शिक्षा के दरवाजे तक जाति हमारा पीछा करती रही (कथाकार,इतिहासकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा से अपर्णा की बातचीत )

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बातचीत का पहला हिस्सा 

अपने बचपन की कुछ स्मृतियों को साझा कीजिये !

बचपन की स्मृतियां ही जीवन के विविध आयामों को समझने में मदद करती हैं। मेरे साथ भी वही है।  मेरी स्मृतियों में कुछ घटनाएं, कुछ विपदाएं और कुछ भूख का हाहाकार शामिल है। ये स्मृतियां बेशक वेदनापूर्ण हैं पर जीवन को समझने के लिए अमूल्य खजाने से कम नहीं हैं। बात उन दिनों की है जब पिताजी ने गांव के स्कूल में दाखिला दिलाया था। तब बड़े भैया जूनियर हाई स्कूल में पढ़ रहे थे, बिना पर्याप्त किताबों के। वह अपने साथियों से एक-दो दिन के लिए किताबें मांगते और थोड़े समय में जरूरी नोट बनाकर लौटा देते। वह असाधारण प्रतिभा वाले छात्र थे। उन्हीं की तरह मेरी भी स्कूली शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में शुरू हुई। शुरू में मैं स्कूल जाने के लिए निकलता और रास्ते से कहीं और खिसक लेता। वे स्थान जहां मैं दिन गुजारता, बारी-बगीचे, गन्ने, अरहर या अगहनी धान के खेत हुआ करते। वहीं, छिप कर बैठता। पटरी पर कुछ लिखता। जब छुट्टी होती, घंटी की आवाज सुनाई देती तब छिपने के स्थान से निकलकर घर आ जाता। भैया तब तक स्कूल से आए नहीं रहते। मां-बाप और बड़ी बहन अनपढ़ थीं तो उन्हें पता ही न चलता कि मैंने क्या लिखा है। थोड़ी देर बाद पटरी साफ कर देता। पता नहीं क्यों, मेरे मस्तिष्क में स्कूल एक प्रकार से आतंक का घर बन चुका था। मैं मार खाने के बावजूद, स्कूल नहीं जाता। इसका ठीक-ठीक उत्तर दे पाना संभव नहीं है। मनोचिकित्सकों का यह विषय हो सकता है। स्कूल से गायब रहने की खबर पिताजी तक पहुंचती। वह मुझे ढूंढते और फिर कसकर मार पड़ती। सबसे ज्यादा पिताजी जी मारते और कभी-कभी बड़े भाई भी। एक भय घर कर गया था, जो मार पड़ने के बावजूद स्कूल में रमने न देता। कई बार डोमटोली के पूरब, मूंज और सरपत के झुरमुटों में छिपा रहता। वहां छिपना, स्वयं को सांप-बिच्छू के हवाले करना था। अंधेरा हो जाता और मैं मार की डर से वहीं छिपा रहता। अंधेरा होने पर मां परेशान होकर, ढूंढती फिरती। कई बार वह रोती। गांव वालों से पूछती। कई बार पिताजी और भैया ने मुझे अगहनी धान या गन्ने के खेतों से ढूंढ कर पीटा मगर स्कूल नहीं जाना था, तो नहीं गया।

एक दिन मुझे प्रलोभन के रूप में एक नया पैसा दिया गया था। समझाने के लिए। मनाने के लिए।  शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर जब करमहा  गांव के बच्चे मेरे घर के सामने से गुजर रहे थे तो उन्होंने मुझे टोका -‘पढ़ने क्यों नहीं आते?’ मैंने हथेली में रखा एक नया का सिक्का दिखाते हुए कहा था- ‘आप लोग पढ़ने जाते हैं तो पैसा मिलता है? नहीं न ! देखिए, मैं पढ़ने नहीं जाता फिर भी पैसा मिलता है?’ यानी माई-पिताजी की घेराबंदी वाले उपक्रम को एक झटके में मैंने ध्वस्त कर दिया था। माई रोती थी और पिताजी को कहती थी कि – ‘मत मारीं ! ना पढ़िएं त मेहनत, मजूरी कर के पेट पाल लीहें।’

इसी बीच हुआ यह कि एक दिन किसी ने कहा कि मस्जिद पर, हाजी साहब के पास इसे ले जाइए। वह ताबीज लिख देंगे। जरूर फायदा होगा।

