सपा अपना घोषणापत्र समानुपातिक भागीदारी पर केन्द्रित करे

एचएल दुसाध

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यूपी विधानसभा चुनाव- 2022 में सत्ता की प्रबल दावेदार पार्टियों का घोषणापत्र कभी भी जारी हो सकता है.चूँकि बसपा घोषणापत्रों को चुनाव के लिए गैर-जरुरी समझती है इसलिए वह तो नहीं, किन्तु भाजपा और सपा बहुत जल्द अपना घोषणा पत्र जारी करने वाली हैं. इनमे मुमकिन है इस लेख के छपने के पहले ही भाजपा का घोषणापत्र जारी हो जाय. बहरहाल भाजपा के घोषणापत्र में शायद किसी की भी कोई दिलचस्पी नहीं होगी. उसकी राजनीति पर नजर रखने वालों को पता है, उसके घोषणापत्र में कुछ आये, वह ध्रुवीकरण के जरिये ही चुनाव जीतने की कोशिश करेगी. और भाजपा के विषय में अगर यह बात सही है तो वह हिन्दू- मुस्लिम के जरिये ध्रुवीकरण की राजनीति को अभूतपूर्व उंचाई दे चुकी है. अभूतपूर्व इसलिए कि मंडल के बाद होने वाले हर चुनाव में उसने नफरत की राजनीति को हवा देकर अपनी सफलता सुनिश्चित की है. किन्तु इस बार उसकी ओर से हेट पॉलिटिक्स को जो ऊंचाई दी गयी, ऐसा इसके पहले कभी नहीं हुआ. हेट पॉलिटिक्स को अभूतपूर्व   उंचाई देने के लिए योगी  आदित्यनाथ प्रायः महिना भर पहले ही घोषणा कर दिए थे कि इस बार चुनाव 80 बनाम 20 अर्थात हिन्दू बनाम मुस्लिम का होगा. और कहना नहीं होगा पिछले एक महीने में योगी-मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह से लगाये भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता 80 बनाम 20 पर केन्द्रित रहा है. इसलिए भाजपा को जिस मुद्दे पर चुनाव लड़ना है, उसे वह इच्छित मात्रा में अपने लक्षित मतदाताओं तक पहुंचा चुकी है. ऐसे में भाजपा के घोषणापत्र को लेकर शायद ही किसी में रूचि हो. आमजन से लगाये राजनीति के पंडितों को किसी के घोषणापत्र में रूचि है तो वह सपा है, जिसका घोषणापत्र कुछेक दिनों के मध्य ही जारी हो सकता है.

सपा के घोषणापत्र में क्या हो सका है लोग अभी से उसका कयास लगाने में जुट गए हैं.पार्टी ने 28 जनवरी को जो 10 सूत्रीय संकल्प पत्र जारी किया है उसके आधार पर राजनीतिक विश्लेषको का कयास है कि इसके घोषणापत्र में तमिलनाडु में अम्मा कैंटीन और कर्नाटक में इंदिरा कैंटीन की तर्ज पर समाजवादी कैंटीन खोलने की बात शामिल हो सकती है.अखिलेश ने यह भी कहा है  कि समाजवादी सरकार बनने पर प्रदेश में समाजवादी किराना स्टोर खुलेंगे और इनमें लोगों को सस्ती कीमतों पर राशन मिल सकेगा।ऐसे में समाजवादी किराना  स्टोर भी घोषणापत्र में शामिल हो सकते है. अखिलेश यादव ने इससे पहले 300 यूनिट फ्री बिजली की बात दोहराए जा रहे हैं,इसलिए फ्री बिजली शामिल होना भी तय माना जा सकता है .अखिलेश यादव यह भी कई बार कहे हैं कि सरकार आने पर लोगों को आईटी सेक्टर में 22 लाख सीधे रोजगार मिलेंगे। ऐसे में घोषणा पत्र में 22 लाख जॉब देने की बात भी शामिल हो सकती है.

