बुद्ध से साक्षात्कार

प्रताप सहगल 

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बनारस की सुबह

यह मार्च महीने के आखिरी दिन की सुबह है और हम वाराणसी के स्टेशन पहुँच गए हैं। वाराणसी में एक बार पहले भी आना हुआ था। उस यात्रा में पहली बार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के विशाल परिसर को पास से देखने का अवसर मिला। पहली बार ही गंगा आरती भी देखी थी लेकिन सबसे अविस्मरीणय शाम हमारी ज्ञानेन्द्रपति और ओम निश्चल के साथ गुज़री थी। उस शाम को मेरे दोनों अनुज महेन्द्र और राजेन्द्र भी साथ थे। ज्ञानेन्द्रपति से पहली बार ही निकट से मिलना हो रहा था। वैश्विक स्तर पर चल रही राजनीति और क्षरित होते मूल्यों पर लंबी चर्चा हुई थी।

इस बार हमारे पास समय कम है। सुबह के केवल चार घंटे हमारे पास हैं और हमें नाश्ते तक होटल लौट आना है। दिल्ली में एक निकट के मित्र ने आग्रह किया था कि उनके लिए विश्वनाथ मंदिर का प्रसाद अवश्य लेकर आऊँ। सो हम लोग विश्वनाथ मंदिर पहुँचते हैं। लंबी कतार है और हमारे पास समय नहीं है। जेब में पैसा हो तो विश्वनाथ से मुलाकात भी जल्दी हो जाती है। एक पंडित महोदय का सहारा लेते हैं और आनन-फ़ानन में अंदर जाकर दिल्ली वाले मित्र की मुराद पूरी करते हैं और बाहर। जल्दी से हम होटल पहुँचना चाहते हैं। रास्तों में जाम है। गाड़ी हिल भी नहीं रही। जैसे तैसे होटल पहुँचकर नाश्ता और फ़िर हम लोग अपनी-अपनी बसों में सवार होकर सारनाथ की ओर रवाना होते हैं।

सारनाथ का महत्त्व

सारनाथ बनारस से केवल 13 किलोमीटर दूर है। कहीं रास्ता साफ़, कहीं सकरा तो कहीं लोगों और गाड़ियों से भरा हुआ है। लगभग एक घंटे में ही यह दूरी तय हो पाती है। सारनाथ में प्रवेश करते ही एक जगह है चौखंडी। बस वहीं रुक जाती है। सामने एक बड़ा सा पार्क और उसमें विश्व में सबसे ऊँची बुद्ध की ऊँची प्रतिमा है। 80 फ़ुट। हैदराबाद में हुसैन सागर में स्थित बुद्ध-प्रतिमा से बीस फ़ुट और ऊपर। आजकल धर्म, आस्था और श्रद्धा का प्रदर्शन करने का तरीका यही बन गया है कि कौन अपने आराध्य की प्रतिमा कितनी ऊँची बनाता है। सबसे ऊँची बने तो क्या कहने। दिल्ली में ही शिव और हनुमान के ऊँचे बुत इसका प्रमाण हैं। ऊँची-ऊँची और महंगी से महंगी प्रतिमाएँ बनाना आस्था है या अहंकार? जितना बड़ा अहंकार उतनी ऊँची प्रतिमा। चौखंडी में यह वही स्थान है, जहाँ पहली बार बुद्ध अपने पाँच शिष्यों से मिले थे। आजकल यह प्रेमी-युगलों के लिए इश्कगाह है। आपकी आस्था बुद्ध में है तो प्रतिमा और थाई बौद्ध मंदिर प्रस्तुत है और इश्क फ़रमाने का मन है तो पेड़ों की घनी छाया में हरे-भरे लान मौजूद हैं।

