सवालों के कटघरे में लालू प्रसाद (डायरी 22 फरवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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सियासत जबरदस्त चीज है। यह करने से आदमी को सत्ता मिलती है और सत्ता मिलने पर आदमी ताकतवर हो जाता है। जब आदमी ताकतवर हो जाता है तब वह अपने मन का कुछ भी कर सकता है। यहां तक कि वह बड़े-बड़े बयान दे सकता है, दावे कर सकता है, अन्य लोगों का मजाक उड़ा सकता है्, आम जनता को परेशान करने के लिए कानून बना सकता है और नहीं माननेवालों को जेल में डाल सकता है, गोली मरवा सकता है। यानी वह सबकुछ कर सकता है। उसके लिए अदालत भी महत्वपूर्ण नहीं। वह चाहे तो अपने उपर मुकदमों को हटवा सकता है और उसके कहे का पालन करने के लिए जज भी मजबूर हो सकते हैं। अदालत को इस बात के लिए भी मजबूर किया जा सकता है कि किस मामले की सुनवाई पहले की जाय और किस मामले की सुनवाई को लटकाकर रखना है।
हालांकि सत्ता पाकर खुद को ताकतवर माननेवाले लोग पहले भी रहे ही होंगे। लेकिन मैं तो वर्तमान की बात करता हूं। एक तो आदित्यनाथ जो कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और दूसरे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। दोनों में गजब की समानता है। हालांकि इसे मैं समानता नहीं मानता कि दोनों के पास जीवनसंगिनी नहीं। नीतीश कुमार गृहस्थ आदमी रहे थे। हालांकि उनकी शादीशुदा जिंदगी सवालों के घेरे में रही। यहां तक कि उनके ऊपर यह आरोप भी लगता रहा है कि जिस ललन सिंह को उन्होंने अपनी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है, वह उनका एक तरह का रिश्तेदार है। यह आरोप बिहार के आमलोग तो लगाते ही हैं, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी एक बार सार्वजनिक सभा में लगाया था। तब ललन सिंह ने राबड़ी देवी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोंका था और बाद में उन्होंने इसे वापस भी ले लिया था। अब यह तो ललन सिंह ही बता सकते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया था? क्या उन्हें राबड़ी देवी द्वारा लगाया गया आरोप स्वीकार है?

अब समझिए न्यायालय, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और उनको कल सुनाई गई सजा को। सब पारदर्शी शीशे की तरह साफ है कि न्यायालय एक संगठन है और वह कोई न्याय का मंदिर नहीं। अयोध्या वाले मामले में तो यह सबने देखा है कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के जज ने सरकार के समक्ष घुटना टेकते हुए पहले तो अजीबोगरीब फैसला सुनाया और बाद में राज्यसभा का सदस्य बना।

 

खैर, मैं योगी आदित्यनाथ और नीतीश कुमार के बीच समानता की बात कर रहा था। दोनों के बीच एक अहम समानता यह है कि दाेनों ने सीएम बनने के बाद अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को वापस लिया। एक योगी आदित्यनाथ ने तो राज्य सरकार के रूप में अपने ऊपर लगाए गए 58 मुकदमे वापस किये, लेकिन नीतीश कुमार ने ऐसा नहीं किया। हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि किसी जज के गर्दन पर उन्होंने तलवार रखी या उसकी गर्दन पकड़ ली और यह आदेश पारित करवा लिया कि पंडारक हत्याकांड में वह अभियुक्त नहीं हैं। मेरे पास ऐसा कहने के लिए सबूत नहीं है। लेकिन सच तो यही है कि पटना हाईकोर्ट ने उन्हें पंडारक हत्याकांड में अभियुक्त माना ही नहीं। यह तब हुआ जब निचली अदालत में मामले की सुनवाई चल रही थी।
आज की पीढ़ी को पंडारक हत्याकांड के बारे में कम जानकारी हाे सकती है। दरअसल यह मामला तब का है जब नीतीश कुमार बाढ़ से चुनाव लड़ रहे थे। तब दो यादवों की हत्या गोली मारकर कर दी गयी थी। इस हत्याकांड में नीतीश कुमार का नाम आया था और उनके खिलाफ मामला भी दर्ज किया गया था। जिन धाराओं के तहत उन्हें अभियुक्त बनाया गया था, वे धाराएं थीं– 147, 148, 149, 302 और 307। अपने ऊपर इस मामले का उल्लेख नीतीश कुमार ने स्वयं अपने शपथ पत्र में दिया है जो उन्होंने चुनाव आयोग को अभी हाल के वर्ष में ही विधान परिषद में खुद को मनोनीत करने हेतु समर्पित किया है। दरअसल, 2004 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद नीतीश कुमार ने कभी चुनाव लड़ने का साहस नहीं दिखाया है। वे विधान परिषद सदस्य के रूप में ही सत्ता के शीर्ष पर आसीन हैं।
खैर, यह तो नीतीश कुमार की अपनी नैतिकता है। मैं तो वह विवरण पढ़ रहा हूं जो उन्होंने चुनाव आयोग को दिया है–
’27 of the Arms Act, Complaint Case No.41(c) of 2009, Arising out of Pandarak P.S. Case No.131 of 1991 Which was lodged on 16.11.91 by one Raja Ram Singh son of Mathura Singh alias Padarth Singh of Village Dhivra, P.S. Pandarak, Dist. Patna. The Police after investigation submitted final report and the same was accepted by A.C.J.M. Barh on 5.8.2008. Thereafter one Ashok Singh who was not a family member of the informant/deceased filed complaint case no. 41(c) of 2009 on 20.1.2009 before A.C.J.M., Barh in which cognizance as aforesaid was taken on 31.8.2009 by the same A.C.J.M., Barh only on the basis of deposition of two witnesses. However order of cognizance dated 31.8.2009 passed in complaint case no. 41(c) of 2009 has been stayed by the Hon’ble High Court vide order dated 8.9.2009 passed in cr.misc.no.33116 of 2009, (Nitish Kumar V/S the State of Bihar & ors.) before the Hon’ble Patna High Court’
अब उनके इस विवरण से ही समझा जा सकता है कि सत्ता पाने के बाद नीतीश कुमार ने न्यायपालिका के साथ कैसा व्यवहार किया है। यहां तो उन्होंने स्वयं ही साफ-साफ लिखा है कि पटना हाईकोर्ट ने कैसे उनके मामले में ‘स्टे’ लगाकर रखा है।
अब बात ‘स्टे’ की ही करते हैं। एक शब्द और है– पेंडिंग। न्यायालयों में ये दो शब्द बेहद महत्वपूर्ण हैं। मसलन, बथानीटोला, बाथे, नगरी आदि नरसंहारों का मामला सुप्रीम कोर्ट में अगस्त, 2012 से लंबित है और सुप्रीम कोर्ट के पास सुनवाई के लिए समय नहीं है। ऐसे ही लालू प्रसाद के मामले में रांची हाईकोर्ट का रवैया है। चारा घोटाला से संबंधित पहले जिन चार मामलों में उन्हें निचली अदालत (सीबीआई की विशेष अदालत) ने सजा सुनायी, उनके खिलाफ वे हाईकोर्ट में अपील कर चुके हैं और कल उनके बेटे तेजस्वी यादव ने कहा कि वे पांचवें मामले में मिली सजा के खिलाफ भी अपील करेंगे