पिताजी का जीवन संघर्षों का रहा। जब वह पैदा हुए तभी मेरी दादी मर गई थीं यानी पिताजी ने अपनी मां का मुंह नहीं देखा है। फूआ ने उनका पालन-पोषण किया। शादी होते ही घर से भागकर कमाने गए थे, कलकत्ता। कुछ दिन द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में सेना में भर्ती हुए थे मगर बाद में मेस इंचार्ज के कुप्रबंध और खुराकी में घपला करने की शिकायत उच्च अधिकारी से कर, भाग आए। शुरू से ही उनमें नेतृत्व की प्रवृत्ति रही। गांव के प्रधान वह कभी नहीं रहे मगर प्रधान की तरह ही उनकी हर कहीं पूछ होती। हर विवाद में उनको बुलाया जाता और न्याय में ईमानदारी उनकी पहली प्राथमिकता थी।

गांव के उत्तर-पूरब कोने पर एक गांव था, जिसे मस्जिद टोला कहा जाता। वहां आटा पीसने वाली चक्की थी। जो पूरे दिन पुक….पुक करती रहती। बड़े होकर हम लोग वहीं गेहूँ  पिसवाने जाते थे। मस्जिद टोले पर एक बुजुर्ग मियां थे जिन्हें इलाके में सभी सम्मान से देखते। हज कर के आए थे इसलिए लोग उन्हें हाजी साहब कहा करते। सुबह उनके दरवाजे पर कई गरीब पहुंचे होते। एक दिन माई मुझे लेकर वहां गई। अपना दुखड़ा सुनाई। हाजी साहब ने एक कागज के टुकड़े पर कुछ लिखकर दिया और ताबीज में डालकर गले में पहनाने को कहा। इसके अलावा उन्होंने जो सबसे महत्वपूर्ण और  मनोवैज्ञानिक बात बतायी वह यह कि स्कूल जाने के पहले रोज सुबह गुड़ में घी लगाकर बच्चे को खिलाया जाए। बच्चे को बिल्कुल मारा न जाए। माई ने वही किया। गले में ताबीज डाल दी गई। हर सुबह माई थोड़ा गुड़ खिलाकर मुझे स्कूल भेजने लगी। उस समय मेरे लिए गुड़ खरीदकर लाना खास बात थी। मुझे लगा कि घर में सबसे अधिक प्यार मिल रहा है। उसी के बाद गुड़ खाकर स्कूल जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर न रुका। छ: माह जो बर्बाद हुआ था, पूरा कर लिया। जुलाई में दूसरी कक्षा में जा पहुंचा।

एक और महत्वपूर्ण स्मृति है। गांव के एक यासीन थे, उम्र में मुझसे सात-आठ साल बड़े।  बोले कि चलो सरेह में चलकर होरहा लगाएं। एक और लड़का हम दोनों के साथ लग लिया, सूर्यभान, जो उम्र में मुझसे एक-दो साल छोटा था। अंधेरा हो चुका था। रामजी राय के मटर के खेत से मटर उखाड़ी गई। रामजी राय हमारे टोले में बड़े काश्तकार थे। साहूकार भी थे। खेत उन्हीं के थे, तो जाहिर है मटर उन्हीं के खेत से उखाड़ा जाता। उखाड़ा गया और पूरब में लाला के इनार के पास  मेरा एक खेत था।  उसमें गन्ना लगा था।  आधा गन्ना मिल पर जा चुका था। वहीं हमने होरहा लगाया। रात को आग की लपट देख  मस्जिद की बाजार से लौट रहे फुलेनी भगत भी वहीं आ पहुंचे। सूर्यभान उन्हीं का लड़का था तो हम लोगों को यह विश्वास जम गया कि वह रामजी राय को बताएंगे नहीं। मगर उन्होंने रामजी राय को बता दिया कि कौन-कौन होरहा लगाने में शामिल थे। जाहिर है उनका लड़का सबसे छोटा था। उसका दोष नहीं माना जाने वाला था। मेरे घर के पास बरगद का बड़ा पेड़ था।  वहीं पिताजी को बुलाकर रामजी राय मेरी बदमाशी के लिए हड़का रहे थे।  गुस्से में पिताजी मुझे बिस्तर से उठाते हुए घसीटकर लाए। बोले- बाबू के खेत से मटर क्यों उखाड़े? मैं चाहता तो यासीन पर दोष मढ़ सकता था क्योंकि वही सबसे बड़े थे। उन्हीं  के कहने पर मैंने मटर उखाड़ा था।  लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया।  मटर उखाड़ते समय मेरे मन में यह बात थी कि पूरी गांव की संपदा जब राय लोगों के पास है तो हम लोग क्या करेंगे? जमींदारी और साहूकारी से गांव का सारा धन इन्हीं लोगों के पास है तो हम कहां जाएं? खैर, गुस्से में मैं घारी में गया और सीपावा ( मोटा बांस का डंडा जो बैल गाड़ी को सहारा देने के लिए होता था) खींच लिया और रामजी राय को गरियाते हुए कि – देखले बाड़ अपना खेत में मटर उखारत? ’  और सीपावा चलाने के लिए दौड़ा। पिताजी ने पकड़कर कुटाई तो की मगर रामजी राय फिर वहां से यासीन के घर नहीं गए। सीधे अपने दरवाजे पर चले गए। बात खत्म हो गई। तब लोग होरहा लगाने को बहुत बड़ा अपराध नहीं मानते थे।  सब्र कर जाते थे। स्मृतियां तो इतनी हैं कि अगर उन्हें ही बताऊं तो किताब बन जायेगी।

