साम्राज्यवाद के द्रोणाचार्य और संजय

विभांशु केशव

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महाभारत की कथा में संजय नामक एक पात्र है, जिसके पास दिव्य दृष्टि है। अपनी दिव्य दृष्टि की बदौलत संजय, धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के मैदान में चल रही साम्राज्यवाद की जंग का आँखों देखा हाल सुनाता है।

धृतराष्ट्र हस्तिनापुर के राजा थे, पर सभी उन्हें बेवकूफ बनाते थे! उनके राज्य के इंजीनियर ऐसा तीर बनाते थे, जिसे जमीन में मारो तो पानी का सोता फूट जाता था। उनके राज्य के डॉक्टर शीशे के जार में सौ संतानें पैदा कर देते थे। इतने चमत्कारी सेवक अपने राजा धृतराष्ट्र के लिए आँख नहीं बना सके! रानी गांधारी के लिए ऐसी पट्टी नहीं बना सके, जिसे आँखों पर लगाने के बाद भी सब कुछ नजर आये!

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साम्राज्यवाद की आधुनिक जंग में दिव्य दृष्टि से लैस अनगिनत संजय पैदा हो गए हैं। जो अपने बंकरों में बैठ देश के विभिन्न भागों में चल रही साम्राज्यवाद की जंग का आँखों देखा हाल सुनाते हैं- आधुनिक हथियारों से लैस साम्राज्यवादियों की पालतू पुलिस ने तीर-धनुष से लैस एकलव्यों को घेर लिया है। पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी है। एकलव्यों के दल में भगदड़ मच गई है। एकलव्य पुलिस का घेरा तोड़कर भागने लगे हैं। भागते समय एक एकलव्य गिर पड़ा है। पुलिस ने उसे चारो तरफ से घेर लिया है। एकलव्य साम्राज्यवाद के चक्रव्यूह में घिर चुका है। क्या वो द्रोणाचार्यों द्वारा रचे गये साम्राज्यवाद के चक्रव्यूह को तोड़ पायेगा? जानते हैं छोटे से एक ब्रेक के बाद।

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संजय के दिव्य दृष्टि की बैटरी लो हो जाती है, तो वो ब्रेक ले लेता है। दिव्य दृष्टि को चार्जिंग में लगाकर संजय अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए सिगरेट पीने लगता है। उसके आगे का आँखों देखा हाल संजय द्वारा नॉन प्रॉफिटेबल करार दिया गया एक एकलव्य सुनाता है- एकलव्य गिरा नहीं है। वो द्रोणाचार्यों और उनके संजयों के ‘करियर’ और ‘मल्टीनेशनल प्लेसमेंट’ की कमेंट्री के लिए आंदोलन करते-करते थक कर सो गया है।
विभांशु केशव तेजस्वी युवा व्यंग्यकार हैं। वाराणसी में रहते हैं।
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