रोटी रोज़गार के फेर में खानाबदोश जिंदगी की ओर बढ़ रहा है लोनिया समाज

सुशील मानव

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 प्रयागराज। सुबह 11 बजे का समय है, पर धूप और उमस इतनी तेज है कि चटक दुपहरिया होने का अहसास हो रहा है। मोबाइल में गूगल तापमान 40 डिग्री सेल्सियस दर्शा रहा है। एक छरहरी लरकोर स्त्री एक हाथ में बच्चा और दूसरे हाथ में रस्सी थामे नंगे पाँव खुंटिहर खेत और जलते चकरोट से गुजरते हुए दलित बस्ती में जा रही है। उसके पीछे-पीछे माटी लादे भैंसा भी चला जा रहा है। एक निर्माणाधीन कमरे पर पहुँचकर वह स्त्री बच्चे को बगल में बिठाकर दोनों हाथों से पूरा ज़ोर लगाकर बोरे की कुर्दी उठाती है और लादी समेत माटी दूसरी ओर ‘लद्द’ की आवाज़ के साथ ज़मीन पर गिर जाती है। स्त्री कुर्दी उठाकर भैंसे पर धरती है, बच्चे को गोद में उठाती है और वापिस खेत की ओर चल देती है। तभी दूसरी स्त्री भैंसे पर माटी लादे आ जाती है वह भी वही सब दोहराती है। फिर पीछे-पीछे दो छोटे बच्चे जिनकी उम्र 10-12 साल होगी, भैंसे का पगहा थामे पीछे पीछे चले आते हैं। चौथे भैंसे का पगहा पकड़े एक किशोर जिसकी उम्र 15 साल होगी आता है। और बार-बार यही क्रम दोहराया जाता है। बच्चे मिट्टी गिराने के बाद वापसी में भैंसे की सवारी करते हुए खेत तक वापिस आते हैं।

दोनों स्त्रियां और किशोर लड़के जहां निर्माणाधीन घर में मिट्टी गिरा रहे हैं, वह पासी समाज के व्यक्ति का घर है। यह पुरवा इतना घना है और यहां की खडंजा चकरोट इतनी सँकरी है कि इस पर से ट्रैक्टर ट्राली नहीं गुज़र सकते। संभवतः इसीलिए लोनिया जाति के लोगों को मिट्टी पाटने का काम मिला है। जहां ये लोग मिट्टी पाट रहे हैं, वहां से महज चार सौ मीटर की दूरी पर वह खेत है, जहां से मिट्टी खोदकर लायी जा रही है। इन दोनों स्त्रियों के ससुर, जेठ, देवर और जीवनसाथी फावड़े से मिट्टी खोदकर, लोहिया तसले में भर-भरकर भैंसे पर लदी कुर्दी भर रहे हैं। खेत में कुल सात भैंसे हैं, जिन पर बारी-बारी से मिट्टी की लदाई और ढुलाई का काम हो रहा है। जबकि पसीने से तर-ब-तर चार पुरुष चार भैंसों पर मिट्टी  खोदकर  लादने के काम में लगे हुए हैं। फूलचंद चौहान जिनकी उम्र 55-60 साल होगी वो और उनके तीन बेटे राजाबाबू, बबलू और बड़के मिट्टी खोदने व् लादने  के श्रमसाध्य काम में लगे हुए हैं। जबकि छोटा बेटा रिंकू जो कि नाबालिग है वह भैंसे पर मिट्टी ढो रहा है। रिंकू की उम्र 16-17 होगी। रिंकू कुछ दिन स्कूल गया लेकिन फिर उसने पढ़ाई छोड़ दी। रिंकू के चेहरे, आंखों और हाव भाव व्यवहार में एक अजीब क़िस्म की बग़ावत दिखती है।

