लड़की हूं… लेकिन सही रणनीति बिना लड़ना आसान नहीं है

विद्या भूषण रावत

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2020 के चुनाव का क्रमिक विश्लेषण – भाग 5 

कांग्रेस बुरी तरह विफल रही। इस चुनाव में महज़ 2% वोट पाकर वह सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई है। प्रियंका गांधी पिछले एक साल से मैदान में हैं और उन्होंने सोनभद्र के आदिवासी नरसंहार और उन्नाव बलात्कार पीड़िता तथा हाथरस के मुद्दे को बहुत दमदारी के साथ उठाया। यह प्रियंका गांधी ही थीं जिन्होंने लखीमपुर खीरी जाने का फैसला किया और उन्हें  उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस ने महिलाओं को 40% टिकट दिया और उनके अभियान का नारा था लड़की हूं लड़ सकती हूं जो वास्तव में बहुत आकर्षक था। उन्होंने विभिन्न जगहों पर बहुत विशाल सभाओं का आयोजन किया और यह बताया गया कि भीड़ ‘अभूतपूर्व’ थी। इस उत्साह का एक पक्ष यह भी था कि कांग्रेस आईटी सेल के सोशल मीडिया रिपोर्टर पार्टी के प्रचार को बेमिसाल कह रहे थे।

राहुल गांधी ने कांग्रेस को वैचारिक आकार दिया है। वह विभिन्न समुदायों के युवा नेताओं को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि कांग्रेस क्षेत्रीय क्षत्रपों को वैसे ही विकसित करे जैसा कि अतीत में था। इससे इसके लिए चीजों का प्रबंधन आसान हो सकता है। हालत यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व लोगों से नहीं जुड़ पाया है।

यह सच है कि प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सबसे बड़ा अभियान चलाया और ऐसा माहौल बनाया जिससे समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा फायदा हुआ। यह भावना कि भाजपा हार का सामना कर रही है, वास्तव में प्रियंका के विभिन्न अभियानों द्वारा बनाई गई थी, लेकिन फिर जब अचानक उन्होंने फोकस अभियान के रूप में लड़की हूं लड़ सकती हूं की घोषणा की तो मुझे लगा कि यह अभियान एनजीओ के इवेंट मैनेजमेंट की तरह अधिक था, न कि वास्तव में राजनीतिक आंदोलन जैसा। जब टिकट बांटे गए, तो कांग्रेस पार्टी यह अच्छी तरह से जानती थी कि उसकी स्थिति पूरी तरह से खराब है और वह सत्ता में आने की स्थिति में नहीं है, लेकिन प्रियंका और उनकी टीम को लगा कि लखनऊ में सरकार को ‘प्रभावित’ करने के लिए उन्हें पर्याप्त संख्या मिल सकती है। लड़की हूं लड़ सकता हूं अभियान के जरिए कांग्रेस ने यह संकेत देने की कोशिश की कि वह लड़कियों और महिलाओं की परवाह करती है। लेकिन राजनीति केवल स्लोगन भर नहीं, बल्कि और भी बहुत कुछ है। अधिकांश टिकट ‘सेलिब्रिटीज’ के पास गए जो ट्विटर और फेसबुक पर ही सक्रिय थे और बिना किसी सामाजिक या राजनीतिक कार्य के भी अपना महत्व स्थापित करने में अधिक सक्षम थे। इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसे अति-सम्मोहित ‘कार्यकर्ताओं’ की एक बड़ी संख्या थी, जो राज्य की बर्बरता के शिकार थे और उन्हें न्याय की आवश्यकता थी। लेकिन ऐसे नेताओं को उनके फेसबुक या ट्विटर लाइक या रीट्वीट की तुलना में बहुत कम वोट मिले। जब प्रियंका गांधी ने सोनभद्र में एक आदिवासी नेता राम राज सिंह गोंड को अधिक उपयुक्त पाया और उन्हें टिकट दिया।  तब लगा कि वह बेहद साहसिक निर्णय था और हार के बावजूद वह पार्टी के लिए अच्छे साबित हो सकते हैं। लेकिन महिलाओं के मामले में, लड़की हूँ लड़ सकती हूँ ने अपेक्षित परिणाम नहीं दिया। इसका एक कारण यह भी था कि उनमें से ज्यादातर सोशल मीडिया पर तो बहुत  ‘सक्रिय’ थीं लेकिन ज़मीन पर उनकी उपस्थिति बहुत कमजोर थी। 

