Friday, June 14, 2024
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देवी अहिल्याबाई होल्कर : जिन्होंने समाज के आदिवासी, दलित और पिछड़े समाज की बेहतरी के लिए काम किया

देवी अहिल्याबाई होल्कर आज से तीन सौ वर्ष पहले समाज के पिछड़े, व वंचित समुदाय के साथ-साथ स्त्रियों के लिए भी बहुत से ऐसे काम किए, जो उन दिनों साहस का कदम था। आदिवासियों और दलित जो समाज से पूरी तरह कटे हुए थे के लिए ऐसी व्यवस्था की ताकि वे मेहनत कर अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सकें। धर्म-अन्धविश्वास, भय-त्रास में और रूढ़ियों में फंसा हुआ था तबअहिल्याबाई ने अपनी प्रजा को इससे निकाला। वे धार्मिक थीं लेकिन अंधविश्वासी नहीं थीं।

देश की महिला शासक अहिल्याबाई होल्कर की जयंती के मौके पर उन्हें याद करते हुए 

इतिहास के उत्तर-मध्यकालीन भारत में जब स्त्रियों का स्थान गौण था और रीतिकालीन काल के कवि बिहारी जैसे कवि स्त्रियों का नख-शिख वर्णन कर रहे थे। स्त्री यानि उपभोग की वस्तु। यह वह काल था जब स्त्रियों को इतने पर्दे में रखा जाता था कि सूर्य की किरणें भी उन्हे छू न सकें। ऐसे समय में अहिल्याबाई होल्कर का मध्य प्रदेश के मालवा के इन्दौर में शासक बन कर सत्ता चलाना एक चुनौती भरा कार्य था, उन्होंने कुशलतापूर्वक अट्ठाइस वर्ष तक राज किया। इन्हें भारत के इतिहास में न केवल अपने साहस के लिए जाना जाता है बल्कि महिला सशक्तिकरण, समाज सुधारऔर कई क्रान्तिकारी कदमों के लिए आज भी उन्हें याद किया जाता है।  वे अपने साहस के साथ सेवाभाव और बुद्धिमानी के लिए भी जानी जाती है।

अहिल्याबाई का जन्म 31मई 1725 चौड़ी नामक गांव में, जो आज महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले के जामखेड में है, जिसे अब अहिल्यानगर के नाम से जाना जाता है।  पिता माणकोजी शिंदे (धनगर) पाटिल होते हुए भी निर्धन थे। वे अपने माता-पिता की इकलौती पुत्री थी। उस समय लड़कियों को पढ़ाया-लिखाया नहीं जाता था पर उनके प्रगतिशील सोच वाले पिता ने अहिल्याबाई को पढ़ाया और काबिल बनाया।

एक बार मालवा के राजा “सूबेदार मल्हारराव होलकर”  पूना जाते समय चौड़ी गांव में रुके। यहीं उन्होंने देखा आठ साल की अहिल्या निष्ठा से भूखे और गरीब लोगों को भोजन करा रही थीं। यह देखकर मल्हार राव ने अहिल्यादेवी का रिश्ता अपने बेटे खंडेराव होलकर के लिए मांगा। 1733 में खंडेराव के साथ विवाह कर कम उम्र में अहिल्या देवी मालवा आ गई। हालांकि खंडेराव की चार पत्नियाँ थी – अहिल्यादेवी, पाराबाई, पीताबाई, सुरताबाई। मल्हार राव को अपने बेटे खंडेराव से ज्यादा भरोसा अपनी बहू अहिल्या पर था। 1754 में खंडेराव कुंभेर के युद्ध में, वीरगति को प्राप्त हो गए। वे 29 वर्ष की थी। पति की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई ने सती होने का फैसला किया पर ससुर मल्हार राव के कहने पर वे सती नहीं हुई अन्य तीन, पत्नियाँ सती हो गईं । बाद में मल्हार राव अहिल्या को राज्य- कार्य संबंधी प्रशिक्षण देने लगे। ससुर जब युद्ध पर जाते तो अहिल्या देवी राज्य-व्यवस्था संभालती। सुरक्षा, राजस्व, न्याय, नीति और सामान्य प्रशासन सभी क्षेत्रों में उन्होंने मार्गदर्शन किया। 20 मई 1766 को मल्हार राव का निधन हुआ। उसके बाद अहिल्यादेवी के सुपुत्र मालेराव अहिल्याबाई होल्कर को गद्दी सौंपी गई। केवल नौ महीने उनके सुपुत्र राज कर पाये उनकी मृत्यु हो गयी। इसके बाद 1767 में रियासत की कमान अपने हाथों में ले ली। पुत्र के मृत्यु के पश्चात दुखी अहिल्याबाई ने इन्दौर छोड़, महेश्वर को अपनी राजधानी बना ली। अब उनकी सारी उम्मीदें बेटी मुक्ताबाई पर टिक गई। इसी बीच उनके राज्य में डकैतों ने आंतक मचा रखा था। महारानी ने ऐलान किया कि जो डकैतों से निपटने, में मदद करेगा, उसके साथ बेटी का विवाह करेंगी। यशवंत फणसे नामक व्यक्ति ने डकैतों का खात्मा किया। महारानी ने डकैतों को फांसी की सजा न देकर बटोरने का काम सौंपा और यशवंतराव से अपनी बेटी मुक्ताबाई का विवाह किया’ कहा जाता है यशवंतराव आदिवासी से महारानी ने अन्तरजातीय विवाह बेटी का किया।