शुरू में मैं स्कूल जाने के लिए निकलता और रास्ते से कहीं और खिसक लेता। वे स्थान जहां मैं दिन गुजारता, बारी-बगीचे, गन्ने, अरहर या अगहनी धान के खेत हुआ करते। वहीं, छिप कर बैठता। पटरी पर कुछ लिखता। जब छुट्टी होती, घंटी की आवाज सुनाई देती तब छिपने के स्थान से निकलकर घर आ जाता। भैया तब तक स्कूल से आए नहीं रहते। मां-बाप और बड़ी बहन अनपढ़ थीं तो उन्हें पता ही न चलता कि मैंने क्या लिखा है। थोड़ी देर बाद पटरी साफ कर देता। पता नहीं क्यों, मेरे मस्तिष्क में स्कूल एक प्रकार से आतंक का घर बन चुका था। मैं मार खाने के बावजूद, स्कूल नहीं जाता।

अपनी माँ की कुछ यादें ताज़ा कीजिये !

माई के शरीर की झुरियों में गरीबी, भूख, पीड़ा, मार और वात्सल्य का जो रक्त प्रवाहित था, उसको जितना भी जानने की कोशिश करता हूं, तो बहूत कुछ छूट जाता है। माई की सहनशीलता ने हमें अभावों में जीने, पढ़ने और संवेदनशील बनने का मूल मंत्र दे दिया था। माई का भोर में जगना, गाय-बैलों के लिए छांटी-पानी करना, गोबर उठाना, खेती-किसानी में खटना और पिताजी की डांट-मार सहना, कठोर जीवन की कुछ कड़वी यादें हैं। हर हाल में बच्चों को खुश रखना, माई की सूनी आंखों का स्वप्न होता। स्वयं भूखे रह, हम भाई-बहनों को खिलाना, माई के रग-रग में जीवन का असीम दुर्द्धर्ष संघर्ष छिपा हुआ था।  अभावों और आपदाओं से लाचार माई का, अंधविश्वासों में असीम विश्वास था। हर आपदा या बुरे समय में माई जोगीर बाबा, बरम बाबा या काली माई के थान पर जाती थी। हम भाई-बहनों के बीमार होने पर भाखौती मांगती। वह कुछ इस प्रकार कहती- ‘हे जोगीर बाबा! बाबू के निरोग क दीं। बाबू के पास करा दीं। आपके हम चीलम चढ़ाइब। हे काली माई! आपके कढ़ाई चढ़ाइब’, आदि.. आदि।

भोजन का जब कोई विकल्प न होता तब माई, सुबह-सुबह भूख मिटाने के लिए मुस्लिम पड़ोसियों के घर ले जाती। उनसे खांड़ा-टुक्की मांगकर खिलाकर हमें चुप कराती। एकाध दृश्य अभी भी आंखों के सामने तैरते रहते हैं। माई सहेजना जानती थी। वह वर्तमान से जूझते हुए, भविष्य के लिए सहेजकर कुछ न कुछ रखती थी। उस कुछ न कुछ में, चार-आठ आना पैसा होता या मेहमानों के आने पर उन्हें खिलाने के लिए थोड़ा गुड़ या चूड़ा  होता। उसके सहेजने की कला को मैं छिन्न-भिन्न कर देता। ढूंढता रहता। जिद्द कर थोड़ा गुड़ या चूड़ा हथिया लेता। पिताजी देखते तो माई को डांटते। भला-बुरा कहते। माई अपने बेटों के लिए यह सब कुछ सहती रहती। वह हम सभी के लिए पिताजी के बीच ढाल का काम करती

माँ के व्यक्तित्व से आप किस तरह प्रभावित थे ?

