रफ़ी को सुनते हुए आज भी ज़माना करवटें बदलता है

विद्या भूषण रावत

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आज पार्श्वगायक मोहम्मद रफ़ी की 42वीं पुण्यतिथि है। आज भी हमारे दिलो-दिमाग से रफी गायब नहीं हुए अपितु ऐसा लगता है कि उनके चाहने वालों की संख्या निश्चित तौर पर बढ़ी होगी। 24 दिसंबर, 1924 को पंजाब के सुल्तान सिंह कोटला नामक गाँव के, जो आज के अमृतसर जिले का मजीठा कस्बा है, एक फकीर के साथ चलते और उनका अनुसरण करते और गाते-गाते उन्हें फीको नाम से जाना जाने लगा। 1935 में उनका परिवार लाहौर में शिफ्ट हो गया और वहाँ उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। उन्हें पहली बार स्टेज पर गाने का मौका उस समय मिला जब लाहौर में उस जमाने के मशहूर गायक कुंदन लाल सहगल साहब को गाना था लेकिन उनके आने मे देरी के कारण आयोजकों में से किसी ने 13 वर्षीय रफी को स्टेज पर आकार गाने को कहा। उन्होंने रफ़ी को पहले सुना था। पहले तो लोगों को लगा कि कोई मज़ाक कर रहा है, बाद में जब उन्होंने गाना शुरू किया तो लोगों को लगने लगा कि गायकी का एक सितारा आ गया है। फिर 1941 में उन्होंने लाहौर में एक पंजाबी फिल्म गुल बलोच के लिए पहला गाना रिकार्ड किया। यह फिल्म 1944 में रिलीज हुई।

1944 में वह अपने पिता के साथ मुंबई आ गए और वहाँ के प्रख्यात भिंडी बाजार में रहने लगे। फिर उनकी मुलाकात प्रख्यात निर्माता निर्देशक अब्दुल रशीद कारदार, महबूब खान और नज़ीर से हुई। यहीं पर संगीतकार श्याम सुंदर ने उन्हें अपनी फिल्म गाँव की गोरी के लिए हिन्दी फिल्मों में उनका पहला गाना दिया, जिसके बोल थे- अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी की तैसी । प्रारंभ में अन्य गायकों की तरह रफ़ी पर भी केएल सहगल का प्रभाव दिखाई देता है। फिर उन्होंने अदायगी में भी किस्मत आजमाई। फिल्म लैला मजनू (1945) और जुगनू (1947) में उन्होंने ऐक्टिंग के प्रयास किया जो बहुत नहीं चलीं। अनमोल घड़ी में नूरजहां के साथ उनका गाना यहाँ बदला वफ़ा का बेवफाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा, मोहब्बत में भी धोखा है… लोगों को बहुत पसंद आया। 1947 में पाकिस्तान बनने पर नूरजहां वहाँ चली गईं लेकिन रफ़ी साहब ने भारत में ही रहने का निर्णय लिया। उन्हें फिल्मों में गाने मिलने शुरू हो गए थे।

मोहम्मद रफ़ी कभी मरते नहीं हैं क्योंकि वह लोगों के दिलों में अपने गीतों, मधुर आवाज के ज़रिए जिंदा हैं। गीत केवल चीखना-चिल्लाना नहीं है अपितु उसमें आपका डूबना ज़रूरी है। रफी दिल से गाते थे और इसलिए बातें अंदर तक चली जाती थीं। अभिनेता जीतेंद्र की एक फिल्म जिसे लोग आज याद भी नहीं रखते होंगे, नया रास्ता थी। उसमें साहिर लुधियानवी ने जो क्रांतिकारी बोल लिखे उसे मोहम्मद रफ़ी ने जिस अंदाज में गाया है वह सीधे दिल पर जाता है।

