताकि कोई ट्रिक मिल जाए और राज और मीता की बेटी को प्रवेश मिल जाए। इन सबके बीच फिल्मी मसाला और अतिवाद भी दिखता है। इस भाग दौड़ में दिल्ली में बसी दो दुनिया के ‘बाइनरी अपोजिशन’ अमीरी-गरीबी, अंग्रेजी-हिंदी बोलने वाले, साधन संपन्न-साधनहीन (हैव्स एंड हैव्स नॉट) सबके बारे में पता चलता है। अंग्रेजी स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए कोच, एलिट प्रिसिपल सब परदे पर आते हैं और बता जाते हैं कि हमारी अपनी दिल्ली कितनी विविधता वाले शख्सियतों से भरी पड़ी है. फिल्म ने जितना दिखाया जहाँ उससे आगे और भी हैं। अच्छे संस्थान में एक बार प्रवेश मिल गया तो भी पांच अंकों की सेलरी कमाने वाले माँ-बाप के यदि दो बच्चे पढ़ने वाले हों तो उनकी हालत ये हो जाती है कि महीने का तीस तारीख आते-आते जेब खाली हो जाती है।

निल बट्टे सन्नाटा (2015) स्कूल कालेज में अपने विद्यार्थी जीवन में हम सभी ने मजाक में इस मुहावरे को कई बार सुना होगा। कमजोर स्टूडेंट्स को टेस्ट या एग्जाम में कम नम्बर मिलने, फेल होने का भय दिखाने के लिए इसका प्रयोग गुरूजी लोग अक्सर करते हैं। अश्विनी अय्यर तिवारी सामाजिक मुद्दों पर सार्थक सिनेमा बनाने की पक्षधर हैं।

 

सुपर 30 (2019) शिक्षा और शिक्षक की बात करते समय आनन्द कुमार का ज़िक्र करना अपरिहार्य हो जाता है। आनंद कुमार के प्रेरणादायक जीवन पर सुपर 30 शीर्षक से एक सफल फिल्म बनी. अमीरी-गरीबी, हिंदी-अंग्रेजी, आदर्श-व्यवसाय का द्वंद या बाइनरी-अपोजिशन यहाँ भी केंद्र में रहा। यहाँ भी त्याग, समर्पण और आदर्श वाले जिद की की ही जीत होती है। आंकड़ों की बात करे तो 2018 तक आनंद कुमार के पढ़ाये 480 में से 422 छात्र आईआईटी में प्रवेश पा चुके हैं जो अपने आप में अनोखा रिकॉर्ड है। आनंद कुमार हावर्ड और मेसाचुसेट इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेकनॉलोजी जैसे दुनिया के बेहतरीन संस्थानों में गरीब किन्तु प्रतिभाशाली बच्चो को समर्पित अपने प्रोगाम के बारे में अपने विचारों को शेयर कर चुके हैं। इन्हें दुनिया भर के कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। सन 2010 में टाइम मैगजीन ने एशिया के महान हस्तियों में आनंद कुमार को शामिल किया। रामानुजन अवार्ड, मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार 2010, ग्लोबल एजुकेशन अवार्ड 2018, अमेरिका का एजुकेशन एक्स्सीलेंस अवार्ड 2019, भी आनंद कुमार को मिले जो शोषित-वंचित समाज के पक्ष में किये गए उनके योगदान के महत्व को रेखांकित करते हैं। इस दुनिया में जनहित के काम करना आसान नहीं होता। जब आप बिना स्वार्थ के गरीबों, पिछडो, शोषितों-वंचितों के हक में आवाज उठाते हैं या काम करते हैं तो खतरे बहुत होते हैं। शिक्षा को बाजारू वस्तु बनाकर बेचने वाले माफिया ने आनंद कुमार के लिए कम मुश्किलें नहीं खड़ी की लेकिन वे अपने मूल्यों, आदर्शों से डिगे नही। बॉलीवुड ने उनके जीवन को आधार बनाकर सुपर 30’ नाम से फिल्म बनायी। एक तरफ कोटा जैसा स्थान है जहाँ देश भर के छात्र डॉक्टर और इंजिनियर बनने की अपने माँ-बाप की अपेक्षाएं लादे आत्महत्या तक करने को मजबूर हैं। ऐसे में देश हजारों आनंद कुमारों की जरूरत है जो बिना किसी आर्थिक लाभ को लक्ष्य बनाए प्रतिभावान छात्रों को उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश दिलाकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दे।