यहाँ से हम सारनाथ में ही डीयर पार्क की ओर बढ़ते हैं। यह वही स्थान है, जहाँ पर बुद्ध ने अपना सबसे पहला प्रवचन दिया और अपने धम्म की स्थापना की। उनके पहले पाँच शिष्य बौद्ध धर्म के इतिहास में अपना स्थान सुरक्षित रखे हुए हैं। यहीं पर बुद्ध ने अतिवाद के बजाय मध्य-मार्ग का प्रस्ताव रखा, उसे समझाया कि मनुष्य के लिए मध्य-मार्ग ही उत्तम मार्ग है। प्रसाद के शब्दों में ‘मध्य-पथ से लो सुगति सुधार’। अतिवाद चाहे कैसा ही हो, तनाव को तो जन्म देता ही है। लेकिन यह भी सत्य है कि बिना ‘अति’ के किसी दर्शन की स्थापना नहीं की जा सकती। बुद्ध का मध्य-मार्ग पर अतिरिक्त आग्रह भी तो एक तरह का अतिवाद ही है।

इस ओर जाने से पहले हम संग्रहालय में प्रवेश करते हैं। संग्रहालय में बुद्ध एवं अशोक के समय के अवशेष सुरक्षित हैं। यहीं पर सुरक्षित है चार शेरों वाला अशोक-स्तंभ। भारत सरकार ने इसे ही अपनी सत्ता का प्रतीक बनाया। चार में से एक शेर खंडित हो चुका है। शेष तीन भी जैसे तैसे अपने अस्तित्त्व की लड़ाई में लगे हुए हैं। भारतीय मुद्रा पर यही तीन शेर नज़र आते हैं। पीछे वाला शेर अनुपस्थित रहने के लिए अभिशप्त है। इसी अभिशप्तता का शिकार बौद्ध धर्म भी हुआ है। चार नोबल सत्य और आठ आयामी मार्ग की इबारत पर खड़ा हुआ है पूरा बौद्ध-धर्म।

संग्रहालय की यात्रा के बाद हम उस स्थान की ओर बढ़ते हैं, जहाँ बुद्ध ने अपने पहले पाँच शिष्यों को अपना पहला प्रवचन दिया था। एक चबूतरा और उसमें पीपल का एक पेड़। पेड़ के चारों और बाड़ लगाके उसे सुरक्षित कर दिया गया है। कई जड़ें बदलने के बाद भी यह पीपल का पेड़ श्रद्धालुओं के लिए अढ़ाई हज़ार साल पुराना है। यहीं पर उन पाँच शिष्यों की प्रतिमाएं भी सुरक्षित हैं, जिन्हें बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन दिया था। एक ओर देखता हूँ कि सैंकड़ों की संख्या में अर्ज़ियाँ टंगी हुई हैं। भारतीय जन प्रार्थना और याचना करने में सबसे आगे हैं। ऐसे ही असंख्य अर्ज़ियां मैंने अल्मोड़ा के गोलू देवता के मंदिर में देखी थीं। अर्ज़ियाँ उलट-पुलट कर देखता हूँ। अधिकतर अर्ज़ियाँ हिन्दी या टूटी फ़ूटी अंग्रेज़ी में हैं। अजीब अजीब याचनाएँ और अजीब अजीब कामनाएँ। कुछ तो ऐसी कि उन्हें यहाँ दर्ज करना भी संभव नहीं।

संग्रहालय के ठीक सामने डियर पार्क वह विशाल हिस्सा है, जिसमें अनेक स्तूप और स्मृति-स्थल अपने अस्तित्त्व की एक खामोश लड़ाई लड़ रहे हैं। बीचोंबीच एक बड़ा सा स्तूप है। कहा जाता है कि इस विशाल और ऊँचे स्तूप में ही बुद्ध के अवशेष सुरक्षित हैं। हैं या नहीं, इस बात पर विवाद बना हुआ है। विशाल पार्क में तीन-चार जगहों पर सफेद और गेरुआ वस्त्रों में कुछ समूह नज़र आते हैं। इनमें से कुछ शिष्य हैं, कुछ गुरु। सफेद कपड़ों में नज़र आने वाले शिष्य हैं, उनकी संख्या भी ज़्यादा है और गेरुआ वस्त्रों में नज़र आने वाले गुरु हैं। बन चुके बौद्ध और बनते हुए बौद्ध। दुनिया से बेखबर। अपनी शिक्षा हासिल करने में तल्लीन। डियर पार्क में हिरण तो अब भी हैं लेकिन केवल नाम के। कुछ पक्षी और एक छोटे से जलाशय में मगरमच्छों को रखा हुआ है।

