बिहार से एक नयी कहानी : डायरी (6 फरवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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विहारों के प्रदेश को बिहार किसने कहा होगा? कल देर शाम से यही सोच रहा हूं। सोचने के पीछे कुछेक खबरें हैं जो कल मिलीं। पहले एक कहानी दर्ज कर रहा हूं। इसे कहानी मानें या सच, यह मैं आपके उपर छोड़ता हूं। वैसे यह कहानी है बड़ी दिलचस्प। इतनी दिलचस्प कि आप यकीन नहीं करेंगे कि हुक्मरानों को भी ऐसे दिन देखने पड़ते हैं।
कहानी की बात करते हैं। तो कहानी का नायक हुक्मरान है। नायक बूढ़ा हो चुका है, लेकिन सत्तालोलुपता गयी नहीं है। वह खुद को सम्राट अशोक साबित करना चाहता है। इसके लिए उसने कई काम भी किये हैं। मसलन, खूब सारे अभिलेख लगवाए हैं। और तो और अपने गृह जिले को सचमुच का विहार बना दिया है। इसके अलावा भी खुद को अमर बनाने के लिए उसने इतने सारे उपक्रम किये हैं कि जिसका हिसाब जब वहां के सीएजी को नहीं मिल रहा है तो फिर मैं तो एक पत्रकार हूं।
खैर, नायक की हालत पहले जैसी नहीं रही है। वह भले ही शीर्ष पर बैठा है लेकिन उसकी हुकूमत में उससे अधिक ताकतवाले लोग हैं। आए दिन ये ताकतवर लोग नायक को धमकाते रहते हैं। धमकाने वाले नायक के दरबारी भी हैं और एक तरह से कहिए तो डिप्टी हुक्मरान। अब यह डिप्टी हुक्मरान है, जो आए दिन नायक को धमकाता रहता है, उसपर नकेल कसने के लिए मुख्य हुक्मरान ने अपने एक भरोसेमंद आईएएस अधिकारी को लगा रखा है।
अब इस कहानी में रोमांचक दौर आनेवाला है। मेरी अपनी जानकरी के अनुसार भरोसेमंद आईएएस अधिकारी की दबिश बढ़ गई है। उसकी दबिश से डिप्टी हुक्मरान परेशान है। सारी पटकथा लिखी जा चुकी है। डिप्टी हुक्मरान को गुमान है कि वह ताकतवर दल का डिप्टी हुक्मरान है तो नायक चुपचाप सकी बात मान लेगा। लेेकिन नायक तो नायक है।
यह सब तो बीती हुई बातें हैं। अब वह जो होनेवाला है। डिप्टी हुक्मरान नायक के समक्ष दबाव की राजनीति करना चाहता है। अब वह नायक के उपर दबाव बनाएगा कि उपरोक्त भरोसेमंद आईएएस अधिकारी को उसके पद से हटाए। इसके लिए वह इस्तीफा देने का भी एलान कर सकता है। लेकिन चूंकि सारी पटकथा पहले से लिखी जा चुकी है तो होगा यह कि एक श्रीवास्तव नामक दूसरे आईएएस अधिकारी को नायक कुछ आदेश देगा।

मेरे लिए बिहार का मतलब फिलहाल भूखा, नंगा और बीमार बिहार। रही बात यह कि इसे बिहार बनाया किसने तो निश्चित तौर पर यह काम ब्राह्मणों का होगा। वही नहीं चाहते हैं कि इस प्रदेश में बौद्ध धर्म का अस्तित्व रहे। इतिहास गवाह है कि कैसे पुष्यमित्र शुंग ने मौर्यों का अंत करने के बाद बौद्धों का नरसंहार कराया था। बाद में तो ब्राह्मणों ने नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय को भी तहस-नहस कर दिया और इसका सारा आरोप बख्तियार खिलजी पर मढ़ दिया

