गिरमिटिया पुरखों के देस में…..

संतोष कुमार

2 939

यात्रा वृत्तांत का दूसरा भाग

जोहान्सबर्ग

दक्षिण अफ्रीका का सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर है जोहान्सबर्ग, जिसको जोजी, जोबर्ग या इगोली नाम से भी जाना जाता है। सोने की खदानों के लिए मशहूर शहर का कुछ हिस्सा इन खदानों के ऊपर भी बसा हुआ है, जिसमे लगभग 44,34,827 लोग निवास करते हैं । मुम्बई की तरह यह दक्षिण अफ्रीका की अनऑफिसियल आर्थिक राजधानी है ।

प्रमाणित नहीं है लेकिन सम्भावना प्रगट की जाती है कि इस शहर का नाम इसके भूगोल का सर्वे करने वाले सर्वेयर जोहान्स जोबार्ट और जोहान रिसिक के नाम पर या प्रथम सरकारी मुलाजिम जोहान्स मेयर के नाम पर पड़ा । इस शहर को तो नहीं कहा जा सकता लेकिन वर्तमान शहर के भूगोल पर कभी सान कबीले के लोगों का निवास स्थान था, जो मूलतः शिकारी एवं फल-फूल चुन कर खाने वाला समुदाय था । कालान्तर में लगभग 13वीं शताब्दी मे बान्टु भाषी कबीले ने मध्य अफ्रीका से आकर अपना निवास बनाया । 1886 मे सोने की खदान की खोज ने बड़ी संख्या में लोगों को खासकर यूरोपियन्स को इस क्षेत्र मे आकर्षित किया और 10 वर्ष में ही इस क्षेत्र की जनसंख्या 100000 पार कर गयी। एक समय पृथ्वी पर सकल उत्पादित सोने का 45 प्रतिशत जोहान्सबर्ग की खानों से ही उत्पादित होता था।

लालच की खदानों में जुटे लाखों लोगों की मेहनत, हवस और हिंसा की ईंट-गारा इस शहर की बुनियाद में है । शायद इसी अतीत का दुष्परिणाम है कि जोहान्सबर्ग लूट-पाट, हत्या जैसे अपराधों के लिए अपने ही देश में  बदनाम है। इसका अनुभव हमें तब मिला जब देश के अन्य हिस्से में घूमते हुए हमारी गाड़ी के नम्बर प्लेट पर जोहान्सबर्ग के प्रान्त का शार्ट नेम जीपी(गुएनतान्ग प्राविन्स) देखकर एक अश्वेत पेट्रोलपम्प कर्मी ने इसका उच्चारण गैंगेस्टर प्राविन्स के नाम से किया और हमारा गैंगेस्टर प्राविन्स के निवासी के रूप में स्वागत करने का विनोद किया।

जोहान्सबर्ग शहर का एक नज़ारा

शहर में भ्रमण के दौरान पब्लिक लाइब्रेरियां काफी संख्या में दिखीं। खाली समय मे मैं कई बार मण्डेला स्वायर के सामने स्थित सैण्डटन लाइब्रेरी में गया। यह तीन मंजिला लाइब्रेरी बहुत ही समृद्ध है। आपके घण्टों कैसे गुजर जाएगें पता नहीं चलेगा । महत्वपूर्ण यह है कि मैं जब भी गया लाइब्रेरी में श्वेत और अश्वेत छात्र और युवा पर्याप्त संख्या में पढ़ते पाए गए । पता लगा कि मुख्य लाइब्रेरी में 1.5 मिलीयन पुस्तकें हैं और 25000 सदस्य हैं।

जोहान्सबर्ग मे निजी कारें ही यात्रा का प्रमुख साधन हैं। सार्वजनिक परिवहन बहुत कम दिखाई पड़ता है। सार्वजनिक परिवहन के नाम पर मिनी बसें चलती हैं, जिनका मेन्टनेन्स अपने देश की तुलना में बहुत अच्छा है और इसमें इस महानगर की दुकानों एवं अन्य प्रतिष्ठानों में काम करने वाले अधिकांश अश्वेत नागरिक ही सफर करते हैं । कार्य का समय प्रातः 8.30 बजे से शाम 4.30 बजे तक है। शहर की दुकानें  एवं परिवहन 8 बजे के बाद बन्द होने लगता है। प्रायः लोग 8 बजे तक घरों मे आ जाते है। ऐसी परम्परा विगत रंगभेद के समय से चली आ रही है, जब अश्वेत एवं एशियाई मूल के लोगों को 5 बजे तक शहर छोड़कर अपनी बस्तियों मे जाने की बाध्यता  थी ।