सारनाथ में केवल बौद्धों के लिए ही नहीं, जैनों एवं हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए भी आस्था के स्थान मौजूद हैं। उनपर भी एक निगाह डालते हुए हम वाराणसी की ओर लौटते हैं। होटल में खाना हमारी प्रतीक्षा में है। जी भरकर लंच और थोड़ी देर आराम।

सूर्य ढलने से पहले ही हम लोग पुन: बसों में सवार होकर गंगा के दशाश्वमेध घाट की ओर रवाना होते हैं। एक बड़ा स्टीमर हमारी प्रतीक्षा में है। थोड़ी देर तक पैदल मार्च और फ़िर स्टीमर में सवार होकर हम लोग गंगा के विभिन्न घाटों का नज़ारा दूर से ही लेते हैं। पिछली बार जब बनारस आना हुआ था तो एक कश्ती पर सवार होकर चौरासी घाटों की यात्रा की थी लेकिन इस बार मुख्य रूप से मणि-कर्णिका घाट और हरिश्वचंद्र घाट आदि ही देख पाते हैं। इन दोनों ही घाटों पर हिन्दू रीति से अंतिम संस्कार की व्यवस्था है। मणि-कर्णिका घाट एक ऐसा घाट है, जहां चिता कभी ठंडी नहीं होती। ऐसा माना जाता है कि पार्वती के कानों के बुंदों की मणि यहाँ गिरी, इसलिए इसे मणि-कर्णिका घाट कहा जाता है। हल्का-हल्का अँधेरा घिरने लगा है। स्टीमर दशाश्वमेध घाट के सामने आकर रुक जाता है। शंख-ध्वनि के साथ ही गंगा आरती शुरु होती है। प्रतिदिन संध्या समय गंगा आरती का विधान सालों से चला आ रहा है। हमारे आसपास सैंकड़ों की संख्या में नावें लगी हुई हैं। पास के दो और घाटों पर भी गंगा-आरती होती है लेकिन अधिक भीड़ इसी घाट पर जुटती है। सबसे पहले आरती की शुरुआत यहां हुई तो आस्था का केन्द्र यही घाट ज़्यादा है। गंगा का पानी मैला नज़र आ रहा है। मैल के साथ दुर्गंध भी है। मैली है तो क्या, है तो गंगा। गंगा के प्रति भारतीयों की आस्था के सामने कोई और मिसाल मिलना मुश्किल है और गंगा के प्रति इतनी लापरवाही की मिसाल मिलना भी मुश्किल है। गंगा आरती में बजते घंटे हवा में तेज़ी से तैरने लगते हैं। आरती के बड़े-बड़े दीपदान प्रज्ज्वलित कर दिए गए हैं। श्रद्धा, आस्था और शंका का सामूहिक भाव गंगा के पानी में तैरता नज़र आने लगता है। अपने विधान के साथ आरती संपन्न होती है और हम वाराणसी स्टेशन पर खड़ी अपनी गाड़ी से मिलने के लिए प्रस्थान करते हैं। हमारा अगला पड़ाव गोरखपुर है। वहीं से हमें लुंबिनी की ओर रवाना होना है।

गोरखपुर की ओर                                            

कैलेंडर का एक पन्ना और पलट गया है। पहली अप्रैल की सुबह। हम गोरखपुर के स्टेशन पर हैं। ज़रूरी कपड़े और दवाइयाँ एक थैले में भर लेते हैं। बाकी का माल-असबाब छोड़ बाहर खड़ी बस में सवार हो जाते हैं। एक होटल में नाश्ता। यह होटल पहले वाले होटलों से कमतर है, लेकिन है। बस गोरखपुर की सड़कों से रपटती हुई लुंबिनी की ओर जा रही है। गोरखपुर, गुरू गोरखनाथ की नगरी। गोरखनाथ के मंदिर और अखाड़े कई बार नज़र आते हैं।

