Wednesday, July 24, 2024
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जब भी मैं इस दुनिया से विदा लूं, पढ़ते हुए बच्चे मेरे आस-पास हों

हमारा राष्ट्र तभी खुशहाल होगा जब हर वर्ग के लोग तरक्की करेंगे। समाज में धन का समान वितरण बहुत आवश्यक है, इसके अभाव में राष्ट्र का विकास अधूरा ही रहेगा। बिना मुस्कुराए आप दूसरों के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं ला सकते। जब समाज के हर तबके का पेट भरने लगेगा और देश का हर बच्चा पढ़ने लगेगा तब आप मुस्कुरा सकते हैं और कह सकते है कि हमारा देश तरक्की कर रहा है।

वाराणसी। उम्मीद कुछ रचने की हो तो उम्र के बढ़ जाने से सफर नहीं रुकता। यह बात पूरी तरह से सही दिखती है जब हम 93 वर्षीय सुदर्शन प्रसाद मौर्य से मिलते हैं। एक पल को बस ऐसे ही लगता है, जैसे कोई वट वृक्ष अपने आस-पास उग रहे पौधों को जीवन का वह उजास बाँट रहा हो, जिससे भविष्य को रोशन किया जा सके। छोटे-छोटे बच्चों के सर पर जब वह प्यार से हाथ फेरते हैं, तो ऐसे लगता है कि मानो प्यार के एक कोमल स्पर्श से वह ज्ञान-विज्ञान के तमाम आखर उन बच्चों पर उड़ेल देना चाहते हैं। वह शिक्षा का मोल जानते हैं। इसलिए बस एक ही धुन में रम गए हैं कि जहां तक संभव हो वहाँ तक कोई अनपढ़ ना रह जाये।

वाराणसी के पंचकोशी मार्ग पर बसे रसूलगढ़ मुहल्ले में एक गली से होते हुए जब घर के आंगन में दाखिल हुये तो यह लोकप्रिय वयोवृद्ध अध्यापक लगभग 35 बच्चों को पूरी तन्मयता से पढ़ाते हुए मिले। उनको देखते ही मानस पटल पर निदा फाजली की मशहूर नज़्म याद आ गई –

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये,

घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाय।

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये। 

सुदर्शन प्रसाद मौर्य की उपलब्धियों पर गर्व करते हुए बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे 30- 35 बच्चों को प्रतिदिन निःशुल्क पढ़ाते हैं। इनके यहां बेहद अभावग्रस्त घरों मसलन ठेले, खोमचे, बुनकर, राजमिस्त्री, मजदूरों आदि के बच्चे पढ़ने आते हैं। उनके एक मात्र पुत्र उर्वरक कारखाना इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव फूलपुर, इलाहाबाद में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। सुदर्शन प्रसाद की सबसे प्रेरक बात यह है कि इनकी स्वयं की प्रारंभिक शिक्षा मात्र कक्षा दो तक ही हो सकी थी। तकरीबन 30 वर्ष बाद नौकरी करते हुए इन्होंने पुनः पढ़ाई शुरू की और  वकालत की डिग्री हासिल कर वर्ष 2012 तक विधि व्यवसाय से जुड़े रहे। बिना किसी बाहरी मदद और अपेक्षा के पिछले 20 वर्षों से गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षित करने के अभियान  88 वर्ष की अवस्था में भी पूरी निष्ठा और लगन से चला रहे हैं। उनसे हमने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर लंबी बात-चीत की।