1948 में गांधीजी की हत्या के बाद गीतकार राजेन्द्र कृष्ण और संगीतकर हुस्न लाल भगत राम ने उनसे एक गीत गवाया जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। गीत बापू की अमर कहानी लगभग 12 मिनट लंबा है, वह बहुत लोकप्रिय हुआ। 1944 में वह संगीतकार नौशाद के लिए पहले आप फिल्म में हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है… गा चुके थे। अनमोल घड़ी से नौशाद और रफ़ी के बीच दोस्ती और मजबूत हो गई। जहाँ रफ़ी ने तेरा खिलौना टूटा बालक… गाना गया। 1952 में फिल्म बैजू बावरा में रफ़ी-नौशाद की जोड़ी ने वो कमाल किया जो आज तक भारतीय संगीत के इतिहास में शायद कोई कर नहीं पाएगाफिल्म की कहानी कोई बहुत कमाल की नहीं है और न ही फिल्म की फोटोग्राफी में कोई दम है लेकिन नौशाद के संगीत, शकील बदायूँनी के गीतों और रफ़ी की आवाज ने वह ऊंचाई छू दी जिस तक पहुंचना उस दौर में किसी के लिए भी बहुत मुश्किल था। शकील बदायूँनी ने जो गीत लिखे वे हमारे सिनेमा एवं संस्कृति की सबसे बड़ी धरोहर है और नौशाद के संगीत व रफ़ी की आवाज ने इन गानों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।

सुनिए नौशाद के संगीत निर्देशन में रफ़ी साहब को –

इस फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण गाना है ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले… को जिस ऊंचाई तक रफ़ी ने पहुँचाया वह आज के दौर में भी असंभव है। इसके बाद इस फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण भजन है मन तड़पत हरि दर्शन को आज… में रफ़ी ने अपने शास्त्रीय गायन से साबित कर दिया कि उन्हें संगीत की कितनी गंभीर समझ है। इसी फिल्म में रफ़ी और लता मंगेशकर का एक गाना- तू गंगा की मौज, मैं जमुना का धारा, हो रहेगा मिलन ये हमारा तुम्हारा… आज भी सुना जाता है। नौशाद-शकील बदायुनी-मोहम्मद रफ़ी का एक और अविस्मरणीय गीत है। 1948 में आई फिल्म दुलारी जो शायद ही किसी को याद हो लेकिन उसका गीत हमारे होंठो आज भी गुनगुनाते हैं – सुहानी रात ढल चुकी, न जाने, तुम कब आओगे, यहाँ की रुत बदल चुकी, न जाने तुम कब आओगे…। मुझे लगता है आज भी शाम की तनहाई में ये गीत हमारे दिलों में खूबसूरत रुमानियत भर देते हैं। मदर इंडिया में रफ़ी के दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे… के साथ-साथ मतवाला जिया… बेहद खूबसूरती से गाया गया है। नौशाद-रफ़ी-साहिर और शकील की मंडली  इसलिए भी खूब चली क्योंकि रफ़ी का उर्दू पर अच्छा नियंत्रण था और वे शायरी के भावों को बेहद संज़ीदगी से सुरों का रूप दे देते थे।

फिल्म मेरे महबूब का एक दृश्य

मेरे महबूब फिल्म का मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम, मेरा खोया हुआ रंगीन नज़ारा दे दे… या फिर कोहिनूर फिल्म में लता मंगेशकर के साथ दो सितारों का ज़मीन पर है मिलन, आज की रात… फिल्म दिल दिया दर्द लिया का टाइटल सॉन्ग- दिलरुबा मैंने तेरे प्यार में क्या-क्या न किया, दिल दिया दर्द लिया… या कोई सागर दिल को बहलाता नहीं… तो दिलीप कुमार पर पूरी तरह से फिट होता है। वहीं दिलीप साहब के लिए उन्होंने क्लासिकल गीत भी दिए। संघर्ष फिल्म में मैरे पैरों में घुँघरु बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले… अथवा फिल्म गंगा जमुना का नैन लड़ी जइहें तो मनवा मा कसक होइबे करी… को आज भी भोजपुरी का सबसे महत्वपूर्ण गीत माना जा सकता है। फिल्म राम और श्याम कथानक के तौर पर बिल्कुल साधारण थी लेकिन इस फिल्म में दिलीप साहब पर ये गीत बहुत चला- आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले…। इसके अलावा भी गीतों की फेहरिस्त बहुत बड़ी है इसलिए बहुत महत्वपूर्ण गीत छूट भी जाते हैं और उनके साथ न्याय नहीं हो पाता।

