साहित्य समालोचना का अविचारित पक्ष (डायरी 27 जुलाई, 2022)

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समालोचनाएं किसी भी भाषा के साहित्य को समृद्ध करती हैं। इसके दो फायदे हैं। एक फायदा तो रचनाकार को मिलता है। वह यह समझने की कोशिश करता है कि उससे कहां चूक हुई और किन-किन बातों पर उसे और मंथन करना चाहिए। दूसरा फायदा पाठकों को होता है। वह किसी भी साहित्यिक रचना के उन पक्षों को देख-समझ पाते हैं, जो उनके सामने होकर भी अदृश्य सा रहता है। लेकिन समालोचनाओं के अपने मानदंड होते हैं। सीधे शब्दों में कहिए तो विचारधारा के स्तर पर मानदंड तय किये जाते हैं। हिंदी साहित्य तो अलहदा उदाहरण है। यहां विचारधारा के नाम पर जातिवाद है और जातिवाद को छिपाने के लिए मार्क्सवाद, प्रगतिशीलतावाद। दलित आलोचना भी अब समानांतर अवस्था को प्राप्त कर चुका है, लेकिन यह भी जन्मना दलित के आधार पर ही है। मतलब यह कि दलित साहित्यिकार यह मानते हैं कि दलित साहित्य वही लिख सकता है जो जन्म से दलित हो। शुक्र है कि स्त्रीवाद के संदर्भ में अभी तक किसी ने यह बात नहीं कही है कि स्त्री विमर्श पर बात करने के लिए स्त्री होना आवश्यक है।
खैर, हिंदी आलोचना का एक पक्ष और भी है, जिसे हम चाहें तो ओबीसी आलोचना कह सकते हैं। इस पक्ष की अपनी मजबूरियां हैं। पहली मजबूरी तो यही है कि कोई इसे आज भी खुले मन से स्वीकार ही नहीं कर रहा। यहां तक कि जो ओबीसी रचनाकार और समालोचक हैं, वे भी खुद को ओबीसी शब्द के साथ नहीं जोड़ना चाहते। लेकिन आप आलोचना के अन्य पक्षों को देखें तो ऐसा नहीं पाएंगे। नामवर सिंह की आलोचना का आधार जातिवाद था और वे खुले मन से मार्क्सवादी आलोचक कहलाने में गर्व महसूस करते थे। दूसरी ओर राजेंद्र यादव रहे, जिनके लिए “सब धान बाइस पसेरी” का मुहावरा शतप्रतिशत चरितार्थ होता है, हिंदी साहित्य के ओबीसी पक्ष को आजीवन खुद से दूर करते रहे। ठीक वैसे ही जैसे कोई किसान अपने फसल को पंछियों से बचाने के लिए मचान पर खड़े होकर आवाज लगाता रहता है।

ओबीसी सिर्फ इसी बात से खुश हो जाता है कि ब्राह्मण महोदय ने उन्हें अपने सामने जमीन पर ही सही, बैठने तो दिया। फिर उसके द्वारा उपजाए गए अनाज को ग्रहण तो किया। गोया ब्राह्मणों का पेट भर जाने से ओबीसी की तमाम पीढ़ियां सीधे स्वर्ग में चली जाएंगीं। दलितों को इस बात का मलाल है कि ब्राह्मण उनके साथ वही व्यवहार क्यों नहीं करते, जो वे ओबीसी के साथ करते हैं।

 

