बलिया जिले का बांगर क्षेत्र छोटे और मझोले किसानों का इलाका है। यहां के किसान बाढ़ से नहीं सूखे की त्रासदी के शिकार हैं। सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र में आने वाला यह इलाका अभी भी कई मामलों में पिछड़ा हुआ नजर आता है। खासकर स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में। क्षेत्र की जनता ने पिछले एक दशक में जो भी प्रतिनिधि चुनकर दिए उन्होंने क्षेत्र के विकास का कोई काम नहीं किया। इससे वहां की जनता में निराशा का भाव देखने को मिला।
मेऊली कनासपुर गांव सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र का अन्तिम गांव है। इस लोकसभा क्षेत्र की लगभग दो दर्जन ऐसी समस्याएं हैं जिनका तुरंत समाधान निकलना चाहिए। लेकिन वह लटकती जा रही हैं। यहां की घाघरा नदी के कटान में 15-20 गांव लुप्त होने की कगार पर हैं। इसके लिए यहां के किसानों ने आंदोलन भी चलाया। यही नहीं, किसानों का आन्दोलन आज भी रह-रहकर होता रहता है। किसानों की मांग रही है कि उन्हें सस्ते दामों पर बीज मिले। सस्ते दामों पर खाद मिले।
मेऊली कनासपुर गांव के किसान सुब्बा यादव अपनी समस्या पर बोले, ‘खेती करने के लिए पानी नहीं है। महंगाई और बेरोजगारी है। खाद समय पर नहीं मिलती है। घर में तीन-तीन बच्चे ग्रेजुएशन करके बैठे हुए हैं। कोई रोजगार नहीं है।’

आने वाली सरकार से आप क्या उम्मींद करते हैं? इस सवाल पर सुब्बा यादव बोले, ‘हमें समय पर और सस्ते दामों में खाद मिले। बिजली सस्ती मिले। घर में जो बेरोजगार बच्चे पढ़-लिखकर बैठे हैं, उन्हें रोजगार मिले।’
इसी गांव के काशीनाथ यादव अपनी बात कहने के लिए काफी उत्सुक दिखे। बोले, ‘मैं किसान हूं। मेरे पास दो-ढ़ाई बीघा जमींन है। उसी में साग-सब्जी, गेहूं पैदा करके घर-परिवार चला रहा हूं। मेरा बेटा फौज में नौकरी कर रहा है लेकिन मैं चाहता हूं कि जो भी सरकार आए वह बेरोजगारों को नौकरी दे। क्योंकि बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है।’

वर्तमान सरकार से आप कितने खुश हैं? इस चुनाव में कैसी सरकार चाहते है? यह पूछने पर इसी गांव के वीरेन्द्र बोले ‘मेरे पास कोई रोजगार नहीं है, इसलिए लोगों के यहां मजदूरी करता हूं। पांच किलो राशन कितना दिन चलेगा। चार या पांच दिन चलता है। सरकार कहने को बहुत कुछ कह रही है लेकिन कर कुछ नहीं रही है। पांच किलो राशन से सरकार का पतन हो जाएगा।’
योगी सरकार कह रही है कि वह माफियाओं का संपत्ति छीनकर जनता को देगी। इस पर कितना अमल हो रहा है? इस सवाल पर वीरेन्द्र बोले, ‘यह सब केवल कहने के लिए है। माफियाओं का छीनकर किसी गरीब को दिए हों तो बताइए? प्रधानमंत्री मोदी बोले थे विदेशों से काला धन लाकर जनता के खाते में भेजेंगे। बताइए किसी के खाते में आया पैसा?’