फिल्म मेला के लिए- ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफसोस हम न होंगे… भी अपने समय में बहुत हिट गाना रहा। दिलीप कुमार के समकालीन राज कपूर ने मुकेश को अपनी आवाज कहा और कुछ एक फिल्मों में मन्ना डे ने उन्हें अपनी आवाज दी लेकिन 1949 की फिल्म बरसात में राज कपूर ने मोहम्मद रफ़ी से एक गीत गवाया जो फिल्म में राज कपूरनर्गिस दत्त के बिछोह को दिखाने के लिए बैकग्राउंड के तौर पर दिखाया गया है गीत के बोल थे- मैं ज़िंदगी में हर दम रोता ही रहा हूँ…

देव आनंद, एसडी बर्मन और ओपी नैयर

ऐसा कहा जाता है कि रफ़ी साहब नौशाद के संगीत और दिलीप कुमार की आवाज थे लेकिन हकीकत यह है कि उनके गानों का कोई जवाब नहीं। उस दौर में दिलीप कुमार के समकालीन अभिनेता थे देव आनंद जो नवकेतन बैनर्स के तहत फ़िल्में बना रहे थे। हकीकत यह है कि एसडी बर्मन द्वारा संगीतबद्ध किए गए और शैलेन्द्र द्वारा लिखे गए बहुत से गीत जो देवानंद पर फिल्माए गए हैं उनको उस दौर में ओपी नैयर, शंकर जयकिशन, रौशन और एसडी बर्मन ने भी पहचान लिया और फिर शुरू हुई हिन्दी सिनेमा के एक नायाब गायक की यात्रा, जिसके सुरों के लिए कोई साज मुकाबला नहीं कर सकता था। 1950 का दौर था जब फिल्मों में नायक के तौर पर दिलीप कुमार ट्रेजेडी किंग की भूमिका निभा रहे थे और रफ़ी उनके लिए दर्द भरे नगमे गा रहे थे। अक्सर गीत शकील बदायूँनी के होते थे। दिलीप कुमार के लिए रफ़ी की आवाज बिल्कुल उनके अंदाज से मेल खाती थी।

संगीतकार ओपी नैयर ने मोहम्मद रफ़ी को बीआर चोपड़ा की फिल्म नया दौर में लिया और शायद उस दौर की यह उनकी पहली ऐसी फिल्म होगी जिसका हर एक गीत सुपरहिट हुआ। इस फिल्म से साहिर ने भी अपनी कलम और रोमांस का जलवा बिखेरा। ओपी नैयर की एक और खास बात थी और वो यह कि उन्होंने संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर के एकाधिकार को चुनौती दी। यह दौर ऐसा था कि लता से गाना गवाये बिना कोई यह मान ही नहीं सकता था कि फिल्म हिट होगी भी लेकिन ओपी ने इस मिथक को तोड़ दिया। नया दौर ने ऐसी धूम मचाई कि उसके गीत आज भी उतने ही जवां हैं जितने उस वक्त थे। उड़े जब-जब जुल्फें तेरी…’ और  मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार… दोनों रोमांस की चरम अभिव्यक्ति थे और आज भी विवाह संगीत में सर्वाधिक चलते हैं, लेकिन इस फिल्म में जिस गीत ने साहिर के समाजवाद को रोमांस से जोड़ा वह था- साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना…। यह गीत आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उस समय था।

मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्या डरना/कल गैरों के खातिर की अब अपनी खातिर करना,/अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक,/अपनी मंजिल सच की मंजिल, अपना रास्ता नेक/ साथी हाथ बढ़ाना

 

Did You Know? Mohammed Rafi has sung more duets with Asha Bhosle than any other playback singer | IWMBuzz

