Sunday, June 23, 2024
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इलाहाबाद में हुई पत्थरबाजी की घटना और गिरफ्तारियों पर पीयूसीएल इलाहाबाद की एक रिपोर्ट

10 जून को इलाहाबाद के अटाला चौक पर जुमे की नमाज़ के बाद प्रदर्शन और पथराव हुआ, जिसमें लगभग आधा दर्जन पुलिसवालों और कई दर्जन नागरिकों को चोटें आई हैं। कई दोपहिया और चौपहिया वाहनों में तोड़फोड़ की गई है। 11 जून की भोर में 70 लोगों के खिलाफ नामजद और 5000 अज्ञात लोगों के […]

10 जून को इलाहाबाद के अटाला चौक पर जुमे की नमाज़ के बाद प्रदर्शन और पथराव हुआ, जिसमें लगभग आधा दर्जन पुलिसवालों और कई दर्जन नागरिकों को चोटें आई हैं। कई दोपहिया और चौपहिया वाहनों में तोड़फोड़ की गई है। 11 जून की भोर में 70 लोगों के खिलाफ नामजद और 5000 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है। अब तक लगभग 150 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जिसमें कई नाबालिग भी हैं। पुलिस द्वारा इस घटना का ‘मास्टरमाइंड’ वेलफेयर पार्टी के पदाधिकारी जावेद मोहम्मद को बताया गया। उन्हें 10 जून की रात 8.30 बजे घर से ही पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी पत्नी और बेटी को कानून का उल्लंघन करते हुए रात में 12.30 बजे थाने पर ले जाया गया और 33 घण्टे बाद 12 जून को सुबह 9.30 पर एक रिश्तेदार के घर पर छोड़ा गया। इस सम्बन्ध में राष्ट्रीय महिला आयोग में शिकायत पत्र भेजा जा चुका है और मामले की जांच चल रही है। 12 जून को ही जावेद मोहम्मद का घर बुलडोजर से ढहा दिया गया, जिससे पूरे शहर में ही नहीं, देश में भी सनसनी फैल गयी। इलाहाबाद में घटी यह घटना पूरे देश में ही नहीं विदेशों तक में निंदा का कारण बनी। पुलिस पर यह भी आरोप लगाये गये कि उसने फर्जी गिरफ्तारियां की हैं, पूरे मामले में गैरकानूनी तरीका अपनाया है और यह पूरा घटनाक्रम नागरिकता आंदोलन में शामिल अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक बड़ी साजिश है।

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने इसी कारण इस घटना और मामले की जांच करने का निर्णय लिया।

इस कार्यवाही के लगभग 15 दिन बाद पुलिस महकमे ने उमर खालिद, शाह आलम, जीशान रहमानी, आशीष मित्तल और फजल खान को फरार घोषित कर उनके ऊपर 25 हज़ार का ईनाम घोषित कर दिया। ईनाम घोषित करने वाले ऐलान में यह भी कहा गया कि ‘उन्हें पकड़ने के दौरान यदि मुल्ज़िमों को चोट आती है या उनकी जान भी चली जाती है तो उन्हें पकड़ कर लाने वाले के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जायेगा।’ यह गैरकानूनी ऐलान भी मानवाधिकार संगठनों और न्याय पसंद व्यक्तियों द्वारा पुलिस की कार्यवाही की आलोचना का कारण बना। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स के अनुसार किसी भी इनकाउन्टर में शामिल होने की वजह से प्रमोशन और ईनाम की कार्यवाही गैरकानूनी है, इससे गैर न्यायिक हत्यायें और अराजकता बढे़गी।

अटाला स्थित इलाहाबाद कबाब वाले के खाली घर में 10 दिन तक पुलिस ताला तोड़कर घुसी बैठी रही। इस दौरान उसने उनका सारा गहना चोरी कर लिया और बीसी का रखा गया 5 लाख रूपया ले लिया। लेकिन पुलिस के खिलाफ पुलिस में ही शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत कोई नहीं कर सका।

घटना की पृष्ठभूमि

27 अप्रैल, 2022 को भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने एक टीवी डिबेट में इस्लाम धर्म के पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिससे देश भर के मुसलमानों में रोष फैल गया। कई शहरों में नूपुर शर्मा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई और गिरफ्तारी की मांग की गई, लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई। 3 जून को जुमे के रोज़, जिस दिन देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी आना था, कानपुर में दंगे भड़क गये। इस सम्बन्ध में वहां तुरंत बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई। इसके बाद का जुमा 10 जून को था। कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा बिना किसी नाम के सोशल मीडिया पर नमाज़ के बाद शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान किया जा रहा था। कुछ संदेशों में भारत बंद की अपील भी की गई थी। इलाहाबाद में 9 जून की रात से ही अटाला और करेली की मस्जिदों के आसपास चौराहों पर भारी पुलिस फोर्स तैनात कर दी गयी थी। कानपुर की घटना में शामिल होने का आरोप लगाकर सीपीआई (एमएल) (न्यू डेमोक्रेसी) के प्रदेश सचिव डॉक्टर आशीष मित्तल को 9 जून की शाम नोटिस भेज दी गयी थी और 10 की सुबह कचहरी आकर जवाब दाखिल करने को कहा गया था। 9 जून की शाम ही डीएम ने अटाला की बड़ी मस्जिद के पेश इमाम, सभी धर्मगुरु और जावेद मोहम्मद जैसे सामाजिक कर्मियों के साथ शहर में शांति बनाये रखने के मकसद से मीटिंग की थी, सभी ने इसमें सहयोग देने की बात कही, यह बात बाद में खुद एडीजी प्रेम प्रकाश ने अपने बयान में कहा था।

