बातें लता मंगेशकर की (डायरी 7 फरवरी, 2022)

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कल लता मंगेशकर का निधन हो गया। वह हमारे देश की सुप्रसिद्ध गायिका थी। कल उनके बारे में विस्तार से जानने की इच्छा हुई तो गूगल की सहायता ली। जानकारी मिली कि उन्होंने 71 साल तक गायन किया और वह भी देश के लगभग सभी भाषाओं और बोलियों में। चूंकि मैं बिहार का हूं तो मेरे मन में इच्छा हुई कि भोजपुरी में उन्होंने क्या गया है, यूट्यूब पर खोजा। एक गाना मिला, जिसे उन्होंने तलत महमूद के साथ गाया– लाल लाल ओठवा से…।

निस्संदेह लता मंगेशकर स्वर कोकिला थीं। बचपन से उनके गाने सुनते आया हूं। आज भी रेडियो पर विविध भारती द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों को सुनने की आदत है। हालांकि अब मेरा रेडियो पहले की तरह नहीं है। यह एक म्यूजिक सिस्टम है। इसकी गुणवत्ता इतनी अच्छी है कि हर वाद्य यंत्र की आवाज स्पष्ट सुनाई देती है।

कल लता मंगेशकर के निधन की जानकारी आते ही अपना अतीत एक झटके में सामने आ गया। लगा जैसे कुछ था हमारे आसपास और अब नहीं है। एक अलग तरह का खालीपन। यह लगाव निस्संदेह उनके द्वारा गाए गीताें के कारण है।

मैं कोई अकेला नहीं हूं, जो लता मंगेशकर के बारे में ऐसी राय रखता हो। देश भर में करोड़ों लोग उन्हें सुनते और मानते रहे हैं। दरअसल, लता मंगेशकर एक बेहतरीन कलाकार थीं। इंसान कैसी थीं, मैं इसके बारे में बहुत कुछ नहीं जानता।

प्रोफेशनल और सोशल होने में फर्क है। लता मंगेशकर प्रोफेशनल गायिका थीं। हर गाने को उन्होंने एकदम सुर में गाया। कल ही एक संस्मरण पढ़ने को मिला। उसमें लिखा था कि बड़े गुलाम अली जब कहीं जा रहे थे तो रेडियो पर लता मंगेशकर का गीत बज रहा था। वह रुक गए और गाना सुनते रहे। गाना खत्म होने के बाद उन्होंने कहा कि यह मुईं कभी बेसुरी नहीं होती।

कल ही लालकृष्ण आडवाणी का शोक संदेश देखा। वह कह रहे थे कि लता मंगेशकर ने रथयात्रा का गीत गाया था। इसके अलावा भी कई और तरह के संदेश देखने को मिले। मसलन, अपने एक पोस्ट में उन्होंने सावरकर को पितातुल्य कहा था। एक और तस्वीर में वह बाल ठाकरे से आशीर्वाद ले रही थीं। वहीं एक संदेश यह भी सामने आया कि उन्होंने डॉ. आंबेडकर पर केंद्रित एक गीत को गाने से मना कर दिया था।

एक पत्रकार के रूप में मैंने लता मंगेशकर को उद्धृत तब किया था जब जनसत्ता के संपादक रहे प्रभास जोशी ने जातिगत टिप्पणी की थी। उनका कहना था कि लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर की महानता के पीछे उनका ब्राह्मण होना महत्वपूर्ण है। यह बात उन्होंने गर्व के साथ कही थी। तब मैंने पहली बार लता मंगेशकर की जाति के बारे में जाना था।

दरअसल, प्रोफेशनल और सोशल होने में फर्क है। लता मंगेशकर प्रोफेशनल गायिका थीं। हर गाने को उन्होंने एकदम सुर में गाया। कल ही एक संस्मरण पढ़ने को मिला। उसमें लिखा था कि बड़े गुलाम अली जब कहीं जा रहे थे तो रेडियो पर लता मंगेशकर का गीत बज रहा था। वह रुक गए और गाना सुनते रहे। गाना खत्म होने के बाद उन्होंने कहा कि यह मुईं कभी बेसुरी नहीं होती।

तो लता मंगेशकर का एक गायिका के रूप में जीवन और उनका सामाजिक जीवन दोनों में बहुत अंतर रहा। यह सभी के साथ होता है। कल ही विविध भारती पर प्राख्यात चरित्र अभिनेता रमेश देव का संस्मरण सुन रहा था। उनका कहना था कि अभिनय सबसे बेहतर प्रोफेशन है। सामान्य आदमी अपने जीवन में कोई एक किरदार निभा पाता है, लेकिन एक अभिनेता के पास अलग-अलग जीवन जीने के मौके मिलते हैं।

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लता मंगेशकर भी शानदार कलाकार रहीं। यह बात अलग है कि वह इकबाल बानो जैसी नहीं थीं, जिन्होंने पाकिस्तान में अपने हुक्मरान का विरोध करते हुए फैज़ अहमद फैज़ की नज्म हम देखेंगे गाया था। लता मंगेशकर ने तो अटल बिहारी वाजपेयी की उन कविताओं को अपनी आवाज दी, जिसके बारे में हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने कहा था कि वाजपेयी कविता के नाम पर विष्टा करते हैं।

बहरहाल, लता मंगेशकर हम सबके जीवन में रहीं और हमेशा रहेंगीं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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