एक बार दक्षिण अफ्रीका

संतोष कुमार

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पहली किस्त 

मानव कुल की जन्मभूमि है अफ्रीका। इसके दक्षिणी हिस्से में घूमते हुए देखकर लगा कि प्रकृति ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति को अपनी सर्वोत्तम पृष्ठभूमि मे ही खेलने, बढ़ने और जूझने का अवसर दिया । इस महाद्वीप के किनारे पर उतरते समय काफी भावुक हो उठा था। सेसल्स के माहे द्वीप से उठता जहाज जब एयर टर्बुलेन्स में हिचकोले लेने लगा तो मैं स्थिति की गम्भीरता को एयर होस्टेस के चेहरे पर दिखने वाले भावों से नाप रहा था, जब उसके चेहरे पर चिन्ता की कुछ लकीरें दिखीं तो मुझे इस महाद्वीप के महासागर के तूफानों में फंसे गिरमिटियों की याद आने लगी । लाखों वर्षो के मनुष्यों के संघर्ष में कितने पानी के जहाज इस महाद्वीप से बाहर निकलने तथा आने की कोशिश में जल की अथाह गहराइयों मे अपने सपनों के साथ डूब गए होंगे।

‘मैं आता हूं कल के निग्गर यार्ड से / उत्पीड़क की नफरत को फांदते हुए / और अपनी खुद की पीड़ा को भी ।/ मैं आता हूं दुनिया मे अपनी आत्मा पर खरोंचे लिए / शरीर पर घाव और हांथो मे क्रोध लिए / मैं पलटता हूं पन्ने लोगों के इतिहास के और जनता की जिन्दगी के। / मैं जांचता हूं चिन्गारियों की बरसात और सपनों की सम्पदा ।/ मैं खुश हूं वैभव से और दुखी हूं दुखों से ।/ समृद्ध हूं समृद्धियों से और निर्धन हूं खोए लोगों से।/ गुजरे हुए कल के निग्गर यार्ड से मैं आता हूं अपने बोझ के साथ / आने वाले कल की ओर मुड़ता हूं ताकत के साथ’ ----मार्टिन कार्टर, गुयाना

तो मैं जिक्र कर रहा था कि महाद्वीप के किनारे उतरते-उतरते भावुक हो रहा था। मानव कुल इसी जमीन पर विकसित हुआ और विभिन्न रास्तों से पूरी दुनिया में  फैला, मानवता के इसी विस्तार में भारत भूमि भी है। हवाई अड्डे पर उतरने के बाद सामान आदि कहां मिलेगा इसीलिए चक्कर लगा रहा था कि दो अश्वेत लोगों से वो जगह दिखाने की गुजारिश किया और रास्ते में उन्होंने इसके एवज में  कुछ पैसे चाहे, उनकी विनम्रता देखकर मैंने कुछ रुपए दिए और एवज में उनका जोरदार धन्यवाद पाया।

बाहर निकलते ही चौड़ी सड़कों का जाल एवं उसपर दौड़ती कारों को देखकर मन में कुछ दरक-सा गया कि यह मुल्क तीसरी दुनिया, जो कि अपनी दुनिया है, का हिस्सा नहीं लग रहा है। चौड़ी सड़कें, हाइवे, कारें अजूबी नही हैं लेकिन महत्वपूर्ण था उसके आसपास का वातावरण । दूर-दूर तक काली चमकती सड़कों पर गन्दगी तो दूर की चीज है, एक भी तिनका नही दिखेगा। सड़कों की पटरियों की हरी घास लगता है जैसे करीने से तराशी गई है और टायरों की सरसराहट के अलावा कोई भी आवाज नहीं सुनाई पड़ी लगता है । लोगों की गाड़ियो के हार्न निकलवा दिए गए हों।

यहां घूमते समय सड़कों पर कभी जानवर नहीं दिखे । जहां पर पालतू जानवरों को सड़कों पर आने की सम्भावना है उसके एक-दो किमी दूर से ही इन जानवरों  के सड़क पर आने की सम्भावना के संकेत दिखाई देने लगते हैं, इससे स्पष्ट है कि ऐसा सामान्यतया नहीं होता है। हजार-पांच सौ किमी सड़कों पर चलने पर भी सड़कों पर पालतू जानवर नहीं दिखे, भले ही इससे सावधान रहने के बोर्ड सड़कों पर दिखें। प्रायः राजमार्गों के किनारे फैन्सिंग रहती है, जिसके उस पार आपको बड़े-बड़े फार्मों में मक्के के लहलहाते खेत और स्वस्थ एवं खूबसूरत पालतू गायों का झुंड चरते दिख जाएँ ।