इस गीत को जिस अंदाज में रफ़ी ने गाया है कि उसकी उम्मीद किसी दूसरे से नहीं की जा सकती। हालांकि आशा भोंसले ने भी इस गीत में बखूबी अपनी खूबसूरत आवाज से उनका साथ दिया है।

इसी फिल्म का गीत – ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का… अभी भी हमारे देश की शादियों में सबसे ज्यादा बजाया जाता है और आश्चर्यजनक रूप से देशभक्ति के इस गीत पर लोग ज्यादा मजे में डांस करते हैं। ओपी नैयर का रफ़ी-आशा समीकरण कश्मीर की कली में खूब फबा। शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर के रोमांस ने उसे युवाओं में बेहद लोकप्रिय कर दिया। दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छाई, ये देख के दिल झूमा, ली प्यार ने अंगड़ाई… ने पूरे रोमांस की परिभाषा को बदल दिया। लेकिन इस फिल्म में भी जिस गीत ने शम्मी कपूर की याहू छवि को और मजबूत कर दिया वो था  ये चाँद-सा रौशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनहरा, तारीफ करूँ क्या उसकी जिसने तुझे बनाया…।

संगीतकार शंकर जय किशन ने मोहम्मद रफ़ी को आरके से बाहर की फिल्मों में गवाया। कपूर भाइयों में ही शम्मी कपूर के लिए रफ़ी ने वो गीत गाए जो जनता में दिलीप साहब के लिए गाए गीतों से बहुत आगे निकल गए। 1961 में आई फिल्म जंगली में शैलेन्द्र के लिखे याहू… चाहे कोई मुझे जंगली कहे… ने देश भर में रफ़ी की आवाज को नए युवाओं तक पहुंचा दिया। इसी फिल्म में एहसान तेरा होगा मुझ पर, दिल कहता है तो कहने दो, मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है, मुझे पलकों की छाँव में रहने दो… या मेरे यार शब्बा खैर… बहुत लोकप्रिय हुआ। शम्मी कपूर के लिए तुमसा नहीं देखा में यूँ तो हमने लाख हसीं देखे हैं, तुमसा नहीं देखा…, चाइना टाउन में बार-बार देखो हजार बार देखो, ये देखने की चीज है हमारे दिलरुबा… फिल्म प्रिंस में शंकर जय किशन के साथ बदन पे सितारे लपेटे हुए, ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो… फिल्म ब्रह्मचारी में आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर, सबको मालूम है और सबको खबर हो गई…, दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर, यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर, रखूँगा मैं दिल के पास, मत हो मेरी जाँ उदास… आदि अलग-अलग शेड के गाने गाकर रफ़ी ने आवाज की दुनिया में अपना दबदबा बना लिया था

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दिलीप कुमार के मॉडल पर चलने वाले हरएक कलाकार के लिए रफ़ी की आवाज होना ज़रूरी था। उसी दौर में राजेन्द्र कुमार, जिन्हें जुबली कुमार भी कहा जाता था, के लिए रफ़ी ने अत्यंत ही कर्णप्रिय गाने गाए। फिल्म सूरज में बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है, मेरा महबूब आया है… फिल्म आरजू में ए फूलों की रानी, बहारों की मलिका, तेरा मुसकुराना गजब हो गया… फिल्म आई मिलन की बेला में ओ सनम तेरे हो गए हम, प्यार में तेरे खो गए हम, जिंदगी को मेरे सनम मिल गया बहानामेरे महबूब में मेरे महबूब तुझे, मेरी मोहब्बत की कसम, मेरा खोया हुआ रंगी नज़ारा दे दे… या याद में तेरी जाग-जाग के हम रात भर करवटें बदलते रहते हैं… हो या फिल्म तलाश में लता मंगेशकर के साथ पलकों के पीछे से क्या तुमने कह डाला… अभी भी उस दौर के रोमांस को जिंदा रखते हैं। साथ ही दशक के इस दौर में शम्मी कपूर की स्टाइल में जॉय मुखर्जी और विश्वजीत दोनों ही खूब चले। साथ ही इन दोनों की ही फिल्मों में ओपी नैयर, रफ़ी, आशा भोंसले के गीत भी बहुत पॉपुलर हुए।