फावड़ा भांजते हुए फूलचंद बताते हैं कि वो लगभग 8 किलोमीटर दूर फूलपुर के कठौता गांव से आये हैं। वहां लोनिया (चौहान) समुदाय के क़रीब 500 परिवार रहते हैं। वे बताते हैं कि कुछ लोग अब दूसरा काम करने लगे हैं पर बहुत से लोग अब भी अपने पुश्तैनी काम में लगे हुए हैं। ट्रैक्टर ट्रॉली और जेसीबी के इय युग में क्या बराबर काम मिल जाता है?, पूछने पर फूलचंद बताते हैं कि ‘हां काम मिल जाता है।’ वह  पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि आने वाले समय में फिर उनके काम का बोलबाला होगा क्योंकि ट्रैक्टर हर जगह नहीं जा सकेगा। फूलचंद बताते हैं कि उनके छः बच्चे हैं। दो बेटियों और दो बेटों की शादी उन्होंने कर दी है। उनके पास कुछ खेत है जिसमें वे लोग सीजन की फ़सलें और पशुओं के लिए चारा उगाते हैं। उन्हें सरकारी राशन मिलता है। आवास और शौचालय के बारे में पूछने पर फूलचंद बताते हैं कि उन्हें आवास नहीं मिला है। लेकिन उन लोगों ने अपनी कमाई से तीन पक्के कमरे बनवा लिये हैं। शौचालय अभी नहीं है। क्या सरकार की ओर से शौचालय नहीं मिला, पूछने पर वो सिर हिलाते हुए कहते हैं कि नहीं। ग्राम प्रधान मन्नीलाल भारतीया हमारी एंटी पार्टी हैं। इसलिए शौचालय नहीं दिया।

फूलचंद की बीबी घर पर अकेले रहकर घर और खेत बारी की देखभाल करती हैं। फूलचंद बताते हैं कि आज के दौर में भैंसों के लिए चारे की व्यवस्था करने में सबसे अधिक मुश्किल पेश आती है। उनके पास इतना खेत नहीं है। जो है उसमें भैंसों के लिए चारा बोते हैं। और बाज़ार से भी ख़रीदकर खिलाते हैं। वह बताते हैं कि पहले के समय में दूसरे के खेतों में निराई कर लेते थे तो इन्सान और मवेशी दोनों के लिए आहार की व्यवस्था हो जाती थी। लेकिन अब लोग घास जलाने वाली दवा का छिड़काव कर देते हैं, जिससे निराई का काम और घास दोनों खत्म हो जाते हैं। धीरे-धीरे परती ज़मीन, तालाब और सरकारी चारागाह भी खत्म हो गये हैं।

थोड़ी देर बाद राजाबाबू पानी पीने के लिए खेत में स्थित पेड़ की छांव तले बैठता है। फिर हम उससे बात करते हैं। बातचीत के दौरान राजाबाबू सहज नहीं हो पाते। वे बार-बार यही कहते हैं कि आप इतनी पूछताछ क्यों कर रहे हो? आप हमारा वीडियो बनाकर सबको दिखाओगे। हम उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि वीडियो बनाने के लिए मोबाइल लगातार चालू करके एक फ्रेम में रखना पड़ता है जबकि हम केवल फोटो खींच रहे हैं। हम उनसे प्रतिप्रश्न करते हैं कि क्या आप कोई ग़लत काम कर रहे हैं?  या कि क्या हम लोग कोई ग़लत बातचीत कर रहे हैं, या कि क्या आप कुछ ग़लत बोल रहे हो जो आप इतना डर रहे हो? लेकिन राजाबाबू अपनी बात पर अड़ा रहता है वो कहता है कि आजकल लोग ग़रीबों का वीडियो बनाकर वायरल कर देते हैं। कुछ देर बाद बातचीत के दौरान ही जब हम राजाबाबू से कहते हैं कि अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हो? उनका बचपन और ज़िन्दगी मिट्टी और खेत में क्यों ज़ाया कर रहे हो? उन्हें स्कूल भेजो पढ़-लिख जाएंगे तो कुछ अच्छी आमदनी वाला काम कर सकेंगे। आखिर यह काम कब तक मिलेगा। उन्हें कुछ पढ़ाओ, सिखाओ ताकि जब उनके सामने यह काम न हो तो वे दूसरा काम कर सकेंगे। बातचीत के दौरान राजाबाबू पूछता है कि क्या हम उसकी नौकरी किसी कंपनी कारखाने में लगवा सकते हैं? जब हम उससे पूछते हैं कि क्या मिट्टी पाटने का यह काम बराबर मिलता है तो वो सिर हिलाकर कहता है- नहीं। केवल गर्मियों के तीन महीनों में ही काम मिलता है, जब चैती की फसल की कटाई के बाद अधिकांश खेत परती पड़े होते हैं। आषाढ़ में जहां पानी बरसा और धान की रोपाई शुरू हुयी तहाँ मिट्टी पाटने का काम मिलना बंद हो जाएगा। ‘अच्छा, तब क्या करते हो?’  पूछने पर राजाबाबू सिर हिलाकर कहता है-‘कुछ नहीं।’ ऐसे ही पड़े रहते हैं, खेत बारी देखते हैं। क्या तीन महीनों में इतनी कमाई हो जाती है कि पूरा परिवार 9 महीने बैठकर खा सके। इस सवाल के जवाब में राजाबाबू और फूलचंद कुछ नहीं बोलते। रुपये-पैसे और कमाई की बात पर अक्सर ग्रामीण समाज के लोग चुप्पी मार जाते हैं। फिर एक अजनबी से बताने का क्या तुक। चोरी, डकैती, छिनैती का भी डर होता है।