इसी पृष्ठभूमि में इलाहाबाद में 10 जून जुमे के रोज़ वह घटना घटी, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया और इसके बाद हफ्तों तक शहर पूरे देश में चर्चा में रहा। बुलडोजर की कार्यवाही ने इसे और भी गंभीर बना दिया। हमारी जांच का फोकस 10 जून को घटी घटना और उसके बाद हुई गिरफ्तारियों पर केन्द्रित रही और हमने लोगों से इससे जुड़े सवाल ही पूछे।

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10 जून की घटना के सन्दर्भ में पुलिस का बयान

पुलिस प्रशासन की ओर से दाखिल एफआईआर को ही जांच टीम ने उनके बयान के तौर पर लिया है। पहली एफआईआर घटना के लगभग 13 घण्टे बाद 11 जून की भोर 3 बजकर 11 मिनट पर खुल्दाबाद थाने में लिखी गयी, जिसे लिखाने वाले खुद अटाला चौकी के प्रभारी दीन दयाल सिंह हैं। इस प्रथम सूचना के अनुसार-

‘जुम्मे की नमाज सम्पन्न होने के बाद लगभग 14.00 बजे (दोपहर दो बजे) हज़ारों लोगों की भीड़ अटाला मोहल्ला की ओर से उत्तेजनात्मक उन्माद फैलाने वाली धार्मिक नारेबाजी करते हुए चौराहे की ओर आई तथा आते ही पुलिस/ पीएसी बल पर हमलावर होकर जानलेवा पथराव करने लगी। इन लोगों द्वारा सैकड़ों नाबालिग बच्चों को भी उकसाकर नारेबाजी व पत्थरबाजी करने हेतु लाया गया था। उपस्थित सभी अधिकारीगण द्वारा उनको समझाते-बुझाते हुए वापस जाने का अनुरोध किया गया तथा लाउडस्पीकर के माध्यम से भी अनुरोध एवं चेतावनी दी गयी, फिर भी ये लोग नहीं माने और धार्मिक विद्वेष व उन्माद फैलाने की नीयत से धर्म विशेष के संबंध में नारेबाजी करते हुए भीड़ अत्यन्त हिंसक हो गयी और पूर्व सुनियोजित षडयंत्र के तहत अपने हाथ में लिए हुए पत्थरों एवं बम को हम पुलिस वालों एवं आने-जाने वाले राहगीरों पर चलाने लगे। पुलिस बल द्वारा बार-बार चेतावनी देने के बाद भी पीछे हटने को तैयार नहीं हुए और जब उन्हें हटाने बढ़ाने की कोशिश की गयी तो सामने से आसपास की गलियों से तथा कई मकानों की छतों से पत्थर एवं बम चलाने लगे साथ ही छतों से गोलियां भी पुलिस बल को लक्ष्य करके जान से मारने की नीयत से चलाई गयी, तथा कहने लगे कि ये पुलिस वाले काफिर हैं, इन्हें कतई छोड़ना नहीं है, इनको मारो-मारो। इसी के साथ इन उपद्रवी तत्वों द्वारा प्ज्डै के कैमरों को तोड़ने एवं वीडियो बना रहे पुलिस कर्मियों के मोबाइल भी छीनने का प्रयास किया गया। इनके द्वारा जानलेवा किये गये पथराव, फेंके गये बम व फायर से आरएएफ 01 बटालियन के निरीक्षक मनीष कुमार, आरक्षी रघुनन्दन एवं आरक्षी तन्मय पाल गम्भीर रूप से घायल हो गये, जिन्हें तत्काल एसआरएन हॉस्पिटल उपचार हेतु भेजा गया। जब अतिरिक्त पुलिस बल के रूप में पीएसी की ट्रक जवान व असलहे सहित आयी तो उग्र भीड़ द्वारा नुरुल्ला रोड स्थित शौकत अली मोड़ तिराहे पर गाड़ी को रोककर गाली-गलौज व पत्थरबाजी करते हुए गाड़ी में आग लगा दी गयी तथा जवानों के शस्त्र लूटने का प्रयास भी किया गया। मौके पर तत्काल फायर ब्रिगेड बुलाकर ट्रक की आग को बुझवाया गया। इन उपद्रवी तत्वों के इस कृत्य से शौकत अली रोड, नुरुल्ला रोड व आस-पास की सभी दुकानें बन्द होने लगी, चारों तरफ भगदड़ मच गयी, दुकानदार अपने शटर गिराकर भागने लगे, साथ ही राहगीर जिसमें महिलायें व बच्चे भी थे, रोते-चिल्लाते गलियों में भागने लगे। इन उपद्रवी तत्वों द्वारा धार्मिक विद्वेष फैलाने की नीयत से धर्म विशेष के प्रति आक्रोश पैदा करने के उद्देश्य से सरकारी कार्यों में बाधा डालते हुए लोक सम्पत्ति क्षतिग्रस्त करते हुए आगजनी तक की गयी, ताकि शहर एवं राज्य में हिंसा फैले और साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़े। मौके की नाजुक स्थिति देखते हुए सिटी मजिस्ट्रेट एवं सीओ सिटी द्वारा तत्काल न्यूनतम बल प्रयोग करने तथा टीयर गैस चलाने का आदेश पुलिस बल को दिया गया।…….’’