उन्होंने अपने जीवन के तमाम अस्पृश्य पहलुओं का जिक्र करते हुये कहा कि, ‘मेरा जन्म सन 1930 के आसपास उप्र के जौनपुर जनपद के कोपा (दुधौड़ा) गांव में हुआ। मेरे पिताजी गरीब किसान मजदूर थे, उनके पास न खेत था न बैल। मेरे मां की शादी अगुआ ने मेरे नाना को दूसरे का खेत और बैल दिखाकर करवा दिया l बाद में नाना जी को पिताजी के बारे में सच्चाई का पता चला। मां जैसे-तैसे पिता जी का साथ निभा रही थी। इसी बीच पिताजी का स्वर्गवास हो गया, उस समय मेरी उम्र करीब दो वर्ष थी। वास्तविक जन्मतिथि का पता नहीं। जैसा कि पहले के अधिकांश लोगों को अपना जन्मदिन पता नहीं होता था और वे अपने जन्म का साल उस समय के प्रचलित नियमानुसार ढूंढ लेते थे। नियम यह था कि जब फलां का जन्म हुआ था उस साल प्लेग, भूकंप, बाढ़ या बड़की आंधी आई थी उसी साल वह पैदा हुए थे। उसी नियम के अनुसार संभवतः मेरा भी जन्म सन 1930 में हुआ। पिताजी के स्वर्गवास के बाद 2 वर्ष की अवस्था में मेरे नाना मुझे ननिहाल ग्राम शंकरपुर, गाजीपुर, उप्र में लेकर आ गए। माँ की शादी कहीं और कर दी गयी। सौतेले पिता का व्यवहार मेरे प्रति अच्छा नहीं रहा और उन्होंने मुझे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मेरा लालन-पालन ननिहाल में हुआ। ननिहाल में मेरी पढ़ाई दूसरे दर्जे तक ही हो सकी।

करीब पन्द्रह वर्ष के उम्र में ही नाना ने मेरी शादी रुक्मणि से कर दी। मेरी पत्नी का और मेरा दुःख एक तरह का था। हम दोनों ही ननिहाल में ही पले-बढ़े। नाना के गुजरने के बाद मैं ननिहाल में बोझ नहीं बनना चाहता था। इसलिए पत्नी सहित रोजगार की तलाश में बनारस आ गया। काफी संघर्ष के बाद किसी तरह भार्गव प्रेस में चपरासी की नौकरी मिली। मैं दो रुपये के किराए के मकान में गुजर-बसर कर रहा था। इस दौरान मैं एक पुत्री और एक पुत्र का पिता बन चुका था। एक दिन प्रेस के मैनेजर ने चिलचिलाती दोपहरी में मुझे किसी काम से बाहर भेजा था, जब मैं  काम करके वापस लौटा पसीने से लथपथ हांफ़ रहा था। मैनेजर ने मुझसे तुरंत पानी पिलाने को कहा। मैं गमछे से हवा कर पसीना सुखाने लगा और पानी पिलाने में थोड़ी देर हो गयी, जिससे वह काफी नाराज हो गया और भला-बुरा कहने लगा। प्रेस के मैनेजर के उस दुर्व्यवहार से मैं काफी आहत हुआ और उस दिन मुझे शिक्षा का महत्व समझ में आया। मैंने दृढ़ निश्चय किया कि अब मैं पढ़ाई करूंगा। मैंने प्रेस की चपरासी की नौकरी करते हुए पढ़ाई शुरू की। उस समय मेरी उम्र 30 वर्ष हो चुकी थी और मैं दो बच्चों का पिता बन चुका था। मैं और मेरे दोनों बच्चे साथ-साथ पढ़ने जाते थे जिसे देखकर लोग व्यंग्य कसते थे फिर भी मैं विचलित नहीं हुआ और न ही मैंने हार मानी।

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अंततः मैंने वर्ष 1971 में एलएलबी की डिग्री हासिल कर ली। मैं इस उम्मीद में था कि स्नातक के बाद प्रेस में मुझे किसी अच्छे पद पर नियुक्त कर दिया जाएगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ। अन्ततः मैंने वर्ष 1978 में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में वकील के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया और प्रेस की नौकरी से त्यागपत्र देकर नियमित रूप से विधि व्यवसाय से जुड़ गया। वर्ष 1978 से 2012 तक मैंने वकालत की। वकालत के दौरान भी मुझे जब भी समय मिलता गरीब बच्चों को इकट्ठा कर पढ़ाता रहा। वर्ष 2012 से मैं अपना पूरा समय बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने में लगा रहा हूं। खाली समय में पढ़ता रहता हूं, ताकि बच्चों को अच्छी तरह पढ़ा सकूं। जिस उम्र में अमूमन लोग पढ़ाई छोड़ चुके होते हैं उस उम्र में मैंने पढ़ाई शुरू की थी और कठिन संघर्ष और परिश्रम के बाद वकालत की डिग्री हासिल कर सका, इस वजह से मैं शिक्षा के महत्व को बखूबी समझ सका। मैं चाहता हूं कि जो दिन मैंने देखे हैं उसे किसी गरीब का बच्चा न देखे। मन के अंतःकरण में दबी संघर्ष यात्रा और पीड़ा ने मुझे गरीब बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित किया।