जहां पर चाचा, ताऊ, पिता और बाबा काम में लगे हुए हैं, वहीं बग़ल में ही पेड़ के नीचे चार छोटे-छोटे बच्चे एक बैठे हुए भैंसे पर पसरे अपने चाचा रिंकू को नीचे खींचकर खुद भैंसे पर बैठने के चुहल में लगे हुए हैं। लेकिन उनका नन्हा सा सामूहिक कार्य-बल उस एक भारी भार-बल के सामने कमज़ोर पड़ रहा है। जबकि तीन छोटी-छोटी बच्चियां अपनी मां के लूगा (साड़ी) का फटा टुकड़ा लपेटे वहीं खेत से पचास क़दम की दूरी पर मौजूद ग्रामदेवी के मंदिर में एक नंग धड़ंग दुधमुंहा बच्चा गोद में लिए खेल रही हैं। साथ ही वे बच्चियां खुद को और उस दुधमुंहे बच्चे को धूप से भी बचा रही हैं। इस तरह बच्चियां अपनी मां के काम करने में सहायिका की भूमिका निभा रही हैं।

पुरुषों के जीवन में झांकने के बाद हम कोशिश करते हैं कि लोनिया समाज की स्त्रियों से भी कुछ जाना समझा जाये। विशेषकर उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के बारे में। लेकिन बहुत दीदी बहिनी कहने पर भी वे स्त्रियां बात करने को तैयार नहीं होतीं। यहां तक कि वे अपना नाम तक नहीं बताती हैं। पूछने पर कहती हैं –’क्या करोगे हमारा नाम जानकर।’ हम बताते हैं कि हम पत्रकार हैं रिपोर्ट में आपके नाम का जिक्र करेंगे। लेकिन वे  किसी क़ीमत पर अपना नाम नहीं बतातीं। यहाँ तक कि जब हम उनकी फोटो खींचने लगते हैं तो वे चलते-चलते ही भैंसे के पीछे छुपने का प्रयास करती हैं। नहीं छुप पाती तो अपना मुंह ही दूसरी ओर घुमाकर खुद को मोबाइल कैमरे के फोटो फ्रेम में क़ैद होने से बचाने का प्रयत्न करती हैं।

वहीं 14 मई को रिपोर्ट के सिलसिले में घूमते हुए कछार क्षेत्र के जमुनीपुर कोटवा में दोपहर 2 बजे एक बगिया में पहुंचे। जहां सड़क किनारे मौजूद बगिया में एक लोनिया स्त्री ईंट लकड़ी जुटाकर जस्ते की कड़ाही और स्टील के भगोने में दाल भात पकाकर खाने वालों के इंतज़ार में बैठी है। बग़ल में पांच-छः साल की बिटिया बैठी खाना खा रही है। उसके झोंटे (बालों) में ख़ूब मिट्टी भरी हुयी है। सामने ही पेड़ के नीचे दो भैंसे बंधे हुए हैं। उनके आगे बोरे में कुछ चारा रखा गया है, जिसे वे बैठे-बैठे खा रहे हैं। बग़ल में एक दीन-हीन लॉरी खड़ी है, जिस में कूटी और भूसा भरा  हुआ है। बग़ल में ही एक टीवीएस एक्सएल की दोपहिया विक्की गाड़ी खड़ी है।