पीड़ितों से बात करते सुनती पीयूसीएल इलाहाबाद के सदस्य

इस बयान में आगे यह भी कहा गया है कि पुलिस के लोगों ने भीड़ में मौजूद लोगों का नाम ले-लेकर लाउडस्पीकर से उन्हें वापस लौट जाने का अनुरोध किया, लेकिन वे नहीं माने।

एफआईआर में आगे मौके से गिरफ्तार किये गये कुल 36 लोगों के नाम हैं। 34 लोगों के नाम इस रूप में हैं कि उनकी घटनास्थल पर पुलिस बल द्वारा पहचान की गयी, लेकिन वे फरार हो गये। मोहम्मद जावेद और जिन लोगों पर ईनाम घोषित किया गया है, उनके सहित 34 लोगों के नाम इसमें शामिल हैं। इसके अलावा 5000 अज्ञात लोगों को घटना में शामिल होने की बात इस एफआईआर में कही गयी है, इस एफआईआर का नम्बर 0118/22 है।

इसी तरह की दो अन्य एफआईआर करेली थाने में लिखी गयी। जिसमें से 0176/2022 संख्या वाली एफआईआर 11 जून की सुबह 8.56 पर लिखी गयी। इस एफआई को दर्ज कराने वाले करेली थाने में तैनात उ.नि. अरविन्द कुमार हैं। इस एफआईआर का बयान और भाषा लगभग वही है, जो खुल्दाबाद वाली एफआईआर संख्या 0118/22 की है। बस इसमें भीड़ का असगरी तिराहे से आना और शौकत अली तिराहे पर इकट्ठा होने की बात कही गई है और घटना का समय 15 बजे यानि दोपहर में 3 बजे बताया गया है। इसमें 11 उन्हीं लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गयी है, जो खुल्दाबाद थाने के एफआईआर संख्या 118/22 में भी नामजद हैं और जिन्हें उसी एफआईआर में मौके से गिरफ्तार भी किया जा चुका है। करेली में दर्ज इस एफआईआर में इन्हें ‘मौके से भाग गये’ बताया गया है। इसके अलावा इस एफआईआर में 250 से अधिक लोगों को अज्ञात बताया गया है, जो उपद्रव में शामिल थे। इसी तरह की एक और एफआईआर संख्या 175/22 भी करेली थाने से ही लिखी गई है।

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घटना के रोज़ प्रेस को बयान देते वक्त इलाहाबाद के एडीजी प्रेम प्रकाश ने कहा कि इस घटना में सीएए एनआरसी आन्दोलन में मंसूर अली पार्क में धरने पर बैठे लोगों की संलिप्तता है। इस प्रेस बयान में उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को चिन्हित किया जा रहा है। उन्होंने प्रेस के सामने डॉ. आशीष मित्तल, ‘फ्रेटर्निटी’ की सारा अहमद जीशान रहमानी, उमर खालिद और वामपंथी संगठनों का शामिल होना बताया।

एक अन्य प्रेस बयान में एसएसपी अजय कुमार ने इसकी घोषणा भी कर दी थी कि ‘चिन्हित लोगों को जेल भेजने के अलावा जब्तीकरण व ध्वस्तीकरण से गुरेज नहीं किया जायेगा।’ यह बयान इसलिए भी गौर करने लायक है कि जावेद मोहम्मद का घर बुलडोजर द्वारा गिराये जाने के बाद जब इस पर सवाल उठने शुरू हुए, तो सरकार ने इसकी सफाई में कोर्ट में यह कहा कि ‘जावेद का घर गिराये जाने की घटना का सम्बन्ध पीडीए यानि प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी से है, इस घटना से नहीं।’ लेकिन एसएसपी के बयान से साफ जाहिर होता है कि जावेद का घर इसलिए गिराया गया, क्योंकि पुलिस ने उन्हें 10 जून की घटना में मुख्य आरोपी बनाया। उनका घर अगर उनके आरोपी होने के कारण गिराया गया तो यह एक बहुत बड़ी गैरकानूनी कार्यवाही है। वो भी तब, जबकि वह घर जावेद की पत्नी के नाम पर है, जो कि उन्हें अपने मायके से उपहार में मिला था। देश भर से बुलडोजर द्वारा घर गिराये जाने की कार्यवाही के खिलाफ नाराजगी के कारण सुप्रीम कोर्ट से बुलडोजरी कार्यवाही पर रोक लग गयी, वरना किसी मुकदमें में मात्र आरोपी होने के कारण घर गिराये जाने की और भी घटना इलाहाबाद सहित उत्तर प्रदेश के कई शहरों में घट सकती थी।

इस तरह दोनों थानों की पुलिस के द्वारा दर्ज कराये गये बयानों, पुलिस के आला अधिकारियों द्वारा दिये गये बयानों में ही काफी अन्तविर्रोध है, जिसके कारण उनकी कहानी पर शक पैदा होता है।

