Friday, August 28, 2026
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फिलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध : हम किसी भी हालत में अपना देश नहीं छोड़ेंगे

 नई दिल्ली में 2 जुलाई, 2026 को में गाज़ा में नरसंहार के 1000वें दिन को कविताओं और एकजुटता भाषणों के साथ याद किया गया। सभा के विशेष अतिथि, फ़िलिस्तीन राज्य के राजदूत डॉ. अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने आईपीएसएन को इस सार्थक कार्यक्रम के आयोजन पर धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वे फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए न्याय, आज़ादी और सम्मान की माँग में आईपीएसएन के साथियों की इस एकजुटता और प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित हैं।

बांडुंग से ब्रिक्स : अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प की संभावनाएँ और चुनौतियाँ

ब्रिक्स के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं: राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच आदान-प्रदान। आज अमेरिका को डॉलर-आधारित वर्चस्व का लाभ प्राप्त है। लगभग 67 देशों पर अमेरिकी शक्तियों द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ब्रिक्स ने द्विपक्षीय व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय संदेश प्रणालियों तथा चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसे व्यापारिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। ये छोटे, किंतु प्रभावशाली कदम एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव की वास्तविकता और सिनेमा

क्या शिक्षण संस्थानों में भेदभाव होता है? क्या जातीय आधार पर अध्यापक अपने विद्यार्थियों से भेदभाव करते हैं? क्या सिनेमा में इस भेदभाव को यथार्थ ढंग से चित्रित किया गया है? क्या सुधारात्मक कानून समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी बढ़ा देते हैं? यह बहुत जटिल, बड़ा और वर्तमान का सबसे ज्वलंत सवाल है, क्योंकि इस सवाल को देखने और समझने की दृष्टि प्रायः पूर्वाग्रहों से भरी हुई होती है। सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक विभेदीकरण दुनिया के सभी समाजों में पाया जाता है। जाति, धर्म, लिंग, रंग और वर्गीय आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना, पूर्वाग्रहों और थोपी हुई निर्योग्ताओं पर आधारित व्यवहार करते हुए एक निश्चित आबादी को उसके मूलभूत, मानवाधिकारों और अवसरों से वंचित करना सामाजिक भेदभाव कहलाता है। पढ़िए जाने-माने कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का विश्लेषण जिसमें उन्होंने शिक्षण परिसरों में घटनेवाली घटनाओं के बहाने सिनेमा में उसके चित्रण पर कई सवाल उठाये हैं। 

सिनेमा में ग्रीनलैंड : असाधारण जीवट की कहानियों पर ट्रम्प की लोलुपता की बढ़ती छाया

अमेरिका खुद को विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र और शांति-व्यवस्था का संरक्षक मानता है जबकि वास्तविकता इसके उलट है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया से दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरा और वहीं से उसकी दादागिरी और बढ़ गयी। अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं को अपनाकर एक खुली हुई विश्व व्यवस्था की वकालत की ताकि पूंजी और श्रम का बेरोकटोक प्रवाह हो सके। इस कार्य में विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खुली विश्व व्यवस्था का लाभ उठाकर चीन, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने नव साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। विकासशील और गरीब देशों के संसाधनों की लूट बढ़ गयी। जिन देशों ने इस लूट में सहयोग नहीं दिया उनके ऊपर वामपंथ, तानाशाही, परमाणु हथियार बनाने का आरोप मढ़कर, प्रायोजित विद्रोह कराकर वहां की शासन व्यवस्था को अस्थिर कर दिया गया। कमजोर और अमेरिकापरस्त लोगों के हाथ में सत्ता देकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दादागिरी थोप दी गयी। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, बांग्लादेश सभी इसके शिकार हो चुके हैं। फिल्म ‘अगेंस्ट द आइस’ दो बहादुर खोजी यात्रियों द्वारा अपने निजी अनुभवों पर लिखी गयी किताब पर आधारित फिल्म थी जिसने ग्रीनलैंड को अमेरका की विस्तारवादी नीति से बचाया था लेकिन एक शताब्दी बाद अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश यह समझने को तैयार नहीं कि देश जमीन पर बना नक्शा नहीं होता। उसमें लोग भी रहते हैं जो अपने देश और लोगों से प्यार करते हैं और किसी बाहरी देश का कब्ज़ा या हस्तक्षेप नहीं चाहते। सबसे रार ठानकर अमेरिका अकेले नहीं रह सकता। उसके राष्ट्रपति को नहीं पता लेकिन वहां की जनता को पता है, इसलिए यूनाइटेड स्टेट के नागरिक अपने राष्ट्रपति के फैसलों के खिलाफ मुखर विरोध भी कर रहे हैं। पढ़िये ग्रीनलैंड के सिनेमा के बहाने साम्राज्यवाद के गहराते संकट पर राकेश कबीर का लेख।

वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव

आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।

भारतीय समाज में फैला जातिवाद यहाँ के सिनेमा के मौलिक चरित्रों में ठूँस-ठूँस कर दिखाया जाता है