प्राकृतिक रूप से इतने समृद्ध मुल्क मे अधिकांश अश्वेत आबादी स्लम में रहने को क्यों अभिशप्त है ? यहां के समृद्ध बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर का स्तर देखकर आश्चर्य हो रहा है। हालांकि जिन स्लम बस्तियों को मैंने दूर से देखा उनकी स्थिति मुझे अपने मुल्क के स्लमों से बेहतर दिखी। यहां पर तीसरी दुनिया के मुल्कों के बीच  ऐतिहासिक साम्यता दिखी कि ये स्लम इन मुल्कों के अभिजात वर्ग ने उपभोगवादी जीवन शैली के लिए रचे हैं ।

एक महत्वपूर्ण आदत यहां के लोगो मे पायी जाती है कि जब भी दो लोग एक-दूसरे के आमने-सामने होते हैं एक दूसरे की खैरियत अवश्य पूछते हैं। इससे इस मुल्क के दो अनजान नागरिकों में भी आपस मे एक सकारात्मक संवाद का पुल बन जाता है। हमारे यहां यह ऐच्छिक होता है लेकिन यहां पर जरूरी और महत्वपूर्ण औपचारिकता होती है। आपके कितने भी सम्पन्न या महत्वपूर्ण हों लेकिन बाहर निकलते वक्त चौकीदार वगैरह से जरूरी औपचारिकता अवश्य निभाएं अन्यथा असभ्यों की श्रेणी मे गिने जाएंगे । यह इतना महत्वपूर्ण होता है कि यदि आप किसी से दिन मे कई बार मिलते हैं तब भी सामने वाले की खैरियत पूछ कर ही अपनी बात कहना सभ्यता का तकाजा है।

जब तक हिरन अपना इतिहास / खुद नही लिखेगें तबतक /  हिरनों के इतिहास मे / शिकारियों की शौर्य गाथाएं / गायी जाती रहेंगी !चिनुआ अचेबे

उपरोक्त कविता इसलिए याद आ रही है क्योंकि यह महत्वपूर्ण है कि इस मुल्क को देखने वाली निगाह की ब्याख्या करने वाला मस्तिष्क अश्वेत, गोरा, एशियायी या किसी अन्य किसी समुदायिक चेतना की निर्मिति से कितना स्वायत्त है । इस महाद्वीप से मनुष्य छोटी-छोटी नदियों की तरह निकले और पूरे भू-भाग पर समुद्र की तरह छा गए । उसी जन समुद्र की कुछ लहरें सहस्त्राब्दियों बाद प्रशान्त और हिन्द महासागर पर सवार होकर वापस लौटीं और उन्होंने इस जमीन को अश्वेत रक्त से सरोबार करके जनसांख्यिकी को एक नयी रंगत दे दी ।