माई से मैंने उदारता, संतोष और सहनशीलता सीखी। वह सरलता मगर चैतन्यता से भरी थी।  वह अपने दुखों को बहुत कुछ बताती नहीं। सहना,  खटना,  चूल्हे-चौके के की व्यवस्था में  लगी रहना, माई का स्वभाव था। माई हम सबका जीवन है। पिताजी से कहीं अधिक वह धैर्यशील और विपदा को सहने की ताकत रखती थी। अब माई नहीं है  जाने से पहले महीनों कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं थी।  बचपन में घर में दाने न होते या चूल्हा न जलता तो भी मार माई पर पड़ती। पिताजी इस मायने में थोड़ा आक्रामक थे। यद्यपि वह हालात को जानते थे मगर आक्रोश को निकालने का सुलभा साधन माई थी।

आप लोग पढ़ने जाते हैं तो पैसा मिलता है? नहीं न ! देखिए, मैं पढ़ने नहीं जाता फिर भी पैसा मिलता है? यानी माई-पिताजी की घेराबंदी वाले उपक्रम को एक झटके में मैंने ध्वस्त कर दिया था। माई रोती थी और पिताजी को कहती थी कि – ‘मत मारीं ! ना पढ़िएं त मेहनत, मजूरी कर के पेट पाल लीहें।’

आपके पिता कैसे व्यक्ति थे ? पिता का आपके ऊपर क्या प्रभाव है ?

पिताजी का जीवन संघर्षों का रहा। जब वह पैदा हुए तभी मेरी दादी मर गई थीं यानी पिताजी ने अपनी मां का मुंह नहीं देखा था। फूआ ने उनका पालन-पोषण किया। शादी होते ही घर से भागकर कमाने गए थे, कलकत्ता।  कुछ दिन द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में सेना में भर्ती हुए थे मगर बाद में मेस इंचार्ज के कुप्रबंध और खुराकी में घपला करने की शिकायत उच्च अधिकारी से कर, भाग आए। शुरू से ही उनमें नेतृत्व की प्रवृत्ति रही। गांव के प्रधान वह कभी नहीं रहे मगर प्रधान की तरह ही उनकी हर कहीं पूछ होती। हर विवाद में उनको बुलाया जाता और न्याय में ईमानदारी उनकी पहली प्राथमिकता थी। यहां तक की जब वह बीमार थे और थोड़ी सी जमीन की कीमत, दूसरे लोग ज्यादा दे सकते थे तब मेरे चाचा जी ने किसी दूसरे को जमीन लेने न दिया। इलाज के लिए मात्र 200 रुपए के बदले चाचा ने सारी जमीनें रेहन ले ली थी। तब भी पिताजी ने कुछ नहीं बोला। घर के बंटवारे में सबसे खराब जमीनें  पिताजी के हिस्से में आयीं मगर वह कहते थे कि भाई को जो मन करेगा, वह देंगे। कुल मिलाकर सामाजिकता और ईमानदारी, उनके मुख्य गुण रहे।

परिवार में किसका अनुशासन चलता था? आप किससे डरते थे?

पिताजी का ही अनुशासन चलता। पिताजी बहुत गर्म मिजाज के थे।  बहुत जल्द गुस्सा होना उनकी प्रवृत्ति रही जो कुछ हद तक मेरे खाते में भी आयी है। हम सभी भाई बहन, उनसे बहुत डरते थे क्योंकि उनकी मार रुह कंपा देने वाली होती।

आपके भाई-बहन कैसे रहे हैं ?

मुझसे बड़ी मेरी दोनों बहनें अनपढ़ रहीं। भैया दूसरे नम्बर पर हैं। सबसे बड़ी बहन उनसे तीन वर्ष बड़ी हैं। सबसे पहले भैया पढ़े और अपनी असाधारण मेधा शक्ति के बल पर कुदाल, हल-बैल से यात्रा शुरू कर देश-दुनिया के अच्छे बाल रोग विशेषज्ञ बने। बाबा राधव दास मेडिकल कॉलेज के बालरोग अध्यक्ष और प्रधानाचार्य रहे। हम तीन भाई और पांच बहनों में मेरा स्थान चौथा था है।  यानी बड़ी बहन के बाद भैया, फिर एक बहन और उसके बाद मैं। मुझसे छोटी तीन बहनें और एक भाई। गरीबी में गुजरती जिंदगी में भैया की पढ़ाई असाधारण कही जायेगी। कई लोगों की मदद से भैया मेडिकल कॉलेज में पढ़ पाए। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने घर को संवारना शुरू किया। उन्हीं की देन है कि मेरी पढ़ाई इण्टर बाद, गोरखपुर में हो पाई।  भौया न होते तो मेरा परिवार आज भी गांव  में मेहनत-मजदूरी कर जीवन बिता रहा होता। यह भैया  का एहसान है कि सभी भाई-बहन एक साथ, एक-दूसरे के लिए आज भी लगे रहते हैं। कुल मिलाकर पिताजी के बच्चों की पूरी पीढ़ी, एकजुट और संयुक्त परिवार के रूप में रह रही है।

पिताजी किसान और माताजी घरेलू स्त्री, ऐसे में किसकी प्रेरणा से आप और आपके भाई-बहनों ने स्कूल का रुख किया? आपकी स्कूली शिक्षा कहाँ हुई ?