रंगभेद के समय से जोहान्सबर्ग के इर्दगिर्द एशियाई लोगों की बस्ती फांर्सबर्ग, अश्वेत लोगों की स्वेटो, अलेक्जेण्ड्रा, न्यू टाउन और सीबीडी, भारतीय मूल के लोगों की बस्तियों बिनोनी, लिनेसिया, लोडियम बसाई गयी थीं । उल्लेखनीय है नेल्सन मंडेला स्वेटो के ही निवासी थे।

प्रायः हर चौराहे पर एकाध भिखारी खड़े मिल जाते हैं, जिसमें गोरा या एशियाई शायद ही कभी दिखा हो । भिखारी काफी शालीन तरीके से एक दफ्ती के बोर्ड पर अपनी आवश्यकता और अपील लिख कर लाल बत्ती के समय खड़ी कारों के पास पहुंचते हैं, जिन कारों के शीशे खुलते हैं उनसे ही मदद का निवेदन करते हैं।  भारतीय भिखारियों की तुलना में उनके मदद लेने के तरीके में उनका आत्मसम्मान भी झलकता है। कोई-कोई भिखारी करतब दिखाकर भी मदद की अपील करता है लेकिन सारा करतब लाल बत्ती के फिर से हरी होने की अवधि में ही समाप्त होता है। उनके द्वारा कभी भी टैफ्रिक में व्यवधान नहीं डाला जाता है । यह कारों से भरा शहर ऐसे लोगो के योगदान से दौड़ता रहता है। यदि किसी चौराहे की ट्रेफिक लाइट खराब हो गयी है तो ट्रेफिक के सहयोगी एक वर्दी डालकर खड़े हो जाते हैं और उनमें से कई काफी मनोरंजक अन्दाज में  ट्रेफिक संचालन करने लगते हैं । सड़कों के किनारे पार्किंग स्थल चिन्हित होते हैं और वहां पर भी कुछ लोग गाड़ी खड़ा करने, निकालने और उसकी देखभाल करने में सहायता करने के लिए खड़े रहते हैं । वापस लौटते समय कार मालिक धन्यवाद के साथ कुंछ रैण्ड उनको देते हैं तो उनकी खुशी देखते ही बनती है। कहना नहीं होगा ये लोग अश्वेत होते हैं ।

टालस्टाय फार्म

30 जनवरी को हम टालस्टाय फार्म जाने के लिए निकले । जो जोहान्सबर्ग से करीब 50 किमी दूर लिनेसिया कस्बे के पास होना बताया गया। यहां पर किसी जगह से पहुंचने का सबसे अच्छा तरीका है कि जीपीएस में स्थान को चिन्हित करके गंतव्य की तरफ निकल जाइए, क्योंकि सड़कों का इतना जाल है कि किस चैराहे से किधर मुड़ना है आपको यह बार-बार परेशान करेगा और जल्दी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई देगा, जो आपको गंतव्य की जानकारी दे सके । हमलोगों के साथ चल रहीं श्रीमती शिवा, जो यहां की निवासिनी हो गयी हैं, को भी भ्रम हो गया। काफी भटकने के बाद हम लिनेसिया से लाओली रेलवे स्टेशन पहुंचे, जिसका जिक्र गांधी जी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग में भी आया है। रेलवे स्टेशन के बगल से एक कच्चा रास्ता मुड़ा था, जिस पर भारतीय उच्चायोग ने लोगों की सुविधा के लिए दफ्ती बोर्ड पर टालस्टाय फार्म जाने के रास्ते का मार्ग चिन्ह बना रखा था। स्टेशन से करीब 5-6 किमी आगे एक मैदान को घेर कर भारतीय दूतावास के प्रयास से टालस्टाय फार्म के करीब 2-3 एकड़ क्षेत्र को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। पता चला कि यहां पर उक्त समय का कोई भवन आदि शेष नहीं है। यह अच्छा किया गया है कि नया संग्रहालय बनाने का जो प्रयास किया जा रहा है उसे पुराने भवन की नींव पर ही खड़ा किया जा रहा है। फार्म के आस-पास दूर-दूर तक कोई बस्ती नहीं थी। पूरब तरफ लगभग पाँच-सात सौ मीटर दूरी पर पहाड़ियां थीं और एक पहाड़ी पर टालस्टाय फार्म सम्भवतः कुछ वर्ष पहले लिखा गया था, जो धुंधला पड़ रहा था । आश्रम में शहीद दिवस के उपलक्ष्य में सर्वधर्म प्रार्थना हुई जिसमें स्थानीय धर्म बौद्ध, इसाई और इस्लाम के पुरोहित तो स्थानीय अश्वेत समुदाय के थे । किन्तु  हिन्दू और सिक्ख धर्म के पुरोहित भारतीय मूल के थे । वक्ताओं में महात्मा गांधी की प्रपौत्री, तत्कालीन गांधी के मित्र परिवार के वंशज और अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस से जुड़े भारतवंशी समुदाय के प्रतिनिधि थे। वक्ताओं ने इस फार्म को बेहतर बनाने के लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता का उल्लेख किया ।

