मानस पटलनामा यानि मेरी स्मृतियों में बाबूजी रामनरेश यादव

डॉ नत्थू सिंह यादव

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जब उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पटल पर रामनरेश यादव का अभ्युदय हुआ तो अभिजात्य वर्ग कुछ क्षणों के लिए भी उनको पचाने को तैयार नहीं था । उनको चुन-चुनकर गालियां दी गईं । जाति के नाम पर अपमानजनक नारे बनाए और दीवारों पर लिखे गए लेकिन बाबूजी रामनरेश यादव किसी और ही मिट्टी के बने हुये थे। उनकी कलम ने संख्या में मुट्ठी भर किन्तु समाज को नकेल डाले बुर्जुआ कबीलों को इतना चोटिल किया था कि वे भूल बैठे थे कि वे चरवाहे नहीं हैं बल्कि संविधान की रखवाली करने वाली जमात के नायक हैं। अपने अभिजात होने के नशे में चूर तथाकथित धर्मनिरपेक्षिता की आड़ में मुंह छिपाए रखने वाले सवर्ण पाखंडी समुदाय को तनिक भी भान नहीं था कि ‘लहू रहित क्रांति कैसे होती है’। लेकिन बाबूजी ने  कुछ निर्णायक कदमों से सामाजिक परिवर्तन का आगाज कर दिया था। उन्होंने अपने चारित्रिक संयम से उत्तर प्रदेश में ‘सामाजिक न्याय’ की पौधशाला तैयार कर डाली थी |

अपनी वकालत की जमीन से सीधे मुख्यमंत्री के पद  पर छलांग लगाकर उन्होंने राजनैतिक पंडितों को हक्का बक्का कर दिया आगे बढ़ते ही गये । जीवन में आनेवाले अपरिहार्य उतार-चढ़ाव ने उन्हें अपनी ईमानदारी, सज्जनता, फैसलों की साहसिकता , जनता की सहायता करने के जज्बात, निर्धनों की राह आसान करने वाले मसीहा के रूप में समादृत होते गए। चेहरे पर सहजता के हमेशा भाव, सरोकार जाहिर करतीं आंखें, मधुर मुस्कान से सामने वाले का मनचित्त जीतने वाले, लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्परता, कठोर नियम के पालन में धीरता और सजगता आदि कुछ ऐसे बिरले गुणों के स्वामी थे हमारे बाबूजी राम नरेश जी यादव।

मेरा सौभाग्य है कि मुझे बाबूजी के साथ अनेक अविस्मरणीय क्षण गुजरने का मौका मिला और आज भी जब उनकी सदाशयता और बड़प्पन के कुछ ऐसे संस्मरण हैं जिनको साझा करना चाहूँगा ।

बात 1998  के अक्टूबर के आसपास की है । मेरी पत्नी ममता यादव, बड़े पुत्र आशीष और मै असमंजस की स्थिति में लखनऊ मेल के अंदर दिल्ली में बैठे थे । समस्या यह थी कि हम अपने पुत्र का स्वास्थ्य परीक्षण कराके लखनऊ आ रहे थे। पुत्र के स्वास्थ्य की वास्तविक स्थिति ऐसी जर्जरावस्था में थी कि उसको न बैठाया जा सकता था और न लिटाया जा सकता था। सिर्फ और सिर्फ हर अंग को पोरूओं से सहलाते हुआ फैलाया जा सकता था। लेकिन जगह ऐसी थी कि दिक्कत दो गुनी हो गई थी, क्योंकि प्रथम श्रेणी के कूपे में हमारी दोनों सीट ऊपर वाली थी। और ऊपर बेटे को लेकर बैठना हमारे लिए पहाड़ जैसा था। टीटी महोदय भी सहयात्रियों की आपसी सहमति से समस्या सुलझाने की सलाह दे चुके थे । गाड़ी छूटने का समय नजदीक आता जा रहा था और मैं बेताब होकर अपनी बैचैनी बढ़ा रहा था । हमने अपने पुत्र को नीचे की ही सीट पर ही लिटाया हुआ था और माँ बेटे की देखभाल में व्यस्तता के साथ-साथ हमेशा की तरह आदतन मुझे ढांढस दे रही थी।

तभी मैं क्या देखता हूँ कि सुरक्षा कर्मचारियों का एक हुजूम आया जिसके पहरे में जिसमें आदरणीय बाबूजी हमारे सामने खड़े थे । हमारी अच्छे से पुरानी पहचान थी । तो उन्होंने हालचाल पूछा और कुछ ही पल में यह कहकर कि बच्चे और बहू को आराम की जरूरत है , पूरा कूपा हमारे हवाले कर दिया और लावलश्कर के साथ वहाँ से चले गए । हम क्या कहते ! बस अभिभूत थे। थोड़ा समय बीतने पर मैं टीटी महोदय जान पाया कि उनकी व्यवस्था चाकचौबंद है।

