Wednesday, July 24, 2024
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टूटी सीढ़ियों पर ख्वाबों के पंख लगाकर चल रहे हैं लोग

मुंबई महानगर के उपनगरीय हिस्से में बसे ‘नायगांव-पूर्व’ की मिट्टी में लोहा भी अपनी फौलादी अकड़ खो देता है पालघर। हम मुंबई की वेस्टर्न लाइन के एक ऐसे स्टेशन पर हैं जिसे अपनी रूट का सूफियाना स्टेशन कहना गलत नहीं होगा। मुंबई के अन्य उपनगरीय स्टेशनों की तरह यहाँ जिंदगी भाग नहीं रही है बल्कि […]

मुंबई महानगर के उपनगरीय हिस्से में बसे नायगांव-पूर्व’ की मिट्टी में लोहा भी अपनी फौलादी अकड़ खो देता है

पालघर। हम मुंबई की वेस्टर्न लाइन के एक ऐसे स्टेशन पर हैं जिसे अपनी रूट का सूफियाना स्टेशन कहना गलत नहीं होगा। मुंबई के अन्य उपनगरीय स्टेशनों की तरह यहाँ जिंदगी भाग नहीं रही है बल्कि यह इकलौता स्टेशन है जिसे शायद आज भी मुंबई महानगर की चमचमाती जिंदगी का स्वाद ही नहीं पता है। यह सिर्फ अपना स्वाद जानता है। अपने नमक का स्वाद। यह नमक स्वादानुसार इसके हिस्से में नहीं आया है बल्कि सिर्फ नमक ही नमक इसके हिस्से में आया है और यह कहना अन्यथा नहीं होगा कि जितना नमक यह खा रहा है। उससे ज्यादा नमक इसको खा रहा है। यही वजह है कि पूरे शहर को अपने फौलाद से कंधे पर ढोने वाला लोहा यहाँ अपना फौलादी चरित्र खो देता है। डरे हुए लोहे और मुंबई से कटे हुए मन के सहारे खड़े इस रेलवे स्टेशन से किसी कि गल-बहियाँ दोस्ती नहीं है। पूरब और पश्चिम दोनों तरफ लोगों की बस्तियां इससे कम से कम एक किलोमीटर दूर हैं। शेष मुंबई से अलग-थलग करने के लिए, एक ओर समुद्र की खाड़ी है तो दूसरी ओर नमक के खेत। चारों ओर के निर्जन में अकेले, अथक साधक से खड़े इस स्टेशन का नाम है नायगांव

हिन्दी भाषी लोग इसे अक्सर नये गाँव के रूप में समझ लेते हैं पर इसका ‘नाय’ किसी ‘नए’ की उपज नहीं है बल्कि यह ‘नाव’ का मराठी शब्दांतरण है। जिस सालसमेट द्वीप पर मुंबई बसा है। उससे एक खाड़ी (वसई-भायंदर की खाड़ी) की वजह से यह स्थलीय संपर्क से कटा हुआ है। पुराने समय में स्थानीय लोगों के लिए मुंबई महानगर से जुड़ने का माध्यम ‘नाव’ या ‘नाय’ ही थी। इसी नाय की मुहब्बत ने इसे नायगांव बना दिया।

नायगांव पूर्व से परेरा नगर को जाती सड़क किनारे नमक के खेत

नायगांव स्टेशन मुंबई उपनगरीय क्षेत्र में चर्चगेट-विरार रेलवे लाइन पर भायंदर और वसई रोड स्टेशन के बीच स्थित है। पिछले दस सालों में यह परिक्षेत्र अप्रत्याशित रूप से विकसित हुआ है। अप्रत्याशित कहना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि मजबूरी भी है और जरूरी भी है। इस मजबूरी और जरूरी बातों को समझने के लिए फिलहाल हम नायगांव के पूर्व पृष्ठ को देखने निकल रहे हैं।