इसी गांव के बीर विजय यादव जो कि दसवीं के छात्र हैं राजनीति की समझ के सवाल पर बोले, ‘मुझे राजनीति की बहुत जानकारी तो नहीं है लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि वर्तमान सरकार में लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट बढ़ा है। पढ़-लिखकर लोग इधर-उधर बेकार भटक रहे हैं।’ आगे क्या करना है? इस सवाल पर बोले, ‘देखा जाएगा। सरकार बदली तो पढ़ाई का फायदा मिलेगा और सरकार रिपीट करेगी तो पढ़ाई का कोई फायदा नहीं होगा। फिर क्या किया जा सकता है, उसके बारे में सोचेंगे।’
किसान रामप्रकाश किसानों की समस्याओं के सवाल पर बोले, ‘मेरे पास 6-7 बीघा जमीन है। गेहूं और धान की ही फसल हमारे यहां ज्यादा पैदा की जाती है। गेहूं काटकर अब धान की तैयारी में लगे हुए हैं। महंगी खाद और पानी देकर जब हम फसल पैदा करते हैं तो उसके बाद हमें ग्राहक नहीं मिलता कि हम अच्छे दामों पर अपनी फसल को बेच सकें। मजबूरी में हमें औने-पौने दाम पर अपनी फसल को बेचना पड़ता है।’
वह कहते हैं ‘वर्तमान सरकार किसान विरोधी है। मजदूर विरोधी है। यह सरकार सिर्फ पूंजीपतियों वाली सरकार है। उन्हीं की हितैषी है। इसलिए हम इस बार परिवर्तन चाहते हैं।’
शिक्षा, रोजगार और महंगाई के सवाल पर सरकार चुप्पी साध लेती है
फौज में जाने की ख्वाहिश दिल में लिए चार साल से तैयारी कर रहे 24 वर्षीय नौजवान सुरेश यादव वर्तमान सरकार के काम पर बोले, ‘यह सरकार तो जुमलों वाली सरकार है। दो करोड़ रोजगार देने की बात कहकर अग्निवीर योजना लेकर आई। चार साल बाद लोग घर में बैठ जाएंगे। पांच किलो राशन में उनका जीवनयापन हो जाएगा? यह सरकार मुर्गा दारू के बल पर वोट लेना चाह रही है। रोजगार, शिक्षा पर यह सरकार बात नहीं कर रही है। मैं कम पढ़ा-लिखा हूं क्योंकि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि हम आगे की पढ़ाई कर सकें। इसलिए अपने काम भर का पढ़कर फौज की तैयारी करना शुरू कर दिया। लेकिन सरकार ने अग्निवीर योजना लाकर हमारे मंसूबे पर पानी फेर दिया।’
मेऊली कनासपुर गांव के छोटेलाल यादव भी एक किसान हैं। वर्तमान सरकार के कामकाज के सवाल पर बोले, ‘मोदी सरकार में कहीं भी विकास नहीं हुआ है।’ राम मंदिर के निर्माण के सवाल पर बोले, ‘राममंदिर बनने से थोड़े ही विकास होता है।’
गांव की समस्याओं के के बारे में छोटेलाल बोले, ‘खाद, बिजली, पानी सब महंगा हो गया है। पहले खाद की जो बोरी 50 किलो की आती थी, आज वह 40 किलो की आने लगी और दाम वही का वही है।’ आपने इसका विरोध क्यों नहीं किया? इस सवाल पर छोटेलाल बोले, ‘विरोध करने से भी क्या होगा? जब सरकार सुने तब न। यहां तो यह भी सरकार कर रही है कि ज्यादा विरोध करने पर जेल या तमाम तरह की धाराएं लगा घर पर बुलडोजर चलवा दे रही है।’
वह कहते हैं ‘हम लोग एक ऐसी सरकार चाहते हैं जो हम लोगों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करे।’
किसान आंदोलन में चढ़ बढ़कर हिस्सा लेने वाले किसान तेज नारायण स्थानीय समस्याओं के सवाल पर बोले, ‘आज किसान जितनी लागत लगा रहा है, उसका वाजिब मूल्य उसे नहीं मिल रहा है। यहां पर दो-दो नदियां हैं लेकिन नहर में पानी नहीं आता। देखा जाय तो आज यहां किसान सिर्फ ठगी का शिकार हो रहा है। उसे नकली खाद दी जा रही है। बीज नकली मिलता है। सरकार का इस पर ध्यान नहीं हैं। यह सरकार सिर्फ लोगों को बेवकूफ बना रही है। किसान जब भी अपने हक़ की बात करता है तब सरकार किसानों के शोषण पर उतारू हो जाति है।

क्या आपको लगता है कि यहां के किसान कर्ज में डूबे हुए है? इस सवाल पर तेजनारायण कहते हैं ‘ बिलकुल यह सत्य है कि किसान कर्ज में जी रहे हैं। अपनी जरूरतों के लिए वह छोटे-बड़े कर्ज लेने के लिए मजबूर हैं। इसका असर उनके निजी जीवन पर बहुत गहरा पड़ा है। एक दौर था जब किसान के घर के बच्चे कुश्ती लड़ते थे लेकिन आज गांवों से कुश्ती गायब हो गई है। आज किसानों ने सबसे ज्यादा कटौती अपने खाने-पीने में किया है। जो किसान दूसरों का पेट भर रहा है, वह खुद के खाने में ही कटौती कर रहा है। उसके अन्दर वह ताकत अब नहीं रह गई है जो पहले हुआ करती थी। आखिर इसका क्या मतलब है। यही न कि किसान पहले की तुलना में अब भरी दबाव में जी रहा है। इसके बावजूद किसान किसी से अपना दुख नहीं कहता। वह अपने कर्जे का जिक्र भी नहीं करता लेकिन यह सत्या है कि ज़्यादातर किसान कर्जे में हैं।’
अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए इसी गांव के बुजुर्ग किसान सुदामा यादव सरकार के कामकाज पर बोले, ‘पंडित जवाहर लाल नेहरू के दौर से लेकर अब तक मैंने ऐसी तानाशाही वाली सरकार नहीं देखी। महंगाई से सभी लोग परेशान हैं। नौजवानों के पास रोजगार नहीं है। खाद का दाम हर साल बढ़ता जा रहा है। इस सरकार का सांसद कह रहा है कि चाइना ने हमारे देश के चार-पांच गांवों पर कब्जा कर लिया है। इसलिए अब हम इस सरकार को बदलना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे घर के बच्चों का भविष्य खतरे में रहे। उनकी रोजी-रोटी ख़त्म हो जाए। इस सरकार को हम जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं। ऐसी सरकार देश को बेच देगी। इस तरह से हमारा देश गुलाम हो जाएगा।’