एक बारबाबूजी के लखनऊ के सरकारी मकान में दावत में हम कई परिवार इकट्ठा थे और माहौल के विपरीत लोग अपन अपने काम के लिए बाबूजी को घेरे हुए थे। उस वक्त हमने उनकी धैर्यवान, क्षमतावान, निर्णायक भूमिका और सहजता के प्रदर्शन से समझा कि इतनी अलग-अलग तरह की समस्याओं को सुनकर उनका समुचित हल निकालना ही बाबूजी को एक महान व्यक्तत्व बनातीं है |

बात 2005 की है जब बाबूजी फूलपुर से विधायक थे और विधानसभा क्रियाशील थी | मेरे मित्र डॉ उदय भान, जो इस समय प्रोफेसर हैं, बाबूजी के पास आजमगढ़ से शिक्षकों समस्याएं लाये थे जिनके समाधान उनके माध्यम से होने थे । आप उनके जमीन से जुड़े होने की शैली का अंदाज़ा लगाइये कि मुख्यमंत्री होने के बावजूद बाबूजी घर में अकेले ही थे और कोई भी कर्मचारी उनकी मदद के लिए नहीं था घर में । वे आत्मसंयमी व्यक्ति थे और किसी भी तरह की टीमटाम उनको पसंद नहीं था। वे स्वयं उठे और हम दोनों के लिए गुड़ और पानी लाये। उनकी इस सादगी से मैं तो अभिभूत हो गया और मेरे रोंये खड़े हो गये।

लेकिन जगह ऐसी थी कि दिक्कत दो गुनी हो गई थी, क्योंकि प्रथम श्रेणी के कूपे में हमारी दोनों सीट ऊपर वाली थी। और ऊपर बेटे को लेकर बैठना हमारे लिए पहाड़ जैसा था। टीटी महोदय भी सहयात्रियों की आपसी सहमति से समस्या सुलझाने की सलाह दे चुके थे । गाड़ी छूटने का समय नजदीक आता जा रहा था और मैं बेताब होकर अपनी बैचैनी बढ़ा रहा था । हमने अपने पुत्र को नीचे की ही सीट पर ही लिटाया हुआ था और माँ बेटे की देखभाल में व्यस्तता के साथ-साथ हमेशा की तरह आदतन मुझे ढांढस दे रही थी।

यही नहीं , वे मुझसे यह भी पूछना नहीं भूले कि अब आना क्यों छोड़ दिया है और क्या इनके साथ आप भी इसी काम के लिए आये हैं ?  बाबूजी ने डॉ उदयभान की हर समस्या को सुना, ब्यौरे लिए और लिपिबद्ध करके अगले दिन विधानसभा में सूचीबद्ध कराकर प्रश्नों के रूप में रिकॉर्ड बनवाया । विधानसभा द्वारा की गई कार्यवाही की प्रति देते हुये मेरे मित्र को वापस आजमगढ़ जाने की इजाजत दी । कालांतर में विधानसभा में सूचीबद्ध सारे कार्य पूरे हुये । बाबूजी की सादगी एवं जमीन से जुड़े व्यक्तित्व को देखने के बाद आज यह समझ में आता है कि विधायक गण कैसे कार्य करते और समाज को बेवकूफ बनाकर धंधा करते हैं।

जनपद आजमगढ़ स्थित अपने गाँव अम्बारी में बाबूजी ने महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय खुलवाया है जिसमें गृह विज्ञान विभाग विशेष तौर पर खोला गया है जिसका कारण स्वयं बाबूजी ने एक वृतांत के रूप में एक बैठकी के दौरान बताया था।  हुआ यह था कि बाबूजी की पुत्री का प्रवेश बहुत प्रयास के बाद भी गृह विज्ञान विषय में बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय,वाराणसी एवं प्रयागराज आदि जगहों पर नहीं हुआ था तो इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने वहाँ एक महाविद्यालय खुलवाने का मन बनाया और अंततः कालेज खुलवा कर ही दम लिया । इससे अब उस इलाके की कितनी ही बेटियों को शिक्षण संस्थानों का चक्कर नहीं काटने पड़ते ।

उनसे मिलने के दौरान एक बात पर मैंने गौर किया । सामान्य तौर हर जनपद से आने वाले आगन्तुक से वे पूछते थे कि बारिश कैसी हुई है? फसल कैसे हुई है? सरकारी कर्मचारी मदद करते हैं कि नहीं? नहरों का पानी बराबर आता है क्या ? लगान जमा करने में परेशानी तो नहीं होती? पुलिस तंग करती है क्या ? आदि आदि । और हर मिलने वाला इस आत्मीयता से खुश और संतुष्ट होकर ही जाता ।

यहाँ यह कहना आवश्यक हो जाता है कि जिस शक्तिशाली पुरोध ने न जाने कितनों को (मेरी ही जानकारी में) सरकारी मकान एवं कोठियां आवंटित कर दी थी वह स्वयं ने लखनऊ में  मुख्यमंत्री और महामहिम राज्यपाल के पद पर आसीन रहते हुए भी बेघर ही दुनिया से महाप्रयाण किया…

       ( डॉ नत्थू सिंह यादव पूर्व बैंकर हैं। फिलहाल लखनऊ में रहकर समाजकार्य में संलग्न हैं।)

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