वांडरर्स में क्रिकेट मैच

वांडरर्स गोल्फ क्लब कॉम्लेक्स

हमलोग गलियों में , बगीचों में पेड़ों के बीच की खाली जगहों में, स्कूल की खाली क्लासों में, अभिभावकों की तरेरती निगाहों में, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब जैसे मुहावरों में क्रिकेट खेलते, सुनते, देखते बड़े हुए । टेस्ट मैचों मे लगे एक चौके पर आधे-आधे घण्टे चाव से उस स्ट्रोक की तारीफ सुनाते कमेन्टेटरों और एक्सपर्टो की टोली ने खेल के नाम पर क्रिकेट को ही सुनने या देखने के संस्कार डाले। क्रिकेट हमारे लिए ठहरे वक्त को चबाने वाली  चुइंगम की तरह था, जिससे लम्बी-उबाऊ दोपहरें बीततीं थीं। निराशा के पठार मे उगे इक्के-दुक्के दरख्तों की विशालता और मजबूती को देखते-निहारते उनके बारे में बात करते-करते अपने साथियों से जूझ जाना ही क्रिकेट था । क्रिकेट हमारे गांव के किशोरों और युवाओं की जिन्दगी में नवम्बर में उतरता था और फरवरी की कड़ी होती धूप में कपूर की तरह उड़ जाता है। गांव जब अपनी हरी-भरी लहलहाती फसलों को खुशनुमा धूप में सहेजने के लिए जूझ रहा होता है तब मेले में माइक लगाकर कमेन्ट्री कर रहे नए-नवेले किशोरों की जुबान में  क्रिकेट नए-नए शब्द गढ़ता है। हमारे जीवन में क्रिकेट बस बचपने के गुजर जाने का अफसोस और जवानी से डर जाने की टीस है। क्रिकेट हमारे गांवों में मेले की तरह आता है जिसके किनारे बैठ कर जुलाहे अपना करघा भूल जाते हैं, राजगीर साइकिल खड़ी करके उस दिन की मजदूरी भूल जाते हैं, सिवान में अपनी फसल अगोरने निकला किसान भीड़ में बज रही तालियों की गड़गड़ाहट में हरियाली के दुश्मनों को भूल जाता है और रास्ते से गुजर रहा दूधिया मु़ड़-मुड़ कर उन पलों को अपनी आंखों में कैद करता रहता है। गांव में क्रिकेट जब मचलता है तो मनु से लेकर मण्डल तक की सरहदों के आर-पार खेलता है। यह हर साल कुछ हीरो गढ़ता है जिसके नाम पर गदोरी पर सुर्ती मलते-मलते उनके चचा-बाप अक्सर झल्ला जाते हैं। क्रिकेट हर साल हमारे गांव की थकी-हारी गिरस्थी में कुछ ऐसा बिगाड़ जाता है जिसका उलाहना मां, बहनें महीनों देती रहतीं हैं ।