आज से दस वर्ष पूर्व, इस स्टेशन पर जब मैं पहली बार आया था तब मुंबई की लोकल ट्रेन से इस स्टेशन पर मेरे साथ तीन और यात्री उतरे थे और किसी तरह, पूर्व की ओर निकलने का रास्ता तलाश कर, बाहर निकले थे। बाहर निकलने का एक मात्र ही रास्ता तब भी था और दुर्भाग्य से आज जब ट्रेन से सैकड़ों लोग इस स्टेशन पर उतरकर निकल रहे हैं तब भी वही इकलौता रास्ता बांह पसारे हमारा स्वागत कर रहा है। इस स्टेशन की शकल-सूरत में काफी बदलाव हो गया है। एक ‘सब-वे’ और दो ‘अप-वे’ के साथ स्वचालित सीढ़ियाँ भी स्टेशन पर बन गई हैं। जिसे देखकर, बिना किसी डाटा की तलाश किये सहज ही यह समझा सकता है कि इस स्टेशन का रेवन्यू काफी बढ़ गया है। रेलवे विभाग के लिए टिकट बिक्री के मामले में यह अब आम से खास हो चुका है।

नायगांव पूर्व स्टेशन के रास्ते पर भीड़

फिलहाल, अब हम बाहर निकलते हैं। स्टेशन परिसर से लगभग 200 मीटर पैदल चलकर अभी एक नाला पार करना है। इस दो सौ मीटर की दूरी पर फुटपाथ का बाजार इस समय खूब सजा हुआ है और संकरी-सी सड़क पर लोगों के कंधे अपने बगलगीर के कंधे से सटकर आगे बढ़ रहे हैं। मुझे याद है कि दस साल पहले इस मार्ग पर सिर्फ दो मछलियाँ बेचने वाली दुकानें थीं और एक लड़का नीरा (पानी की बोतल) बेंच रहा था और उन तीनों ही दुकान पर उस समय कोई ग्राहक नहीं दिखा था। आज भारी चहल-पहल है, अस्थाई किस्म की सैकड़ों दुकानें स्थाई स्थायित्व के भाव से जमी हुई हैं। कपड़े, जूते, सब्जी फल समेत तमाम चीजें बेची जा रही हैं। इस दो सौ मीटर के मार्ग में कोई भी वाहन नहीं है। वजह यह है कि यहाँ तक कोई वाहन आ ही नहीं सकता है। यह सोचते ही सबसे पहले ख्याल आता है कि यदि कभी दुर्भाग्य से यहाँ कोई हादसा हो गया तो एम्बुलेंस भी यहाँ तक नहीं पँहुच सकती है। यदि आप को  किसी बीमार यात्री के साथ यात्रा करना पड़ जाए तो आपके सामने कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थित निर्मित हो सकती है यह आप अपनी निजी संवेदना के सहारे महसूस कर सकते हैं।

इतनी बड़ी भीड़ और न्यूनतम सुविधा का इतना बड़ा अभाव चिंतित करने वाला है। आखिर जिन यात्रियों से रेलवे कमा रहा है, उनके प्रति, उसकी मूलभूत सुविधाओं के प्रति आखिर सरकार क्यों आँख पर पट्टी बांध कर बैठी हुई है? यहाँ के जन प्रतिनिधि क्या कभी अपनी लग्जरी गाड़ी से उतरकर इस स्टेशन पर नहीं आए होंगे? आए भी होंगे तो मेरा दिल यह यकीन करने को तैयार नहीं है क्योंकि जिस जनता के वोट से वह चुने गए हैं उसके प्रति उनके मन में कोई द्वेष तो होगा नहीं। ऐसे में यदि वह आए  होते तो अपने लोगों को इस तरह उनकी हालत पर कत्तई नही छोड़ते। फिलहाल, 200 मीटर की यात्रा पूरी करने के बाद हम उस दुरभिसंधि पर आ खड़े हुए हैं जहां सबसे पहले मुक्तिबोध की यह कविता याद आ रही है-

वह बिठा देता है तुंग शिखर के

खतरनाक, खुरदरे कगार तट पर

शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता है मुझको।

कहता है – “पार करो पर्वत-संधि के गह्वर,

रस्सी के पुल पर चलकर

दूर उस शिखर कगार पर स्वयं ही पँहुचो।”

अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा,

मुझे डर लगता है ऊंचाइयों से।।

नायगांव पूर्व स्टेशन के रास्ते पर भीड़

दस साल पहले जिस डरे, सहमे पुल से यह दुरभिसंधि पार की थी, वह अब अपने ही शोक का घड़ियाल बना एक किनारे पर पड़ा है और राहगीरों के लिए पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। उसके बगल में एक अधूरा पुल उसका परिहास करता हुआ बैशाखी के सहारे लोगों को पार उतार रहा है। यह उन सौभाग्यशाली पुलों में से एक है जो बिना पूरा हुए ही लगभग पाँच-छह सालों से लोगों के काम आ रहा है, जबकि हमने कितने दुर्भाग्यशाली पुलों को भी देखा है जो बनने के बाद भी तात्कालिक समय के किसी महान आदमी की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जो अपने हाथों से उनकी गर्भनाल काटकर दुनियादारी करने की आजादी दे दे।

पुल बने लगभग छह साल से ज्यादा का समय बीत चुका है पर इतने सालों में यह उस रास्ते से नहीं जुड़ सका है जिस तक जाने के लिए लोग इसे एक मुकम्मल पुल का दर्जा दे सकें। पता चला कि यह पुल जब निर्माणाधीन अवस्था में था तभी पुराना पुल जिस पर सिर्फ पैदल ही चला जा सकता था वह पैदल चलने वालों से भी नाराज हो गया था। दरअसल, वह किसी भीड़ के पांव की ठोकर खाने के लिए बना ही नहीं था वह तो बस कभी-कभार कुछ खुशमिजाज तलुओं का रूमानी आघात सहना चाहता था। अचानक सस्ते मकानों के लिए नायगांव इस लाइन का सबसे बड़ा बाजार बन गया। वह तमाम मध्यवर्ग जो किसी तरह से मुंबई में ‘अपने घर’ का मालिक बनना चाहता था वह धड़धड़ाते कदमों से नायगांव पूर्व कि ओर बढ़ता चला आया। इन्हीं धड़धड़ाते हुए कदमों की बेतरतीब आवाजाही में पुराने पुल की रूमानी दुनिया बलतकृत देह में बदल गई। ऐसा नहीं था कि उसके प्रति जनसेवकों कि कोई संवेदना नहीं थी, उन्होंने अपनी कूबत भर उसकी मरहम-पट्टी भी करवाई ही थी पर दुर्भाग्य से वह भी उन पैरों को नहीं रोक सकते थे जिससे इस पुल का अस्तित्व कुचला जा रहा था।

ऐसे में बड़ी सूझ-बूझ दिखाते हुए इस अर्धनिर्मित, रास्ताविहीन पुल को सीढ़ियों से जोड़कर पुराने पुल से रिश्ता तोड़ लिया गया। जिस रास्ते को भविष्य और सुगम तौर पर देखने को आतुर था अब वह और भी दुष्कर रूप में सामने आ चुका था। नायगांव की मिट्टी में खड़े होने की जिस लोहे की हिम्मत नहीं होती थी अब वही टूटे-बिखरे रास्ते पर बैशाखी बनकर लोगों को वह दुरभिसंधि पार करा रहा था जिसे पार कर वह अपने सपनों के चाँद को छूने की ख्वाहिश रखते थे। पिछले लगभग 6 साल से चलती यह बैशाखी भी नमक लगे पाँव के तले कुचले जाने से अपना फौलादी रुतबा खो चुकी है। कुशल इंजीनियर लोहे की पटरियों को रेशम के धागे से रफू करके चमकाने की झूठी कोशिश करते हैं पर सचमुच में यह सीढ़ियाँ अब यही कहती हैं कि अपनी जान-माल की हिफाज़त आप का अपना सरोकार है। अब हम भी इन्ही कांपती-हाँफती सीढ़ियों के सहारे पुल पर चढ़ चुके हैं। सामने पूर्व और पश्चिम को जोड़ने वाला एक ओवर ब्रिज चमकता हुआ खड़ा है जिस पर इक्का-दुक्का सवारियाँ भी गुजर रही हैं। जिसकी भव्यता दिखाकर यहाँ के तमाम बिल्डर अपने फ्लैटों का रेट पूरी निर्ममता से बढ़ा रहे हैं। खैर पुल पर चढ़ना जितना मुश्किल और डरावना था उतरना भी उतना ही कठिन मामला है। पर एक सुखद मामला यह जरूर था कि पुल के पूर्वी छोर को सड़क से जोड़ कर भीड़ को विभाजित कर दिया गया था। अब केवल पूर्वी नायगांव के रहनेवाले लोगों को ही इन सीढ़ियों से उतरना पड़ रहा था। नीचे कई कतार में आटो रिक्शे खड़े हैं। अलग-अलग जगह जाने के लिए अलग-अलग लाइनों में खड़े लोग अपने हिस्से के आटो की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यहाँ ऑटो मीटर से नहीं बल्कि चालक के मन से चलते हैं। ऑटो रिक्शा ड्राईवर सिर्फ स्थानीय निवासी हैं शेष मुंबई की तरह यहाँ कोई प्रवासी भले ही वह मराठी ही क्यों न हो यहाँ रिक्शा नहीं चला सकता है। रिक्शा साझे फंडे पर चलते हैं, कम से कम पाँच सवारियाँ और मामला ठीक बन जाने की स्थिति छह सवारियाँ बैठाई जाती हैं। प्रति यात्री किराया कम से कम 15 रुपये लिए जाते हैं। अगर आप अकेले रिक्शे में यात्रा करना चाहते हैं तो शेष चार सवारियों का किराया चुकाकर ही आप यह शौक पूरा कर सकते हैं। शायद एक गुम सिरा मानकर आरटीओ या प्रशासन की इन पर कभी नजर नहीं जाती है या फिर किसी और तरह का याराना हो तो कुछ कहा नहीं जा सकता। शायद यहाँ का पूरा विधान इन रिक्शा वालों के हिसाब से ही बनता है। उनके सही गलत की बात करना संभव नहीं है।

