क्या कांग्रेस भाजपा की विकल्प हो सकती है?

सलमान अरशद

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एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है जिसमें पुलिसवालों से घिरे हुए राहुल गाँधी ज़मीन पर बैठे हैं। राहुल एक राष्ट्रीय स्तर के नेता के साथ विपक्ष का मुख्य चेहरा भी हैं, सत्ता का ये व्यवहार निंदनीय है। पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस सत्ता से संघर्ष करते हुए नज़र आ रही है, इस वजह से उदारचित्त नागरिकों और पत्रकारों ने कांग्रेस से अपनी मुर्दा हो रही उम्मीदों में जान डाल ली है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय जनता पार्टी के निरंकुश शासन से जनता परेशान है और इनके विकल्प के रूप में अलग-अलग पार्टियों को देख रही है, इसमें भी कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है, देश में आज भी उसका बुनियादी ढाँचा मौजूद है और एक ताक़तवर सियासी दल के रूप में उसके उठ खड़े होने की संभावना किसी भी दूसरी पार्टी से कहीं ज़्यादा है। इसलिए विकल्पहीनता के इस दौर में जो लोग कांग्रेस पार्टी को भारतीय जनता पार्टी के एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं वो कुछ ग़लत भी नहीं कर रहे हैं। लेकिन जहाँ कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है वहीं भारतीय जनता पार्टी से नाराज़ एक बहुत बड़ा तबका विकल्प के मुद्दे पर ‘वेट एंड वाच’ के मूड में भी है। आइये इसे ही समझने की कोशिश करते हैं कि क्या कांग्रेस सच में भारतीय जनता पार्टी की सियासी विकल्प हो सकती है?

इस सवाल के ज़वाब में सबसे पहले ये देखने की ज़रूरत है कि भारतीय जनता पार्टी की हुकूमत और उसकी सियासत से देश को क्या मुश्किलें पेश आयी हैं, फिर ये देखना होगा कि इन मुश्किलों का क्या कांग्रेस कोई समाधान पेश कर रही है, अगर ज़वाब हाँ है तो फिर कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी के एक विकल्प के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और इसके लिए संघर्ष भी किया जाना चाहिए।

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भारतीय जनता पार्टी की सियासत ने देश को मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिकता में पूरी तरह डुबो दिया है, साम्प्रदायिकता का ये ज़हर पढ़े-लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ों तक, शहर से लेकर गाँव तक, यहाँ तक कि देश के बाहर रह रहे लोगों तक फ़ैल गया है। साम्प्रदायिकता का ये ज़हर शासन-प्रशासन के एक एक अंग में, यहाँ तक कि न्याय तंत्र में भी फ़ैला हुआ है। मुसलमान विरोधी इस सियासत के विरुद्ध क्या कांग्रेस ने अबतक कोई स्टैंड लिया है या कोई सियासी प्रोग्राम जनता से शेयर किया है या खुलकर इस सियासत का विरोध किया है? ज़वाब है नहीं। अयोध्या में राम मंदिर का क्रेडिट लेना हो या कश्मीर में जनविरोधी कार्यवाहियों की, कांग्रेस यहाँ साफ़ तौर पर साम्प्रदायिक सियासत के साथ खड़ी नज़र आती है।

भारत की जेलों में आदिवासियों और मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार के ख़िलाफ़ बोलने वाले ठूंसे जा रहे हैं। इन दोनों समुदायों के सन्दर्भ में कांग्रेस का रिकॉर्ड बेहद ख़राब है। कांग्रेसी हुकूमतों के दौर में सबसे ज़्यादा मुसलमान विरोधी दंगे हुए और दंगे के अधिकतर आरोपियों पर कार्यवाही नहीं हुई। इसी तरह आदिवासियों के गाँव जलाने का मामला हो, फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में उन्हें मारने का मामला हो या आदिवासी महिलाओं से बलात्कार का मामला हो, कांग्रेस के सत्ता में होने या ना होने से इस पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। आदिवासियों पर ज़ुल्म बदस्तूर जारी रहा केंद्र या राज्य में किसी भी दल की सत्ता हो। क्या यहाँ ये मानने में कोई बुराई है कि मुसलमानों और आदिवासियों पर ज़ुल्म के मामले में सभी सियासी दलों का रवैया एक जैसा है?

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भारतीय जनता पार्टी के दौरे हुकूमत में चुनिन्दा पूँजीपतियों ने व्यापार में बहुत तरक्की की है, उन्हें बैंको से मिलने वाले लोन, क़र्ज़ माफ़ी, सरकारी नीतियों से मिलने वाला लाभ, शासन-प्रशासन द्वारा सीधे मिलने वाले लाभ आदि को देखा जाये तो बिना लम्बे-चौड़े जांच-पड़ताल के ये समझना मुमकिन है कि सत्ता द्वारा उन्हें सचेतन और सप्रयास लाभ पहुँचाया जा रहा है। क्या कांग्रेस ने इन स्थितियों को रोकने का कोई वादा किया है या कोई प्रोग्राम शेयर किया है जिससे देश के लोग ये उम्मीद पाल सकें कि जब कांग्रेस हुकूमत में होंगी तो ये लूट बंद हो जाएगी? ज़वाब है नहीं।