दोनों ही एफआईआर में सभी पर एक ही तरह की धारायें लगाई गई हैं ये इस प्रकार हैं

भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 143, 144, 145, 147, 148, 149, 153क, 153ख, 295क, 307, 332, 353, 435, 427, 504, 505 (2), 506, 120ख, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 की धारा 4 और 5, आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 1932 की धारा 7, किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 83, सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 की धारा 3 और 4।

घटना के सम्बन्ध में नागरिकों के बयान

घटना के सम्बन्ध में नागरिकों का बयान लेने के लिए पीयूसीएल की 6 सदस्यीय टीम (दो स्थानीय गाइड के साथ) अटाला चौराहे पर 20 जुलाई को गयी और चौराहे पर स्थित दुकानदारों से घटना का विवरण जानने का प्रयास किया। हम जिस भी दुकान में गये लगभग सभी दुकानदारों ने हमसे बात की और अपना बयान दर्ज कराने से पीछे नहीं हटे, (सभी के बयान रिकार्डेड हैं), लेकिन अपना नाम और होटल या रेस्टोरेंट का नाम देने से मना किया। अभी भी लोगों में दहशत का माहौल है, क्योंकि पुलिस की एफआईआर में 5000 लोग अज्ञात हैं, सभी को ये डर है कि पुलिस नाराज होकर कभी भी किसी को भी इसी 5000 में एक आरोपी बना सकती है। अटाले में मौजूद सभी होटल और रेस्टोरेंट जो हमेशा भरे रहते थे, खाली थे। लोगों ने बताया कि 10 जून की घटना के बाद लोगों ने बाहर निकलना ही बंद कर दिया है, कि न जाने पुलिस कब किसको गिरफ्तार कर ले। अटाला चौराहे की उत्तर की तरफ की गलियों में हर तीसरे-चौथे घर से कोई न कोई घटना के सम्बन्ध में या तो जेल में है या फिर गिरफ्तारी के डर से शहर से बाहर चला गया है, उसका नाम एफआईआर में हो या न हो। लोगों ने बताया कोई रिक्शा वाला डर के कारण स्टेशन से अटाले की ओर आता ही नहीं है। होटल-रेस्टोरेंट के लिए रोज़ का खर्च निकालना मुश्किल हो गया है, जबकि उन्होंने अपने यहां नियुक्त काम करने वाले मजदूरों की संख्या काफी घटा दी है।

अटाला चौराहे पर स्थित दुकानदारों के बयान के अनुसार

‘9 जून से ही ऐसा सुनने में आ रहा था कि कुछ लोग इस्लामिया कॉलेज (अटाला चौराहे पर स्थिति मजीदिया इस्लामिया इण्टर कॉलेज) में जुमे के रोज़ तकरीर के लिए आयेंगे। सोशल मीडिया पर क्या चल रहा था, किसी प्रदर्शन का आह्वान किया गया है, ऐसी कोई जानकारी नहीं थीं। 9 जून की रात 11 बजे से ही पुलिस ने भारी संख्या में पुलिस और आरएएफ तैनात कर पूरे एरिया को छावनी में बदल दिया था। सुबह लोगों ने देखा कि हर जगह पुलिस के लोग मौजूद हैं। अटाला चौराहे के उत्तर की तरफ मस्जिद वाली गली में बैरियर लगाकर नाकेबन्दी कर दी गयी थी, जिसके कारण लोग सड़क पर या सड़क पार इस्लामिया कॉलेज की ओर नहीं जा सकते थे, जिससे लोग अचंभे में थे। फिर भी लोग नमाज़ के लिए मस्जिदों में इकट्ठा हुए। पौने एक बजे के करीब नमाज़ खतम हो चुकी थी, सभी अपने घरों को लौट गये थे या लौट रहे थे। कुछ लड़के रूके हुए थे, और बैरियर के पीछे खड़े होकर नुपुर शर्मा के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थी। वे अस्थाई तौर पर बनाये गये बैरियर के पीछे ही रहें, पुलिस इसके लिए वहां तैनात हो गयी थी। 2 बजे के करीब चौराहे के सामने जहां पुलिस वाले खड़े थे, के पास से एक अकेला आदमी गुजरा, पुलिस वालों ने उसे रोका और लाठियों से बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया। फिर दुकान वालों को धमकाने लगे और मस्जिद की तरफ खड़े लोगों को भगाना शुरू किया और भगाने के लिए लाठी चलाना शुरू कर दिया। लाठी के साथ उन्होंने लोगों को भगाने के लिए पत्थर चलाना भी शुरू कर दिया। पुलिस की इस कार्यवाही से गुस्साये और भागते लोगों ने भी पुलिस की ओर पत्थर चलाना शुरू कर दिया। अटाला से शौकत अली मार्ग पर उत्तर की गलियों से गुस्साये लोगों का हुजूम निकल पड़ा, उन्होंने लाठीचार्ज करती पुलिस पर पत्थर चलाये और नारे भी लगाये। ‘ये कौन से नारे थे’ ये पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि उन्होंने नुपुर शर्मा और मोदी-योगी सरकार के खिलाफ नारे लगाये थे। लाठियों के साथ पुलिस वालों ने भी लोगों पर पत्थर चलाये, इसका प्रमाण भी स्थानीय लोगों ने दिखाया। उन्होंने बताया कि अटाला से उत्तर की ओर की गलियों में लोगों का हुजूम था और दक्षिण की ओर पुलिस वाले थे, इसकी पुष्टि सभी लोगों ने की। लागों ने उत्तर के कई घरों और रेस्टोरेंट के टूटे हुए शीशे दिखाये, (जिसकी तस्वीरें भी हमने ली) जो कि दक्षिण की ओर यानि पुलिस की ओर से चले पत्थरों से ही टूट सकते थे। जो लोग अपने फोन पर रिकार्डिंग कर रहे थे, पुलिस वालों ने उनसे या तो फोन छीन लिये या फिर उन्हें वीडियो और तस्वीरें डिलीट कराने के बाद ही छोड़ा। इसके लिए पुलिस वालों ने लोगों को मारा भी। इन सबके बीच ही लोगों ने अपनी दुकानें बंद करनी शुरू कर दी, जिन्होंने नहीं की, पुलिस ने जबरन उनसे अपनी दुकान बंद करायी। पुलिस ने इस्लामिया कॉलेज के मैदान से ड्रोन उड़ाना भी शुरू कर दिया। उन्हें मुखबिरों को दिखाकर लोगों की पहचान की। पुलिस पहले से किसी को नहीं पहचानती थी।