दरअसल, ओबीसी साहित्य समालोचना का मुख्य आधार क्या हो, अभी यह तय नहीं हो पाया है। आंबेडकरवाद एक आधार अवश्य है, लेकिन केवल आंबेडकरवाद से बात बनेगी नहीं। क्योंकि आंबेडकरवाद के खांचे में 52 फीसदी आबादी वाला ओबीसी समुदाय फिट नहीं बैठता। यह इसलिए भी नहीं क्योंकि ओबीसी का सामाजिक व्यवहार दलितों के सामाजिक व्यवहार से अलग रहा है। अनेक दलित आलोचकों ने दलित शब्द की परिभाषा खुद तय कर रखी है कि जो अछूत है, वही दलित है। लेकिन ओबीसी अछूत नहीं रहा है। मजे की बात यह है कि यहां ब्राह्मणवर्ग की हेजेमॉनी सिर चढ़कर बोलता है। ओबीसी खुद को सछूत इसलिए मानते हैं, क्योंकि ब्राह्मण उनसे छुआछूत नहीं करता। फिर भले ही वह उन्हें अपने सामने खटिया पर बैठने की अनुमति नहीं दे। ओबीसी सिर्फ इसी बात से खुश हो जाता है कि ब्राह्मण महोदय ने उन्हें अपने सामने जमीन पर ही सही, बैठने तो दिया। फिर उसके द्वारा उपजाए गए अनाज को ग्रहण तो किया। गोया ब्राह्मणों का पेट भर जाने से ओबीसी की तमाम पीढ़ियां सीधे स्वर्ग में चली जाएंगीं। दलितों को इस बात का मलाल है कि ब्राह्मण उनके साथ वही व्यवहार क्यों नहीं करते, जो वे ओबीसी के साथ करते हैं।
साहित्य में ये सारी बातें खुलकर सामने आती हैं। मैं तो डॉ. कुमार विमल की बात कर रहा हूं जो हिंदी साहित्य समालोचना के क्षेत्र में एक नया आयाम लेकर आए। यह आयाम था– सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना। उनकी दृष्टि मार्क्सवादी दृष्टि से अधिक विस्तृत थी, क्योंकि वह पेरियारवादी दृष्टि भी रखते थे और आंबेडकरवादी दृष्टि भी। वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर आलोचना नहीं किया करते थे। एक उदाहरण उनके द्वारा रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं की समालोचनाएं हैं, जिनमें वह वैरिएबुल्स के रूप में पेरियारवाद और आंबेडकरवाद भी रखते हैं।

मसलन, उर्वशी के संदर्भ में वह दिनकर की उस दृष्टि के बारे में बताते हैं, जो सामान्य तौर पर गौण रहा है। यह संदर्भ है अप्सरा धर्म और मानवी-धर्म का निरूपण। डॉ. विमल लिखते हैं– ‘दिनकर समय और समाज के प्रति जागरूक कवि हैं। अत: कला की साधना में अर्पित इनका प्रत्येक पुष्प सोद्देश्य और निश्चित-निर्मित है। फलस्वरूप ‘उर्वशी’ चिंतन मानवता के शाश्वत मूल्यों को अधुनतन दृष्टि से उपस्थित करनेवाली एक उल्लेखनीय काव्य-कृति होने के साथ ही समसामयिक समाज का मंगल-विधान चाहनेवाली प्रासंगिक सोद्देश्यता भी रखती है।’

मैं तो डॉ. कुमार विमल की बात कर रहा हूं जो हिंदी साहित्य समालोचना के क्षेत्र में एक नया आयाम लेकर आए। यह आयाम था– सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना। उनकी दृष्टि मार्क्सवादी दृष्टि से अधिक विस्तृत थी, क्योंकि वह पेरियारवादी दृष्टि भी रखते थे और आंबेडकरवादी दृष्टि भी। वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर आलोचना नहीं किया करते थे। एक उदाहरण उनके द्वारा रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं की समालोचनाएं हैं, जिनमें वह वैरिएबुल्स के रूप में पेरियारवाद और आंबेडकरवाद भी रखते हैं।