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माहेश्वरी साड़ियों को बनाने के लिए कुटीर उद्योग की अवधारणा की शुरुआत की

अहिल्याबाई  समाज को लेकर इतनी दूरदर्शी थीं कि उन्होने हर क्षेत्र के विकास के लिए काम किया। माहेश्वरी की साड़ियाँ बहुत प्रसिद्ध है लेकिन  साड़ी के इस उद्योग को स्थापित करने और बढ़ावा देना का कम किया। सन् 1767 में आज से 250 वर्ष पहले कुटीर उद्योग स्थापित किया। गुजरात तथा भारत के अन्य शहरों के बुनकर परिवारों को यहाँ लाकर बसाया। उन्हें घर, व्यापार आदि की सुविधाएँ दीं। पहले यहाँ केवल सूती साड़ियाँ ही बनाई जाती थी परंतु बाद में उच्च गुणवत्ता वाली रेशम तथा सोना व चांदी के धागों से बनी साड़ियाँ बनाई जाने लगी। देवी अहिल्याबाई की राजधानी बनने के बाद महेश्वर के विकास में कई अध्याय देखे। सामाजिक, धार्मिक, भौतिक, सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ देवी अहिल्या ने अपनी राजधानी को औद्योगिक रूप से समृद्ध करने के उद्देश्य से यहाँ वस्त्र-निर्माण प्रारंभ की योजना बनाई। उस समय वस्त्र निर्माण और हथकरघा में हैदराबादी बुनकरों का कोई जबाव नहीं था। उन्होंने हैदराबाद के बुनकरों को आमंत्रित किया और अपने पुश्तैनी कार्य महेश्वर में रहकर करने को कहा। इन बुनकरों से अहिल्याबाई का विशेष आग्रह होता था कि वे इन साड़ियों तथा अन्य वस्त्रों पर महेश्वर किले की दीवार पर बनाई गई डिजाइनें बनाएं। वे वैसा ही करने लगे। आज भी साड़ियों के किनारियों पर महेश्वर किले की दीवारों के शिल्प वाली डिजाइनें मिल जायेंगी। इन्दौर के अंतिम महाराजा यशवंत होल्कर के पुत्र युवराज रिचर्ड ने “रेवा सोसाइटी’ नामक एक संस्था का निर्माण किया जो आज भी महेश्वर किले में ही महेश्वर साड़ियों का निर्माण करती है।

