खबरें केवल खबरें नहीं होतीं (डायरी, 1 अगस्त, 2022) 

नवल किशोर कुमार

2 230

खबरों की दुनिया अलग ही होती है। मतलब यह कि हर खबर के पीछे एक कहानी होती है। ऐसी कोई खबर नहीं होती है, जिसके पीछे कोई कहानी ना हो। फिर चाहे कोई भी खबर हो। यह बात अखबारों के पहने पन्ने की खबरों से लेकर अंदर की खबरों के लिए भी सही है। दरअसल, खबरें भी दो तरह की होती हैं। एक तो वह जो वाकई में खबर होती हैं। मतलब यह कि कोई घटना हो और उससे जुड़ी खबर स्वाभाविक खबर मानी जाती है। हालांकि ऐसी खबरों में भी मैनिपुलेशन होता ही है। लेकिन इस तरह की खबरों में इतना जरूर होता है कि कोई घटना होती है। लेकिन दूसरी तरह की खबरें वे हैं जिन्हें खबर बनाया जाता है। घटना इन खबरों के मामले में भी महत्वपूर्ण है, लेकिन ये घटनाएं तैयार की जाती हैं।

बतौर उदाहरण आज मेरे पास दो खबरें हैं। एक खबर के केंद्र में एक सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गयी सूचना है। यह सूचना बहुत अधिक विशेष तो नहीं है लेकिन महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए। बहुत अधिक विशेष नहीं कहने का मतलब यह कि जिस देश में लोग रोजाना अनेकानेक टन पका हुआ अनाज डस्टबिन में डाल देते हैं, उनके लिए इस जानकारी का कोई मतलब नहीं है कि पिछले वित्तीय वर्ष 2021-22 के दौरान 1693 टन अनाज भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में बर्बाद हो गए। यह जानकारी मांगी नीमच, मध्य प्रदेश के आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने। उन्होंने भारत सरकार से यह जानकारी मांगी थी कि पिछले वित्तीय वर्ष में कितना अनाज सरकारी गोदामों में नष्ट हो गया। मांगी गयी सूचना के जवाब में सरकार ने जो जानकारी दी है उसमें 1693 टन अनाज के बर्बाद होने की सूचना के साथ ही यह सूचना भी दी गयी है कि अनाजों के नष्ट होने में चूहों की कोई भूमिका नहीं है। मतलब यह कि चूहों या फिर किसी अन्य जानवर ने अनाज बर्बाद नहीं किये।

हर खबर के पीछे एक मंशा होती है। कई बार खबर को जन्म देनेवाले लोगों की मंशा महत्वपूर्ण होती है तो कई बार खबर लिखनेवाले की मंशा महत्वपूर्ण। ठीक ऐसे ही डायरी लिखने के पीछे मेरी भी मंशा है।

मामला यही है कि आखिर भारत सरकार ने चूहों को जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया? क्या सरकार ने चूहों पर नियंत्रण के लिए कोई खास रणनीति तैयार की थी? दरअसल, हर साल सरकार अनाज की बर्बादी के लिए चूहों को भी जिम्मेदार बताती रही है। यह पहला मौका है जब सरकार ने चूहों की जान को बख्श दिया है।

तो यह है वह खबर, जिसके पीछे की कहानी में एक आरटीआई कार्यकर्ता की उत्कंठा है और जिसने देश हित में यह सवाल पूछा।

अब दूसरे तरह की खबर देखें। हाल ही में लोकसभा में तीन सांसदों ने लगभग एक ही तरह के सवाल भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से पूछे। मजे की बात यह कि इनमें एक किरण खेर भी हैं, जो भाजपा की सांसद हैं। अन्य दो सांसद मोहन भाई कुंदरिया और संजय सेठ भी भाजपा के ही सांसद हैं। अब यह किसी को भी आश्चर्य लग सकता है कि तीन भाजपा सांसदों ने एक ही तरह के सवाल अपनी ही सरकार से क्यों पूछे। वैसे यह कोई पहली घटना नहीं है। लेकिन इस तरह के सवाल कृत्रिम सवाल होते हैं, जिनका मकसद सरकार से सवाल करना नहीं, बल्कि सरकार को एक मौका प्रदान करता होता है ताकि एक खबर बन सके। खबर बन सके यानी सरकार अपना चेहरा चमका सके।

यह भी पढ़ें….

छोटे किसान क्यों लगातार बनते जा रहे हैं मजदूर

दरअसल, किरण खेर, मोहन भाई कुंदरिया और संजय सेठ ने विदेश मंत्रालय से पूछा था कि पिछले तीन सालों में कितने नये पासपोर्ट बनाये गये, कितने लोग विदेश गये और यह भी कि सरकार ने पासपोर्ट में दर्ज सूचनाओं की गोपनीयता बनाए रखने की दिशा में किस तरह की कार्य योजना का निर्धारण किया है।

जाहिर तौर पर जब संसद का सत्र चलता है तो प्रत्येक सदस्य को प्रश्न पूछने का अधिकार होता ही है। फिर चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का। कई बार तो मैंने बिहार विधानसभा के अंदर सत्ता पक्ष के सदस्यों को अपनी ही सरकार से जनपक्षीय सवाल पूछते देखा है। यहां तक कि सरकारों के जवाब के दौरान उनके पूरक प्रश्न भी बड़े नुकीले होते थे। लोकसभा में भी हुकुमदेव नारायण यादव एक उदाहरण हैं। इन्होंने भी संसद में अपनी ही सरकार से कई सारे जन-सरोकार वाले सवाल पूछे।

यह भी पढ़ें…

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का चिंतन और नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा की पहल

खैर, भाजपा के सांसदगणों किरण खेर, मोहन भाई कुंदरिया और संजय सेठ के सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय द्वारा लिखित जानकारी दी गयी कि बीते तीन सालों में 2 करोड़ 92 लाख नये पसपोर्ट बनाए गए तथा पांच करोड़ से अधिक लोग विदेश गये। साथ ही यह भी जवाब दिया गया कि सरकार अब ई-पासपोर्ट जारी करने पर विचार कर रही है जो कि एक कार्ड के रूप में होगा और उसमें एक मेमोरी चिप के जरिए पासपोर्ट धारक की तमाम जानकारियां संगृहीत होंगी।

तो मामला यही है कि खबरें केवल खबरें नहीं होतीं। हर खबर के पीछे एक मंशा होती है। कई बार खबर को जन्म देनेवाले लोगों की मंशा महत्वपूर्ण होती है तो कई बार खबर लिखनेवाले की मंशा महत्वपूर्ण। ठीक ऐसे ही डायरी लिखने के पीछे मेरी भी मंशा है। एक तो यही कि रोज-ब-रोज के अनुभवों को दर्ज कर सकूं और दूसरा यह कि समाज और देश की स्थिति के संबंध में अपने विचारों को अभिव्यक्त कर सकूं।

अगोरा प्रकाशन की किताबें kindle पर भी…

अनुभवों से एक बात याद आयी। पिछले एक सप्ताह से कान में दर्द है। बाजदफा यह दर्द बहुत बढ़ जाता है। कल रात में भी इस दर्द ने पढ़ने से रोक दिया और बिना पढ़े ही सो गया। यह दुखद है मेरे लिए।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

2 Comments
  1. […] खबरें केवल खबरें नहीं होतीं (डायरी, 1 अग… […]

  2. […] खबरें केवल खबरें नहीं होतीं (डायरी, 1 अग… […]

Leave A Reply

Your email address will not be published.