डाॅ. विमल ने पेरियारवादी नजरिए से दिनकर की काव्य-कृति ‘उर्वशी’ का विश्लेषण किया है। हालांकि वह भी इस रोग से ग्रसित रहे कि कोई उन्हें गैर-मार्क्सवादी समालोचक ना कहे। खैर, यह तो ऐसी व्याधि है जो ओबीसी साहित्यकारों को दूर करने में समय लगेगा। मैं तो अप्सरा धर्म और मानवी-धर्म के बीच उनके द्वारा किये गये न्ययपूर्ण विश्लेषण के बारे में सोच रहा हूं। एक जगह डॉ. विमल स्त्रियों के सापेक्ष संतति-निरोध और संतति नियोजन का उल्लेख करते हैं। वे दिनकर की एक पंक्ति को उद्धृत करते हैं–
फला न कोई शस्य, प्रकृति से जो भी अमृत मिला था
लहर मारता रहा टहनियों में, सूनी डालों में।
किंतु, प्राप्त कर तुझे आज, बस, यही भान होता है,
शस्य-भार से मेरी सब डालियां झुकी जाती हों। (ऊर्वशी, दिनकर, पृष्ठ 154)
डॉ. विमल दिनकर की पंक्तियों के जरिए जिस ओर ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं, वह मानवी धर्म है, जो स्त्रियों के प्रति न्यायपूर्ण दृष्टकोण की अपेक्षा रखता है। वह स्त्रियों को अप्सरा बनने से बचने की बात कर रहे हैं। वे बदल रहे समय के सापेक्ष यह टिप्पणी भी करते हैं– ‘अब ‘प्रणय की चिरकिशोरी’ आधुनिकताओं के बीच ऐसी माताएं कितनी रहीं, जिनकी चोली अपनी संतान को देखकर प्रेम के आवेश में टपके हुए दूध से भींग जाय!’
वह दिनकर की दृष्टि को और विश्लेषित करते हैं। वह ऊर्वशी द्वारा गर्भ-धारण की बात सुनकर रंभा की सह-जन्या प्रतिक्रिया को उद्धृत करते हैं–
गर्भ-भार ऊर्वशी मानवी के समान ढोएगी?
यह शोभा, यह गठन देह की, यह प्रकांति खोएगी? (वही, पृष्ठ 17)
और
यौवन को कर भस्म बनेंगी माता अप्सरियां भी,
पुत्रवती होंगी, शिशु को गोदी में हलरायेंगी,
मदिर तान को छोड़ सांझ से ही लोरी गायेंगी,
पहनेंगी कंचुकी क्षीर से क्षण-क्षण गीली-गीली,
नेह लगाएंगी मनुष्य से, देह करेंगी ढीली। (वही, पृष्ठ 19)
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दरअसल, डॉ. विमल पेरियार की नजर से दिनकर की रचनाओं को देख रहे हैं, जो स्त्रियों को पुरुषों का गुलाम नहीं मानते थे। पेरियार परिवार नियोजन के समर्थक थे और परिवार नियोजन के विभिन्न उपक्रमाें को आवश्यक मानते थे। लेकिन वे चाहते थे कि स्त्रियां किसी भी रूप में पुरुषों की दासी बनकर न रहें। मतलब यह कि न केवल वह संतान पर संतान जनती रहें और ना ही वह केवल ‘सेक्स टॉय’ बनें। इसलिए डॉ. विमल अप्सरा धर्म और मानवी-धर्म के जरिए जीवन में समता की बात करते हैं। वह चाहते हैं कि महिलाएं केवल गहनों से लदी-थकी संपत्तिविहीन न रहें, वह मानव हों और मानव होने के अपने सारे अधिकार हासिल करें। अब यह बात मार्क्सवादी आलोचना और दलित आलोचना में कहां?
बहरहाल, ओबीसी समालोचना के विभिन्न आयामों पर बात करने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता इसलिए नहीं कि इसके जरिए किसी को अलगाया जाय, बल्कि इसलिए कि 52 फीसदी की एक बड़ी आबादी के सामाजिक, सांस्कृतिक पक्षों पर खुलकर बात हो। सवाल हों और सभी के सामने हों। सब मिलजुलकर विचार भी करें। तभी यह भेद खुलेगा कि अछूत और सछूत कहकर ब्राह्मण वर्गों ने किसका हित और किसका नुकसान किया है।
कल एक कविता सूझी–
डूब जाने दो सूरज,
हो जाने दो अंधेरा,
तुम रहो रू-ब-रू,
कुछ कहती रहो तुम,
मैं भी सुनता रहूं तुम्हें
तुम हंसो जब तुम चाहो,
और जब चाहो रो लो
तुम जब कहो रचूं गीत
कहो तो सुनाऊं कोई मधुर संगीत
तुम कहोगी इतना कुछ क्यों
और मैं कहूंगा कि
मेरी सुबह हो तुम
और मेरी शाम भी
हद भी तुम हो
और अनहद भी तुम
तुम हंसोगी
और मैं तुम्हें देखूंगा
जीतते हुए इस दुनिया में।
हां, मैं तुम्हें देखूंगा
जीतते हुए इस दुनिया में।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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