फिल्म मेरे सनम के लिए पुकारता चला हूं मैं, गली-गली बहार की, बस एक छाँव ज़ुल्फ़ की, बस इक निगाह प्यार की.. में रफी की आवाज का जादू दिखता है। वैसे ही जॉय मुखर्जी के लिए बंदा परवर, थाम लो जिगर, बन के प्यार मैं आया हूँ, खिदमत में आपके हुज़ूर, बस यही दिल लाया हूँ… या लाखों हैं निगाह में, जिंदगी की राह में, सनम हसीन जवान… या हमदम मेरे मान भी जाओ कहना मेरे प्यार का… आदि गाने अभी भी युवाओं के दिलों की धड़कन हैं। इसी दौर में धर्मेन्द्र, जीतेंद्र और राजेश खन्ना के लिए भी रफ़ी ने गीत गाए पर इसमें कोई शक नहीं कि 1970 का दौर किशोर कुमार का था और लोगों के मूल्य भी बदल रहे थे  और रोमांस का तरीका भी बदल गया था। उस पर एक चर्चा अलग से होगी।

गुरु दत्त और जॉनी वॉकर

मोहम्मद रफ़ी ने अपने दौर के हर एक अभिनेता के लिए गाया और सबने उनका लोहा माना। लेकिन 50 के दशक के दो लोगों पर हम विशेष चर्चा करेंगे जिनके लिए रफ़ी ने ऐसे इमॉर्टल (लोकप्रिय) गीत गा दिए कि आज भी वे मील का पत्थर हैं। पहली चर्चा हम करेंगे महान निर्माता निर्देशक अभिनेता गुरु दत्त की, जिनके लिए रफ़ी के गाने आज भी हमारे दिलों पर राज करते हैं। गुरुदत्त, ओपी नैयर, मोहम्मद रफी और गीता दत्त का कॉम्बिनेशन बहुत सशक्त था। 1954 में आई फिल्म आर-पार में देवानंद हीरो थे और फिल्म का गीत लेके पहला-पहला प्यार,  भरके आँखों में खुमार, जादू नगरी से आया है कोई जादूगर… आज भी सिनेमा के सबसे खूबसूरत गीतों में से एक है। इस जोड़ी ने एक से बढ़कर एक चुलबुले-गुदगुदे नगमे हमें दिए। मजरूह के लिखे सुन-सुन-सुन ए ज़ालिमा, प्यार हमको तुमसे हो गया, दिल से मिला ले दिल मेरा, तुझको मेरे प्यार की कसम… हो या मोहब्बत कर लो जी भरलो अजी किसने रोका है, पर बड़े गजब की बात है इसमें भी धोखा है… या आँखों ही आँखों में इशारा हो गया, बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया…। गुरुदत्त की अलग-अलग फिल्मों में रफी ने अपनी बेहतरीन संगीत प्रतिभा दिखाई और न केवल मुख्य नायक के लिए गीत गाए अपितु हास्य अभिनेता जॉनी वॉकर के लिए भी बेहद अविस्मरणीय गीत दिए। मिस्टर एण्ड मिसेस 55 में उधर तुम हसीं हो, इधर दिल जवान है ये रंगीन रातों की एक दास्ताँ है… या जाने कहा मेरा जिगर गया जी, अभी-अभी यहीं था किधर गया जी…, सर जो तेरा चकराये, या दिल डूबा जाए, आजा प्यारे पास हमारे काहे घबराए, काहे घबराए…।

सुने यह गाना…(फिल्म दोस्ती से )