यह जो दूसरा अधिकारी है, वह भी एक बड़ा और काम का मोहरा है। यह मोहरा नायक की बात मानेगा। वह डिप्टी हुक्मरान के काले चिट्ठे खोलेगा। दरअसल, डिप्टी हुक्मरान के खून में व्यापार है तो उसने पहले भी व्यापार कर रखा है और हुक्मरानी के दौर में उसने कुछ खास तरह के व्यापार किये हैं, जिसकी पूरी फाइल नायक के पास है।
अच्छा, एक बात और। नायक बड़े कमाल का है। वह जानता है कि कैसे किस पर नकेल डालकर रखना है। यही वजह है कि वह पिछले 16 साल से बिहार का हुक्मरान है।
तो अब होगा यह कि दूसरा आईएएस अधिकारी नायक के आदेश से डिप्टी हुक्मरान के काले चिट्ठे निकालेगा और तब डिप्टी हुक्मरान को होश आएगा। वह भागा-भागा पहले आईएएस अधिकारी के कक्ष में जाएगा और हाथ-गोर जोड़कर माफी मांगेगा। लेकिन वह आईएएस अधिकारी उसकी एक बात नहीं सुनेगा और उसे लतियाकर अपने कक्ष से बाहर भगा देगा।
फिर इसके बाद क्या होगा? मुझे इसके आगे की पटकथा की जानकारी नहीं है।
तो यह तो रही एक तथाकथित कहानी। अब खबरों की बात करते हैं।
कल ही खबर मिली कि छपरा में एक राजपूत किसान रामबाबू सिंह की मौत हो गई। मरने से पहले वह अमनौर में यूरिया खाद खरीदने के लिए चार बजे भोर से लाइन में खड़े थे। मेरी जानकारी के अनुसार रामबाबू सिंह ने तीन बीघे में गेहूं की फसल लगा रखी है, जिसके लिए उन्हें यूरिया खाद की आवश्यकता थी। लेकिन खाद बिहार के किसानाें को बड़ी मुश्किल से मिल रहा है। खाद उन किसानों को ही दी जा रही है, जिनके पास खेत के कागजात हैं। ऐसे में बटाईदार किसान कैसे अपनी खेती कर रहे होंगे, इसका आकलन जटिल नहीं है। जाहिर तौर पर उन्हें अधिक कीमत पर यूरिया मिल रही होगी।

कल ही खबर मिली कि छपरा में एक राजपूत किसान रामबाबू सिंह की मौत हो गई। मरने से पहले वह अमनौर में यूरिया खाद खरीदने के लिए चार बजे भोर से लाइन में खड़े थे। मेरी जानकारी के अनुसार रामबाबू सिंह ने तीन बीघे में गेहूं की फसल लगा रखी है, जिसके लिए उन्हें यूरिया खाद की आवश्यकता थी। लेकिन खाद बिहार के किसानाें को बड़ी मुश्किल से मिल रहा है।

 

आपको शायद यकीन नहीं होगा, लेकिन यही सच है कि बिहार में इन दिनों शराब और यूरिया की तस्करी की जा रही है।
खैर, रामबाबू सिंह पिछले पंद्रह दिनों से खाद खरीदने के लिए लाइन में लग रहे थे। लेकिन कल सुबह में चार घंटे लगे रहने के बाद उन्हें ठंड का असर हुआ और वे गश खाकर गिर पड़े। लोगों ने उन्हें रेफरल अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टर नहीं थे। नतीजतन उन्हें सदर अस्पताल ले जाया जा रहा था। रास्ते में ही रामबाबू सिंह ने दम तोड़ दिया।
बहरहाल, मेरे सामने दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता का आठवां पृष्ठ है। इस पृष्ठ पर एक खबर प्रकाशित है– डिजिटल कृषि हमारा भविष्य : मोदी।
खैर, अब सवाल यह कि विहारों के प्रदेश को बिहार किसने बनाया? बिहार में बिना किसी हार का। अरविंद कुमार के समानांतर शब्दकोश के मुताबिक हार का मतलब पराजय भी कहा जा सकता है और इसका मतलब गलेहार भी हो सकता है। मेरे लिए बिहार का मतलब फिलहाल भूखा, नंगा और बीमार बिहार। रही बात यह कि इसे बिहार बनाया किसने तो निश्चित तौर पर यह काम ब्राह्मणों का होगा। वही नहीं चाहते हैं कि इस प्रदेश में बौद्ध धर्म का अस्तित्व रहे। इतिहास गवाह है कि कैसे पुष्यमित्र शुंग ने मौर्यों का अंत करने के बाद बौद्धों का नरसंहार कराया था। बाद में तो ब्राह्मणों ने नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय को भी तहस-नहस कर दिया और इसका सारा आरोप बख्तियार खिलजी पर मढ़ दिया। जबकि काशी प्रसाद जायसवाल, जो कि बड़े इतिहासकार रहे, उन्होंने लिखा है कि बख्तियार खिलजी कभी बख्तियारपुर से आगे गया ही नहीं।
यह भी पढ़ें :
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बख्तियारपुर से याद आया। यह वही इलाका है जहां का वह नायक है, जो मेरी उपर वर्णित कहानी में है।
बहरहाल, खेती से एक बात याद आयी। कल बसंतपंचमी थी। ब्राह्मणों के लिए तो यह सरस्वती की पूजा करने का दिन है। और मेरे लिए अपनी प्रेमिका को याद करने का दिन।
सामने सूरज डूब रहा है
और मैं सोच रहा हूं कि
तुमसे कैसे कहूं वह सब
जो अनकहा है।
अहसास और शब्द हों तब भी
सब कहना इतना आसान नहीं होता
और मैं तो
तुम्हें देख रहा हूं कि
बसंत के मौसम में
तुम्हारी जुल्फें रेखाचित्र के माफिक हैं
और तुम्हारे लरजते होंठ
मेरी कविता का शीर्षक।
अहसासों को चाहिए इत्मीनान कि
धरती का वजूद कायम है
और सरसों के फूल
जो तुम्हें देख हंस रहे हैं
काल्पनिक नहीं, यथार्थ हैं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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