अफ्रीकी सड़कों पर

दक्षिण अफ्रीका का क्षेत्रफल भारत के 37 प्रतिशत के बराबर है और जनसंख्या भारत का मात्र 4.14 प्रतिशत है। जिसमें 9 प्राविन्सेज और 52 डिस्ट्रिक्ट हैं । पूरा देश 8 मेट्रोपोलिटन शहरों, 44 डिस्ट्रिक्ट  म्यूनिसपैलिटीज और 226 लोकल म्यूनिसपैलिटीज में विभाजित है। हजार-पांच सौ किलोमीटर एक दिन में  कारों से चल लेना सहज है क्योंकि दूर-दूर जानेवाली सभी प्रमुख सड़कें फोरलेन हैं और आपकी कार में रखा गिलास का पानी जुम्बिश तक नहीं करेगा । अगर कैमरे नहीं लगें हो तो लोग अधिकतम प्राविधानित 120 की रफ्तार को कब पार कर जाएंगे पता नही चलेगा । प्रत्येक पेट्रोल पम्प पर सारी विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलव्ध मिलीं। चाहे टायलेट हो या खाने-पीने की चीज। पेट्रोल भरने वाला गाड़ी का विन्डस्क्रीन और साइडस्क्रीन को साफ करके आपकी गाड़ी का हवा-पानी भी चेक करेगा। सैकड़ों किलोमीटर चले जाइए आपको कार का हार्न नहीं सुनाई देगा । हार्न यहां पर अप्रसन्नता प्रगट करने के लिए बजाया जाता है जबकि अपने यहां तो अनायास खाली सड़कों पर भी लोग प्रेशर हार्न बजाकर दूसरों को परेशान देखकर आनन्दित होते हैं । अगर आपने ओवरटेक किया है तो पीछे वाले को सम्मान सहित आभार प्रगट करना आपकी सभ्यता का परिचायक होगा । यदि आपकी गाड़ी रास्ते में खराब हो गयी हो तो आपके पास से गुजरती गाड़ियां स्वयं मदद के लिए तैयार रहती हैं । इसकी पहचान यह होती है कि आपके बगल से गुजरती  गाड़ी धीमी हो जाती है और उसका चालक आपसे मदद का संकेत पाने की अपेक्षा करता है।  यदि आपने मदद का इशारा किया तो वे गाड़ी रोककर भरसक आपकी सहायता करते हैं । लोगों द्वारा सहज ढंग से लिफ्ट मांगते देखकर पता चल जाता है कि लिफ्ट लेना एवं देना यहां के सहज व्यवहार का हिस्सा है। पब्लिक सवारी गाड़ियां हमारे यहां की मिनी बसों की तरह होती हैं । मुझको किसी भी सवारी गाड़ी का टूटा शीशा या गाड़ी पर धूल जमी नहीं दिखी । लोग बस स्टाप पर लाइन लगाकर ही खड़े मिले । एक चीज उल्लेखनीय है कि भले ही यह देश तीसरी दुनिया का हिस्सा गिना जाता हो लेकिन दूर-दराज में भी किसी यूरीनल या टायलेट मे गन्दगी नहीं मिली और प्रायः फ्लश चालू हालत में मिला । जिस तरह सड़कों पर मलमूत्र विसर्जन हमारे यहां सामान्य है उस तरह यहां पर कई हजार किलोमीटर चलने पर भी दिखना दुर्लभ है । सड़कों  पर जानवरों का भी मलमूत्र देखने को नहीं मिला ।

यहां सहज है कि आपके टिकट की जांच करने वाला कोई अश्वेत कर्मचारी किसी संगीत की धुन पर थिरक रहा हो या थिरक रही हो । इस मामले मे श्वेत तथा अश्वेत समुदाय की प्रवृत्तियां लगभग समान हैं । चूंकि श्वेत और अश्वेत समुदाय में श्रम को हेय नहीं समझा जाता इसलिए श्रम से जुड़े कार्यों को लेकर विश्वगुरुओं की तरह हीन भावना नहीं पायी जाती है। मेहनत का सम्मान और दूसरों की तनिक सी असुविधा पर विनीत होकर खेद प्रकट करने के सहज भाव दिखे । तुलनात्मक रुप से अपने समाज मे पाता हूं कि किसी भी संस्थान मे तीन-चार परिश्रमी कार्मिको की तुलना मे एक चापलूस किस्म का कार्मिक अपने मुखिया का ज्यादे पसंदीदा होता है क्योंकि हमारे समाज मे श्रम के सम्मान का आभाव प्रतिपल दिखता है, आत्ममुग्धता मे डूबे विश्वगुरु लोग सिर्फ अपनी निजी सुविधाओं और प्रशंसाओं के आकांक्षी होते हैं ।

प्रतीकों को ही धर्म मानने का पिछड़ापन मुस्लिम समुदाय में ही बचा है इसलिए रंग आधारित विभाजन के अतिरिक्त वेशभूषा और खानपान के आधार पर मुस्लिम समुदाय ही अपनी भिन्नता के प्रति आग्रही दिखा अन्यथा बाकी हिन्दू, इसाई, यहूदी और स्थानीय धर्मावलम्बियों की कोई भिन्न पहचान नहीं दिखी । एक मजेदार वाकया लोगों ने बताया कि हलाल मीट बेचने के चक्कर में एक दुकान में सूअर के मांस पर भी हलाल का टैग लगा दिया गया था, जिसका कुछ मुस्लिम धार्मिकों ने विरोध किया तो उसे हटाया गया ।