नायगांव स्टेशन

सरकार द्वारा चलाई जा रही बस भी इनकी दया पर ही चलती है। अन्य चार सवारियों के साथ अपने हिस्से का 15 रुपये देकर लगभग 1 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए मैं अपने गंतव्य तक पँहुच चुका हूँ। रास्ते में नमक के चमकते हुए खेत दिखते हैं और उसके बाद बिल्डिंगों का एक पूरा जंगल नायगांव पूर्व में उगा हुआ है। लाखों की संख्या में यहाँ लोग रहते हैं। हिन्दू, क्रिश्चियन के साथ अच्छी संख्या मे मुस्लिम आबादी भी यहाँ है। यहाँ के ज्यादातर लोग मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय समाज से हैं। यह वह समाज है जो एडजस्ट करने का हुनर पेट से लेकर ही पैदा होता है। पानी की सप्लाई लाइन बिछी हुई है पर पानी कभी-कभार ही आता है। जिसकी वजह से पानी यहाँ का सबसे बड़ा बिज़नस बना हुआ है। घरेलू कामों के लिए टैंकर से पानी का व्यापार चल रहा है तो प्यास बुझाने के लिए प्यूरीफाई पानी बोतलों में बंद कर बेंचा जा रहा है। शायद दुर्भाग्य ही है कि यहाँ के लोगों को अभी कोई ऐसा नेता नहीं मिला है जो इनके हित में संघर्ष कर सके। जो इनके लिए उस पुल का निर्माण करवा सके जिसे सुगमता से पार कर यहाँ के लोगों का सपना भी उड़ान भर सके। यहाँ मन में कुछ सवाल भी उठ रहे हैं कि जो बिल्डर यहाँ लोगों का घर बेंचकर, करोड़ों कमा रहे हैं क्या उनके प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या नायगांव की तेजी से बढ़ती भीड़ किसी अप्रत्याशित हादसे का इंतजार कर रही है? सबसे बड़ा सवाल कि क्या नायगांव के लोग इस टूटे पुल और ऊबड़-खाबड़ रास्ते से चलकर ज़िंदगी की दूरी नापने को अपनी नियति मान चुके हैं? अगर ‘हाँ’ तो मुझे और कुछ नहीं कहना है। फिलहाल अभी तो हम टूटी सीढ़ियों पर ख्वाबों के पंख लगाकर चल रहे लोगों के लिए दुआ कर रहे हैं कि उन्हें अपनी मंजिल तक ले जाने वाला मुकम्मल रास्ता मिले।

गाँव के लोग
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