हेट पॉलिटिक्स को अभूतपूर्व उंचाई देने के लिए योगी आदित्यनाथ प्रायः महिना भर पहले ही घोषणा कर दिए थे कि इस बार चुनाव 80 बनाम 20 अर्थात हिन्दू बनाम मुस्लिम का होगा. और कहना नहीं होगा पिछले एक महीने में योगी-मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह से लगाये भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता 80 बनाम 20 पर केन्द्रित रहा है. इसलिए भाजपा को जिस मुद्दे पर चुनाव लड़ना है, उसे वह इच्छित मात्रा में अपने लक्षित मतदाताओं तक पहुंचा चुकी है

 

कुल मिलाकर सपा के जारी संकल्प पत्र और समय-समय पर अखिलेश यादव द्वारा उठाये गए मुद्दों के आधार पर संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि सपा के विधानसभा चुनाव 2022 के घोषणापत्र में फ्री बिजली, सस्ता राशन, रोजगार के अलावा, बेरोजगारी भत्ता जैसी स्कीम की राशि को बढ़ाने, समाजवादी पेंशन योजना, कन्या विद्याधन जैसी महिला आधारित योजना के अलावा अन्य कई बड़े वादे शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा महिलाओं को यूपी के सार्वजनिक परिवहन में आधी कीमत पर यात्रा, छात्रों को फ्री लैपटॉप और डेटा, प्रदेश में 1500 किलोमीटर के नए एक्सप्रेस-वे, इलेक्ट्रिक वीकल प्रमोशन, आईटी क्लस्टर समेत कई वादे घोषणा पत्र का हिस्सा बन सकते है. महिला सुरक्षा के लिए यूएस मॉडल पर सिस्टम डेवलप करने, यूपी पुलिस के मॉर्डनाइजेशन और 1090 को और मजबूत करने का प्लान घोषणा पत्र में शामिल हो सकता है। इसके अलावा छात्राओं को स्किल, सेफ्टी और सपोर्ट देने का संकल्प भी घोषणा पत्र में शामिल हो सकता है। युवाओं को अपने पाले में करने के लिए यूपी में स्किल डेवलपमेंट यूनिवर्सिटी, स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी और स्पेशल स्कॉलरशिप स्कीम्स को भी देने के वादे घोषणा पत्र में शामिल हो सकते हैं।
इसके अतिरक्त किसानों के लिए यूपी में स्मारक बनवाने के साथ ही गन्ना कीमतों का 15 दिन के भीतर भुगतान करने का वादा भी सपा के घोषणापत्र में शामिल हो सकता है। इसके अलावा खाद के लिए विस्तृत नेटवर्क बनाने, आवारा जानवरों को रोकने के लिए बाड़बंदी को फिर से वैध करने, मुफ्त सिंचाई व्यवस्था करने, नई नहरों का निर्माण करने और किसान फसल बीमा योजना जैसी स्कीम्स घोषणा पत्र का हिस्सा बन सकती हैं। वहीं किसान आंदोलन में जान गंवाने वालों को 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का वादा भी घोषणापत्र का हिस्सा हो सकता है। बहरहाल कुछेक अख़बारों ने लिखा है कि समाजवादी पार्टी के सूत्रों का कहना है कि बीजेपी को काउंटर देने के लिए उसकी हर एक योजना की काट सपा के आगामी घोषणापत्र में दिख सकती है। अगर ऐसा है तब तो कहा जा सकता है कि  भाजपा पिछले चुनावों के मुकाबले इस इस बार अपने चुनाव जिताऊ मुद्दे अर्थात मुस्लिम विद्वेष को जिस प्रकार हवा  दे रही है , उसकी काट घोषणापत्र में शामिल होने वाली उपरोक्त संभावित मुद्दों से तो प्रायः असंभव है.