अटाला चौराहे के दक्षिण में स्थित अकबरपुर मोहल्ले में भी 11 जून को ही ‘क्रैक डाउन’ किया गया, जबकि ज्यादातर लोगों ने अपने बयान में यह बताया कि वे 10 जून को नमाज़ पढ़ने अटाले के पास वाली मस्जिद में गये ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने पास की मस्जिद में नमाज़ पढ़ी थी।

लोगों ने यह भी बताया पुलिस के अलावा पुलिस के मुखबिरों ने भी पूरे इलाके में आतंक मचा रखा है। वे उन सारे लोगों का नाम भी पुलिस को बोल रहे हैं, जिनसे उनका किसी भी रूप में झगड़ा या मनमुटाव है। इसके अलावा वे घर-घर में यह अफवाह फैलाकर पैसे की वसूली कर रहे हैं कि उनकी गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है, अगर वे कुछ पैसे खर्च करें तो वे पुलिस फाइल से उनका नाम हटवा सकते हैं। इस काम में पुलिस वाले खुद भी शामिल हैं। जिसका भी नाम उन्हें पता चल जा रहा है, वे उसका नाम घटना से जोड़ दे रहे हैं। इससे अटाला और इससे लगे अकबरपुर क्षेत्र में भयंकर अफरा-तफरी और भय का माहौल है। गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी है। पूरा इलाका नौजवान लड़कांे से लगभग खाली हो गया है। या तो वे जेल में हैं या लोगों ने अपने नौजवान लड़कों को दूसरे शहरों में बसे रिश्तेदारों के यहां भेज दिया है। मजीदिया इस्लामिया की एक शिक्षिका ने बताया कि नौजवानों को हटा दिये जाने के कारण कॉलेज में एडमिशन की दर बहुत कम हो गयी है।

गिरफ्तारियों के सम्बन्ध में लोगों के बयान

पुलिस के दावे से अलग लोगों का कहना है कि मौके से किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई, मामला जब शान्त होने लगा, तो जहां-तहां फंसे लोग वापस अपने-अपने गन्तव्य की ओर लौटने लगे, पुलिस ने उस वक्त लोगों को गिरफ्तार करना शुरू किया। बगैर ये जाने कि घटना में कौन शामिल था, कौन नहीं। चौराहे के पास मौजूद फर्नीचर की दुकान के शहनवाज शाम छः बजे अपने डरे हुए कारीगरों को मोटरसाइकिल से उनके घर छोड़ने जा रहे थे, दोनों को शौकत अली मार्ग स्थित कादिर स्वीट हाउस के सामने रोक कर गिरफ्तार कर लिया गया। कारीगर परवेज़ को तो फतेहगढ़ जेल भेज दिया गया। इमरान अहमद असर की नमाज़ (शाम की नमाज़) के लिए मुस्तफा काम्पलेक्स के पास स्थित मस्जिद जा रहे थे, उन्हें वहां गिरफ्तार कर लिया गया। इमरान को आगरा जेल भेज दिया गया। इमरान के परिजनों ने बताया कि पुलिस ने उन्हें बहुत मारा है और जेल में भी उनके साथ बदसलूकी की जा रही है, उन्हें ‘प्रशासनिक मुजरिम’, ‘पत्थरबाज’ कहकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्हें ही नहीं, जेल में मिलने जाने वालों को भी प्रताड़ित किया जा रहा है।