पहली बार नेपाल जाना हो रहा है। अधिकतर हम अपने देश में ही घूमना पसंद करते हैं। इतना बड़ा और इतनी विविधिताओं से भरा हुआ है अपना देश कि विदेश जाने की ललक बिल्कुल नहीं होती। हाँ, कभी-कभी मन होता है कि विश्व के कुछ ऐतिहासिक शहरों की यात्रा की जाए। इतिहास तो हर शहर के पास होता है लेकिन कुछ शहर ज़रा ज़्यादा ऐतिहासिक होते हैं, जैसा कि अपना दिल्ली शहर। मैं आजतक केवल एक बार बैंकाक और सिंगापुर तक गया हूँ। वहाँ जाने की कहानी भी दिलचस्प है, लेकिन वह कहानी कहीं और। मैं शशि से मज़ाक करता हूँ कि यह तुम्हारी पहली विदेश यात्रा है। बिना पास्पोर्ट और बिना वीज़ा के।

शीशे से बाहर झाँकता हूँ। सड़क के दोनों ओर वीराना है। अचानक ब्रेक लगती है और बस एक बहुत बड़े खाली प्लाट में दाखिल हो जाती है। यहाँ एक थाई बौद्ध मंदिर का निर्माण हो रहा है। इस तरह के बौद्ध मंदिर पूरे रास्ते में नज़र आते हैं। किसी मंदिर का निर्माण थाई सरकार या वहाँ के लोगों के पैसे से हुआ है तो किसी का निर्माण जापान या चीन के पैसे से। इस समय हम एक थाई बौद्ध मंदिर के परिसर में खड़े हैं। निर्माण कार्य तेज़ी से हो रहा है। यहाँ की विशेषता यह है कि यहाँ आप चाय-काफ़ी या कुछ हल्के स्नैक्स ले सकते है। बिल इज़ निल। पूरा सेवा भाव। ऐसा हमने भारत के कई गुरुद्वारों में तो देखा है लेकिन और कहीं नहीं। एक प्याला काफ़ी मैं भी ले लेता हूँ और मंदिर के तीमार होते स्थापत्य को निहारता रहता हूँ। यह स्थापत्य हमारे संस्कारों में नहीं है। इसे समझने के लिए इसके साथ गहरे जुड़ने की ज़रूरत है। जो भी हो सौंदर्य तो हर हाल में अच्छा ही लगता है। बीच राह में कई मंदिरों को देखते-परखते हम नेपाल के प्रवेश-द्वार पर हैं। हमारे साथ जो विदेशी हैं, उनके पासपोर्ट ले लिए जाते हैं। हमें कहा गया था कि हम अपने-अपने पहचान-पत्र तैयार रखें लेकिन यहाँ कोई पूछता ही नहीं और थोड़ी देर के बाद हम नेपाल की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। बस रुकती है। हमारा एक सहयात्री विश्वनाथ पाठक तेज़ी से उतरकर मिठाई ले आता है। नेपाली मिठाई। कुछ हिदायतें हमें गाइड की ओर से दी जाती हैं। यहाँ हमारे रुपए की कीमत नेपाली रुपए से ज़्यादा है। लगभग दोगुनी। अच्छा लगता है कि कोई देश तो ऐसा है, जहाँ हमारे रुपए की भी आवभगत होती है। वरना तो डालर, यूरो डालर और पाउंड का ही शोर सुनाई देता रहता है।

आखिर हम नेपाल पहुँच गए

प्रवेश-द्वार पार करने के बाद सड़क आठ-लेन की है। भारत की साइड की सड़क केवल डबल लेन है। खुली सड़क है तो बस की रफ़्तार भी तेज़ है और हम दोपहर एक बजे के करीब बुद्ध माया होटल में चैक-इन कर लेते हैं। खाना तैयार है। नेपाल का खाना। खाते हैं, तो भारत में मिलने वाले खाने से कुछ भी अलग नहीं लगता।