यह पूछने पर कि, ‘आप की 88 वर्ष की उम्र में दिनचर्या कैसे चलती है? बच्चों को पढ़ाने के दौरान किन-किन परेशानियों से आपको दो-चार होना पड़ता है?’ तब वह बड़ी साफ़गोई से कहते हैं, ‘देखिए नकारात्मकता को मैंने अपने जीवन में कभी हावी नहीं होने दिया। मुझे इस बात का भय कभी नहीं सताता कि अकेले हूं। रात-बिरात कुछ होनी-अनहोनी हो जाएगी तो कौन सहारा देगा? क्या होगा? मन में हमेशा यही रहता है कि जो भी होगा ठीक ही होगा। मैं अपनी जिन्दगी जी चुका हूं, अब मैं इन गरीब बच्चों के लिए जी रहा हूं। अब ये बच्चे ही मेरा परिवार और जिंदगी का मकसद हैं। जब आप दूसरों के लिए जीने लगते हैं तो दूसरे भी आपका ख़याल रखना शुरू कर देते हैं। मेरे साथ तो कम से कम ऐसा ही है। जवानी के दिनों में मैं पहलवानी करता था, पहलवानी का पहला मंत्र है 4 बजे भोर में उठ जाइये। आज भी मैं 4 बजे सुबह उठ जाता हूं और नित्य क्रिया से निवृत्त होकर योग और व्यायाम करता हूं। जब तक शरीर में ताकत थी आधा घंटा जोड़ी फेरता था। जब शरीर की ताकत कम होने लगी और जोड़ी खींचने में दिक्कत आने लगी तो जोड़ी के स्थान पर डंडा फेरने लगा। इससे मेरे हाथ पैर और जोड़ों का मूवमेंट ठीक रहता है और मैं अपना नित्य कर्म ठीक से निपटा पाता हूं। अभी लगभग हर काम अपने हाथ से कर लेता हूं। मैं जिन परिवार के बच्चों को पढ़ाता हूं, उन्हीं परिवार के लोग मेरा खाना बना देते हैं, कपड़ा धो देते हैं, नहला देतें हैं। मैं जब भी बीमार होता हूं, यही बच्चे पूरी निष्ठा से मेरी सेवा करते हैं। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं परिवार से दूर हूं या अकेला हूं। यहां पढ़ने वाला हर बच्चा मुझे अपने परिवार की तरह लगता है और इन बच्चों के परिवार वाले मुझे बहुत प्यार करते हैं।

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वह अपने परिवार के सदस्यों की शिक्षा, व्यवसाय आदि के बारे में बताते हैं कि, मेरे दो पौत्र प्रशांत और निशांत ने आईआईटी से बीटेक की डिग्री ली। उसके बाद आयरलैंड तथा कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी अमेरिका से एमटेक करने के बाद क्रमश: फ्रांस और नीदरलैंड से पीएच.डी. किये। अब वे दोनों बाद फ्रान्स और ऑस्ट्रिया में उच्च पदों पर कार्यरत हैं। इसका श्रेय मै अपनी सकारात्मक सोच और सही तरीके से किये गए कर्म और मेहनत की कमाई को देना चाहूँगा, साथ ही साथ मेरे बेटे और पोतों की मेहनत और लगन का यह फल फल है कि वे कुछ कर सकें और कामयाब हो सके। हर सप्ताह शनिवार को मेरे पोतें और बहुएं मुझसे फोन पर बिना नागा बात करते हैं। मुझे शनिवार का बेसब्री से इंतजार रहता है l मुझे जिंदगी में सब कुछ मिला चुका है अब इससे अधिक कुछ नहीं चाहिए। जब किसी गरीब का बच्चा पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है या सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है मुझे असीम सुख मिलता है।’