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कल्लू कबाब पराठा की दुकान में काम करने वाले 3 सोते मजदूरों को पुलिस ने 11 जून को उठा लिया। मजीदिया इस्लामिया के शिक्षक अकील अब्बास रिजवी जो 3 बजे के आसपास कहीं से इस निश्चिंतता के साथ स्कूटर से लौट रहे थे कि ‘जब हमने कुछ किया नहीं है, तो पुलिस हमें क्यों पकड़ेगी?’ को पुलिस ने रोककर गिरफ्तार कर लिया। 10 जून को घटना के बाद अटाले के पास होकर जो भी गुजरा अगर वो मुस्लिम है, तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन 11 जून को पुलिस ने अटाले की गलियों में जिस तरह से गिरफ्तारियां की, वो किसी खतरनाक ‘क्रैक डाउन’ से कम नहीं। उस दिन को याद कर लोग अभी भी सिहर उठते हैं। भोर पांच बजे से ही अटाला के उत्तर की ओर स्थित काका खेत गली, गुला शाह बाबा की मज़ार वाली गली और अकबपुर इलाके में सादी वर्दी में हट्टे-कट्टे पुलिस वालों ने 4 बजे भोर से ही धर-पकड़ शुरू कर दी। गली के बाहर या घरों के अन्दर से बाहर नज़र आ रहे जो भी नौजवान उनकी नज़रों के सामने पड़ा सबको उन्होंने पकड़ लिया। कुछ लोगों ने ये भी कहा कि पुलिस के साथ आरएसएस के लोग भी लाठी लिये घूम रहे थे और लोगों की धर-पकड़ कर रहे थे, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। लोगों के घरों में पुलिस बिना किसी चेतावनी के सीढ़ी लगाकर या कूद-फांदकर घुस जा रही थी। घर में परदेदार औरतों का भी पुलिस ने कोई लिहाज नहीं किया।

काका खेत वाली गली के एक घर में इसी तरीके से पुलिस वाले सादी वर्दी में घर में घुसे और कर सोये हुए मोहम्मद आरिफ को बाल से खींचकर उठाया, दरवाजे से इनायत अली और गुलाम गौस को पकड़ा। जब किसी बच्चे ने कहाकि आपकी सारी हरकतें घर के बाहर लगे कैमरे में कैद हो गयी हैं तो पुलिस वाले फिर से घर में घुसे और कैमरे को तोड़कर उसका बॉक्स लेकर चले गये। मोहम्मद आरिफ को झांसी जेल भेज दिया गया।

इसी गली में मस्जिद के पास स्थित घर के बाहर खड़े 17 साल के मोहम्मद अज़ीम को पकड़ लिया। मोहम्मद अज़ीम से पुलिस लाइन में ड्रोन से ली गई तस्वीरों और वीडियो दिखाकर उनकी पहचान कराई गयी। बाद में उससे मिलने गयी अम्मी को मोहम्मद अज़ीम ने बताया कि वीडियो में कुछ ही लोग पहचान के थे, बाकी सभी लोग बाहरी दिख रहे थे। उनकी पहचान न करने के कारण उसे फिर से पीटा गया। कुछ और लोगों ने भी बताया कि भीड़ में पत्थर फेंकने वाले लोग बाहरी थे, जिन्हें वे नहीं पहचानते थे।

उसी दिन भोर में करेली बैरियर के पास खुले में सड़क किनारे सो रहे तीन भाइयों को पुलिस ने उठा लिया।

इसी गली में 22 साल का फैसल 11 तारीख को मस्जिद से दोपहर की नमाज़ पढ़कर वापस लौट रहा था, जब उसे उठा लिया गया और पहले से तैयार खड़ी गाड़ी में बिठा लिया गया। उस दिन पुलिस लाइन ले जाकर अगले दिन जेल भेज दिया गया।

दूसरी ओर, अटाला चौराहे के दक्षिण में स्थित अकबरपुर मोहल्ले में भी 11 जून को ही ‘क्रैक डाउन’ किया गया, जबकि ज्यादातर लोगों ने अपने बयान में यह बताया कि वे 10 जून को नमाज़ पढ़ने अटाले के पास वाली मस्जिद में गये ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने पास की मस्जिद में नमाज़ पढ़ी थी।

19 साल का मोहम्मद अल्तमश 11 जून को अपने पिता की चाय की दुकान पर बैठा उनकी मदद कर रहा था, जब 3 बजे दिन में पुलिस ने पहले उसके पिता को पकड़ा फिर उसे छोड़कर अल्तमश को पकड़कर ले गये।

16 साल के वैस ख़ान उर्फ वारिस ख़ान को 11 जून को दोपहर ढाई बजे घर के सामने से पकड़ लिया, जब वो फोन पर पबजी खेलते हुए पान वाले को पानी देने जा रहा था।

अकबरपुर के ही दो भाइयों हमजा और हुजैफा को 11 जून को चार बजे के आसपास घर से ही सादी वर्दी वालों ने पकड़ा। हमजा की उम्र 23 साल और हुजैफा की उम्र 17 साल है।

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30 साल के फुरकान को सुबह पांच बजे तब पकड़ा, जब वे अपनी टेलरिंग की दुकान से किसी ग्राहक का अर्जेंट कपड़ा निकालकर देने जा रहे थे। उनकी गिरफ्तारी के बारे में घर में किसी को पता भी नहीं चला। शाम को पड़ोसी, जिसके घर का लड़का अरेस्ट हुआ था, के माध्यम से पता चला कि फुरकान को भी पुलिस लाइन में गिरफ्तार लोगों में देखा गया।