परिसर में होनेवाली राजनीति की परतों पर एकआयामी फोकस

उच्च शिक्षा संस्थानों में अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ छात्र राजनीति भी एक महत्वपूर्ण पहलू रहा हैं जहाँ भविष्य के नेता तैयार होते रहे हैं। देश के सभी विश्वविद्यालयो ने बड़े और प्रभावी राजनेता देश को दिए हैं। समय के साथ छात्र राजनीति के स्तर में गुंडा तत्वों और उनकी हिंसक गतिविधियों के कारण गिरावट आई जिसके कारण छात्रों, अध्यापकों और समाज में छात्रसंघों के प्रति नकारात्मक भाव उत्पन्न हुए. छात्र संघों में बाहरी तत्व जैसे माफिया और राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप और हिंसक गतिविधियों के समर्थन के कारण कैंपस और शहरों के माहौल ख़राब होने लगे। गुंडा तत्वों द्वारा मारपीट, खून-खराबा आम बात हो गयी। पढ़ाई छोड़ चुके लोग पुनः प्रवेश लेकर चुनाव लड़ने लगे। उद्देश्य शिक्षा से अलग ठेकेदारी, रंगदारी, जातीय वर्चस्व अंततः राजनीतिक दलों के टिकट लेकर एक पूर्णकालिक केरीयर की तलाश। देश भर के छात्रसंघों में आ रही इन्ही विद्रूपताओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सन 2005 में लिंगदोह कमिटी का गठन किया गया। समिति की सिफारिशों को लागू करके छात्रसंघों पर अंकुश लगाये गए और अनेकों कैम्पसों में छात्र राजनीति पर पूरी तरह रोक ही लग गयी। बहुसंख्यक वर्ग के छात्र नेताओं वाली राजनीति को विकसित होने के अवसर लिंगदोह कमेटी के बाद समाप्त हो गए। अब केवल परम्परागत पढ़ाई, एक्जाम और डिग्री के कार्य शेष बचे हैं। कैम्पस राजनीति पर कुछ फ़िल्में निम्नवत हैं:

युवा (2004) एक छात्र संगठन से जुड़े कोलकाता के तीन अलग-अलग बैकग्राउंड के युवाओं की कहानी है जो राजनीति से भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते हैं लेकिन एक घटना उनका रास्ता बदल देती है। एक बड़े राजनेता का पालतू गुंडा जब उन्हें मार देना चाहता है। युवाओं की सकारात्मक राजनीति में भागीदारी को समर्थन देती फ़िल्मकार मणिरत्नम की महत्वपूर्ण फिल्म है। हम सभी जानते हैं कि ज्यादातर राजनितिक दल अपने स्टूडेंट विंग विश्वविद्यालयों में रखते हैं और छात्र संघ चुनावों में उनकी जीत के लिए पूरा जोर लगाते हैं। कैम्पस राजनीति में इस उठापटक को बहुत स्वाभाविक तरीके से यह फिल्म सामने रखती है। दिल दोस्ती एक्स्ट्रा (2007) दिल्ली विश्विद्यालय के कैम्पसों में छात्र राजनीति का चित्रण करती यथार्थपरक फिल्म। दिल्ली और दिल्ली से बाहर के विद्यार्थी, देसी कल्चर बनाम दिल्ली का अंग्रेजीदां एलिट कल्चर का टकराव। उन्मुक्त सेक्स, पहनावे पर टोकने वाले बिहार से आये छात्र नेता मिश्रा जी की दिल्ली वाली गर्लफ्रेंड उसे मिडिल क्लास एटिट्यूड वाला मर्द बताकर छोड़कर चली जाती है। छात्र राजनीति के साथ इस फिल्म में मूल्यों के संघर्ष को भी प्रभावी ढंग से दिखाया गया है। रंग दे बसंती (2006) फिल्म में दिल्ली विश्वविद्यालय के बेपरवाह छात्र अपने दोस्त के मारे जाने के बाद भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रान्तिकारियों जैसे भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, आजाद आदि के चरित्रों से एक फिल्म प्रोजेक्ट में काम करने के दौरान प्रेरित होते हैं और भ्रष्ट लोगों की हत्या तक करते हैं। ये फिल्म इस पहलू को हमारे सामने रखती है कि किस तरह हमारी शहरी संपन्न घरों में पैदा हुई युवा पीढ़ी अपने अतीत, इतिहास और ऐतिहासिक नायकों से उनके संगर्ष और बलिदान से अनजान मौज मस्ती में डूबी है। उन्हें जगाने की बार-बार जरूरत पड़ती है ताकि वे ज़िम्मेदार नागरिक बन सकें।