देश में बढ़ती महंगाई हो या भ्रष्टाचार, दोनों का सम्बन्ध सरकारी नीतियों से है, यहाँ ये बात ध्यान में रखने की है कि देश की आन्तरिक नीतियाँ हों या विदेश नीति, भाजपा के सत्ता में आने के बाद इनमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है, यानि हम कह सकते हैं कि नीतिगत मामलों में दोनों दलों में कोई मौलिक भेद नहीं है। ऐसे में महंगाई का विरोध अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं है जब तक इसके निवारण का कोई प्रोग्राम पेश न किया जाये। यहाँ भी कांग्रेस की लड़ाई संसदीय राजनीति की रश्मी लड़ाइयों से इतर नज़र नहीं आती। अगर आप गौर करें तो सभी संसदीय दलों में प्रशासनिक कामों को लेकर थोड़े बहुत अंतर नज़र आ सकते हैं लेकिन नीतिगत मामलों में सभी एक साथ खड़े नज़र आते हैं। यही कारण है कि भाजपा के हार्ड हिन्दुत्व की आंधी में सभी संसदीय दल तिनके की तरह बहते हुए नज़र आ रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी की हुकूमत में सत्ता मोखालिफ़ आवाज़ों को जिस तरह दबाने की कोशिश हो रही है और विरोधियों पर जिस तरह दमनात्मक कार्यवाही हो रही है वैसा कांग्रेस की हुकूमत में नहीं हो रहा था, लेकिन बिलकुल भी नहीं हो रहा था ये नहीं कहा जा सकता। यहाँ एक बात पर और ध्यान देने की ज़रुरत है कि सत्ता किसी शौक या नशे की पिनक में जनता पर दमनात्मक कार्यवाही नहीं करती बल्कि पूँजीवादी हितों के लिए ज़रूरी होने पर ही ऐसा करती है, ऐसे में ये सवाल तो उठेगा कि कांग्रेस के जिस ‘सॉफ्ट रवैये’ के लिए उसे विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, क्या वो अब भी जारी रहेगा!

अब तक एक बात तो बिलकुल साफ़ है कि सत्ता कांग्रेस को मिल जाए तो भी सत्ता के मूल चरित्र में कोई बदलाव नहीं आयेगा। फिर भी अपने आप से पूछिए कि क्या फ़िलहाल देश में कोई भी एक सियासी दल है जो ये वादा कर सके कि अगर उसे हुकूमत करने का मौका मिले तो वो शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्तापूर्ण सुविधा सभी नागरिकों को निःशुल्क दे देगी? हम सभी जानते हैं कि कोई भी दल ये वादा नहीं कर सकता, ऐसे में इन्हीं दलों में से इसे या उसे या किसी को भी सत्ता दे दीजिये का फर्क पड़ेगा?

अब एक सवाल अपने आपसे पूछिए, क्या हमारा देश बिना किसी बाहरी सहायता के सभी नागरिकों को निःशुल्क शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा दे सकता है? जब इस सवाल पर विचार करें तो ये भी ध्यान में रखियेगा कि पूँजीपतियों को दिया गया क़र्ज़ जो डूब गया है या माफ़ कर दिया गया है वो 11 लाख करोड़ से भी ज़्यादा है। आपको याद दिला दूँ कि 2021-22 में भारत में शिक्षा का बजट 88 हज़ार करोड़ के आसपास था। इसी के साथ लाखों करोड़ का भ्रष्टाचार है जो हमारी आपकी निगाह में ही नहीं आता। हम इतने संपन्न हैं कि हज़ारों टन अनाज़ सड़ा देते हैं और फिर लाखों लोगों को भूखा मरने के लिए छोड़ देते हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखकर सोचिये कि क्या सिर्फ़ शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्तापूर्ण सुविधा नागरिकों को बिना किसी शुल्क के दिया जा सकता है?

अगर आपने थोड़े से विचार-विमर्श का उपयोग किया होगा तो आपका ज़वाब हाँ ही होगा। अब फिर से सोचिये कि जो संसदीय दल अपने नागरिकों को इतनी मिनिमम सुविधा भी नहीं दे सकते, उन्हें ही अपने किस्मत की चाभी बार-बार सौंपने की ज़रुरत क्यों है?

अब बात थोड़ी उलझ गयी, अगर सभी संसदीय दल नाकारा हैं तो काम करने वाला दल कहाँ से लायें? अगर कोई ऐसा दल वजूद में आ भी गया तो क्या गारंटी है कि वो भी इन्हीं की तरह नहीं हो जाएगा? ये सभी सवाल जायज़ हैं. लेकिन ऐसे सवालों से हम और हमारे जैसे लोग दुनिया में और भी जगह गुज़रे हैं लेकिन उन्होंने कोशिशें की हैं। अंग्रेजों को भगाने की लड़ाई हमने भी तीन सौ साल लड़ी है उसके बाद ही भारत जैसा विशाल देश वजूद में आया और एक नए तरह की हुकूमत भी। क्या एक बार फिर से इस देश और देश की हुकूमत को बदलने पर विचार नहीं करना चाहिए?

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जब मैं इस तरह लोगों से बात करता हूँ कि तो कई लोग कहते हैं कि आज कोशिश शुरू करेंगे और सौ साल बाद सफ़लता मिलेगी, इससे क्या फ़ायदा? यहाँ दो बातें सोचने की ज़रुरत है, एक तो ये कि कोशिश का ये अर्थ कत्तई नहीं है कि जीवन के बाकी के सारे कामकाज रोक दिए जाएँ, ये भी ज़रूरी नहीं है कि किसी मकसद को हासिल करने में जो समय सौ साल पहले लगा था उतना ही आज भी लगे। उदहारण के लिए जो सफ़र सौ साल पहले में आप दिनों में तय करते थे वो आज घंटों में तय होता है। महत्वपूर्ण बात है सही विकल्प पर विचार करना। फिलहाल संसदीय सियासत रातों रात नहीं बदलेगी, लेकिन हम सोचेंगे तो एक रोज़ ज़रूर बदलेगी।

डॉ. सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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