अकबरपुर में रहने वाले फैज़ खान को 10 जून को ही 4 बजे के करीब गिरफ्तार किया गया। उनके बारे में इससे ज्यादा किसी को कुछ भी ठीक से नहीं पता है। वे उस दिन अपनी पत्नी की दवा लेने निकले थे। देर होने पर जब पत्नी ने उन्हें फोन किया, तो फोन पुलिस वाले ने उठाया और कहाकि फैज का एक्सीडेंट हो गया है और वो अस्पताल में भरती है। फैज के घर में पत्नी के अलावा कोई नहीं है। मोहल्ले के लोग जब अस्पताल पहुंचे तो फैज पुलिस वालों से घिरे हुए थे, जो लोगों को दूर भगा रहे थे। कुछ और लोग भी एडमिट थे। इस कारण फैज से बात नहीं हो पाई। उनका सिर फट गया था उसमें टांके लगे थे और शरीर में कई जगह चोट का निशान था। अगले दिन फिर से अस्पताल जाने पर पता चला कि उन्हें जेल भेज दिया गया है। उसके बाद पत्नी जब उनसे मिलने गयी तो आधार और वैक्सीन सर्टीफिकेट साथ न होने के कारण मुलाकात नहीं करने दिया गया। 10 दिन बाद फिर जाने पर पता चला कि फैज़ को नोएडा के जेल में भेज दिया गया है। उसके साथ क्या हुआ ये किसी को पता नहीं चल पाया।

सौ से ऊपर हुई गिरफ्तारियों के ये कुछ थोड़े से बयान हैं। इस तरह के अनगिनत बयान इस पूरे इलाके में बन्द हैं, जिन्हें अभी दर्ज किया जाना बाकी है। इन्हें दर्ज करके पुलिस की कहानी के झोल और सच्चाई की तह तक पहुंचा जा सकता है। इसलिए इन्हें जानना न्याय तक पहुंचने के लिए ज़रूरी भी है। फिलहाल ये चन्द बयान ही इनकी बानगी का खुलासा कर रही हैं। (हमारी टीम की कोशिश है कि आगे हम और बयानों को भी इकट्ठा कर एक और रिपोर्ट जारी कर सकें)

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इन बयानों से पता चलता है कि पुलिस ने गिरफ्तारियों में बड़े पैमाने पर कानून का उल्लंघन किया है, तथा बिना जांच के किसी को भी जेल में डालकर वह खुद जांच के दायरे में आ गयी है। न्याय को स्थापित करने के लिए इन सभी गिरफ्तारियों की जांच करना ज़रूरी है। उल्लेखनीय है कि पुलिस ने खल्दाबाद थाने की एफआईआर में जिन लोगों को मौका-ए-वारदात से 10 जून को गिरफ्तार होना दिखाया है, वास्तव में उनकी गिरफ्तारी 11 जून को उनके घरों या आसपास से की गयी है। पुलिस ने यह झूठ क्यों कहा, यह समझ से परे है और इस झूठ के कारण उसके बयान पर संदेह खड़ा होता है।

फरार घोषित किये गये और ईनाम प्राप्त दो आरोपियों डा. आशीष मित्तल और उमर खालिद के बारे में उनके सम्बन्धियों और दोस्तों ने प्रमाण सहित बताया कि वे मौके पर मौजूद नहीं थे। उमर खालिद उस दिन अपने संगठन ‘एसआईओ’ की वर्कशॉप के लिए पहले से ही आजमगढ़ गये हुए थे। आशीष मित्तल शहर में ही थे, लेकिन उन्हें एक दिन पहले ही कानपुर दंगों से जुड़ी नोटिस भेज कर 10 जून को अदालत में तलब किया गया था। वे 10 जून को सुबह से दिन के ढाई-तीन बजे तक कचहरी परिसर में ही थे। जावेद मोहम्मद अपने फेसबुक पर सुबह ही लोगों से शांतिपूर्वक मेमोरेंडम देकर मामले को खत्म करने की अपील कर चुके थे। उसके बाद भी इन सभी को 10 जून की पत्थरबाजी की घटना में शामिल बताया गया। आशीष मित्तल जिस वामपंथी विचारधारा के हैं, उसके उसूल के अनुसार उनके नमाज़ियों की भीड़ में शामिल होने की बात ही हास्यास्पद लगती है।

लूटपाट और गाड़ियों का जलाया जाना

पुलिस ने अपने बयान में आरोप लगाया है कि लोगों की भीड़ ने 10 जून को पत्थरबाजी करने के साथ गाड़ियों में तोड़फोड़ की उनमें आग लगाई और लूटपाट की। जबकि नागरिकों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने घटना के बाद 11 जून की सुबह अपने केस को मजबूत बनाने के लिए खुद ये सब किया है। नाम न लिखने की शर्त पर अटाला के लोगों ने बताया कि 11 जून की भोर में 5 बजे से ही पुलिस ने आस-पास खड़ी गाड़ियों के शीशे तोड़ने शुरू कर दिये, एक मोटर साइकिल को नाले में गिरा दिया। उन्होंने सुबह के समय लगभग बीसियों गाड़ियां तोड़ी और आस-पास के इलाकों में इसी वक्त से गिरफ्तारियां शुरू कर दीं। नागरिकों ने पुलिस द्वारा अटाला पर लूटपाट किये जाने की बात भी कही गई है। अटाला स्थित इलाहाबाद कबाब वाले के खाली घर में 10 दिन तक पुलिस ताला तोड़कर घुसी बैठी रही। इस दौरान उसने उनका सारा गहना चोरी कर लिया और बीसी का रखा गया 5 लाख रूपया ले लिया। लेकिन पुलिस के खिलाफ पुलिस में ही शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत कोई नहीं कर सका।