हॉलीवुड में कैंपस फ़िल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनतीं

हॉलीवुड में शिक्षक, कैंपस और उनसे जुड़े मुद्दों पर बेहतरीन फिल्मे बनी है। यहाँ हम कुछ फिल्मों और उनकी विषयवस्तु पर चर्चा करेंगे। ‘स्कूल फिल्म’ हॉलीवुड फिल्मों का एक जेनर है जिसमे अध्यापक-छात्र के पारस्परिक सम्बन्धों, अध्यापक के व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन का तालमेल और भूमिका-संघर्ष जैसे विषयों को बारीकी से प्रस्तुत किया जाता है। ब्लैकबोर्ड जंगल, टू सर विथ लव, चिल्ड्रेन ऑफ़ अ लेसर गॉड, द प्रिंसिपल, डेड पोएट सोसाइटी, द एम्परर’स क्लब, टीचर्स जैसी फ़िल्में इस जेनर की कुछ नामचीन फिल्म हैं। उच्च शिक्षा को चित्रित करने वाली प्रमुख फ़िल्में गुड विल हंटिंग, मोना लिसा स्माइल, क्रिपेंडोर्फ़ ट्राइब, एनिमल हाउस, बैक टू स्कूल, ओल्ड स्कूल, मीन गर्ल्स, हाउस ऑफ़ कार्ड्स, फ्राइडे नाइट लाइट्स, इन एंड आउट, स्टैंड एंड डिलीवर, द वेव इत्यादि।

और अंत में यह कि सिनेमा ने गंभीर चीजों का कैरिकेचर बना दिया

बॉलीवुड फिल्मों में कालेज, यूनिवर्सिटी और अन्य शिक्षण संस्थानों को प्रायः राजनीति, गुंडागर्दी और प्यार, मोहब्बत के ठिकानों के रूप में दिखाये जाने की परम्परा है जो कि अब भी चली आ रही है। प्रोफेसर जैसे महत्वपूर्ण चरित्र को भी अक्सर जोकर या दिलफेंक आशिक के रूप में ही चित्रित किया जाता रहा है। शायद ही किसी फिल्म में वह किसी विषय पर गंभीरता से काम करते दिखाया गया हो। अनुपम खेर को याद कर लें कई फिल्मों के चरित्र आपके आँखों के सामने घूम जायेंगे (कुछ कुछ होता है)।

बॉलीवुड फिल्मों में कालेज, यूनिवर्सिटी और अन्य शिक्षण संस्थानों को प्रायः राजनीति, गुंडागर्दी और प्यार, मोहब्बत के ठिकानों के रूप में दिखाये जाने की परम्परा है जो कि अब भी चली आ रही है। प्रोफेसर जैसे महत्वपूर्ण चरित्र को भी अक्सर जोकर या दिलफेंक आशिक के रूप में ही चित्रित किया जाता रहा है। शायद ही किसी फिल्म में वह किसी विषय पर गंभीरता से काम करते दिखाया गया हो। अनुपम खेर को याद कर लें कई फिल्मों के चरित्र आपके आँखों के सामने घूम जायेंगे (कुछ कुछ होता है)। मोहब्बतें वाले अमिताभ भी याद होंगे जो परम्परा प्रतिष्ठा और अनुशासन के इतने पक्के हैं कि कोई नई चीज स्वीकार ही नही करना चाहते। मिस्टर इंडिया के प्रोफेसर जो इंसान को गायब करने वाले लेंस का आविष्कार करते हैं लेकिन आगे उनके चरित्र को विकसित नहीं किया जाता। कला और साहित्य विषयों के प्रोफेसर एवं उनके योगदानों पर बॉलीवुड में आज तक महत्वपूर्ण फिल्मे नही बनी हैं।