बातचीत के दौरान उन्होने बताया कि 86 वर्ष की अवस्था में पोतों के आग्रह पर उनके पास अकेले नीदरलैंड घूमने पहुँच गए और फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड आदि कई देशों की यात्रायें की। नीदरलैंड से हिंदुस्तान वापस भी अकेले आए। विदेश यात्रा की एक रोचक घटना भी उन्होने हमारे साथ साझा की। उन्होंने बताया कि, ‘विदेश यात्रा की वापसी में मेरे साथ एक दिलचस्प घटना घटी। मैं नीदरलैंड से हिंदुस्तान वापस आने के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़ा था, मेरी फ्लाइट मास्को लेट पहुंची, कनेक्टिंग फ्लाइट जा चुकी थी। मास्को एयरपोर्ट पर मुझे भाषा की समस्या से दो-चार होना पड़ा जबकि मैं अंग्रेजी भी बोल लेता हूं परंतु वहां अंग्रेजी समझने वाला मुझे कोई नहीं मिला। मैं हैरान और परेशान होकर एयरपोर्ट पर बैठकर सोचने लगा कि अब मैं अपने वतन वापस कैसे पहुंच पाऊंगाl मेरी आंखों में आंसू आ गये। उस समय मेरी जेब में 500/- रुपये, पासपोर्ट और वीजा था। मेरी स्थिति भाँप कर 20-22 वर्ष की एक रशियन लड़की मेरे पास आई और अपनी भाषा में उसने मुझसे कुछ पूछा परंतु  मैं उसे सिर्फ देखता रहा और कुछ समझ नहीं सका। वह लड़की समझ गई कि ये भिखारी नहीं है क्योंकि यदि ये भिखारी होते तो हवाई जहाज से यात्रा क्यों करता ? उसे यह समझ में आ गया कि मैं किसी मुसीबत में फंसा हूं और मेरे पास शायद पैसे नहीं है। उस लड़की ने जबरदस्ती मेरी जेब में 2000/- रूबल  डाल दिये और इशारे में बोली की मैं अभी आती हूं। मैं पांच घंटे इन्तजार करता रहा परंतु वह दोबारा लौट कर नहीं आई l हर देश में मानवता की एक ही भाषा होती है और उसे समझने के लिए किसी भाषा की जरूरत नहीं होती। आज भी उस रूसी लड़की की मूक सहायता और उसकी निश्छल भूरी आंखें बार-बार याद आती हैं। काफी परेशान होने के बाद मुझे एक सरदार जी एयरपोर्ट पर दिखाई दिए। मैं एक हिंदुस्तानी को देखकर बहुत खुश हुआ कि शायद अब मेरी परेशानी दूर हो जाएगीl सरदार जी से मैंने अपनी समस्या बताई, सरदारजी मुझे नई दिल्ली के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़ने में एयरपोर्ट अधिकारियों से दुभाषिये के रूप में बातचीत कर मेरी बड़ी मदद की। जब तक मैं फ्लाइट में बैठ नहीं गया तब सरदार जी वहां से नहीं हिले। दूसरे दिन में सकुशल नई दिल्ली पहुंच गया। फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड आदि कई देश मुझे बहुत खूबसूरत लगे, वहां के लोग बहुत अनुशासित हैं। अपने देश के लोगों को उनसे अनुशासन सीखना चाहियें। वे अपने राष्ट्र के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं इसलिए वे बहुत तरक्की कर सके। नीदरलैंड की प्याज मुझे बहुत खूबसूरत लगी शायद इसलिए कि प्याज गरीब आदमी की लाइफ -लाइन होती है। मैं वापसी में नीदरलैंड से दो खूबसूरत प्याज हिंदुस्तान लेकर आया था, यह देखने के लिए कि वहाँ की प्याज कितनी टिकाऊ होती है। वहाँ की लाई हुई प्याज काफी दिनों तक तरोताजा रही और खराब नहीं हुई।