अब सवाल उठता है कि लालू प्रसाद क्या सियासत के कच्चे खिलाड़ी रहे जो इतना भी नहीं समझ सके कि उन्हें किस तरह फांसा जा रहा है। पंडारक मामले में ही मामला दर्ज 1991 में दर्ज हुआ था और बिहार पुलिस ने अपनी रपट 2008 में अदालत को समर्पित किया। करीब सत्रह साल के बाद। मुमकिन है कि नीतीश कुमार को संरक्षण मिला। उन्हें संरक्षण किसने दिया? क्या तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को संरक्षण नहीं दिया?

लेकिन मूल सवाल तो यह है कि जिस हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद द्वारा चार अपीलों पर सुनवाई शुरू ही नहीं की है, वह पांचवें मामलें में कब सुनवाई शुरू करेगी?
दरअसल, लालू प्रसाद का मामला जरा अलग है। कल ही शिवानंद तिवारी के संबंध में नीतीश कुमार ने कहा कि जिस व्यक्ति ने लालू प्रसाद के खिलाफ मुकदमे के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया, वह तो लालू प्रसाद के साथ ही है। इस पर शिवानंद तिवारी ने अपने बयान में कहा है कि उन्हें हस्ताक्षर करने के लिए जार्ज फर्नांडीस जो कि उस समय जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, और अन्य पार्टी नेताओं ने कहा था। उनके मुताबिक, लालू प्रसाद को जब चुनाव में हराने में नीतीश कुमार और भाजपा के नेतागण कामयाब नहीं हो सके तो उन्हें चारा घोटाले में फंसा दिया गया।
अब समझिए न्यायालय, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और उनको कल सुनाई गई सजा को। सब पारदर्शी शीशे की तरह साफ है कि न्यायालय एक संगठन है और वह कोई न्याय का मंदिर नहीं। अयोध्या वाले मामले में तो यह सबने देखा है कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के जज ने सरकार के समक्ष घुटना टेकते हुए पहले तो अजीबोगरीब फैसला सुनाया और बाद में राज्यसभा का सदस्य बना।
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अब सवाल उठता है कि लालू प्रसाद क्या सियासत के कच्चे खिलाड़ी रहे जो इतना भी नहीं समझ सके कि उन्हें किस तरह फांसा जा रहा है। पंडारक मामले में ही मामला दर्ज 1991 में दर्ज हुआ था और बिहार पुलिस ने अपनी रपट 2008 में अदालत को समर्पित किया। करीब सत्रह साल के बाद। मुमकिन है कि नीतीश कुमार को संरक्षण मिला। उन्हें संरक्षण किसने दिया? क्या तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को संरक्षण नहीं दिया?
बहरहाल, अनेक सवाल हैं, जिनका जवाब तो लालू प्रसाद को ही देना होगा। वैसे मैं अपनी बात कहूं तो उनका सबसे बड़ा कसूर यही है कि उन्होंने न्यायालय को अधिक तवज्जो दी।  उन्हें अपने ऊपर लगाए गए आरोपों के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिवाद करना चाहिए था ना कि सीबीआई की विशेष अदालत के सवर्ण जज से अपने लिए रहम की गुहार लगानी चाहिए थी?

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।
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