छात्र राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के लिए बनी लिंगदोह कमिटी ने 2006 में अपनी संस्तुतियां दी थीं। इस कमेटी के सुझावों को लागू करने के बाद से छात्रसंघ और छात्र राजनीति कोमा में चली गयी और पूरी तरह कुलपति और प्रधानाचार्य जी की दया पर निर्भर हो गयी। अब यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि राजनीति की पढ़ाई कहाँ होगी और लोग राजनेता बनने के लिए किस कैम्पस में प्रशिक्षण लेने जायेंगे। पिछड़ों-दलितों की बहुसंख्यक आबादी जब उच्च शिक्षण संस्थानों तक पहुंची और वोटर की जगह नेतृत्व में हिस्सेदारी की तरफ कदम बढ़ाया, कैम्पसों में बढ़ते अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के लिए छात्र संघों की राजनीति पर ही रोक लग गयी। ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख जैसे महान आरम्भिक शिक्षकों वाले आधुनिक भारत में प्राथमिक शिक्षा के लिए आज गाँव-गाँव में स्कूल खुल चुके हैं, सरकार की तरफ से बच्चों को मिड-डे-मील, क़िताबे, स्कूल यूनिफार्म दिए जा रहें हैं लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होना बाकी है। इस विषय पर अब तक कोई फिल्म संज्ञान में नहीं है। जागृति, बूँद जो बन गयी मोती जैसी फिल्मों में गांधीवादी-नेहरूवादी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट है। भारत में साक्षरता का प्रतिशत तमाम सरकारी और निजी प्रयासों से बढ़ा है, लेकिन इसी के साथ निजी और महंगे शिक्षण संस्थानों की बाढ़ आ चुकी है। संख्या में जरूर वृद्धि हुई है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं हो सका है। शिक्षण संस्थाओं से डिग्री लेकर निकले बेरोजगार नौजवानों में युवा असंतोष (यूथ अनरेस्ट) लगातार बढ़ता जा रहा है। ग्रामीण और शहरी शिक्षा की गुणवत्ता में भारी गैप अब भी बना हुआ है जो भारतीय संविधान के समाजवाद और सामाजिक न्याय की राह में एक कठिन प्रश्न की तरह विद्यमान है। रट्टामार (रोट लर्निंग) शिक्षण पद्धति और अंको का भूत सभी स्कूलों, गार्जियन और शिक्षण पद्धति का लक्ष्य बन चुका है। भारत में शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान स्थिति और स्तर बहुत संतोषजनक नहीं है। बारहवीं तक की शिक्षा के लिए सरकारी शिक्षण संस्थानों की स्थिति लगातार ख़राब होती जा रही है। मूलभूत सुविधाओं के साथ ही अध्यापको की भारी कमी है। परिणामतः निजी शिक्षण संस्थानों में मोटी फीस देकर प्रवेश लेना अभिभावकों और बच्चों की मज़बूरी है। प्राइमरी स्कूल भी इन्ही परेशानियों से जूझ रहे हैं। हमने शिक्षा के क्षेत्र में जो उपलब्धियां आजादी के अर्जित की हैं या जो नयी चुनौतियाँ सामने हैं बॉलीवुड के निर्माता इन गंभीर मुद्दों को ज़िम्मेदारी से प्रस्तुत नहीं कर पा रहे। उच्च शिक्षण संस्थानों पर कुछ फ़िल्में दो कारणों से मिल जाती हैं, पहला यह कि युवा लड़के लड़कियों में दोस्ती, प्यार-मोहब्बत, नाच-गाने का भरपूर स्कोप मिल जाता है और दूसरे छात्र राजनीति और रैंगिंग के बहाने जातीय गुटबाजी वर्चस्व की जंग दिखाने का भी मौका मिल जाता है जो बॉलीवुड फिल्मों के लिए कमाऊ फार्मूला है।
संदर्भ
बालाबनतारे, शुभ्र रजत (2020) इम्पैक्ट ऑफ़ इंडियन सिनेमा आन कल्चर एंड क्रिएशन ऑफ़ वर्ल्ड व्यू अमोंग यूथ: अ सोइओलोजिकल एनालिसिस ऑफ़ बॉलीवुड मूवीज, इन जर्नल ऑफ़ पब्लिक अफेयर्स, सितम्बर 2020।
कौसर, हिना एंड सिंह गोपाल (2014) वीमेन इन हिंदी सिनेमा एंड देयर इम्पैक्ट ऑन कॉलेज स्टूडेंटस विद रेफरेंस टू एट वीमेन ओरिएंटेड फिल्म्स इन 2014, अ स्टडी अमोंग यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स ऑफ़ लखनऊ, डब्लूडब्लूडब्लू.रिसर्चगेट.नेट।
शर्मा, संपदा (2021) रिविजिटिंग हासिल: तिग्मांशु धुलिया’स फर्स्ट फिल्म देट पुट इरफ़ान खान ऑन द मैप, इन इंडियन एक्सप्रेस, 4 जुलाई 2021।