समाज में जब आदिवासीऔर दलित समाज के लोगों को सम्मनित जीवन के लिए काम दिया 

यह वह काल था जब महाराष्ट्र में पेशवा ब्राह्मणों का राज था जहाँ दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार होता था। पेशवाई के शासन में कोई सवर्ण ब्राह्मण रास्ते पर चलते थे तब दलितों को उस रास्ते पर चलना मना था। उन्हें अपने गले में हांडी बांधनी पड़ती थी जिसमें वे थूक सकें जमीन पर थूकना मना था, कमर में झाड़ू बांधना पड़ता था ताकि जमीन जो उनके परछाई से भी गंदी हो गई है, वह साफ हो जाये। यहाँ तक की यदि भूल से कोई दलित (महार) शनिवार बाड़ा के पास से निकल जाए तो उसका सिर काटकर बॉल की तरह ब्राह्मण लोग खेलते थे ऐसा पेशवाराज में अहिल्याबाई होल्कर ने दलितों, आदिवासियों और कबीलों, पिछड़ों के उद्धार के लिए बहुत कुछ किया। आदिवासी कबीलों को उन्होंने जंगलों का जीवन छोड़ गांव में किसानों के रूप में बस जाने के लिए मनाया। उनका दामाद यशवन्त आदिवासी समाज से था। उन्होंने कपड़ा उद्योग में इन सभी जाति के लोगों को ट्रेनिंग दी और काम पर लगाया। उन्हे शिक्षित किया।

महिलाओं को आगे लाने का महत्वपूर्ण काम किया  

देवी अहिल्या ने महिलाओं को उचित स्थान दिया। नारी शक्ति का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने बता दिया कि महिलाएं किसी भी स्थिति में पुरुषों से कम नहीं। महिलाओं के मान-सम्मान का बड़ा ध्यान रखा, लड़कियों को पढ़ाने लिखाने का जो घरों में थोड़ा सा चलन था, उससे विस्तार दिया। वे हमेशा नारी जगत के लिए प्रेरणा स्त्रोत रही।

अपने नेतृत्व में महिला सेना बनाई । वे स्वयं भी पति के साथरणक्षेत्र में जाया करती थी। सेना की महिलाओं को प्रशिक्षण दिया और युद्ध कौशल भी सिखाए । सेना का नेतृत्व वे पति की मृत्यु के बाद स्वयं करती थीं ।

अपने शासन काल में, उन्होंने नदियों पर जो स्नान घाट बनवाएं उनमें महिलाओं के लिए स्नान की अलग व्यवस्था की। दान- दक्षिणा में महिलाओं का विशेष ध्यान रखा।

महिलाओं के लिए विशेषकर समाज सेवा के लिए खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने विधवा महिलाओं की स्थिति पर भी खास काम किया और उनके लिए उस वक्त बनाए गए कानून में बदलाव लाए। अहिल्याबाई के मराठा प्रांत का शासन संभालने से पहले यह कानून था कि अगर कोई महिला विधवा हो जाए और उसका पुत्र न हो तो उसकी पूरी संपत्ति सरकारी खजाना में या फिर राजकोश में जमा की जाती थी लेकिन अहिल्याबाईने कानून को बदलकर विधवा महिलाओं को अपने पति की संपत्ति लेने का हकदार बनाया। विधवाओं को गोद लेने का हकदार बनाया। इसके अलावा उन्होंने शिक्षा पर खास जोर दिया। विधवाओं के लिए सरकार ने आश्रम बनाए।

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साहसी प्रशासक, जो अपने राज्य में आने वाले खतरों से निपटने का तरीका जानती थीं 