85 बनाम 15 के हुंकार का समर्थन करते हुए अखिलेश यादव ने यह कहा,’ सपा सत्ता में आने के तीन महीने के अन्दर जातीय जनगणना शुरू कराएगी और उन आकड़ों के आधार पर सभी समाजो के लिए समानुपातिक भागीदारी अर्थात जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी की नीति लागू करेगी.’ बहुत से राजनीति के पंडितों के मुताबिक योगी के खिलाफ पनपे जनाक्रोश के बावजूद जो भाजपा मोदी- शाह जैसे अपने स्टार प्रचारकों, साधु -संतों और संघ के आनुषांगिक संगठनों के जोर से यूपी चुनाव में 80 प्रतिशत के करीब जीत की सम्भावना बनायीं थी

भाजपा नेतृत्व को पता है योगी के कुशासन और आतंक राज से भाजपा के विरुद्ध एक जबरदस्त लहर है. इस बात को ध्यान में रखते हुए ही योगी-मोदी- शाह इत्यादि, जिस मुस्लिम विद्वेष के प्रसार के सहारे भाजपा अबतक अत्यंत प्रतिकूल हालातों में भी जीतती आई है, उसे हिमालय सरीखी ऊँचाई दिए जा रहे है. और सपा नेतृत्व को इस बात का इल्म होना चाहिए कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत को हवा देने का इतना असर होता है कि जो दलित- पिछड़े मोदी राज में गुलामों की स्थिति में पहुँच गए, जिन दलित -पिछड़ों को यह पता है कि उनकी  उन्नति और प्रगति का प्रधान आधार आरक्षण  मोदी- राज में ख़त्म सा कर दिया गया है, वे नफरत की राजनीति के प्रवाह में सारी बातें भूलकर भाजपा को वोट कर देते हैं.  दलित- पिछड़ों में अधिकांश को पता चल चुका है कि भाजपा सत्ता में आने पर  राजसत्ता का प्रायः सम्पूर्ण  इस्तेमाल सवर्णों को और शक्तिसंपन्न करने में करती है, बावजूद इसके वे मुसलमानों को मजा चखाने के लिए भाजपा को वोट कर ही देते हैं. ऐसे में यदि सपा नेतृत्व भाजपा के हर चाल की काट अपने घोषणापत्र में शामिल करना चाहता है तो उसे अपना घोषणापत्र प्रायः पूरी तरह 85 बनाम 15 और समानुपातिक भागीदारी पर केन्द्रित करना  होगा.

सपा नेतृत्व यदि एक माह पूर्व की स्थिति का ठीक से सिंहावलोकन करे तो उसे पता चल जायेगा कि योगी की व्यर्थता से भाजपा के खिलाफ आक्रोश जरुर था, लेकिन वह सपा के पक्ष में आ जायेगा, इसकी सम्भावना नहीं थी. सम्भावना तब बनी जब 11 जनवरी को स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा छोड़ सपा में शामिल होकर 85 बनाम 15 की हुंकार भरे. 85 बनाम 15 : यह वह मुद्दा था जिसे सुनने के लिए यूपी ही नहीं : पूरे भारत का दलित,आदिवासी , पिछड़ा और मुस्लिम समुदाय वर्षों से तरस रहा था. स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा पच्चासी बनाम पंद्रह का मुद्दा उठाते ही पूरे भारत का जन्मजात वंचित तबका रातों रात सपा की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगा. और यह उम्मीद तब एवरेस्ट शिखर से मुकाबला करने लगी जब स्वामी के 85 बनाम 15 के हुंकार का समर्थन करते हुए अखिलेश यादव ने यह कहा,’ सपा सत्ता में आने के तीन महीने के अन्दर जातीय  जनगणना  शुरू कराएगी और उन आकड़ों के आधार पर सभी समाजो के लिए समानुपातिक भागीदारी अर्थात जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी की नीति लागू करेगी.’ बहुत से राजनीति के पंडितों के मुताबिक योगी के खिलाफ पनपे जनाक्रोश के बावजूद जो भाजपा मोदी- शाह जैसे अपने स्टार प्रचारकों, साधु -संतों और संघ के आनुषांगिक संगठनों के जोर से यूपी चुनाव में 80 प्रतिशत के करीब जीत की सम्भावना बनायीं थी, वह स्वामी और अखिलेश के सामाजिक न्यायवादी बयानों के चलते महज दो-तीन दिन में 80 से घटकर 50 से भी नीचे आ गयी. उसके बाद जिस तरह अखिलेश यादव कई मंचों से समानुपातिक भागीदारी की बात उठाये, आश्चर्यजनक रूप से सपा विजेता के रूप में नजर आने लगी और अखिलेश यादव में लोग भावी प्रधानमंत्री तक की छवि देखने लगे. किन्तु अखिलेश यादव सपा के पक्ष में आकस्मिक रूप से आये सुखद बदलाव का आंकलन न कर सके और धीरे-धीरे वह घिसे-पिटे मुद्दों पर लौटने लगे. हद तो हो गयी जब जनवरी बीतते-बीतते अखिलेश यादव सत्ता में आने पर मंदिरों में नियुक्त ब्राह्मण पुजारियों को मानदेय देने तथा ब्राह्मणों पर दायर मुकदमे वापस लेने की घोषणा करने लगे.

