आम और आदमी या आम आदमी या फिर कोई और? (11 जुलाई, 2021 की डायरी)

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दो शब्द हैं – आम आदमी। दोनों शब्दों के बीच कोई मेल नहीं। मतलब यह कि आम एक फल है और आदमी आदमी। लेकिन दोनों के एक साथ उपयोग से एक खास अर्थ  निकलता है और बन जाता है आम आदमी। अंग्रेजी में कॉमन मैन। मुझे नहीं पता कि आदमी आम कब और कैसे बन गया। लेकिन मुझे लगता है कि आम आदमी शब्द का चलन बहुत पुराना नहीं है। यह बिल्कुल हाल की बात है। हाल का मतलब यह भी नहीं कि दस-बीस साल पहले की।

खैर, मैं यह बात क्यों सोच रहा हूं, इसके पीछे दो घटनाएं हैं। एक घटना तीन दिन पहले की है। पटना में कुछ लोग जो मुझसे परिचित हैं, मेरे संपर्क में रहते हैं, उन्हें लगता है कि मैं कोई समाजसेवी हूं। जबकि मैं समाजसेवी कभी नहीं रहा। खबरें लिखता रहा हूं। यही मेरा प्रोफेशन है। लेकिन लोगों की नजर में मैं केवल एक पत्रकार नहीं। दरअसल हुआ यह कि परसों करीब चार बजे एक परिचित व्यक्ति ने फोन किया। मामला जमीन विवाद का था। सवर्ण समुदाय के एक पड़ोसी ने उसकी जमीन में आगे बढ़कर दीवार खड़ी कर ली। चूंकि वह आदमी कमजोर था। सो मदद मांगने पटना के फुलवारी थाना पहुंच गया। उस व्यक्ति ने मुझे थाना से ही फोन किया।

उसने बताया कि करीब एक साल से उसका सवर्ण पड़ोसी जमीन कब्जाने की फिराक में है। आए दिन वह उस जमीन पर अपनी गाड़ी खड़ी कर देता है। मना करने पर गालियां देता है। बीते गुरुवार को उस सवर्ण ने दिनदहाड़े लगभग आधी जमीन पर कब्जा जमाते हुए दीवार खड़ी करवा दी। जैसे ही जमीन मालिक को जानकारी मिली, वह भागा-भागा पहुंचा। वहां उसका सवर्ण पड़ोसी हरवे-हथियार के साथ बैठा था। उसने जमीन मालिक के साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी।

निस्संदेह आम आदमी डॉ. योगेंद्र हैं। वह मजबूर व्यक्ति नहीं, जिसे थाने का एक अदना-सा पुलिसकर्मी गालियां देता है और घबराकर वह मुझे फोन करता है। वह आम नहीं, मजबूर आदमी है। डॉ. योगेंद्र मजबूर आदमी नहीं हैं। वह विरोध करना जानते हैं। उनका एक वर्ग है। तो आम आदमी भी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके बारे में पटना से प्रकाशित अखबार सरकार के प्रति अपनी निष्ठा के कारण भले ही खबर प्रकाशित न करें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे उनके साथ नहीं हैं।

परेशान हाल जमीन मालिक थाना पहुंचा तो थाना में उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गयी। पहले उसे कहा गया कि रिपोर्ट लिखने वाला मुंशी थाना में नहीं है। लेकिन वह थाना से हटा नहीं। वहीं बैठा रहा। जमीन मालिक ने मुझे दूरभाष पर बताया कि करीब एक बजे थाना प्रभारी आए। जमीन मालिक ने उनसे मिलकर गुहार लगाने का प्रयास किया। परंतु पुलिसकर्मियों ने उसे थाना प्रभारी से मिलने नहीं दिया। इस दौरान उसे तरह-तरह की गालियां दी जा रही थीं। कभी उसकी मां को गाली तो कभी बहन और कभी बेटी को लगाकर। यह गालियां कोई और नहीं, बल्कि पुलिसकर्मी दे रहे थे।

ऐसे हाल में परेशान होकर शायद उसे मेरा ख्याल आया होगा। उसे लगा होगा कि मैं अब भी पटना में ही हूं। मोबाइल पर उसकी आवाज जानी-पहचानी लगी। लेकिन जब उसने अपना नाम और पता बताया तब जाकर याद कर पाया कि वह आदमी मीठापुर में एक बड़े अनाज व्यवसायी के यहां काम करता है। किसी तरह से वह अपना और अपने परिजनों का पेट भरता है।

खैर, उसकी बात सुनकर मैंने केवल इतना ही किया कि एक स्थानीय पुलिस अधिकारी को इस घटना की जानकारी दी। तदुपरांत उस व्यक्ति की रिपोर्ट दर्ज की गयी।

