क्या कविता का मतलब बाल की खाल निकालना है ?

देवेंद्र आर्य

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सिर्फ प्रतिभा नहीं, कविता एक क्राफ्ट भी है जिसका ताल्लुक सीखने और अभ्यास से है और जिसके सहारे ही कविता आस्वाद से जुड़ती है। यह शिल्प ही है जो कविता के कथ्य को कविता के आस्वाद से जोड़ता है। अधिकांश (प्रतिभा सम्पन्न?) कवि चुस्त कहन या कविता में चुटकुला या किसी बात की खाल खींच लेने को ही कविता मान ले रहे हैं । उनके लिए केवल एक पंच लाइन है या महीन विवरण ही कविता है। समकलीन कविता में कवित्त जैसे एक सामंती शब्द हो गया है । कवित्त की बात करना या मांग करना पुरातनपंथी होना है। सोचा जाना चाहिए कि कवित्त से अनभिज्ञता का कविता की क्लिष्टता या बेमसरफ़पन से क्या रिश्ता है ?

क्या किसी कविता में कविता का न होना ही कविता है ?

कविता जहां भी गुरचियाई, उसमें मेरी रुचि कम हो जाती है। रचना का गुरचियाना भाषा के स्तर पर भी सम्भव है , और कथ्य के स्तर पर भी। क़ाबिल होने और रचना में क़ाबिलियत दिखाने में अंतर है। कविता डाक्टर का लिखा पर्चा होकर मरीज़ से अधिक दुकानदार के लिए महत्व रखती है। चिकित्सक, मरीज़ और दुकानदार साहित्य में भी होते हैं। कविता के चिकित्सक कौन हैं और दुकानदार कौन, इस पर विवाद हो सकता है पर मरीज़ बेचारा पाठक ही है, इसमें कोई विवाद नहीं।

एक अंतर्निहित सांगीतिकता ही कविता को जीवित और चर्चित रखती है । यह संगीतिकता, भाव सघनता, काव्य विषय से गहरे आंतरिक लगाव बिना नहीं आती, वरना आप मिलाते रहें छंद की, ग़ज़लियत की चाशनी, कविता दो ही कौड़ी की रहेगी। विष्णु खरे से बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है। निरा गद्य कैसे भाव और विचार सघन होकर कविता बन जाता है, उनसे सीखना चाहिए ।

क्या कविता के होने न होने का पैमाना छंद है ?

छंद का सार्वकालिक आग्रह कविता को मंचीय बना देता है और पूर्णकालिक दुराग्रह उसे जनसामान्य से निर्लिप्त कर देता है। छंद, कविता की सपाटबयानी ढंकने का उपकरण कतई नहीं है। कविता में प्रथमतः और अंतत: बात ही देखी जाती है, कहन नहीं । आदमीयत है तो आप गोरे हों या काले, फ़र्क नहीं पड़ता। इसी का उल्टा करके जांचिए कि आपकी पसंद कैसी है ?

छंद मुक्त कविता में सपाटबयानी यानी गद्यात्मकता की शिकायत कभी-कभी काव्य ग्राहिता की कमी के कारण भी होती है। कविता को जानबूझकर सरल बनाना और जानबूझकर कठिन बनाना, दोनों ही कविता और पाठक के हक़ में नहीं ।

‘जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख’, ही सर्वोत्तम काव्य प्रकिया समझ में आती है । बात के लिहाज़ से भी और सम्प्रेषणीयता के लिहाज़ से भी । कविता अगर है तो उसे समथिंग डिफरेंट होना ही होगा ।

कविता छंद विहीन हो सकती है मगर लय विहीन नहीं ।

एक अंतर्निहित सांगीतिकता ही कविता को जीवित और चर्चित रखती है । यह संगीतिकता, भाव सघनता, काव्य विषय से गहरे आंतरिक लगाव बिना नहीं आती, वरना आप मिलाते रहें छंद की, ग़ज़लियत की चाशनी, कविता दो ही कौड़ी की रहेगी। विष्णु खरे से बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है। निरा गद्य कैसे भाव और विचार सघन होकर कविता बन जाता है, उनसे सीखना चाहिए ।

कविता की पहली और अंतिम शर्त उसका कविता होना है चाहे वह छंद में हो या छंद मुक्त । कविता दोनों जगह गायब या छिछली हो सकती है , छंद में भी और मुक्तछंद में भी ।

कविता सिर्फ शिल्प नहीं होती । शिल्प विशेष की उपस्थिति अनुपस्थिति से उसे पास या फेल न करें । यह काम हिन्दी के आलोचक पिछले चार दशक से कर रहे हैं और कविता को एकरंगी, एक रेखीय बना रहे हैं ।

गद्य कविता, छंद कविता का आगे बढ़ा हुआ, विकसित ही नहीं अब अपरिहार्य रूप भी है । गद्य में होके भी कविता कविता हो सकती है, होती भी है पर तभी जब कवि स्वयं कविता में लय-संरचना से अंजान न हो । विचार स्वतःस्फ़ूर्त होते हैं पर लयात्मकता या काव्यात्मकता को गढ़ना पड़ता है जो क्राफ्टमैन शिप का विषय है और जिसके बिना कविता अप्रभावी होती है । छंद में होकर भी कविता कविता नहीं हो सकती, अक्सर नहीं भी होती है । यह होना न होना काव्य क्षमता, गहन सर्वेक्षण, रुचि परिष्कार , सरोकार और समझ से जुड़ा मामला है ।

अक्सर छंद की अनावश्यक वकालत कवि में काव्य प्रतिभा की कमी के कारण होता है ।

 देवेंद्र आर्य सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार हैं और गोरखपुर में रहते हैं ।

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