पीड़ितों को सुनती पीयूसीएल इलाहाबाद की टीम

जांच दल का निष्कर्ष और मांगें

1- 10 जून को अटाला पर हुई पत्थरबाजी की घटना के सन्दर्भ में यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि लोगों में भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के बयान के खिलाफ रोष था। लेकिन अटाला पर हुई हिंसक घटना की शुरूआत कैसे हुई यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता। पुलिस के बयान से उलट नागरिकों के बयान के अनुसार पुलिस ने ही लाठीचार्ज कर लोगों को पत्थरबाजी के लिए उकसाया, ताकि एक धर्म समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा सके। पुलिस के बयान, जो कि एफआईआर में दर्ज है, को पढ़कर भी यह समझ में आता है कि वह उपद्रवियों को नहीं, अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेना चाहती है।

अतः हमारी मांग है कि इस घटना की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच हों, ताकि ऐसी किसी भी साजिश का खुलासा हो सके।

2- पुलिस द्वारा एफआईआर में दर्ज गिरफ्तारी के समय और नागरिकों द्वारा बताये गये गिरफ्तारी के समय में बहुत अधिक अन्तर है। मौका-ए-वारदात के समय गिरफ्तारी के सम्बन्ध में भी पुलिस की कहानी में झोल ही झोल है, जबकि सभी नागरिकों के बयान एक से हैं। इससे यह सन्देह होना लाजिमी है कि ये गिरफ्तारियां गलत और मनगढ़ंत हैं। इसमें सन्देह नहीं है कि इस घटना में निर्दोष लोगों को जेल में बंद कर दिया गया हो, जिसमें कई नाबालिग बच्चे भी हैं।

अतः हमारी मांग है कि इन गिरफ्तार हुए लोगों और उनके सम्बन्धियों के बयान को दर्जकर सभी गिरफ्तारियों की जांच जल्द से जल्द की जाय और सभी निर्दोष फंसाये और जेल में डाले गये लोगों को उचित मुआवजे के साथ रिहा किया जाय।

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3- एसएसपी अजय कुमार के बयान और दस्तावेजों की जांच के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि जावेद मोहम्मद का मकान, जो कि उनकी पत्नी के नाम पर है, को बिना किसी कानून नोटिस के सिर्फ इस कारण गिराया गया कि उनके पति उस घर में रहते है और 10 जून की घटना में आरोपी हैं (दोषसिद्ध भी नहीं)। यह पुलिस प्रशासन द्वारा सम्बन्धित विभागों के साथ मिलकर की गयी बड़ी आपराधिक कार्यवाही है।

हमारी मांग है कि जावेद की पत्नी परवीन फातिमा का घर गिराने का आदेश देने वाले अफसरों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही की जाय, तथा परवीन फातिमा को उचित मुआवजा दिया जाय।

4- उमर खालिद, आशीष मित्तल की इस घटना में शामिल होने के कोई प्रमाण नहीं मिलते।

हमारी मांग है कि तथ्यों के मद्देनज़र उनके ऊपर से यह मुकदमा वापस लिया जाय।

5- फरार घोषित लोगों को शारीरिक क्षति और मृत लाने पर मुकदमा दर्ज न करने और ईनाम दिये जाने की घोषणा असंवैधानिक है।

हमारी मांग है कि जिसने भी फरार घोषित लोगों पर ईनाम घोषित करने वाला बिना हस्ताक्षरित फरमान जारी किया है, उसकी जांचकर उसके खिलाफ गैरकानूनी फरमान जारी करने का मुकदमा चलाया जाय व दण्डित किया जाय।

6- अटाला और अकबरपुर इलाके में पुलिस, पुलिस के दलाल और मुखबिर मुकदमे से नाम हटवाने के नाम पर लोगों से हज़ारों रूपयों की अवैध वसूली कर रहे हैं।

हमारी मांग है कि इसकी भी जांच की जाय, इस पर तत्काल रोक लगाई जाय और ऐसे लोगों को दण्डित किया जाय।

7- शहर में 10 जून की घटना के बाद हुई बिना जांच अंधा-धुंध धरपकड़ की घटना के बाद शहर का माहौल बिगड़ा है।

हमारी मांग है कि सही न्यायिक प्रक्रिया द्वारा निर्दोषों को जल्द से जल्द जेल से रिहाकर न्याय पर विश्वास को पुनर्स्थापित किया जाय।

8- कई आरोपियों को दूसरे शहर के जेलों में स्थानान्तरित कर उनके न्याय की स्थानिकता और सम्बन्धियों से मिलते रहने के अधिकार पर रोक लगा दी गयी है, वो भी तब जबकि इन सबकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। यह नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है।

हमारी मांग है कि सभी आरोपियों को उनकी गृह जनपद की जेल में ही निरूद्ध किया जाय।

जांच दल के सदस्य

श्रीवल्लभ मिश्र, आनन्द मालवीय, अविनाश मिश्रा, सीमा आज़ाद, मनीष सिन्हा, सोनी आज़ाद, विश्वेस राजरत्नम, स्थानीय गाइड के रूप में अनवर आज़म और मोहम्मद आक़िब।

इस घटना की यह रिपोर्ट अंतिम नहीं है, इसके बाद भी संगठन मामले की जांच कर और रिपोर्ट भी जारी करेगी।

गाँव के लोग
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