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फिलहाल, जब हमने उनसे यह पूछा कि आपको सबसे ज्यादा खुशी किस काम में मिलती है तो वह बताते हैं कि, ‘पढ़ते हुए बच्चे मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, जब कोई बच्चा पढ़ लिखकर अपने पैर पर खड़ा हो जाता है या किसी सरकारी नौकरी में आ जाता है तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होती है। मेरी पढ़ाई हुई एक लड़की इस वर्ष उत्तर प्रदेश पुलिस में भर्ती हुई। उसकी मां उस बच्ची को लेकर आईl  लड़की पुलिस की वर्दी में मेरे पास आई थी। जब वह मेरा पांव छूकर आशीर्वाद मांगने लगी तो मेरी आंखों में खुशी के आंसू छलक आए, मैं भाव विह्वल होकर काफी देर तक रोता रहा। उसकी मां ने मेरी पीठ थपथपाकर मुझे चुप कराया। मुझे कुछ ठीक से याद नहीं कि अब तक कितने बच्चों को पढ़ा चुका हूं पर ऐसे बच्चों की संख्या काफी है। मेरी बस्ती के लोग ज्यादातर गरीब और मेहनतकश मजदूर है l ये लोग बच्चों को पढ़ाने में असमर्थ हैं या यूं कहिए कि उनके पेट के बोझ से उनके बच्चों की पढ़ाई का बोझ दब जाता है इसलिए वे अपने बच्चों को पढ़ाने में असमर्थ हो जाते हैं। मेरी कोशिश ऐसे ही मेहनतकश लोगों के बच्चों को पढ़ाने की रहती है। ज्यादातर बच्चे आसपास से ही पढ़ने के लिए स्वतः प्रेरित होकर मेरे पास आते हैं। मैं किसी बच्चे को बुलाने इस उम्र में नहीं जा सकता। मेरे पास पढ़ने की ललक वाले बच्चे ही पढ़ने आते हैं और मैं उन्हीं को पढ़ाता हूं। जिस दिन मैं इन बच्चों को नहीं पढ़ा पाता उस दिन मुझे कुछ अधूरा-अधूरा सा लगता है l इन बच्चों के साथ जीना मुझे बहुत अच्छा लगता है।’

सुदर्शन प्रसाद मौर्य के घर के आंगन में मौजूद बच्चे

इस उम्र में भी वह अकेले रहते हैं पर इस एकाकीपन नें उन्हें कभी कमज़ोर नहीं होने दिया। वह कहते हैं कि, ‘मेरा तो सबसे यही कहना है कि 60 वर्ष की उम्र के बाद अपनी जिंदगी का कुछ हिस्सा दूसरों की जिंदगी संवारने के लिए  देना चाहिए। आप समाज और देश के लिए जो कुछ भी दे सकते हैं, देना चाहिए। हमारा राष्ट्र तभी खुशहाल होगा जब हर वर्ग के लोग तरक्की करेंगे। समाज में धन का समान वितरण बहुत आवश्यक है, इसके अभाव में राष्ट्र का विकास अधूरा ही रहेगा। बिना मुस्कुराए आप दूसरों के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं ला सकते। जब समाज के हर तबके का पेट भरने लगेगा और देश का हर बच्चा पढ़ने लगेगा तब आप मुस्कुरा सकते हैं और कह सकते है कि हमारा देश तरक्की कर रहा है।

फिलहाल, जीवन को अब तक उन्होंने जैसा जिया है उसको लेकर उन्हें कोई शिकायत नहीं है। हाँ, एक ख़्वाहिश अब भी है। वह कहते हैं कि, ‘मैं अपनी पूरी जिंदगी जिन्दादिली के साथ जी चुका हूं। मेरी एक ही ख्वाहिश है कि जब भी मैं इस दुनिया से विदा लूं, पढ़ते हुए बच्चे मेरे आस-पास हों और वही मुझे कंधा दें।

अपर्णा
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अपर्णा गाँव के लोग की संस्थापक और कार्यकारी संपादक हैं।

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