मुझे नहीं पता कि उसकी रिपोर्ट पर अबतक क्या कार्रवाई हुई। यह भी नहीं कि जो पुलिसकर्मी उसे थाने में मां, बहन और बेटी को गालियां दे रहे थे, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई या नहीं।

एक दूसरी घटना पर कल मेरी नजर पड़ी। फेसबुक पर किसी ने यह जानकारी साझा की कि तिलका मांझाी विश्वविद्यालय, भागलपुर के अंगिका भाषा के विभागाध्यक्ष डॉ. योगेंद्र अपनी पत्नी और पुत्र के साथ कोतवाली थाना के ठीक सामने धरने पर बैठे हैं। उनके साथ पुलिस ने ज्यादती की थी।

दरअसल हुआ यह कि बीते शुक्रवार को जब डॉ. योगेंद्र अपने परिजनों के साथ कार से अपने घर लौट रहे थे। वहीं खलीफाबाग चौक पर पोता-पोती ने आइसक्रीम खाने की जिद की तो रूक गए। कार को सड़क किनारे खड़ी कर सपरिवार आइसक्रीम खाने लगे। इस बीच भागलपुर पुलिस की एक टीम ने उनकी कार को घेर लिया। डॉ. योगेंद्र ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने उनके बेटे को घसीटकर कार से बाहर किया। उसके साथ मारपीट की। वहीं पत्नी, पतोहू और बच्चों को जबरदस्ती कार से निकाला। पुलिसकर्मियों ने कहा कि उन्होंने अपनी कार नो पार्किंग जोन में पार्क की है।

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मैं उस घटना का साक्षी नहीं हूं। यह सब फेसबुक पर मेरे संज्ञान में आया और आज जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के पृष्ठ संख्या 4 पर इससे संबंधित एक खबर है। वहीं पटना से प्रकाशित प्रभात खबर और हिन्दुस्तान में डॉ. योगेंद्र के द्वारा सपरिवार धरना दिए जाने की खबर नहीं है। जनसत्ता में प्रकाशित खबर में भी इस बात की कहीं चर्चा नहीं है कि पुलिसकर्मियों ने डॉ. योगेंद्र और उनके परिजनों को गालियां दी या नहीं। लेकिन मुझे लगता है कि बिहार की महान पुलिस ने यह काम जरूर किया होगा। कल अपने धरने के बाद डॉ. योगेंद्र ने पुलिस अधिकारियों को एक ज्ञापन सौंपा। इसमें शहर में पार्किंग जोन बनाने की बात कही। साथ ही उन्होंने पुलिसकर्मियों द्वारा आम नागरिकों का अपमान करने पर रोक लगाने की मांग की।

अब मेरे सामने दो तस्वीरें हैं। एक तो वह आदमी जिसकी जमीन पर एक सवर्ण कब्जा करने का प्रयास करता है, जान से मारने की धमकी देता है और दूसरी तस्वीर डॉ. योगेंद्र व उनके परिजनों की है। मैं कंफ्यूज्ड हो रहा हूं कि इन दोनों में आम आदमी कौन है? सरकार को और उसके तंत्र को लेकर मेरे मन में कोई सवाल नहीं। बिहार की मुसहरियों में आए दिन पुलिसकर्मी दलितों के आत्मसम्मान को अपने जूतों से रौंदते हैं। प्राथमिकी दर्ज कराने आने वाले पीड़ित उनकी गालियां सुनने वाले प्रथम श्रोता होते हैं।

मेरा सवाल यही है कि आम आदमी कौन है?

निस्संदेह आम आदमी डॉ. योगेंद्र हैं। वह मजबूर व्यक्ति नहीं, जिसे थाने का एक अदना-सा पुलिसकर्मी गालियां देता है और घबराकर वह मुझे फोन करता है। वह आम नहीं, मजबूर आदमी है। डॉ. योगेंद्र मजबूर आदमी नहीं हैं। वह विरोध करना जानते हैं। उनका एक वर्ग है। तो आम आदमी भी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके बारे में पटना से प्रकाशित अखबार सरकार के प्रति अपनी निष्ठा के कारण भले ही खबर प्रकाशित न करें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे उनके साथ नहीं हैं।

दरअसल, यही सच्चाई है आज की मीडिया की। मुट्ठी भर सवर्णों की मीडिया और अखबार। दलितों, आदिवासियों और पिछड़े किस खेत की मूली हैं। इस देश में सवर्ण ही आम आदमी है। बाकी जो हैं उसका निर्धारण बाकियों को ही करने देना चाहिए। आजाद भारत में भी यदि वे गुलाम हैं तो अपनी गुलामी को दूर करने का प्रयास खुद करें। इसके लिए एकजुट हों। ठीक वैसे ही जैसे डॉ. योगेंद्र के पक्ष में भागलपुर शहर के कई लोग एकजुट हुए।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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