पहली अप्रैल है। कहने को तो यह मूर्ख बनाने का दिन है लेकिन हमारा इरादा मूर्ख बनने का नहीं और न किसी और का। बसें मायादेवी मंदिर की ओर चलने को तैयार हैं और हम भी। लुंबिनी यानी सुंदर। लुंबिनी ही वह स्थल जहाँ सिद्धार्थ का जन्म हुआ था। कपिलवस्तु से लगभग 25 किलोमीटर दूर। माना जाता है कि सिद्धार्थ की माता लुंबिनी से यहाँ गुज़र रही थीं, तभी उन्हें प्रसव-वेदना हुई और यहीं सिद्धार्थ ने जन्म लिया। आज यहाँ एक विशाल मंदिर और उद्यान है। प्रस्तुत मंदिर जो हमें दिखाई दे रहा है, इसका निर्माण 1993 में जापानियों द्वारा करवाया गया। उनका मानना था कि वहां पर पहले से ही स्थित मंदिर के नीचे बौद्ध विहार के अवशेष हैं। उनके इस आश्वासन पर ही उन्हें उत्खनन की अनुमति दी गई कि बाद में वही यहाँ बौद्ध-मंदिर का निर्माण करवाएँगे। जापानियों ने जब उत्खनन करवाया तो वहाँ सचमुच बौद्ध-विहार मिला और मिली बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा जो अभी भी मंदिर में रखी हुई है। मंदिर के प्रवेश-द्वार के सामने अशोक-स्तंभ है। अनुयायियों का मानना है कि यही वह स्थल है, जहाँ सिद्धार्थ ने जन्म लिया। ऐसा हुआ या नहीं, नहीं मालूम। लेकिन भक्तों की आस्था है, तो है। तभी न रामलला का मंदिर वहीं बनाने की ज़िद पकड़कर करोड़ों हिन्दू बेचैन हैं। मंदिर के बाहर बुद्ध के विशाल चरण अनुयायियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। वहीं बैठकर कुछ बौद्ध चांटिंग कर रहे हैं। अपनी बाईं ओर नज़र डालता हूँ तो बुद्ध की एक और विशाल प्रतिमा खड़ी दिखाई देती है। भक्तों केलिए बुद्ध और मेरे लिए हरियाली को पीने का सुख। मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं। बुद्ध की पुरानी और कुछ-कुछ खंडित हो चुकी प्रतिमा लेटी हुई है। चारों ओर बाड़ है और श्रद्धालु अपनी-अपनी श्रद्धानुसार धनादि से दान कर रहे हैं। यहाँ तक कि मंदिर की दीवारों के खड्डों में भी कुछ डालर अथवा नोट आदि ठुंसे हुए नज़र आते हैं। परिक्रमा के बाद बाहर निकलते हैं और जगह के साथ जुड़ने की कोशिश करते हैं। हमारे साथ जो तैवानी युवा और युवती हैं, वे तो आए ही इसलिए हैं। उनका जुड़ाव पहले से ही है। हाथ जोड़े और आंखें बंद करके वे न जाने किसके लिए क्या-क्या मांग रहे हैं।

लुंबिनी मंदिर के बाहर एक छोटा सा बाज़ार है। वहाँ सब वही सामान उपलब्ध है, जो दिल्ली के बाज़ारों में मिल जाता है। नेपाल के हस्तशिल्प से बनी हुई कोई वस्तु हमें नहीं मिलती। बसें तैयार हैं लेकिन हम होटल तक पैदल या रिक्शा पर जाना चाहते हैं। आखिर ज़मीन से आदमी पाँवों के रास्ते से ही जुड़ता है। होटल बहुत दूर भी नहीं है और हम बतियाते हुए होटल पहुँच जाते हैं। होटल में होटल के मैनेजर बीजू सहदेव से मुलाक़ात होती है। हमें अपने लिए अलग-अलग कंबल की ज़रूरत थी। वह हमारे कमरे में आ जाता है और थोड़ी सी बातचीत के बाद वह सहज होकर एक मित्र हो जाता है। अब होटल में किसी चीज़ की कमी नहीं। हर सुविधा सबसे पहले हमारे कमरे में। थोड़ी देर बाद वह अपने छोटे से बेटे को लेकर हमारे पास आ जाता है। बेहद सुंदर बच्चा। मन मोहक। उसकी आँखों में नींद भरी है। शशि उसे झिड़क देती है कि सोए बच्चे को क्यों उठा लाए। बीजू हमसे मिलकर बहुत उत्साहित है। वह दिल्ली आना चाहता है। यह बाद की बात है कि जब नेपाल में भूकंप आया तो हम लोग बहुत चिंतित हुए बीजू को लेकर। कई बार फोन मिलाया, कोई जवाब नहीं। थोड़े दिन बाद उसी का संदेश आ गया। बीजू चैन्नई पहुँच चुका था।