अब क्रिकेट की माया से मुक्त हो चुका हूं । वान्डरर्स में बेमन से ही गया था। संयोग यह है कि जहां रुका था उस कालोनी से पांच मिनट की पैदल दूरी पर ही वान्डर्रस था। वान्डरर्स अकेला मैदान नहीं है। यह कई छोटे-बड़े मैदानों का बिग बाजार है जिसके अगल-बगल तमाम छोटे-बड़े मैदान हैं। फुटबाल के, रग्बी के । आप यहां आएंगे तो प्रायः शाम को ये मैदान खेलने वालों से भरे मिलेंगे। फुटबाल के छोटे-छोटे मैदान भी हैं जिनमें 6-6 खिलाड़ी भी खेल सकते हैं । ये मैदान रात में दूधिया रोशनी से जगमगाते मिलेंगे चाहे ठण्ड पड़ रही हो या बारिश हो रही हो । तेज संगीत और दूधिया रोशनी में खेल अपनी पूरी रवानी पर मिलेगा । मैदान तारों के बाड़े से घिरे हुए होते हैं जिससे गेंद बाहर न जा सके और मैदान के बगल से सनसनाती गुजर रही कारों को किसी तरह की दिक्कत न हो । फिटनेस और खेल के प्रति यह मुल्क दीवाना है, न कि हमारे समाज की तरह जिसमें खेल एक खास उम्र की बेचैनी भर है।

तो उस दिन श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका का मैच था । वान्डरर्स की तरफ आने वाली सड़कें दोपहर 1 बजे से गुलाबी टी शर्ट पहने युवाओं, स्त्रियों, बुर्जुगों से भरी हुई थीं । वान्डरर्स में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच में  ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रहे लोगों के प्रति एकजुटता दर्शाने के लिए महिलाएं, पुरुष गुलाबी वस्त्र पहनकर मैदान में आते हैं और दक्षिण अफ्रीकी टीम भी इसी रंग के वस्त्र पहन कर मैदान मे उतरती है। गुलाबी वस्त्र पहनने की अनिवार्यता नहीं होती लेकिन मैदान तीन चैथाई गुलाबी वस्त्रों के कारण गुलाबी रंग मे रंगा होता है। मैदान की तरफ आने वाली सड़कों पर मीलों आगे से अश्वेत युवा कार मालिकों को कार पार्किंग में खड़ा करने का इशारा करने लगते हैं । पार्किंग मतलब सड़कों पर कार खड़ा करने के लिए बनाई गयी पार्किंग और इशारा करने वाले प्राइवेट लोग होते हैं जो आपकी कार पार्क कराकर उसकी देखभाल करेंगे और बदले में दो-चार रैण्ड जैसी आपकी खुशी हो आपसे लेंगे । इन मैंचों में यहां के कुछ निवासी कार पार्क करने वालों से दुखी होकर अपने मकान के बाहर की सड़क पर कार पार्क न करने की तख्ती भी टांग देते हैं और लोग उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए वहां पर कार पार्क नहीं करते हैं ।