राकेश कबीर जाने-माने कवि-कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

3 Comments
  1. Ghanshyam kushwaha says

    फिल्मों ने कालेज कैंपस को लड़के लडकियों के मिलने, नाचने-गाने और प्रेम करने के स्थल मात्र के रूप में चित्रित करने तक सीमित कर दिया है। कॉलेज और विश्विद्यालय को एक वैचारिकी के पनपने और देश की दशा और दिशा तय करने की प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया गया है। युवाओं को महज मनोरंजन का वाहक समझकर उन्हें यथार्थ और जरूरी मुददों से ध्यान हटाकर केवल बाज़ार आधारित जरूरतों का आदी बना दिया गया है।
    एक बहुत ही महत्वपूर्ण और जरूरी लेख के लिए आपका बेहद शुक्रिया सर। शानदार लेख की बधाई। हम लोगों के लिए लिखते रहें।🙏

  2. Gulabchand Yadav says

    👌👍👏🙏

    “समाज, सिनेमा और हमारे शिक्षण संस्थान” थीम पर केन्द्रित राकेश कबीर जी का शोधपरक और वैचारिक आलेख “ बॉलीवुड ने कैंपस के जीवन और राजनीति का उथला चित्रण किया है.” पढ़ा। सिनेमा हमारे समाज से बहुत गहराई से जुड़ा है क्योंकि सिनेमा के विषय समाज से लिए जाते हैं और सिनेमा भी समाज (अर्थात दर्शक वर्ग) के लिए बनाया और दिखाया जाता है। शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश-समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बल्कि यूँ कहें कि ऐसी नींव या बुनियाद होती है जो उस देश के विकास की दशा-दिशा और गति को तय करने में निर्णायक भूमिका अदा करती है। जाहिर है हमारा या हॉलीवुड या अन्य देश का सिनेमा शिक्षा, शिक्षण संस्थान, विद्यार्थी, अध्यापक, शिक्षा और राजनीति तथा इन घटकों से जुड़ी समस्याओं और अपेक्षाओं से अछूता या असंपृक्त कैसे रह सकता है? दूसरे, फिल्ममेकिंग मूलतः एक व्यवसाय या धंधा है जहाँ मुनाफे के बारे में सबसे पहले सोचा जाता है देश-समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी उन समस्याओं और अपेक्षाओं पर भी कहानी और पटकथाएँ लिखी जाती हैं जिनमें एक हिट फिल्म के फार्मूले फिट बैठते हों। इसी लक्ष्य या ध्येय के केंद्र में होने के कारण कुछ अपवादों को छोडकर शिक्षण संस्थाओं या शिक्षा प्रणाली पर बनी बॉलीवुड की अधिकांश फिल्में अतिरंजित, अयथार्थपूर्ण, फूहड़ और हास्यास्पद हो जाती हैं। जबकि हॉलीवुड द्वारा बनाई गई फिल्में गंभीर और यथार्थपूर्ण होती हैं क्योंकि उनके दर्शक न केवल करोड़ों में हैं बल्कि शिक्षित, प्रबुद्ध और संवेदनशील भी होते हैं।