रात होटल में ही रहना है। खाना खाने के बाद इधर-उधर टहल कर जगह के साथ अपना रिश्ता मज़बूत करते रहते हैं। आकाश साफ़ है। चांदनी ज़मीन पर दस्तक दे रही है। उसकी दस्तक हम सुनते हैं। चाँदनी के साथ अपना रिश्ता मज़बूत करते हैं।

अगली सुबह। नाश्ता और बस से ही कुशीनारा यानी कुशीनगर की ओर प्रस्थान। कुशीनगर एक छोटा सा शहर है। भीड़-भाड़ से परे। बौद्धों के लिए कुशीनगर का महत्त्व वैसे ही है जैसे लुंबिनी का। यही वह शहर है, जहाँ बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। मेरे लिए कुशीनगर का महत्त्व इसलिए भी है कि यह हिन्दी के एक बड़े लेखक अज्ञेय की जन्मभूमि है। कुशीनगर की धरती पर पाँव रखते ही अज्ञेय का ध्यान आता कि एक छोटे से शहर से निकलकर इस लेखक ने साहित्य में कितना ऊँचा स्थान हासिल किया। बस से उतरकर सबसे पहले हम मोथा कुंअर मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। एक छोटा सा मंदिर। आज यह मंदिर खस्ता हालत में हैं फ़िर भी इस स्थान का महत्त्व इसलिए है कि यहीं पर बुद्ध ने अपने जीवन का अंतिम प्रवचन दिया था। सारनाथ से कुशीनारा में मोथा कुआं मंदिर तक की यात्रा बौद्ध-धर्म की यात्रा है।

लौटते हुये कुशीनगर

गोरखपुर से लगभग 52 किलोमीटर दूर हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित कुशीनगर के नाम को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं। एक मत और रामायण के अनुसार भी इस नगर को राम के पुत्र कुश ने बसाया, जबकि बौद्धों के अनुसार इस नगर का नाम कुश के आने से पहले ही पड़ चुका था। कुशीनगर इसलिए कहा गया कि यहाँ ‘कुशा’ बहुत मिलती थी। इसीलिए इसका प्राचीन नाम कुशावती है। बुद्ध के समय इसे कुशीनारा नाम मिला जो ईसा पूर्व छठी शताब्दी में मल्ल-राज्य की राजधानी थी। मौर्य, शुंग, कुषाण और गुप्त-वंश और हर्ष के समय से यह एक महत्त्वपूर्ण जनपद था। कल्तुरी राजाओं तक इसे महत्त्व मिलता रहा लेकिन 12वीं शताब्दी के बाद यह स्थान लुप्त-प्राय: हो गया।

आधुनिक कुशीनगर उन्नीसवीं शताब्दी में किए गए उत्खनन के बाद सामने आया और इसका परिसंस्कार किया गया।        मोथा मंदिर से हम एक ऐसे परिसर की ओर बढ़ते हैं जो कुशीनगर में सबसे अधिक महत्त्व का है। इस परिसर में सबसे पहले हम रामभर मंदिर जिसे बौद्ध चैत्य एवं स्तूप के रूप में देखते हैं। यह वह स्थान है जहाँ बुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी अंतिम रस्में की गईं। अंतिम रस्मों से पूर्व बुद्ध के पार्थिव शरीर को शहर के उत्तरी-द्वार से बाहर ले जाकर पूरे नगर में घुमाया गया और पूर्वी द्वार से शहर से बाहर भी उसकी प्रदक्षिणा हुई। बाद में यहीं बुद्ध का संस्कार हुआ और एक स्तूप का निर्माण करवाया गया। समय ने इस स्तूप को ढक लिया और उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में कार्लाइल के प्रयत्नों से इस स्थान का उत्खनन करवाया गया। उत्खनन के दौरान यहाँ ताँबे की एक प्लेट मिली जिसपर निदान-सूत्र था और उसे निर्वाण चैत्य में दबा दिया गया। यहीं पर एक स्तूप का निर्माण हुआ, जिसे बाद में सम्राट अशोक ने इसी स्तूप पर एक बड़ा स्तूप बनवाकर इसे सुरक्षित कर दिया। वस्तुत: यह स्तूप तीन स्तरों पर बना है और हर स्तर का समय अलग-अलग है। स्तूप के आगे यानी प्रवेश-द्वार पर बुद्ध को महापरिनिर्वाण की मुद्रा में रखा गया है।