घोषणापत्र में शामिल हो की सपा यूपी के बाद केंद्र में पहुंचकर विनिवेश के जरिये बिक्री हुई कंपनियों के सौदों की समीक्षा कराएगी. शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाने के लिए प्रदेश और देश में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू का प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के एडमिशन, टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति इत्यादि में अवसरों का बंटवारा सभी समाजों के संख्यानुपात में करेगी तथा तमिलनाडु की तरह समाजवादी कैंटीन ही नहीं अयोध्या- कशी, मथुरा- वृन्दावन सहित सभी जगह पुजारियों की नियुक्ति में तमिलनाडु की तरह सभी समाजों के स्त्री- पुरुषों को अवसर देगी.

इन घोषणाओं से जनवरी के तीसरे सप्ताह से समानुपातिक भागीदारी के मुद्दे से दूरी  बनाते- बनाते फ़रवरी में ब्राह्मणों के हित में पहले जैसा सदय होकर अखिलेशा यादव 11 जनवरी के पहले वाले स्थिति में पहुँच गए हैं. दूसर ओर भाजपा हेट पॉलिटिक्स को निरंतर नयी –नयी ऊंचाई देते हुए एक बार फिर विजेता के रूप में उभर आई है. ऐसे में जबकि भाजपा के हर बात की काट पैदा करने वाला घोषणापत्र सपा की ओर से रिलीज होने वाला है, अखिलेश यादव एक बार पुनः भाजपा की नफरती राजनीति और अपनी जिम्मेवारियों को याद कर लें!

अखिलेश यादव यह मत भूलें  कि 2025 में भाजपा आरएसएस की स्थापना के 100 साल पूरे होने के अवसर पर देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की तैयारी कर रही है. उसकी तैयारियों को देखते हुए उसके असंख्य आनुषांगिक संगठनों में से एक ने 31 जनवरी को प्रयागराज में ‘हिन्दू राष्ट्र  संविधान’ का खांका पेश कर दिया है. इसमें कहा गया है ‘हिन्दू राष्ट्र संविधान’  गीता, श्रीराम चरितमानस, मनुस्मृति सहित समस्त वेद –  पुराणों के अंश शामिल होंगे. मातृकुल, गुरुकूल शिक्षा अनिवार्य होगी.श्रवण मास तक हिन्दू राष्ट्र संविधान का प्रारूप तैयार करने का लक्ष्य है, जबकि 2023 के माघ माह मेला में धर्म संसद संचालन समिति संत सम्मलेन का आयोजन कर उसमे नए संविधान को संतो व श्रद्धालुओं के समक्ष प्रस्तुत करेगी.  बताया जा रहा है इस संविधान में मुसलमानों को सम्मान व सुरक्षा मिलेगी लेकिन मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा. तो हिदू राष्ट्र भयावह मुंह बाये हमारे सामने खड़ा है जो दलित, आदिवासी, पिछड़ों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के सम्पूर्ण अधिकारों लील कर उन्हें विशुद्ध गुलामों की स्थिति में खड़ा कर देगा. यह हिन्दू राष्ट्र उस उत्तर प्रदेश की धरती से उभरेगा जहाँ से अयोध्या –काशी के बाद अब मथुरा-वृन्दावन में मंदिर निर्माण के जरिये मुस्लिम विद्वेष को उस शिखर पर पहुँचाया जायेगा जो राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन से भी कही भयावह होगा. तो जिस यूपी की छाती पर हिन्दू राष्ट्र का तोरण विकसित होना है उसे रोकने की सम्पूर्ण जिम्मेवारी इतिहास ने अखिलेश यादव के कंधे पर डाल दी है, जिसका मुकाबला  भाजपा द्वारा मुसलमानों के खिलाफ फैलाये जा रहे नफरत की काट पैदा करके ही की जा सकती है और यह काट सिर्फ और सिर्फ 85 बनाम 15 और समानुपातिक  भागीदारी के मुद्दे को एवरेस्ट सरीखी उंचाई देकर ही की जा सकती है.