रसोंई के समय बिना बुलाये मेहमान की तरह पहुंच जाने पर वो स्त्री सकपका सी जाती है। फिर बातचीत के दौरान वे बताती हैं कि उसका निवास वहां से 30-35 किलोमीटर दूर फूलपुर में है। वो बताती है जमुनीपुर गांव में उसे चार कमरे के एक मकान को पाटने का काम मिला है। मिट्टी एक किलोमीटर दूर से ले जाकर पाटना है। ऐसे में लगभग एक महीना लगेगा। हालांकि अपना और पति का नाम पूछने पर वह महिला भी नाम बताने से मना कर देती है। इस तरह हम देखते हैं कि लोनिया समुदाय के लोग रोटी रोज़गार के लिए अपने घर बार से दूर बीबी बच्चों और भैंसों को लेकर खानाबदोश जीवन जी रहे हैं। इस कारण इस समाज की भावी पीढ़ी (बच्चे) भी शिक्षा जैसी ज़रूरी चीज से वंचित हो रहे हैं। स्कूली शिक्षा से वंचित होने के साथ ही वो पौष्टिक आहार से भी वंचित हो जाते हैं।

वहीं गांवों में मनरेगा का काम ट्रैक्टर और जेसीबी से हो रहा है। अपने परम्परागत काम को छोड़कर दूसरा काम करने के लिए इस समुदाय के पास न तो बहुत अवसर है, न ही शिक्षा। इसे छोड़कर भी वे लोग ज़्यादा से ज़्यादा खेतों और शहर के लेबर चौक पर दिहाड़ी का काम तलाश कर सकते हैं।

यूं तो लोनिया समुदाय उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्ग में आते हैं। लोनिया, लूनिया (नोनिया, नूनेरे) जाति समूह उत्तर प्रदेश और बिहार में मुख्य तौर पर पाये जाते हैं। यह जाति उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से पूर्वोत्तर के जिलों में पाई जाती हैं। इनकी बहुतायत आबादी मिर्ज़ापुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया, कुशीनगर, जौनपुर, मऊ, महाराजगंज, चंदौली और बहराइच में हैं। जबकि छिटपुट तौर पर ये अन्य जिलों में भी पाये जाते हैं। आमतौर पर इन जिलों को सूबे के सबसे पिछड़े जिलों में गिना जाता है जहाँ न तो शिक्षा और स्वास्थ्य का सार्वजनिक आधुनिक ढांचा विकसित हुआ है न लोगों को रोटी रोज़गार देने वाला उद्योग और कल कारखाना। ऐसे में समाज के बेहद पिछड़े समुदाय से आने वाले लोनिया समुदाय के लोगों के पास बहुत कम विकल्प होता है कि वह अपना परम्परागत काम छोड़कर काम के दूसरे विकल्प तलाशें।

वहीं अपना संस्कृतिकरण करते हुए लोनिया समुदाय के लोग भी अब अपने नाम के आगे ‘चौहान’ टाइटल लिखने लगे हैं और खुद को पृथ्वीराज चौहान का वंशज और राजपूत होने का दावा करते हैं। यह समुदाय पिछड़ी जाति समूह में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सबसे वंचित समुदाय से हैं। और लम्बे अर्से से इस समुदाय के नेता लोनिया जाति को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग करते आ रहे हैं।

ओबीसी वर्ग में होने के नाते फिलहाल सूबे में लोनिया समुदाय की आबादी का आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है। उत्तर प्रदेश की जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ संजय चौहान लोनिया जाति के नेता हैं। उनका दावा है कि प्रदेश में लोनिया-चौहानों की आबादी पौने तीन करोड़ हैं। जोकि उत्तर प्रदेश की वर्तमान जनसंख्या का 11.73 प्रतिशत है। इस तरह उनका दावा खुद ब खुद झूठा साबित हो जाता है। क्योंकि अगर इस समुदाय की आबादी 11-12 प्रतिशत होती तो हर चुनावी पार्टी उन्हें अपने वोट बैंक के तौर पर साधने में लगी होतीं। और प्रधानमंत्री तो अब तक उनकी जाति का नायक ढूंढ़कर उन्हें सम्बोधित भी कर चुके होते।

सुशील मानव गाँव के लोग डॉट कॉम के  संवाददाता हैं।

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