एक अन्य किसान सुदर्शन यादव अपने मन की पीड़ा व्यक्त करते हुए बोले, ‘हम अपने खेतों में जो फसल पैदा करते हैं तो उसका हमें वाजिब मूल्य नहीं मिलता। जब हम खाने के लिए दाल खरीदने जाते हैं तो 16 रूपए में सौ ग्राम दाल मिल रही है। महंगाई का यह हाल है। घर के लड़के पढ़ाई-लिखाई करके खेत में क्रिकेट खेल रहे हैं। सरकार रोजगार नहीं दे रही है। इस सरकार के सारे बदमाश माफिया सत्ता का सुख भोग रहे हैं जबकि दूसरी पार्टियों के नेताओं को लक्ष्य करके मारा जा रहा है। अभी मुख्तार को षडयंत्र रचकर मार दिया गया। अतीक अहमद की हत्या कर दी गई जबकि बृजेश सिंह जैसे लोग इनकी पार्टी की शोभा बढ़ा रहे हैं।’
मेऊली कनासपुर गांव के किसान हरिशंकर अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए बोले, ‘अब तक की सबसे खराब सरकार रही यह। इस सरकार ने नौजवानों को तबाह कर दिया। रोजी-रोटी का रास्ता बनाने की बजाय इस सरकार ने नौकरी के रास्ते को बंद करने का काम किया। मेरे पास लड़का नहीं है, लड़की ही है। उसके बच्चे एमए करके बैठे हुए हैं। उन लोगों को कोई काम-धंधा नहीं मिल रहा है। हम ऐसी सरकार चाहते हैं जो बच्चों को रोजगार दे। बच्चे अपने पैर पर खड़े होंगे तो हमारी भी चिंताएं कम हो जाएंगी। आज सरकार पांच किलो अनाज जरूर दे रही है, लेकिन वह पांच किलो राशन कितना दिन चलेगा? कोई रोजगार मिलता तो वह स्थायी होता न।’
किसानों को उनकी फसल का वाजिब मूल्य न मिलने से खेती से हो रहा मोहभंग
आमतौर पर किसानों ने यह समझ लिया है कि कॉर्पोरेटपरस्त भाजपा सरकार में उनका भला नहीं होनेवाला है। विगत वर्षों में दिल्ली में हुये किसान आंदोलन का प्रभाव उनके ऊपर बहुत गहरा है और उससे वे आत्मीय रूप से जुड़े हैं। इसके साथ ही वे यह मानने लगे हैं कि भाजपा सरकार ने उनके दमन के अलावा कोई काम नहीं किया है।

उत्तर प्रदेश किसान संयुक्त मोर्चा के बलिया के नेता बलवंत यादव स्थानीय स्तर पर किसानों की समस्याओं के सवाल पर बोले, ‘यह गांव अक्सर सूखे की मार झेलता रहता है। यहां मुख्य रूप से दो ही फसल गेहूं और धान किसान पैदा कर रहा है। उसमें भी देखिए किसान जितनी लागत लगाकर फसल पैदा कर रहा है उस फसल का उसे वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा है। सरकार से किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों वाली एमएसपी लागू करने की मांग कर रहा है, लेकिन सरकार उसे नहीं मान रही है। फसल का वाजिब मूल्य न मिलने के कारण आज किसानों की कमर टूट चुकी है। आज किसान खेती करने से कतरा रहा है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के खिलाफ यहां के किसानों में रोष है और आने वाले चुनाव में किसानों ने सरकार को बदलने का मन बना लिया है।’
गाँवों में जाने पर लोग अपने कष्टों को साझा करते हैं। आमतौर पर छोटे किसान चाहते हैं कि खेती करके वे अपने जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर लें। लेकिन ऐसा है नहीं। एक तरफ जहां किसान बिजली, पानी और खाद तो युवा बेरोजगारी के कारण परेशान हैं। ऐसे में किसानों, नौजवानों की नाराजगी इस लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को कितनी भारी पड़ेगी यह तो 4 जून को होने वाले मतगणना के बाद ही पता चलेगा।