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राहुल गांधी ने कांग्रेस को वैचारिक आकार दिया है। वह विभिन्न समुदायों के युवा नेताओं को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि कांग्रेस क्षेत्रीय क्षत्रपों को वैसे ही विकसित करे जैसा कि अतीत में था। इससे इसके लिए चीजों का प्रबंधन आसान हो सकता है। हालत यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व लोगों से नहीं जुड़ पाया है। इसका कारण संभवत: उनका दृष्टिकोण है जो विशेष मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा था और हालांकि ये विशेष मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब तक बड़े पैमाने पर जमीनी स्तर पर कैडर नहीं होगा, तब तक सरकार नहीं बदल सकते। पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश में एक विकल्प के रूप में उभरना संभव नहीं होगा, लेकिन उसे अभी भी एक मजबूत सामाजिक गठबंधन पर ध्यान केंद्रित करने और पुनर्निर्माण करने, कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने और नैरेटिव बनाने की आवश्यकता है। यह एक बड़ा कार्य है, जो कठिन है, क्योंकि अधिकांश दल – चाहे भाजपा हो या उसके विरोधी, सभी में समानता है, गांधी परिवार के प्रति उनमें घृणा है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि उन्हें बदनाम करने के प्रयास के बावजूद, वे भाजपा के लिए एक अखिल भारतीय विकल्प बने रहें। प्रत्येक पार्टी इस तरह की प्रक्रिया से गुजरती है और हालांकि प्रियंका गांधी ने जोरदार प्रचार किया लेकिन कांग्रेस उत्तर प्रदेश में गठबंधन बनाने में असमर्थ थी। यह विमर्श का हिस्सा बन गई लेकिन यह कभी तस्वीर में नहीं थी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पुनरुत्थान तब तक मुश्किल है जब तक कि पार्टी देश के बाकी हिस्सों में पुनर्जीवित नहीं हो जाती और सत्ता का हिस्सा नहीं बन जाती। 2% वोट शेयर के साथ, कांग्रेस को इस समय पुनर्जीवित करना मुश्किल होगा, लेकिन एक राजनीतिक दल के रूप में इसे लोगों के मुद्दों को उठाना जारी रखना चाहिए और चुनाव से बहुत पहले गठबंधन बनाना चाहिए ताकि प्रासंगिक बने रहें।

पंजाब में कांग्रेस ने स्वयं अपने आप को हरा दिया। अमरिंदर सिंह को जिस तरह से रिप्लेस किया गया वह गलत था। प्रियंका गांधी ने नवजोत सिंह सिद्धू को दूसरों पर प्रमोट करना भी इसका कारण था। कुल मिलाकर विभाजित कांग्रेस सारी लड़ाई हार गई। यह शर्मनाक था।

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कांग्रेस का अपने ही प्रॉस्पेक्टस को खत्म करने का सबसे घिनौना उदाहरण उत्तराखंड है। पंजाब में जहां उसने चन्नी को पार्टी का मुख्यमंत्री घोषित किया, वहीं उत्तराखंड में अपने सबसे वरिष्ठ नेता हरीश रावत के योगदान को स्वीकार करने तक से इनकार कर दिया। 2002 के बाद से, कांग्रेस ने हरीश रावत को स्वीकार करने और उनका सम्मान न करने की मानों कसम ले रखी हो। रावत को अभी भी उत्तराखंड में सबसे बड़े नेता माना जाता है। जब पहाड़ी राज्य के सभी चुनावी सर्वेक्षण एक कठिन लड़ाई की भविष्यवाणी कर रहे थे, तब भी व्यक्तिगत नेताओं की लोकप्रियता के मामले में, सभी सर्वेक्षणों ने संकेत दिया कि हरीश रावत दूसरों से काफी आगे थे, फिर भी पार्टी नेतृत्व उन्हें स्वीकार करने से भागता रहा। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी शायद ही कभी उत्तराखंड गए हों। उन्होंने चुनाव की पूर्व संध्या पर राज्य की यात्रा की। उनके विपरीत नरेंद्र मोदी और अमित शाह नियमित रूप से उत्तराखंड का दौरा करते रहे और लोगों को यह महसूस कराया कि वे जरूरी और सम्मानित हैं। कांग्रेस चुनाव की पूर्व संध्या पर राज्य में अपने नेता के पर्यटन से जीत की उम्मीद नहीं कर सकती है। उत्तराखंड में राहुल और प्रियंका के भाषणों में उत्तर प्रदेश और पंजाब की तुलना में अलग-अलग मुद्दों वाले लोगों को पेश करने के लिए कुछ खास था भी नहीं।

समाप्त

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं

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