पिताजी ने अपने बेटों को स्कूल भेजा। माई भी चाहती थी कि बच्चे पढ़ें। मगर पिताजी ने बेटियों को नहीं पढ़ाया। इसका मलाल उन्हें अब होता है। पांच बहनों में से केवल दो बहनों को शिक्षा मिल पाई जिसका श्रेय भैया को है। सभी की प्राथमिक शिक्षा  गांव के स्कूल में हुई। जूनियर हाई स्कूल मैंने गांव के पास के लछिया गांव से किया और हाई स्कूल तथा इण्टर की शिक्षा फाजिलनगर बाजार में पावानगर महावीर इण्टर कालेज में हुई। बी.एस.सी और एम.एससी. की पढ़ाई गोरखपुर विश्वविद्यालय में हुई।

युवा सुभाषचन्द्र कुशवाहा

उन दिनों स्कूल में पढ़ाई का कैसा माहौल था ? स्कूल की कोई ऐसी घटना जो आपके ज़हन में आज भी ताज़ा है. पिछड़ी जाति के होने के कारण कोई भेदभाव या कोई घटना जिसने आपके मन को ठेस पहुंचाई हो.

उन दिनों स्कूल में जो भी मास्टर थे, मन से पढ़ाते थे। जातिवादी नजरिये से दलितों और पिछड़ों को देखा जाता। उन्हें आगे की पंक्ति में कम स्थान मिलता मगर एक थे मौलवी साहब। कनक पीपरा गांव के। उन्होंने सभी बच्चों से सदा समान व्यवहार किया। इसके बावजूद पढ़ाई ठीक होती थी। शिक्षा के दरवाजे तक जाति पीछा करती रही।  मेरी प्राथमिक पाठशाला में एक मास्टर साहब, गांव के बाबू साहब थे, जिनका नाम आत्मा राय था। अभी भी हैं वह। घोर जातिवादी थे। हर बच्चे को जाति सूचक शब्दों से बुलाते।  ‘का हो कोईरी भाई, तुहों पढ़ब त बैगन के उगाई’ उनके शब्द कान को छेदते हुए दिमाग में ऐसे घुसे कि वह बाबू साहब कई कहानियों में भिन्न-भिन्न वेष में आए।  मैं उन्हें अतीत से वर्तमान में खींच लाया।  बचपन में गांव और स्कूल हर कहीं जातिवादी लोग थे मगर यह भी सही है कि सभी मास्टर ऐसे नहीं थे। कुछ बेहतर थे जिनमें पीपराकनक के मौलवी साहब।

 बचपन के दिनों में जब आप गाँव में रहते थे, उन दिनों क्या माहौल था? और आज जब गाँव जाते हैं तो उसमें क्या बदलाव दिखता है?  

बचपन में गांव का माहौल वैसे ही जातिवादी था जैसा आज है। ओबीसी समाज ज्यादा गरीब था। खाने-पीने की परेशानी थी।  खेती और भी खराब हालत में थी। आज कुछ स्थिति बेहतर तो है मगर पहले की तरह लोग स्वाभिामानी नहीं रहे। पहले एक अच्छी बात यह थी कि तब ओबीसी समाज के लोग, गरीब होते हुए भी एकजुट हो जाते थे। आज लोग कुछ सम्पन्न हैं मगर बेहतर शिक्षा न मिलने से मानसिक रूप से गुलाम हैं। गांवों  की पूरी तस्वीर, पंचायती राज व्यवस्था की लूट के कारण फूट में बदल चुकी है। हर व्यक्ति दूसरे से नफरत करता है। पहले की तरह सामाजिक सद्भाव नहीं है। विभाजन बढ़ा है। पहले लोग अपना काम करते हुए दूसरे की मदद कर देते थे। अब यह सब खत्म हो चुका है। हर चीज व्यावसायिक हो चुकी है।

अपर्णा गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक है ।

बातचीत क्रमश:

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