Wednesday, July 24, 2024
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बुझाई गई चेन्नई के सीपीसीएल केंद्र में लगी आग

चेन्नई (भाषा)। तमिलनाडु में उत्तरी चेन्नई के मनाली में चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (सीपीसीएल) की रिफाइनरी में शनिवार को आग लग गयी। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। तमिलनाडु अग्नि एवं बचाव सेवा विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि सीपीसीएल के इस केंद्र में आग लगने के बाद वहां से धुंआ निकलने लगा तथा कंपनी […]

चेन्नई (भाषा)। तमिलनाडु में उत्तरी चेन्नई के मनाली में चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (सीपीसीएल) की रिफाइनरी में शनिवार को आग लग गयी। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

तमिलनाडु अग्नि एवं बचाव सेवा विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि सीपीसीएल के इस केंद्र में आग लगने के बाद वहां से धुंआ निकलने लगा तथा कंपनी की अपनी अग्निशमन सेवा के कर्मियों ने आग बुझायी। उन्होंने कहा, ‘कंपनी ने जैसे ही हमें (आग लगने की) सूचना दी, हम हरकत में आ गये। जब हम आग बुझाने के लिए जा रहे थे, तभी रास्ते में उनका फोन आया कि आग बुझा दी गयी है।’

आग की इस घटना के संबंध में कंपनी के एक अधिकारी ने कहा, ‘आग बुझा दी गयी है और हम इस हादसे को लेकर एक रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।’

कंपनी की तरफ से प्राप्त जानकारी के अनुसार चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CPCL) दक्षिण भारत में स्थित एक विश्व स्तरीय ऊर्जा कंपनी है। पहले इसे मद्रास रिफाइनरीज लिमिटेड (एमआरएल) के नाम से जाना जाता था। इसका गठन भारत सरकार (GOI), और  AMOCO के बीच एक संयुक्त उद्यम के रूप में किया गया था। 

नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी (NIOC) ने 1965 में मनाली, चेन्नई में एक रिफाइनरी स्थापित की। AMOCO ने 1985 में भारत सरकार के पक्ष में CPCL इक्विटी का विनिवेश किया। बाद में, भारत सरकार ने अपनी इक्विटी इंडियनऑयल को हस्तांतरित कर दी, और सीपीसीएल 2001 में इंडियन ऑयल की सहायक कंपनी  बन गई। 

सीपीसीएल के पास प्रति वर्ष 11.5 मिलियन टन की संयुक्त शोधन क्षमता वाली दो रिफाइनरियां हैं। चेन्नई में मनाली रिफाइनरी की क्षमता 10.5 मिलियन टन प्रति वर्ष है और ईंधन, चिकनाई, मोम और पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक उत्पादन सुविधाओं के साथ भारत में सबसे जटिल रिफाइनरियों में से एक है।

सीपीसीएल की दूसरी रिफाइनरीनागपट्टनम रिफाइनरी है जो कावेरी बेसिन पर स्थित है। यह इकाई 1993 में नागापट्टिनम में 0.5 मिलियन टन प्रति वर्ष की क्षमता के साथ स्थापित की गई थी और बाद में इसे बढ़ाकर 1.0 मिलियन टन प्रति वर्ष कर दिया गया।

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