मराठा शासन में उस समय कट्टर पेशवा ब्राह्मणों  का राज था जो घोर विधवा विरोधी और बहुजन विरोधी थे। पेशवा अहिल्याबाई पर आक्रमण करने की तैयारी में थे। अहिल्याबाई जानती थी कि पेशवा के सामने उनकी सेना कमजोर है इसलिए उन्होंने राघोबा पेशवा को समाचार भेजा कि “यदि वे स्त्री सेना से जीत हासिल भी कर लेंगे, तो उनकी कीर्ति और यश में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी, दुनिया कहेंगी कि स्त्रियों की सेना से ही तो जीते है और अगर आप स्त्रियों की सेना से हार गये तो कितनी जग हंसाई होगी इसका आपको अन्दाजा भी नहीं है। अहिल्याबाई की बुद्धिमानी और चतुराई काम कर गई। पेशवा ने आक्रमण करने का विचार छोड़ दिया। इसी तरह ग्वालियर के राजा रणोजी सिंधिया के उत्तराधिकारी महादजी सिंधिया ने अहिल्याबाई को धमकी दी। महादजी सिंघिया को पेशवा के समस्त उत्तर, मध्य, पश्चिम भारतीय राज्यों से कर वसूलने औरसाम्राज्य विस्तार की जानकारी दी थी। एक दिन वे महेश्वर आए और अहिल्याबाई को धमकी दी। अहिल्याबाई क्रोध में बोलीं “जैसे तुम अपने घर की स्त्रियों को सुपारी के टुकड़े के समान मुँह में डालकर गटक जाते हो।…. जिस दिन इन्दौर पर तुम्हारी फौज कूच करेगी, उसी दिन हाथी के पांव की सांकलसे तुम्हें बांधकर तुम्हारा स्वागत करने मैं आऊँगी—तभी मैं मल्हार राव’होल्कर की बहू कहलाऊँगी।

निष्पक्ष फैसले लेती थीं अहिल्याबाई

एक बार जमीन के टुकड़े को लेकर काफी दिनों से ग्वालियर राज्य और होल्कर राज्य में मतभेद चल रहा था। इसका फैसला अहिल्याबाई पर छोड़ दिया गया। उन्होंने निर्णय दिया- यह दोनों राज्य की जमीन नहीं। इस जमीन पर का इस्तेमाल गो-चर के रूप में होगा। इस पर कोई लगान भी नहीं लिया जाएगा।

कायदों-नियमों की पक्की थीं । जमीन-विवाद आने लगे तो उन्होंने ‘खसरा नियम’ बना दिया। आवेदकों से जमीन की लंबाई में सात फलदार पेड़और चौड़ाई में बारह फलदार पेड़ लगाने को कहा। इस तरह विभाजन बराबर हुआ। सात पेड़ो के फलों से होने वाली कमाई का वार्षिक टैक्स के रूप में राजकोष में जमा करें और बारह पेड़ो के फलों से होने वाली कमाई अपनी आजीविका के लिए रखें । महाराष्ट्र राज्य का राजस्व विभाग अब भी इसके जरिये भूमि का रिकार्ड रखता है ।

एक बार अहिल्याबाई के बेटे मालोजीराव अपने रथ से सवार होकर राज-बाड़ा से गुजर रहे थे। उसी दौरान गाय का बछड़ा कहीं से कूदताहुआ आ गया और बुरी तरह घायल होकर तड़प- तड़प कर मर गया । इस घटना को नजर अंदाज कर मालोजी आगे बढ़‌ गये। थोड़ी देर बाद वहीं से अहिल्याबाई गुजरी उन्होंने देखा गाय, वहीं बछड़े के पास बैठी है, हट नहीं रही। उन्होंने घटना की जानकारी ली। वे दरबार में जाकर मालोजी की धर्मपत्नी मेनाबाई को बुलाकर पुछी कि यदि कोई व्यक्ति किसी की माँ के सामने उसके बेटे का कत्ल कर दें तो उसे क्या दण्ड देना चाहिये? मेनाबाई ने तुरन्त जबाव दिया- मृत्यु दण्ड देना चाहिए। उसके बाद अहिल्याबाई ने अपने बेटे को मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई। कोई भीरथ का सारथी बनकर मालोजी को कुचलना नहीं चाहता था। न्याय की देवी अहिल्या खुद‌ ही रथ पर बैठ गई। वे रथ आगे बढ़ा रही थी कि गाय सामने आकर खड़ी हो गई। दरबारी मंत्रियों के आग्रह पर अहिल्याबाई हटीं। मंत्रियों ने कहा गाय भी नहीं हटी, वह नहीं चाहती कि किसी और माँ के बेटे के साथ ऐसी घटना हो। गाय वही अड़ी रही इसलिए राजबाड़ा के पास जिस स्थान पर यह घटना हुई थी, उसे”आड़ा बाजार” कहते हैं।