85 बनाम 15 और समानुपातिक भागीदारी के मुद्दे को एवरेस्ट ऊँचाई देने के लिए बाकी बाते पृष्ठ में धकेलकर घोषणापत्र में एलान करना होगा कि सत्ता में आने पर सपा गठबंधन जातीय जनगणना कराकर सभी समाजों को उनकी संख्याअनुपात में न सिर्फ मिलिट्री-पुलिस- न्यायिक सेवा सहित सभी प्रकार की सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों तथा सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, पार्किंग-परिवहन, यूपी के मीडिया संस्थानों तथा प्रदेश में विकसित होने जा रहे फिल्मोद्योग में अवसरों का बंटवारा सवर्ण, ओबीसी, एससी-एसटी और धार्मिक अल्प संख्यकों के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में करेगी . घोषणापत्र में कहना होगा सवर्णों को प्रत्येक क्षेत्र उनके संख्यानुपात में अवसर देने के बाद उनके हिस्से का बंचा अतिरिक्त अवसर दलित-आदिवासी- ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के स्त्री-पुरुषों के मध्य बाँट दिया जायेगा. बहुजनों को मुस्लिम नफरत से निकलने के लिए घोषणापत्र में शामिल हो कि सपा केंद्र की सत्ता में आने के बाद सवर्ण आरक्षण का खात्मा करेगी. घोषणापत्र में शामिल हो की सपा यूपी के बाद केंद्र में पहुंचकर विनिवेश के जरिये बिक्री हुई कंपनियों के सौदों की समीक्षा कराएगी. शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाने के लिए प्रदेश और देश में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू का प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के एडमिशन, टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति इत्यादि में अवसरों का बंटवारा सभी समाजों के संख्यानुपात में करेगी तथा तमिलनाडु की तरह समाजवादी कैंटीन ही नहीं अयोध्या- कशी, मथुरा- वृन्दावन सहित सभी जगह पुजारियों की नियुक्ति में तमिलनाडु की तरह सभी समाजों के स्त्री- पुरुषों को अवसर देगी. यह सब बाते सपा के घोषणापत्र में शामिल करने पर भाजपा के नफरती राजनीति को मात और देश को हिन्दू राष्ट्र के संकट से निजात दिया जा सकता है. अखिलेश यादव को यह भी नहीं भूलना होगा कि 7 अगस्त , 1990 को पिछड़ों के हित में मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद ही संघ परिवार नफरत की राजनीति के सहारे देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के हालात में ले जाने के लिए आगे बढ़ा है . ऐसे में पिछड़े कुल की संतान होने के नाते इतिहास द्वारा सुपुर्द की गयी जिम्मेवारी का निर्वाह करना  उनका अत्याज्य कर्तव्य बनता है.

दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कैसे हो संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक हैं।

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