पूरी दुनिया में भारत ही ऐसा देश है जहां जातिवाद का घोर बोलबाला है। इसका प्रभाव समाज की हर संस्कृति और कला में देखने को मिलता है। भारतीय सिनेमा चाहे जिस भाषा में बनी हो वहाँ के चरित्रों में जाति और धर्म को केंद्र में रखा जाता है। आज का सिनेमाई यथार्थ यही है कि नायक या नायिका जो भी कुछ बेहतर परिवर्तन लाने की कोशिश करते दिखेंगे, देशहित में विदेशों से अच्छा कैरियर छोडकर वापस आयंगे या समाज में कुछ भी सकारात्मक घटित हो रहा होगा तो फिल्मों में उन चरित्रों को निभाने वाले नायक-नायिका के टाइटल साफ़ तौर पर उनकी जातीय पृष्ठभूमि को बताते हैं।

अहिल्याबाई होल्कर ने आदिवासी, दलित और पिछड़े समाज की बेहतरी के लिए काम किया

देवी अहिल्याबाई होल्कर आज से तीन सौ वर्ष पहले समाज के पिछड़े, व वंचित समुदाय के साथ-साथ स्त्रियों के लिए भी बहुत से ऐसे काम किए, जो उन दिनों साहस का कदम था। आदिवासियों और दलित जो समाज से पूरी तरह कटे हुए थे के लिए ऐसी व्यवस्था की ताकि वे मेहनत कर अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सकें। धर्म-अन्धविश्वास, भय-त्रास में और रूढ़ियों में फंसा हुआ था तबअहिल्याबाई ने अपनी प्रजा को इससे निकाला। वे धार्मिक थीं लेकिन अंधविश्वासी नहीं थीं।

सामाजिक व्यवस्था, शोषण और दमन ने जिन लोगों को बीहड़ में जाने को मजबूर कर बागी बनाया   

जब तक इन निर्जन-दूरस्थ स्थानों पर बसे कमजोर समुदाय के लोगों के साथ अन्याय और अत्याचार होता रहेगा बीहड़ों और जंगलों में बाग़ी पैदा होते रहेंगे। सरकार की उपस्थिति, अन्याय अपमान और अत्याचार से संरक्षण, सरकारी योजनाओं का लाभ, नौकरी और रोजगार में हिस्सेदारी जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को सुनिश्चित कराकर ही लोगों के मन में कानून के प्रति सम्मान पैदा किया जा सकता है। लोकतंत्र की सभी संस्थाए जैसे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अपनी पहुंच के साथ-साथ भरोसा पैदा करके इन क्षेत्रों में बसे लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने और बागी होने से रोक सकती हैं।

सिनेमा : प्रवासी महिलाएं होम और होस्ट दोनों देशों में पितृसत्ता से आज़ादी चाहती हैं..

तीसरी दुनिया के गरीब देशों से महिलाओं का विकसित देशों के लिए प्रवास करना मानवीय इतिहास की बड़ी घटना है। प्रवासी महिलाएं होम और होस्ट दोनों देशों में पितृसत्ता से आज़ादी चाहती हैं क्योंकि वे कहीं भी जाएं अपनी कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण उनके साथ शोषण, अपमान और भेदभाव जारी रहता है।

विद्रोही का आक्रोश छाती पीटने वाला आक्रोश नहीं है

वह मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से शीर्षक कविता के माध्यम से स्त्री-अस्मिता के सवालों से साहस के साथ टकराते हैं। वह दिखलाते हैं कि जिन साम्राज्यवादी सभ्यताओं पर हम गर्व करते हैं वह स्त्रियों और आम इंसानों की लाशों पर खड़ी हुई हैं। वह एक तरह से दुनिया की सारी सभ्यताओं को कटघरे में खड़ा करते हुए सवाल उठाते हैं कि आखिर क्या बात है कि हर सभ्यता के मुहाने पर औरत की जली हुई लाश और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ मिलती हैं। यह अमानवीयता केवल मोहनजोदड़ों तक सीमित नहीं है; यह बेबीलोनिया से लेकर मेसोपोटामिया तक, सीथिया की चट्टानों से लेकर सवाना के जंगलों तक फैली हुई है।

अभिनेता ही नहीं, सामाजिक आंदोलनकारी भी थे नीलू फुले

नीलू फुले के पूर्वजों में महामना जोतीराव फुले और माता सावित्रीबाई फुले सबसे उल्लेखनीय हैं लेकिन वास्तव में नीलू फुले परिवार के उस हिस्से से ताल्लुक रखते थे जिसने आजीवन जोतीराव फुले का विरोध किया। वे सिनेमा में काम जरूर करते थे लेकिन उनका दिल समाज के लिए धड़कता था। वे आजीवन राष्ट्रसेवा दल के साथ रहे लेकिन बाद के दिनों में कुछ उपेक्षित महसूस करने लगे थे। मैं जब भी उनसे मिला या बात करता उनमें वही जज़्बा और जोश होता जो जवानी के दिनों में होता था। वे हर व्यक्ति के मददगार मित्र थे।
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