पति, ससुर और बेटे की मौत के बाद अपना राज्य भगवान शिव को समर्पित कर दिया। वे सिर्फ सेविका के रूप में राज्य का कार्य करती थी।यही से शुरूआत होती हैं- हुजुर शंकर” ऑर्डर की, जो महाराज यशवंतराव होलकर द्वितीय के समय तक चली। यह विश्व में एक मिसाल है। यही कारण है कि अहिल्या देवी के काल के सिक्कों पर शिव-लिंग अंकित होता था।

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देश भर में अनेक काम करवाए

मंदिरों के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण के लिए अहिल्याबाई ने पूरे भारत में, 65मंदिर, धर्मशालाओं का निर्माण किया। सभी जाति, धर्मों, समुदायों के लिए सड़कें, कुएँ, तालाब, बावड़ि‌या, घाट और पानी की टंकी की मूलभूत सुविधाओं के साथ बनवाया। महेश्वर में रहते हुए, अमर कंटक, बद्रीनाथ, केदारनाथ अयोध्या, गंगोत्री, पुष्कर, रामेश्वर, हरिद्वार में धर्मशालाएँ बनवाई, उज्जैन में नौ मंदिर और तेरह घाट का निर्माण उनके नाम है।

काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी में वर्तमान स्वरूप का निर्माण1780 ई. में देवी अहिल्या ने बनवाया, सोमनाथ मंदिर, वेरावल, गुजरात 1783 में पूना के पेशवा के साथ मिलकर बनवाया। विष्णुपद मंदिर-गया, बिहार (विश्व का ऐसा मंदिर जहाँ विष्णु के चरण-चिन्ह की पूजा होती है) 1787 में धर्मशिला नाम से जाना जाने वाले इस मंदिर का निर्माण किया। बैजनाथ मंदिर, कांगडा, हिमाचल प्रदेश में नागर शैली में बना हिन्दू मंदिर है। 1204 ईस्वी में अदुका व मन्युका दो व्यापारियों ने बनवाया था। यह वैद्यनाथ (चिकित्सकों के प्रभु) के रूप में भगवान शिव को समर्पित है। एलोरा के गणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार अहिल्यादेवी ने करवाया।

उन्होंने कोलकाता से लेकर काशी तक श्रद्वालुओं के लिए सड़क निर्माण किया। गर्मी में कई जगह प्याऊ बनवाएँ। शीत ऋतु में गरीबों को कंबल, रजाइयों, गर्म कपड़ो का वितरण करती थी। कुछ खेतों में खड़ी होकर फसल को खरीदकर चिड़ियों को चुगने के लिए छोड़ देती थी। मछलियों के चारे की व्यवस्था करती थी।

अहिल्याबाई होल्कर ने दिखा दिया कि मात्र शस्त्र-बल से ही दुनिया को नहीं जीता जा सकता बल्कि प्रेम और धर्म के बल पर भी राज किया जा सकता है। जब चारों ओर गड़बड़ी मची हुई थी। प्रजाजन – साधारण गृहस्थ, किसान, मजदूर, अत्यंत हीन अवस्था में थे। धर्म-अन्धविश्वास, भय-त्रास में और रूढ़ियों में फंसा हुआ था तबअहिल्याबाई ने अपनी प्रजा को इससे निकाला। उन्हें लोगों ने उनके जीवन काल में ही देवी’ की उपाधि दी क्योंकि उनके न्याय, व्यवस्था, प्रेम, उनके व्यक्तित्व को जनता ने देखा था। वे बेहद स्पष्ट, सख्त एवं निष्पक्ष थीं । शासन-व्यवस्था पर जबर्दस्त पकड़ थी। वह बहुत साधारण जीवन जीतीं थीं।

 

कुसुम त्रिपाठी
कुसुम त्रिपाठी
कुसुम त्रिपाठी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहते हुए लगातार छात्र,महिला, मजदूर और मानवाधिकारों के मुद्दों पर संघर्ष करती हुई लेखन कार्य में सक्रिय हैं

2 COMMENTS

  1. प्रेरक और प्रासंगिक लेख ,जिसे बहुत ही गंभीरता से लिखा गया है..

  2. प्रेरक और प्रासंगिक लेख ,जिसे बहुत ही गंभीरता से लिखा गया है..विशेषकर स्त्री संदर्भों को लेकर..

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