    बहरहाल, आपने शिक्षण संस्थान या शिक्षा व्यवस्था की स्थितियों/समस्याओं/अपेक्षाओं/उम्मीदों आदि पर आधारित हिंदी फिल्मों के बारे में विस्तार से जानकारी दी है और हॉलीवुड की कुछ चुनिन्दा फिल्मों के बारे में भी सम्यक उल्लेख किया है। आपका यह कहना सही है कि ,”हॉलीवुड में कैंपस फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनती।“ आपने बॉलीवुड की हासिल, तांडव, गुलाल, थ्री इडियट्स, निल बटे सन्नाटा, सुपर 30, हिंदी मीडियम, युवा, दिल दोस्ती एक्स्ट्रा जैसी कुछ उल्लेखनीय फिल्मों की कथावस्तु और विशेषताओं के बारे में बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है. हर बार की तरह आपका यह आलेख भी नई जानकारियों और विचारणीय मुद्दों को समेटता हुआ और बेहद पठनीय लगा। फिर भी, आलेख की निम्नलिखित टिप्पणियों/सम्मतियों ने विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया:

    – “शिक्षा बाजार में बिकनेवाली व्यावसायिक चीज बन चुकी है।“

    – “वास्तव में शिक्षा को एक एक स्वतंत्र कारक शक्ति की तरह काम करना चाहिए ताकि एक व्यक्ति की स्वतंत्र सोच विकसित हो और रचनाशीलता का विकास हो।“

    – “ (बॉलीवुड की फिल्मों में) कॉलेज कैंपस को लड़के –लड़कियों के मिलने, नाचने-गाने और प्रेम करने के स्थल मात्र के रूप में चित्रित किया जाता रहा है।“

    – “शिक्षण संस्थानों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहलू भी होते हैं। व्यक्ति और समाज को दिशा देने और बृहत्तर रूप में राष्ट्र के स्वरूप निर्धारण में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों तथा अध्यापकों की अति महत्वपूर्ण भूमिका होती है।“

    – “……देश को हजारों आनंद कुमारों की जरूरत है जो बिना किसी आर्थिक लाभ को लक्ष्य बनाए प्रतिभावान छात्रों को उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश दिलाकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दें।“

    – “भारत में शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान स्थिति और स्तर बहुत संतोषजनक नहीं है।“

    – “हमने शिक्षा के क्षेत्र में जो उपलब्धियां आजादी के बाद अर्जित की हैं या जो नई चुनौतियाँ सामने हैं, बॉलीवुड के निर्माता इन गंभीर मुद्दों को ज़िम्मेदारी से प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं (या फ्लॉप होने के डर, सेंसरशिप की अड़ंगेबाजी, सत्ता तंत्र के कोप आदि कारणों से करना ही नहीं चाहते हैं)।“

    इस रोचक, पठनीय और विचारणीय आलेख को साझा करने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाई।

  3. Tarkeshwar Patel says

    समाज ,शिक्षण और राजनीति से संबंधित और उनका प्रभाव फिल्मों के माध्यम से बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है, जिनमें
    बॉलीवुड फिल्मों में केवल हैप्पी एंडिंग किया जाता है जो केवल लडकियो के नाचने गाने और प्रेम करने के स्थल के रूप में प्रदर्शित करते है ,हालांकि शिक्षण संस्थानों के सामाजिक ,राजनीतिक पहलू भी होते है। फिल्मकारों का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नही होना चाहिए बल्कि सभी पहलुओं का ध्यान में रखते हुए दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। फिल्म हमारे समाज के मार्गदर्शन के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

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