मेले में जाते लोगों का उत्साह देखते-सुनते और कुछ गलतफहमियों के कारण थोड़ा-सा विलम्ब हो गया लेकिन मैदान में घुसते ही एक अलग दुनिया थी। उर्जा से ओत-प्रोत एक जन समूह हिलोरें ले रहा था। खूबसूरत मैदान में एक-एक शाट पर बजने वाला संगीत, दर्शकों की लयबद्ध तालियां या क्रमशः खड़े होकर दर्शक दीर्घा में समुद्र की लहर उठने का दृश्य पैदा करना क्रिकेट से कहीं उपर था । दर्शक दीर्घा करीब चालीस प्रतिशत गोरों से भरी थी । शेष अश्वेत और भारतीय समुदाय था। अफ्रीकी टीम के नए गेंदबाज रवाडा के प्रति दर्शकों का समर्थन देखने लायक था लेकिन अच्छे क्रिकेट की सराहना राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर हो रही थी। वांडरर्स उस दिन 30 प्रतिशत क्रिकेट, 30 प्रतिशत बीयर, 30 प्रतिशत दर्शकों का खेल था और शेष बयान के बाहर था । सबसे अधिक आश्चर्यजनक लगा कि लंच के समय पिच को घेर कर मैदान को दर्शकों के लिए खोल दिया गया और आधे से अधिक दर्शक मैदान में उतरकर चहलकदमी करने लगे । खेल शुरू होने के दस मिनट पहले मात्र दो-तीन लोगों द्वारा जगह-जगह खड़े होकर इशारा किया गया और पूरा मैदान खाली हो गया । कितना विश्वास है अपने दर्शकों पर इस मैदान के प्रबन्धकों का । शायद खेल भावना से भरे हुए समाजॉन में यह आत्म विश्वास आ जाता है कि वे एक-दूसरे पर विश्वास कर सकें। वाण्डरर्स से बाहर निकलते-निकलते मुझे समझ में आया कि यह भीड़ क्रिकेट देखने नहीं बल्कि खेल को जीने जाती है। उस दिन मधुमक्खियों ने भी लगभग एक घण्टा मैदान पर कब्जा कर लिया था । मधुमक्खी भगाने वालों का दर्शक उसी उत्साह से तालियां बजा कर उत्साहवर्धन कर रहे थे जैसे उन्होंने कोई शानदार कैच लपका हो ! 

डरबन की ओर

जोहान्सबर्ग से बाइरोड कार से हम डरबन पहुंचे। जोहान्सबर्ग ऊँचाई पर बसा दक्षिण अफ्रीका का महानगर है और डरबन समुद्रतट पर। जोहान्सबर्ग से नीचे उतर कर डरबन जाते हुए वैनरीनेंस पास से गुजरते हुए प्रकृति के शानदार नजारे दिखाई देते हैं। जब जोहान्सबर्ग से लगभग 290 किमी पर दक्षिण अफ्रीका के प्रान्त क्वाजा नटाल मे प्रवेश करते हैं, तब यह पास हैरीस्मिथ से शुरु होकर वेनरीनेंस तक पर्वतों के बीच से गुजरते हुए अपने अद्भुत नजारों से आपको सम्मोहित करता रहता है । हमें जोहान्सबर्ग की स्थानीय निवासिनी श्रीमती शिवा के सौजन्य से उनकी यहूदी सह अध्यापिका का फ्लैट मिल गया डरबन मे रहने के लिए । तड़कती बिजलियों और बारिश की फुहारों के बीच हम रात्रि 8.00 बजे जीपीएस महोदय के सहयोग से बहुमंजलीय आवास मे पहुंचे । बुर्जुग श्वेत केयर टेकर महोदय ने हमारा स्वागत किया और फ्लैट के सम्बन्ध में सारी जानकारी विस्तार से देते हुए हमारी सुखद यात्रा की कामना की । बुर्जुग केयर टेकर करीब 80 साल के रहे होंगे लेकिन कमर झुकी होने के बावजूद उनकी सक्रियता से हम आश्चर्यचकित थे । फ्लैट बेहद साफ-सुथरा था और अपने बुर्जुग मालिकान की स्मृतियों को अपनी दीवालों पर संजोए हुए था, इसके मालिक की बनाई पेंण्टिंग्स दीवालों पर टंगी हुई नवागंतुकों को निहार रहीं थीं । 7वीं मजिल की बड़ी-बड़ी बालकनियों से रोशनियों में चमकता डरबन महानगर और उसके किनारे फैले हिन्द महासागर के तट पर झिलमिलाती रोशनियां हमें मंत्रमुग्ध कर रहीं थी। जैसा कि इस देश का रिवाज है उसी का अनुसरण करते हुए हम जल्दी सो गए और सुबह जल्दी ही उठकर समुद्रतट के किनारे पहुंच गए ।

डरबन में 16 नवम्बर 1860 को पहले 342 गिरमिटिया भारतीय उतरे थे फिर 26 नवम्बर, 1860 को गिरमिटिया मजदूरों का दूसरा जत्था इस खाड़ी में उतरा था । 1860 से 1911 तक लगभग 15184 भारतीय गन्ने की खेती के लिए डरबन में लाए गए थे।