कोकाकोला आदि कम्पनियों की साजिश और लगातार प्रचार के चलते यहां पर पीने के लिए श्वेत तथा गरीब अश्वेत समुदाय भी पानी के स्थान पर कोक ही पीता है। यहां के मजदूर वर्ग को भी दुकानों से कोक ढोते देखकर दुख हुआ कि कैसे कम्पनियों ने एक पूरे देश के स्वाद को बदल कर गुलाम बना दिया है। यहां का अश्वेत समुदाय भी घूस के रूप मे गर्मी का बहाना करके कोक की अपेक्षा करता है ।

भारतीय समुदाय के जितने भी लोगों से मुलाकात हुई उनसे बातचीत से आभास हुआ कि अश्वेत समुदाय के प्रति अज्ञात भय से यह समुदाय हमेशा आशंकित रहता है और अपनी गतिविधियों को अपने समुदाय तक ही सीमित रखता है। स्थानीय पुलिस-प्रशासन की कार्य-पद्धति से लोग असंतुष्ट दिखे लेकिन भयभीत नहीं दिखे ।

दक्षिण अफ्रीका यहां के मूल निवासियों की जीवन्तता, एशियाईमूल के लोगो के लगन और यूरोपीय मूल के लोगों के दूरगामी समझ से विकसित हो रहा है। तीनों संस्कृतियों का मिलन इस महादेश को मनुष्यता का एक बेहतर मुकाम सकता है । भविष्य में यह विकसित देश बनने की सम्भावना से भरा हुआ है मेरी कामना है कि यह साम्राज्यवादी ताकत और अहंकार से मुक्त समृद्ध निवासियों के देश के रूप में विकसित हो ।पूरे अफ्रीकी महाद्वीप को इस देश के विकसित होने से दूरगामी लाभ होगा। यह सारा कुछ निर्भर होगा एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और सेक्यूलर नेतृत्व की कई दशाब्दियों की लम्बी परम्परा के अधीन फिलहाल वर्तमान नेतृत्व से यहां के नागरिक निराश हैं ।

दक्षिण अफ्रीका के राजनैतिक आकाश पर जो आशंकाए छायी हैं उसमें यहा पर भारतीय मूल के उद्योगपति गुप्ता बन्धु का महत्वपूर्ण योगदान है । आमजन मे प्रचलित है कि गुप्ता बन्धु ने राष्टपति से मिलकर मुल्क की आर्थिक नीतियों मे काफी हेर-फेर किया है और यह भी कहा जा रहा है कि उनके इशारे पर वित्त  मंत्री तक को कुछ दिनों के लिए हटा दिया गया था, जिसका दुष्प्रभाव राष्टीय अर्थब्यवस्था पर पड़ते देख कर राष्टपति जुमा को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा । गुप्ता बंधुओं की कारगुजारी को देखते हुए लगता है आगे आने वाला वक्त उन पर भारी पड़ सकता है। हालांकि भारतीयों का इस देश से बहुत पुराना और गहन रिश्ता है लेकिन जिस तरह से चीन के संस्थान अपनी विशालता के साथ इस देश मे दिखे सम्भव है कि भविष्य में भारत और भारतीयों के लिए यह इर्ष्याजनक हो ।

मैं आता हूं कल के निग्गर यार्ड से / उत्पीड़क की नफरत को फांदते हुए / और अपनी खुद की पीड़ा को भी ।/ मैं आता हूं दुनिया मे अपनी आत्मा पर खरोंचे लिए / शरीर पर घाव और हांथो मे क्रोध लिए / मैं पलटता हूं पन्ने लोगों के इतिहास के और जनता की जिन्दगी के। / मैं जांचता हूं चिन्गारियों की बरसात और सपनों की सम्पदा।/  मैं खुश हूं वैभव से और दुखी हूं दुखों से ।/ समृद्ध हूं समृद्धियों से और निर्धन हूं खोए लोगों से।/ गुजरे हुए कल के निग्गर यार्ड से मैं आता हूं अपने बोझ के साथ / आने वाले कल की ओर मुड़ता हूं ताकत के साथ’ —-मार्टिन कार्टर, गुयाना

(संतोष कुमार जाने-माने कथाकार हैं )

1 Comment
  1. प्रमोद कुमार बर्णवाल says

    दक्षिण अफ्रीका के बारे में जानकारी परक लेख,

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