अब हम इसे देखने के लिए महापरिनिर्वाण मंदिर में प्रवेश करते हैं। बुद्ध की अंतिम वेला में उनके शिष्य सुभद्र उनके साथ थे। सूचना मिलते ही मल्ल राजा की पुत्री मल्लिका भी पहुँची और शिष्य आनंद भी। मंदिर में इन तीनों की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। अखंडित लाल पत्थर से निर्मित निर्वाण प्राप्त करते हुए बुद्ध को लेटे हुए मुद्रा में स्थापित कर दिया गया है। लगभग छह मीटर लंबी यह प्रतिमा भव्यता समेटे हुए बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा के अनुसार है। हीनयान में बुद्ध की महापरिनिर्वाण की मुद्रा में सिर नीचे रहता है, जिसका अर्थ है कि बुद्ध अब नहीं आएँगे जबकि महायान मत के अनुसार बुद्ध का सिर ऊँचा रहता है जिसका अर्थ है कि बुद्ध फ़िर आएँगे। भक्त-जन आते हैं और बुद्ध-प्रतिमा के पाँवों के पास खड़े होकर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हुए निकल जाते हैं। कुछ लोग मंदिर की दीवारों से सटकर खामोश बैठे शायद बुद्ध के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:। सभी अपने-अपने सुपरमैन की प्रतीक्षा में हैं। यह भी वेटिंग फ़ार गोदो ही तो है!

मंदिर से बाहर निकलकर एक बार फ़िर पूरे परिसर को देखते हैं। हरा-भरा है परिसर और अनेक बौद्ध-अनुयायी स्तूप के आसपास बैठकर जप कर रहे हैं। बस के पास लौटते हैं, वहाँ कपड़े पर बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा उकेरकर कुछ स्थानीय कलाकार बेच रह हैं। यही उनकी रोज़ी-रोटी है। मैं चार खरीद लेता हूँ। दिल्ली लौटकर बुद्ध के भक्तों को बाँट दूँगा।

अगला पड़ाव श्रावस्ती है

हमारी गाड़ी गोरखपुर स्टेशन पर हमारी बाट जोह रही है। दिन भर की थकान के बाद अपने छोटे से अस्थाई आशियाने में आना बहुत अच्छा लगता है। गाड़ी रफ़्तार पकड़ती है और हम अपने-अपने जाम। अगली सुबह गाड़ी हमें गोंडा जंक्शन पर उतार देती है और हम बस से श्रावस्ती की ओर रवाना होते हैं।

भारत के हर शहर की तरह से श्रावस्ती की भी एक ऐतिहासिक यात्रा है। राप्ती नदी के पश्चिमी छोर पर बसी हुई श्रावस्ती का आज वह वैभव नहीं, जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व था। यह वही  समय था जब यह कौशल राज्य की राजधानी थी। एक मिथ के अनुसार इस शहर को वैदिक कालीन राजा श्रावस्त ने बसाया था, सो इसका नाम श्रावस्ती हुआ। इतिहास के इस काल-खंड के साथ आज श्रावस्ती को कम जोड़ा जाता है। आज श्रावस्ती दो कारणों से एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ एवं पर्यटन-स्थल बन गई है। ऐसा विश्वास है कि यहाँ का शोभनाथ मंदिर ही तीर्थंकर संभवनाथ का जन्मस्थान है। हमारे दल के साथ एक जैन भी हैं और वे चाहते हैं कि पहले इसी मंदिर के दर्शन किये जाएँ। हम सब उसी ओर चल देते हैं। एक बड़ा परिसर है मंदिर का लेकिन भव्यता की जगह यहाँ सादगी है। कुछ लोग आरती के लिए तैयार हैं। हम भी वहाँ खड़े होकर आरती देखते हैं। जैन-मित्रों की दिली इच्छा पूरी होने के बाद हम जैतवन की ओर बढ़ते हैं।