गुरुदत्त की फिल्म प्यासा में हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा दें तो… तो स्वयं गुरु दत्त पर फिल्माया गया था लेकिन इस फिल्म के जिस गीत ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया वह था- ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया, ये इंसां के झूठे रिवाजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…। और जिस तरीके से रफी इस गीत का अंत करते हैं और जब उनका स्वर आसमान छूता है वह किसी भी अन्य गायक के लिए अकल्पनीय है, क्योंकि रफ़ी साहब की रेंज के आगे सब फेल हैं लेकिन हकीकत यह है कि ये केवल रेंज ही नहीं अपितु उर्दू के अल्फ़ाज़ को वे जिस नज़ाकत और नफ़ासत से गाते थे वह किसी के बस का नहीं है। वह दिखाता है कि उनकी भाषा पर कितनी मज़बूत पकड़ थी। फिल्म चौदहवीं का चांद का शीर्षक गीत इसका प्रतीक है, चौदहवीं का चांद हो, या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम, लाजवाब हो…।

गुरुदत्त के अलावा एक और महान कलाकार के लिए रफ़ी साहब ने ऐसा कमाल गाया कि आज भी वो हमारी ज़िंदगी में मिठास और रोमांस जगाते रहते हैं। ये हैं हमेशा नौजवान रहने वाले हीरो देवानंद जिनके नवकेतन बैनर्स के तहत एसडी बर्मन के संगीत में रफ़ी ने कभी न भुलाने वाले गाने हमें दिए। 1963 में आई फिल्म तेरे घर के सामने में देवानंद के लिए दिल का भंवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो, प्यार का राग सुनो रे… हो या देखो रूठा ना करो, बात नज़रों की सुनो… अथवा तेरे घर के सामने, एक घर बनाऊँगा… में उनकी आवाज का जादू बेमिसाल है। नवकेतन की 1960 की फिल्म काला बाजार में खोया-खोया चाँद, खुला आसमान… या अपनी तो हर आह एक तूफान है… ने उस दौर में बहुत प्रसिद्धि पाई। 1958 में देवानंद, मधुबाला अभिनीत काला पानी का अच्छा जी मैं हारी पिया मान जाओ ना, देखी तेरी यारी मेरा दिल जलाओ ना… में रफ़ी-आशा ने देवानंद-मधुबाला का चुलबुलाबन दिखाया है। फिल्म में देवानंद पर फिल्माया गीत हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गए, सागर में जिंदगी को उतारे चले गए… को फिल्म में देखकर रफी की आवाज की रूह महसूस की जा सकती है।

सुनिए फिल्म बैजू बावरा का गाना

1965 में नवकेतन बैनर्स की गाइड में देवानंद ने एसडी बर्मन के संगीत के लिए गीत लिखने की जिम्मेदारी शैलेन्द्र को दी और दोनों ने ही उस क्रांतिकारी फिल्म के लिए वह संगीत और गीत दिए जो आज भी मील का पत्थर है। दिन ढल जाए हाये, रात न जाए, तू तो ना आए, तेरी याद सताए… देवानंद-वहीदा रहमान पर फिल्माया गया एक बेहद खूबसूरत गीत है क्योंकि यह फिल्म अपने दौर से बहुत आगे की थी, इसलिए इसमें गीतों का अर्थपूर्ण होना और उनमें जीवन दर्शन सबसे महत्वपूर्ण था। हालांकि इस फिल्म के दो सबसे हिट गीत, लता मंगेशकर का आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है… और लता-किशोर कुमार द्वारा गाया गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंजिल, कहीं बीते ना ये राते, कहीं बीते ना ये दिन…  भी बहुत लोकप्रिय और कर्णप्रिय थे लेकिन अर्थपूर्ण गीतों में देव-वहीदा पर फिल्माया गया- तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं,  जहाँ भी ले जाए राहें हम संग हैं…। इस गीत के बोल इतने सशक्त हैं कि वह शैलेन्द्र की महान लेखनी की ओर भी इंगित करते हैं —  तेरे दुख अब मेरे, मेरे सुख अब तेरे, तेरे ये दो नैना, चाँद और सूरज मेरे, ओ मेरे जीवन साथी, तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं, जहाँ भी ले जाए राहें हम संग हैं…। देवानंद के दीवानेपन को रफ़ी ने जिस तरीके से गाया वह यह साबित करता है कि किस तरीके से उन्होंने दिलीप कुमार और देवानंद दो बिल्कुल अलग-अलग किस्म के अदाकारों के लिए उनके व्यक्तित्व के अनुसार गीत दे दिए। गाइड में क्या से क्या हो गया, बेवफा तेरे प्यार में… देवानंद के उन्मुक्त दीवानगी को दिखाता है।

