Wednesday, May 6, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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तेईस मार्च को भगत सिंह और लोहिया को याद करने के मायने

डॉ. राम मनोहर लोहिया फ़ासीवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी थे लेकिन समाजवाद के समर्थक थे। डॉ लोहिया का जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ एक गहरा बौद्धिक और वैचारिक जुड़ाव था। इसी प्रभाव के चलते, 1934 में जर्मनी से लौटने के बाद, उन्होंने (24 वर्ष की आयु में) 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया। वे इसकी कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने और पार्टी के मुखपत्र, 'कांग्रेस सोशलिस्ट' के संपादक नियुक्त किए गए। आज उनकी 116 वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख। 

क्या भारत के पहले आदिवासी राष्ट्रपति संविधान की रक्षा करेंगे या चुप्पी साध लेंगे?

माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, आपके होम स्टेट ओडिशा में – नियमगिरी, गोपालपुर और पूरे दंडकारण्य में – आदिवासी कितने सालों से नुकसान पहुंचाने वाले डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स का विरोध कर रहे हैं। भारत की आबादी में आदिवासी सिर्फ़ 8-9% हैं, लेकिन आज़ादी के बाद से डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स की वजह से बेघर हुए लोगों में वे 75% हैं। उनके विरोध को नक्सलवाद का लेबल लगाकर कुचला जा रहा है। आपके साइन लेने और संविधान बनाने वालों द्वारा आदिवासियों को दिए गए खास अधिकारों को खत्म करने के लिए आदिवासी समुदाय की एक महिला को सबसे ऊंचे पद पर बिठाने की साज़िश है। मैं यह खुला खत खास तौर पर, श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, इस साज़िश से सावधान करने के लिए लिख रहा हूं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : एपिस्टन फाइल के शिकारियों के देश में महिलाओं के सामने अभी भी कई पहाड़

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 115 साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन दुनिया भर में पुरुष-प्रधान सोच अभी भी कायम है। ताकतवर नेताओं और उद्योगपतियों से जुड़े एपस्टीन के खुलासे हमें याद दिलाते हैं कि कितनी आसानी से महिलाओं के साथ आज भी मज़े की चीज़ जैसा बर्ताव किया जाता है। जब तक महिलाओं को मर्दों की खुशी के लिए सामान समझा जाता रहेगा, तब तक असली आज़ादी नामुमकिन रहेगी। पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख।

अंध भक्त ही नहीं, अपशब्द और नफरती भाषण देने में सर्वोच्च नेता भी पीछे नहीं

देश में नफरत फैलाने वालों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है, यहां तक ​​कि केंद्र सरकार ने हाल ही में भारत मंडपम में सनातन राष्ट्र शंखनाद की बैठक के लिए 63 लाख रुपए दिए। इस कार्यक्रम में मुसलमानों के खिलाफ भाषण दिए गए, जिनका मुख्य विषय हिंदू राष्ट्र की मांग था। मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म द्वारा प्रस्तुत एक हालिया अध्ययन में घृणास्पद भाषणों के प्रकारों और विवरणों का गहन विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार, 2024 से 2025 के बीच घृणास्पद भाषणों की संख्या में कमी आई है। रिपोर्ट में सामने आया है कि सबसे अधिक घृणास्पद भाषण महाराष्ट्र सरकार में मत्स्य एवं बंदरगाह विकास मंत्री नितेश राणे (10) ने दिए, उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (6), असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पांच-पांच भाषण दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन घृणास्पद भाषण दिए।

महात्मा गांधी …जै राम जी!

मनरेगा मांग-आधारित योजना है, लेकिन नए विधेयक में इससे राम-राम कर लिया गया है। 125 दिनों के रोजगार की उपलब्धता उन क्षेत्रों के लिए होगी, जिसका चयन केंद्र सरकार करेगी। इस चयन के मापदंड का उल्लेख विधेयक में नहीं मिलता और हम आसानी से अनुमान लगा सकते है कि यह चयन भाजपा की राजनैतिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम बनेगा। इसके साथ ही, ग्रामीण विकास योजनाओं को तैयार करने में ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता भी खत्म हो जाएगी और उन्हें केंद्र की बनी-बनाई लीक पर काम करना होगा। इस प्रकार, राज्यों और केंद्र के बीच संविधान में उल्लेखित सहकारी संघवाद की अवधारणा को भी दफनाया जाएगा।

सरकार चाहती है कि विपक्षी सांसद बिधूड़ी, बृजभूषण की तरह बर्ताव कर अपना निलंबन बचाएं : ओ’ब्रायन

नयी दिल्ली (भाषा)। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सदस्य ने विपक्ष के 14 सांसदों के संसद से निलंबित रहने के बीच मंगलवार को तंज...

बिना आधार के नहीं मिलेगी मनरेगा की मजदूरी

नयी दिल्ली। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत मजदूरी भुगतान का भुगतान अब आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (एबीपीएस) के माध्यम से...

देश में 5.33 करोड़ घरों से अभी दूर है ‘नल से जल’ का सपना, तीन राज्यों में सबसे खराब हालात : RTI

नई दिल्ली (भाषा)। भारत सरकार ने 2024 तक देश के प्रत्येक गांव के हर घर में नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा है,...

न्यूजक्लिक मामले में सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा से पूछताछ

नयी दिल्ली (भाषा)। समाचार पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ को कथित तौर पर विदेश से वित्तपोषण और उसकी ‘भारत विरोधी गतिविधियों’ की जांच के सिलसिले में दिल्ली...

ईवीएम कॉर्पोरेट का राजनीतिक हथियार है जिसके बल पर वह जब चाहे जिसकी सरकार बनवा सकता है- डा. रत्नेश कातुलकर

ईवीएम अपने आरम्भ से ही विवादों के घेरे में रही है। इसको लेकर भिन्न-भिन्न पार्टियां और कार्यकर्ता (जिनमें जन सरोकार वाले कार्यकर्ता से लेकर...
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