हमारे मार्ग-दर्शक श्रावस्ती का इतिहास बताते हुए चलते रहते हैं। पढ़े-लिखे हैं। काफी जानकारियाँ हैं उनके पास। बताते हैं कि बृहतकल्प के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में इस शहर का नाम माहिद था और फ़िर साहेत-माहेत के नाम का भी उल्लेख मिलता है। एक समय में शहर एक किले में बसा हुआ था।  भारत सरकार ने जब खुदाई करवाई तो यहाँ कई मंदिर और मूर्तियाँ मिलीं जो आज मथुरा और लखनऊ संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

इतिहास की बात अपनी जगह। आज श्रावस्ती जैतवन के कारण ही अधिक जानी जाती है और बौद्धों के तीर्थ-स्थलों में यह एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ-स्थल है। ऐसा माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के चौबीस चौमासे इसी जैतवन में गुज़ारे। एक मत के अनुसार उन्होंने श्रावस्ती में तो चौबीस लेकिन जैतवन में 19 गुज़ारे। इस बहस से बाहर मैं जैतवन के विशाल हरे-भरे परिसर को देखता हूँ। जहाँ-तहाँ बौद्ध-भिक्षु घूमते हुए नज़र आते हैं और एक भिक्षु हमें पकड़कर अपने पास खड़ा करके जैतवन का महत्त्व समझाने लगता है। हर धर्म के अनुयायियों की तरह से उसके कथनों में भी अतिश्योक्ति की मात्रा पर्याप्त है। वह यहाँ बुद्ध द्वारा किए गए चमत्कारों के बारे में अधिक और बौद्ध-धर्म के मूल-तत्त्वों के बारे में कम बताता है। वस्तुत: सामान्य जन चमत्कारों की ओर ही अधिक आकर्षित होता है, जैसे कि मूल-तत्त्व तो वह जानता ही है।

जहाँ जहाँ तक नज़र जाती है, या तो तरह-तरह के पेड़ दिखते हैं या स्तूप। विहार नज़र आते हैं या मंदिर। अब हम आनंद बोधि-वृक्ष की ओर बढ़ते हैं। कहते हैं, जब बुद्ध पहली बार यहाँ आए तो उनके साथ उनके दो शिष्य आनंद और सुदत्त भी थे। आनंद ही अपने साथ बोधगया से बोधि-वृक्ष की कलम लाए और उन्होंने उसे यहाँ रोप दिया। हम अब इसी वृक्ष के नीचे बैठे हैं। वृक्ष की शाखाएँ और जड़ें साफ बता रही हैं कि यह वृक्ष हज़ारों नहीं तो सैंकड़ों वर्ष पुराना ज़रूर है। भक्तों के लिए तो यह आदि-वृक्ष है। कोई प्रश्न नहीं, कोई जिज्ञासा नहीं।

श्रावस्ती इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि बुद्ध ने वैशाली छोड़कर यहाँ आने का निर्णय लिया। इसका कारण संभवत: उन्हें मिलने वाले संरक्षक थे। अनंतपिंडिका, विशाख आदि ने उन्हें सब तरह की सुविधा दी और वुडवार्ड के अनुसार उनके चार निकायों में 871 सूत्त हैं और उनमें से 844 की रचना श्रावस्ती के जैतवन में हुई है।

यह तथ्य अकादिम चर्चा का विषय हैं लेकिन एक बात तो तय है कि बुद्ध ने वैश्विक स्तर पर अपना और अपने चिंतन का प्रभाव छोड़ा। हमारे इस यात्रा-कार्यक्रम में वैशाली शामिल नहीं है। इसलिए वैशाली छूट जाता है और हम बढ़ते हैं आगरा की ओर। आगरा की चर्चा भी छोड़ता हूँ क्योंकि आगरा का संबंध बुद्ध से नहीं है। वहाँ बुद्ध से नहीं शाहजहाँ से साक्षात्कार होता है।

वैराग्य की जगह मुहब्बत ले लेती है। इंसानी मुहब्बत और रूहानी मुहब्बत दो मरहले। लेकिन क्या इंसानी मुहब्बत ही असल में रूहानी मुहब्बत नहीं होती?

प्रताप सहगल जाने-माने कवि-कथाकार और नाटककार हैं ।

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