रफी ने अपने दौर के हर अभिनेता के लिए गाया। उनकी आवाज में दर्द था, दीवानगी थी, मस्ती थी, चुलबुलापन था और मोहब्बत की खुशबू भी लेकिन यह वह दौर था जब सिनेमा में साहित्य और कला के चाहने वाले थे। निर्माता-निर्देशक गीत-संगीत पर बहुत जोर देते थे और ऐसे ही दौर में कला परिपक्व हुई और हमें ऐसे गीत मिले जो आज भी हमारे दिलों को सुकून देते हैं। रफ़ी के लिए स्वर्णिम दौर सन साठ का दशक था, हालांकि 1970 के अंत तक भी वह बहुत कर्णप्रिय और भावप्रिय गीत गाते रहे और जीतेंद्र जैसे अभिनेता के लिए उन्होंने कुछ बेहतरीन गीत दिए। 1975 मे फिल्म हँसते जख्म के लिए कैफ़ी आजमी के गीत — तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है, कि जहाँ मिल गया है, एक भटके हुए राही को कारवां मिल गया है…  हो या उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की सरहद पे निगेहबान हैं आंखें…। रफ़ी साहब के गीतों के फेहरिस्त बहुत बड़ी है और हम उनके साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। मैंने तो वह लिखा जितना मुझे पता है और जो गीत मुझे और मेरे दिल को छू गए।

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खबरें केवल खबरें नहीं होतीं (डायरी, 1 अगस्त, 2022) 

मोहम्मद रफ़ी कभी मरते नहीं हैं क्योंकि वह लोगों के दिलों में अपने गीतों, मधुर आवाज के ज़रिए जिंदा हैं। गीत केवल चीखना-चिल्लाना नहीं है अपितु उसमें आपका डूबना ज़रूरी है। रफी दिल से गाते थे और इसलिए बातें अंदर तक चली जाती थीं। अभिनेता जीतेंद्र की एक फिल्म जिसे लोग आज याद भी नहीं रखते होंगे, नया रास्ता थी। उसमें साहिर लुधियानवी ने जो क्रांतिकारी बोल लिखे उसे मोहम्मद रफ़ी ने जिस अंदाज में गाया है वह सीधे दिल पर जाता है। रफ़ी साहब और साहिर की जोड़ी ने यह कमाल हमेशा दिखाया। एक शायर और शब्दों के बिना गीत कुछ नहीं है और गीतों में रूह नहीं तो वे कहीं के नहीं रहते। रफ़ी साहब को उनकी पुण्यतिथि पर मैं उनके गाए इस गीत के बोलों को यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ जो आज के दौर में हम सबके लिए बहुत ज़रूरी है। साहिर ने पूरी दुनिया को जो संदेश दिया उसे जिस अंदाज में मोहम्मद रफी ने गाया उसे बस सलाम ही किया जा सकता है।  भारत रत्न मोहम्मद रफ़ी को हमारा सलाम…!

पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से,/मुस्कुराओ तो कोई बात बने,/सिर झुकाने से कुछ नहीं होता,/ सिर उठाओ तो कोई बात बने।।

जिंदगी भीख में नहीं मिलती,/जिंदगी बढ़के छीनी जाती है,/अपना हक संगदिल जमाने से/ छीन पाओ तो कोई बात बने,

रंग और नस्ल, ज़ात और मजहब/जो भी हो आदमी से कमतर है,/इस हकीकत को तुम भी मेरी तरह,/मान जाओ तो कोई बात बने,

नफ़रतों के जहां में हमको/प्यार की बस्तियां बसानी है/दूर रहना कोई कमाल नहीं,/पास आओ तो कोई बात बने

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे फिल्मों के भी गंभीर रसिक और अध्येता हैं। 

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