सामने नीला हिन्द महासागर था, इस अपरिचित महाद्वीप की भूमि पर खड़े होकर अपने परिचित महासागर को निहारने का सुख अद्भुत था, वैसे ही जैसे बहुत दिनों बाद अपने गांव जाने वाली सड़क दिख जाने पर लगता है या कहीं दूर से लौटने पर अपने घर की खिड़की से आ रही रोशनी को देखकर लगता है। इतनी सुबह पहुंचने पर भी हमें लगा कि कुछ देर हो गयी है। तट के किनारे निवासियों की जलक्रीड़ा देखकर धीरे-धीरे पानी से दूर रहने की मेरी हिचक खत्म हुई । मैं उत्तर भारत में जनवरी की कड़ाकेदार ठंड को झेलकर यहां के खुशगवार मौसम में पहुंचा था लेकिन शरीर के भीतर घुसी ठंड अभी भी पानी से डरा रही थी।

डरबन का समुद्र तट

काफी लम्बे, साफ-सुथरे समुद्रतट के किनारे खूबसूरत टाइल्स से बने फुटपाथ पर उस दिन मैराथन दौड़ थी, थोड़ी देर मे देखता हूं कि हजारों श्वेत, अश्वेत, एशियाई, युवा, बुर्जुग, बच्चे, पुरुष, स्त्री, विकलांग लोगों को हुजूम दौड़ रहा है और केवल जूतों की आवाज ही सुनाई दे रही है। समुद्रतट के किनारे रंग-बिरंगे टी-शर्ट और टोपियों को दौड़ते देखकर लग रहा था कि जैसे हजारों तितलियों का समूह एक अनुशासनबद्ध उड़ान भर रहा है। किनारे समुद्र के हिलोरों के आमंत्रण को हम देर तक अवाएड नहीं कर पाए और पानी में कूद पड़े । पानी मे घुसते ही सारी हिचक वैसे ही काफूर हो गयी जैसे किसी शिशु का किसी अनजान वत्सला स्त्री की गोद मे पहुंचने पर दूर होती है, अब हमें समुद्र अपनी गोद मे उछाल रहा था और हमारी शिशुवत किलकारियां गूंज रही थीं।

डरबन जिसे कहते हैं

जोहान्सबर्ग से लगभग 500 किमी की दूरी पर हिन्द महासागर के किनारे बसा दक्षिण अफ्रीका का एक बेहद खूबसूरत शहर है। भारतीय व्यापारी, मजदूर इसी किनारे उतर कर सदियों से इस महाद्वीप में समाते चले गए । इसीलिए यहां पर भारतवंशी अच्छी संख्या में सड़कों पर दिखते हैं । कहीं-कहीं पर तो इनकी बस्तियां लघु भारत होने का भ्रम देती हैं। डरबन और भारत का रिश्ता सदियों पुराना रहा है। इसकी खाड़ी में क्रिसमस के समय 1497 मे पहुंचे थे वास्को डि गामा। महान जूलू राजा शाका और हेनरी के समझौते में इसको व्यापार केन्द्र के रूप मे विकसित किया गया और केप के गर्वनर सर बेंजामिन डरबन के नाम पर इस बस्ती का नाम डरबन रखा गया । शुरू में इसको पोर्ट नाटाल नाम दिया गया था। डरबन में 16 नवम्बर 1860 को पहले 342 गिरमिटिया भारतीय उतरे थे फिर 26 नवम्बर, 1860 को गिरमिटिया मजदूरों का दूसरा जत्था इस खाड़ी में उतरा था । 1860 से 1911 तक लगभग 15184 भारतीय गन्ने की खेती के लिए डरबन में लाए गए थे। डरबन में भारतीयों ने व्यापार में  अश्वेतों से सहज रिश्ते बना कर शीघ्र ही श्वेत व्यापारियों के माथे पर बल डाल दिए और यही चलकर आगे भारतीयों के आगमन पर प्रतिबंध का कारण बना । अधिकांश भारतीय चेस्टवर्थ में रहते हैं । भारतीय बच्चों के लिए रोमन कैथोलिक चर्च ने 1867 मे पहला भारतीय स्कूल खोला और 1909 तक 35 भारतीय स्कूल खोले गए थे।

डरबन के समुद्रतट

हिन्द महासागर के किनारे पर बसा यह महानगर अपने शानदार समुद्र तटों पर इतराता रहता है क्योंकि इन समुद्र तटों के किनारे इसके निवासी लगातार खेलते रहते हैं । इस महानगर के किनारे  दूर-दूर तक छोटे-छोटे तटों पर सुन्दर स्नानागारों मे प्रकृति का आनन्द में डूबे निवासियों को देखकर आप विभोर हो उठेंगे। मुख्य नगर के किनारे के समुद्रतटों के अतिरिक्त नगर के बाहरी हिस्सों में स्थित समुद्रतटों के समानान्तर तरणताल भी बने हुए हैं और नगरवासी इच्छानुसार समुद्रतट और तरणतालों का देर रात तक आनन्द लेते रहते हैं।

डरबन के म्यूजियम

डरबन मे डरबन लोकल हिस्ट्री म्यूजियम, ओल्ड हाउस म्यूजियम, ओल्ड कोर्ट हाउस म्यूजियम, पोर्ट नेटाल मेरीटाइम म्यूजियम हमने देखा । इन म्यूजियमों मे दक्षिण अफ्रीका का उपनिवेशकालीन इतिहास दर्ज है। ओल्ड हाउस म्यूजियम नेटाल प्रान्त के प्रथम उपनिवेशकालीन प्रधानमंत्री के घर को यथावत बनाकर रखा गया है। जब हम पहुंचे तो म्यूजियम की मरम्मत शुरू होने के कारण उसको बन्द करके तिरपाल से ढँका जा चुका था ।

म्युजियम की एक झलक

सुदूर भारत से आने और फिर कभी देख पाने का अवसर न मिल पाने की सम्भावना जब हमने दर्शायी तो आयोजकों ने हमें 5 मिनट के लिए अन्दर प्रवेश करके म्यूजियम देखने की अनुमति खुशी-खुशी दे दी गयी। इन म्यूजियमों के माध्यम से आप न केवल दक्षिण अफ्रीका का अतीत जान सकते है वरन इन म्यूजियमों मे जीवन के विकास क्रम को समझाने, मानव जाति के विकास क्रम को भी जान सकते हैं।

फीनिक्स सेटलमेन्ट

डरबन के उत्तर-पश्चिम में महात्मा गांधी द्वारा स्थापित फीनिक्स आश्रम अपने इर्द-गिर्द की जुलू आबादी से घिरा हुआ है। आश्रम को जीपीएस खोज नहीं पा रहा था तो हमने एक जुलू महिला का सहारा लिया और उसने खुशी-खुशी आश्रम तक पहुंचाया और कुछ रैण्ड का मेहनताना लेकर प्रसन्न हो गयीं । एक अश्वेत अपरिचित महिला को इस तरह से गाड़ी मे बैठाने की चर्चा होने पर विनय के सहकर्मियों ने इसे दुस्साहस कहा और भविष्य मे इससे बचने की सलाह दी, इससे पता चलता है कि भारतीयों और अश्वेत समुदाय के बीच अविश्वास की कितनी गहरी खाई है । इस आश्रम की देखभाल बहुत व्यवस्थित तरीके से हो रही है। परिसर मे लगे फलदार वृक्षों पर लदे फलों ने सहयात्री श्रीमती शिवा के बचपने को जाग्रत कर दिया और उस परिसर की देखभाल करने वाले की ईमानदारी का भी एहसास हुआ । जूलू आबादी से घिरा परिसर जिस तरह से सुरक्षित और साफ-सुथरा है, यह उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसे स्थानों पर हमारे जैसे भारतीय ही कभी-कभार आते हैं । इस स्थल पर आने पर हमें टिन की छतों से बने छोटे-छोटे लेकिन साफ-सुथरे मकान और सड़कों के किनारे आपस मे सुख-दुख बांटती महिलाएं दिखीं ।

संतोष कुमार जाने-माने कथाकार हैं

2 Comments
  1. reshma tripathi says

    बेहतरीन जानकारी

  2. […] गिरमिटिया पुरखों के देस में….. […]

Leave A Reply

Your email address will not be published.